हरेला त्योहार का उत्सव रिज़ीलियेन्स के रूप में रीति-रिवाज

Updated on August 27, 2026

उत्तराखण्ड राज्य में मनाया जाने वाला त्योहार ‘‘हरेला’’ एक जीवंत व महत्वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार प्रकृति के साथ इस क्षेत्र के गहरे जुड़ाव, कृषि-सम्बन्धी परम्पराओं व समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। मुख्य रूप से उत्तराखण्ड के कुमाउं क्षेत्र में मनाया जाने वाला ‘‘हरेला’’ का त्योहार, आध्यात्मिकता व पर्यावरण के प्रति जागरूकता का मेल है। साथ ही यह मानव व पर्यावरण के बीच सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की याद दिलाता है।


उत्तराखण्ड में ऐसे कई रीति-रिवाज/त्योहार हैं, जो समुदाय व प्रकृति के बीच पारम्परिक जुड़ाव को दर्शाते हैं। इन्हीं प्रमुख त्योहारों में से एक है ‘‘हरेला’’। कुमाउंनी भाषा में ‘‘हरेला’’ का अर्थ है- ‘‘हरियाली का दिन’’। यह भारत के उत्तराखण्ड राज्य में मनाया जाने वाले एक जीवन्त व महत्वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार प्रकृति के साथ इस क्षेत्र के गहरे जुड़ाव, कृषि से जुड़ी परम्पराओं व गहरी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। मुख्य रूप से उत्तराखण्ड के कुमाउं क्षेत्र में मनाया जाने वाला ‘‘हरेला’’ त्योहार मनुष्य व पर्यावरण के बीच ताल-मेल व सह-अस्तित्व की याद दिलाता है, जिसमें आध्यात्मिकता व पर्यावरण के प्रति जागरूकता का अनूठा मेल दिखता है।

उत्पत्ति व महत्व

उत्तरखण्ड, अपनी बहुत पुरानी कृषि परम्पराओं के कारण, जीवन-यापन व आर्थिक समृद्धि, दोनों के लिए खेती पर बहुत ज्यादा निर्भर है। ‘‘हरेला’’ इस क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक त्योहारों में से एक है, जो बुवाई का मौसम प्रारम्भ होने का संकेत देता है तथा खेती के जीवन के चक्र को उल्लास के साथ मनाता है। कुमाउं की कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा ‘‘हरेला’’ त्योहार पारम्परिक रूप से मानसून के मौसम ;जुलाई-अगस्त ;हिन्दी माह श्रावणद्ध से सम्बन्धित है। यह भगवान शिव व देवी पार्वती के दिव्य मिलन का भी प्रतीक है, जो उपजाउपन व समृद्धि के भाव को प्रदर्शित करता है। साथ ही कृषि से जुड़ी चीजों को देवताओं को अर्पित करके उनकी पूजा करने की पवित्र परम्परा को भी बताता है।

हर्षोल्लास व उत्साह पूर्ण यह त्योहार कई तरीकों से आशा, एकता व भूमि के प्रति सम्मान को दर्शाता है। ‘‘हरेला’’ मानसून की शुरूआत व खेती के मौसम के आरम्भ होने का प्रतीक है। किसानों का मानना है कि, ‘‘हरेला’’ उत्सव के दौरान बीज की बुवाई कर दी जाये तो अच्छी फसल होती है। यह त्योहार लोगों के जीवन में खेती की मुख्य भूमिका को फिर से रेखांकित करता है और उत्तराखण्ड में आजीविका के मुख्य आधार के तौर पर खेती के महत्व को रेखांकित करता है।

उत्तराखण्ड के हरे-भरे परिदृश्य के बीच मनाया जाने वाला ‘‘हरेला’’ त्योहार वास्तव में प्रकृति प्रदत्त उपहारों का पर्व है। जब मानसून के कारण पहाड़ हरियाली की रंग-बिरंगी चादर से ढंक जाते हैं, तो यह त्योहार लोगों को उन प्राकृतिक संसाधनों की सराहना व सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है जो जीवन को बनाये रखते हैं।

