यथोचित कृषि उपकरणों तक पहुंच से न केवल उत्पादकता में वृद्धि होती है, वरन् इससे श्रम की कमी जैसी समस्या का समाधान भी होता है। कृषि उपकरण बैंक पहल यह दर्शाती है कि कैसे कृषि उपकरण आसानी से उपलब्ध कराये जा सकते हैं, साथ ही पर्याप्त राजस्व भी उत्पन्न किया जा सकता है और ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं को कृषि में लाभप्रद तरीके से शामिल किया जा सकता है।
पिछले 35 वर्षों में, उदारीकरण, वैश्वीकरण एवं निजीकरण के कारण भारत में तीव्र गति से तकनीकी एवं औद्योगिक विकास हुआ है। परिणामतः, खेती में भी नई व आधुनिक तकनीकों को अपनाया गया है। लकड़ी के पारम्परिक औजारों व बैलों की जगह अब शक्तिशाली ट््रैक्टरों व लोहे के उपकरणों ने ले ली है। हर दिन एडवांस्ड तकनीकों पर आधारित नये-नये उपकरण बाजार में आ रहे हैं, जिससे इन उपकरणों को बनाने वाली बड़ी निर्माता कम्पनियों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा हो रही है।
यद्यपि, आर्थिक रूप से किसानों की स्थिति इतनी बेहतर नहीं है कि वे आसानी से इन सभी तकनीकी बदलावों को अपना सकें। इसलिए, उनकी सहायता हेतु, केन्द्र व राज्य सरकारों ;महाराष्ट््र सहितद्ध ने कई अनुदान व ऋण योजनाएं प्रारम्भ की हैं। इसी कड़ी में भारत में पहला ‘‘उपकरण बैंक’’ प्रयोग जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर ;मध्य प्रदेशद्ध व महात्मा फूले कृषि विश्वविद्यालय, राहुरी, जिला- अहमदनगर ;महाराष्ट््रद्ध में किया गया था।
कई तरह के ग्रामीण विकास का काम करने वाली ‘‘ज्ञान प्रबोधिनी’’ नामक स्वयंसेवी संगठन का हरली केन्द्र महाराष्ट््र के धराशिव जिले के ब्लाक लोहरा में है, जिसका मुख्य कार्यालय पुणे में स्थित है। यह केन्द्र एक विद्यालय व कृषि डिप्लोमा काॅलेज चलाने के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण, वाटरशेड डेवलपमेण्ट, जैविक खेती व ग्रामीण युवाओं के लिए उद्यमिता विकास के क्षेत्रों में भी कार्य करता है।
कृषि उपकरण बैंक
ज्ञान प्रबोधिनी के हरली केन्द्र पर फरवरी, 2024 में ‘‘प्रबोधिनी कृषि उपकरण बैंक’’ की शुरूआत की गयी। इस कृषि उपकरण बैंक का मुख्य उद्देश्य, आर्थिक रूप से कमजोर व नये उपकरण न खरीद सकने वाले लघु एवं सीमान्त किसानों को किराये पर कृषिगत उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। साथ ही इस कार्य के संचालन व प्रबन्धन में स्थानीय खेती-किसानी से जुड़े युवाओं का शामिल करना है। कृषि उपकरण बैंक को कई उद्देश्यों के साथ प्रारम्भ किया गया।
ऽ छोटी जोत/आर्थिक रूप से कमजोर किसानों तक पहुंच: प्रायः छोटी जोत के व आर्थिक रूप से कमजोर किसान कृषि सम्बन्धी आधुनिक उपकरणों को नहीं खरीद पाते। ‘‘उपकरण बैंक’’ का उद्देश्य ऐसे किसानों को हाथ से चलने वाले छोटे उपकरणों को आसानी से उपलब्ध कराना है ताकि उनकी उत्पादन लागत कम हो सके।
ऽ ट््रैक्टर मालिकों के लिए सहयोग: सरकारी योजनाओं के सहयोग से, हाल के वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में ट््रैक्टरों की संख्या बढ़ी है। परन्तु, ट््रैक्टर के साथ-साथ, अन्य बहुत से कार्यों के संचालन हेतु अतिरिक्त कृषि उपकरणों की आवश्यकता किसानांे को पड़ती है, जिससे उनके उपर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। ये उपकरण बैंक आवश्यक उपकरणों को किराये पर देकर, इन ट््रैक्टर मालिकों को उनके कृषि आधारित व्यापार को बढ़ाने हेतु सक्षम बनाने में सहयोग करते हैं।
ऽ ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार: खेती में मजदूरों की कमी हर दिन बढ़ती जा रही है। युवा खेतों में काम करने से कतराने लगे हैं। साथ ही, ग्रामीण युवाओं में बेरोजगारी एक गम्भीर समस्या बनती जा रही है। युवाओं को आधुनिक, मशीन से चलने वाले खेती के औजारों, जैसे पावर बीडर, पावर टिलर और स्प्रेयर का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्हें खेती के उपकरणों का उपयोग करने पर प्रशिक्षण दिया जा सकता है, जिससे उनके लिए स्वरोजगार के मौके बन सकते हैं।
बैंक की शुरूआत
उपकरण बैंक प्रारम्भ करने से पूर्व, हमने 3 गांवों के किसानों, युवाओं एवं ट््रैक्टर मालिकों के साथ