उर्वरता व शक्ति की प्रतीक देवी शक्ति को समर्पित ‘‘हरेला’’ त्योहार, आर्शीवाद, अच्छी बारिश व खेती के सफल होने की एक आध्यात्मिक प्रार्थना है। किसान भूमि को उपजाउ बनाने व फसल अच्छी होने की कामना के लिए देवी शक्ति की प्रार्थना करते हैं। यह इस क्षेत्र मानव व प्रकृति के बीच गहरे आध्यात्मिक जुड़ाव को दर्शाता है।

‘‘हरेला’’ उत्तराखण्ड की संस्कृति का एक प्रमुख भाग है। छोटे बर्तनों में बीज बोने, मिट्टी की मूर्तियां बनाने व लोक संगीत व नृत्य में भाग लेने जैसी पुरानी परम्पराओं के माध्यम से, यह त्योहार पीढ़ियों से चली आ रही रीति-रिवाजों व परम्पराओं को बचाये रखने में मदद करता है। यह इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का एक जीता-जागता उदाहरण है।

खेती व आध्यात्मिक महत्व के अतिरिक्त, ‘‘हरेला’’ का त्योहार साथ मिलकर खुशियां मनाने का समय भी है। परिवार व पड़ोसी मिलकर उत्सव मनाते हैं, पारम्परिक भोजन का आनन्द लेते हैं और विभिन्न रीति-रिवाजों में प्रतिभाग करते हैं। मिल-जुलकर त्योहार मनाने की यह भावना सामाजिक रिश्तों को सशक्त बनाती हैं और गांवों व समुदायों के बीच आपसी जुड़ाव की भावना को प्रोत्साहित करती है।

हाल के वर्षों में, हरेला पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का एक मंच भी बन गया है। पेड़ लगाने व पर्यावरण-अनुकूल अभियान जैसी गतिविधियां अब सामान्य तौर पर होने लगी हैं, जो स्थाईत्व के प्रति लोगों की जागरूकता को दर्शाती हैं। उत्तराखण्ड जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में, यह त्योहार पर्यावरण के साथ सामंजस्य बिठाकर रहने के महत्व को भी बताता है।

‘‘हरेला’’ का उत्सव

‘‘हरेला’’ का त्योहार मानसून के आगमन व सावन मास की शुरूआत ;कर्क संक्रान्ति/16 जुलाई के आस-पासद्ध के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जो दस दिनों तक चलता है। समुदाय के लोग ‘‘हरेला’’ अर्थात् 16 जुलाई से दस दिन पूर्व, परिवार बांस की छोटी टोकरियों में अनाज ;जैसे जौ, गेंहू और मक्काद्ध और स्थानीय दालों ;सामान्यतः समुदाय व मौसम के हिसाब से सात, पांच या ग्यारह प्रकार केद्ध बीज बोते हैं। यहां बोयी जाने वाली फसलों में गेंहूं, जौ, काला सोयाबीन, उड़द, कुल्थी, धान और सरसों शामिल हैं।

त्योहार के दिन तक, इन बीजों में से हरे-भरे अंकुर निकल जाते हैं, जो नये जीवन का प्रतीक होते हैं। यह भी मान्यता है कि ‘‘हरेला’’ जितना बड़ा व हरा-भरा होगा, आने वाले मौसम में मुख्य फसल भी उतनी ही अच्छी व भरपूर होगी। मुख्य त्योहार वाले दिन ‘‘हरेला’’ कहलाने वाले इन अंकुरों को काटकर घर के बड़े-बुजुर्ग आर्शीवाद के तौर पर परिवार के सदस्यों के सिर पर रखते हैं। इस दौरान सुख-समृद्धि व भलाई की कामना करते हुए पारम्परिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। त्योहार के दौरान भगवान शिव, देवी पार्वती व भगवान गणेश जैसी देवी-देवताओं की मिट्टी की मूर्तियां बनायी व पूजी जाती हैं, जिन्हें ‘‘दिकारे’’ या ‘‘दिकार’’ कहा जाता है।

यद्यपि, ‘‘हरेला’’ के दो कम जाने-पहचाने लेकिन उतने ही महत्वपूर्ण रूप आश्विन ;अक्टूबर-नवम्बरद्ध और चैत्र ;मार्च-अपै्रलद्ध में मनाये जाते हैं, जो खेती के चक्र के अहम् पड़ावों को दर्शाते हैं ;बाक्स-1 देखेंद्ध। ये त्योहार अच्छी फसल व प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए खेती करने वाले समुदाय की ईश्वर के आर्शीवाद पर निर्भरता को दिखाते हैं।

लगभग तीन दशकों पहले तक ‘‘हरेला’’ त्योहार के तीनों रूप अर्थात् मानसून, आश्विन व चैत्र ‘‘हरेला’’ का त्योहार बड़े धूम-धाम व उल्लास के साथ मनाया जाता था, लेकिन आज ‘‘मानसून हरेला’’ अर्थात सावन का त्योहार बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। लोग आश्विन व चैत्र हरेला का त्योहार कम ही

मनाते हैं। इसके कई कारण हैं, जो इस प्रकार हैं-
ऽ अब लोग अनाज के स्थान पर फलों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं।
ऽ मौसम की अनिश्चितता, जिसकी वजह से खेती का पारम्परिक समय बाधित होता है। और
ऽ पीढ़ियों से चली आ रही पारम्परिक ज्ञान विलुप्त हो रही है।

उत्तराखण्ड राज्य में नैनीताल जिले भीमताल जैसे क्षेत्रों में ‘‘हरेला मेला’’ का आयोजन 16 जुलाई से 21 जुलाई तक आयोजित किया जाता है। पांच दिनों तक चलने वाले इस मेले में स्थानीय हस्तकलाओं, संगीत एवं पारम्परिक प्रस्तुतियां देखने को मिलती हैं, जो उत्तराखण्ड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।

जलवायु के प्रति रिजीलियेन्स को सशक्त करना

‘‘हरेला’’ एक ऐसे त्योहार के रूप में विकसित हुआ है जो न केवल खेती-बाड़ी की भरपूर उपज की खुशी मनाता है, वरन् पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर देता है। यह त्योहार प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन के लिए स्थाई विकास के लक्ष्यों व प्रकृति आधारित समाधानों के साथ प्रभावी ढंग से जुड़ता है। ‘‘हरेला’’ त्योहार जलवायु के अनुसार ढलने व जोखिम कम करने की एक पारम्परिक व्यवस्था है। खेती के मुख्य चक्रों के साथ रीति-रिवाजों को जोड़कर, ‘‘हरेला’’ स्थाई खेती की विधियों, पर्यावरण के प्रति जागरूकता व जलवायु से जुड़ी अनिश्चितताओं से निपटने हेतु समुदाय की तैयारी को सशक्त करता है।

यह त्योहार मौसम का अनुमान लगाने के लिए माध्यम के तौर पर भी कार्य करता है। ‘‘हरेला’’ का समय ;सावन/जुलाई, अश्विन/ अक्टूबर, चैत्र/मार्च-अप्रैलद्ध खेती के प्रमुख चरणों- मानसून में बुवाई, सर्दियों की फसल लगाना व कटाई के समय से मेल खाता है। यह पारम्परिक ज्ञान का एक हिस्सा होने के कारण देशी पंचांग की तरह कार्य करता है। इस क्षेत्र के बड़े-बुजुर्ग ‘‘हरेला’’ के दौरान बारिश, ओलावृष्टि या सूखे का अनुमान लगाने हेतु प्राकृतिक संकेतों जैसे- पक्षियों का व्यवहार, बादलों का तरीका आदि का प्रयोग करते हैं। इससे पूर्वानुमान से किसानों को बुवाई/कटाई के समय में परिवर्तन करने में सहायता मिलती है।

 

बाक्स 1: हरेला की प्रासंगिकता:

अश्विन हरेला: कटाई एवं बुवाई

ऽ चन्द्र कैलेण्डर के सातवें माह ;अश्विनद्ध में मनाया जाने वाला यह त्यौहार गर्मियों के फसलों जैसे- धान व बाजरा की कटाई तथा सर्दियों की फसलों जैसे- गेंहूं व जौ की बुवाई के समय आता है।
ऽ किसान देवी-देवताओं की पूजा करते हैं तथा अच्छी कटाई, सही भण्डारण व बैमोसम बारिश या ओलावृष्टि से सुरक्षा के लिए आर्शीवाद मांगते हैं, क्योंकि इस दौरान ऐसी मौसमी घटनाओं का होना सामान्य बात है।
ऽ इन रीति-रिवाजों में गर्मियों की फसल के लिए आभार व्यक्त करने व आने वाली सर्दियों की फसल के सफलतापूर्वक होने के लिए प्रार्थना करने पर जोर दिया जाता है।

चैत्र हरेला: सर्दियों की फसल का त्योहार

ऽ चैत्र अर्थात् मार्च-अप्रैल में मनाया जाने वाला यह त्योहार सर्दियों की फसलों की कटाई का प्रतीक है। यह वह महत्वपूर्ण समय होता है, जब किसान गेंहूं, जौ व अन्य मुख्य फसलों को काटने व भण्डारण करने की तैयारी करते हैं।
ऽ चूंकि बसन्त ऋतु के प्रारम्भ में ओलावृष्टि व अनियमित बारिश से फसलों को प्रायः जोखिम रहता है। इसलिए समुदाय सुरक्षित कटाई के लिए दैवीय कृपा पाने हेतु अनुष्ठान करते हैं।
ऽ यह त्योहार खाद्य सुरक्षा की उम्मीद का भी प्रतीक है, क्योंकि भण्डारित किये गये अनाज से ही परिवारों का वर्ष भर जीवन-यापन होता है।

 

यह त्योहार सुरक्षा के एक अनुष्ठान के तौर पर भी मनाया जाता है, क्योंकि किसान ओलावृष्टि ;जो मार्च-अप्रैल में एक सामान्य बात हैद्ध से बचाव व समय पर बारिश के लिए प्रार्थना करते हैं, जिससे फसल को होने वाला नुकसान का जोखिम कम हो जाता है। इसके अतिरिक्त, छोटी टोकरियों में जौ/गेंहू व दालों के बीज बुवाई की रस्म ;जिन्हें बाद में देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है।द्ध बीजों को सुरक्षित रखने का एक पारम्परिक तरीका है। इससे यह भी सुनिश्चित होता है कि फसल की अच्छी प्रजातियां विपरीत मौसम में भी सुरक्षित रहें। साथ ही यह अच्छे खराब बीजों को अलग-अलग करने की एक पारम्परिक प्रक्रिया भी है।

इस त्योहार को मनाने से मृदा व जैव विविधता के संरक्षण में भी सहयोग मिलता है। पारम्परिक रूप से ‘‘हरेला’’ ओक, बांस या फलों के पेड़ लगाये जाते हैं, जो भारी बारिश के दौरान मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, भूजल पुनर्भरण में मदद करते हैं और जैव विविधता को बनाये रखते हैं। उदाहरणस्वरूप, ओक के जंगल हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाये रखने में सहयोग करते हैं।

कई गांव ‘‘हरेला’’ के दौरान ‘‘देव वन’’ ;पवित्र वनद्ध निर्धारित करने की प्रक्रिया आयोजित करते हैं। इस प्रक्रिया से स्थानीय पेड़-पौधांे को बचाया जाता है व वन संसाधनों के संरक्षण के माध्यम से मुश्किल समय के लिए सुरक्षा मिलती है। समुदाय पेड़ लगाने हेतु चलाये गये अभियानों में भागीदारी करते हैं और शिक्षण संस्थान छात्रों को पौधे लगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिससे पर्यावरण का संतुलन बनाये रखने का महत्व और भी अधिक प्रासंगिक व महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस त्योहार के दौरान परिवार आपस में एक-दूसरे को उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं और समुदायिक स्तर पर मेलों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें लोग परम्पराओं व अध्यात्म से जुड़े गीतों को गाते हैं। इस प्रकार यह त्योहार सामाजिक सौहार्द को भी मजबूत बनाता है।

निष्कर्ष:

‘‘हरेला’’ जैसे सांस्कृतिक त्योहार सिर्फ रीति-रिवाज नहीं हैं, वरन् ये कुमाउंनी लोगों व उनकी खेती के बीच गहरे जुड़ाव को दर्शाते हैं। ‘‘हरेला’’ से पहले, समुदाय मिलकर खेतों को तैयार करते हैं और सीढ़ीदार खेतों की मरम्मत, खेती का प्रबन्धन आदि के माध्यम से मौसम की मार से निपटने के लिए आपसी सहयोग की भावना व प्रणाली को सशक्त बनाते हैं। वहीं, त्योहार की रस्में अनाज को सुरक्षित रखने पर जोर देती हैं। यह मौसमी अनिश्चितताओं अथवा कीटों के कारण फसल बरबाद होने की स्थिति में बीज को छांटने व उन्हें सुरक्षित रखने के माध्यम से मुश्किल स्थितियों से निपटने की एक रणनीति है। इसके अतिरिक्त, इस परम्परा में मानसिक मजबूती व सांस्कृतिक सहयोग के माध्यम से कठिनाईयों का सामना करने का पहलू भी शामिल है। इस तरह के त्योहार मनाने से, एक तरफ मौसमी जोखिमों जैसे- ओलावृष्टि से फसल बरबाद होना आदि को लेकर किसानों की चिन्ता कम होती है तो दूसरी तरफ ‘‘हरेला’’ के दौरान कहानियों व गीतों के माध्यम से पीढ़ियों के बीच ज्ञान का आदान-प्रदान होता है, जिससे नई पीढ़ी को कठिन स्थितियों में खेती करने की विधियों जैसे- मिश्रित खेती, सीढ़ीदार खेती आदि के बारे में जानकारी व सीख मिलती है।

इस प्रकार, निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यह त्योहार परम्परा व आज के दौर की पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संगम है तथा यह उत्तराखण्ड की अपनी सांस्कृतिक विरासत व प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की समुदाय की प्रतिबद्धता का सबूत है। अपनी परम्पराओं को पुनः अपनाकर, यह क्षेत्र आधुनिक जलवायु सम्बन्ध खतरों का सामना कर सकता है और साथ ही अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी बचाये रख सकता है, क्योंकि यह त्योहार लोगों, जमीन व परम्परा के बीच गहरे जुड़ाव की भी एक सशक्त याद दिलाता है। यह न केवल खेती के नये मौसम की उम्मीद का उत्सव मनाता है, वरन् एकता, कृतज्ञता व पर्यावरण की देख-भाल जैसे मूल्यों को भी सशक्त करता है।

सन्दर्भ
भट्ट एच, जुगरान एच.पी. एवं पाण्डेय आर. द्वारा लिखित ‘‘भारतीय पश्चिमी हिमालय के सामुदायिक वनों के प्रबन्धन हेतु सांस्कृतिक पारिस्थितिकी प्रणाली सेवाओं का सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताओं व पारम्परिक पारिस्थितिकी ज्ञान के साथ सम्बन्ध’’, इकालाॅजिकल इण्डिकेटर्स, 166, 2024, 112379।

ई-मेल: ींतेीपजण्चंदजर/हइचपीमकण्दपबण्पद

ब्सपउंजम तमेपसपमदज ंितउपदह
स्म्प्ै। प्छक्प्।ए टवसण् 27ए छवण्2ए श्रनदम 2025

पद्धतिद्ध’’ जैसी नई तकनीकें अपनाने को प्रोत्साहित किया। मुझे गर्व है कि अब मैं अपने परिवार व समुदाय के लिए ज्यादा योगदान दे सकती हूं।’’


हर्षित पन्त
वैज्ञानिक - सामाजिक-आर्थिक विकास केन्द्र ;सीएसईडीद्ध
जी0बी0 पन्त हिमायली पर्यावरण राष्ट््रीय संस्थान
कोसी-कतरमाल, अल्मोड़ा - 263 643, उत्तराखण्ड Email: harshit.pantj@gbpihed.nic.in

Source: Climate resilient farming, LEISA INDIA, Vol. 27, No.2, June 2025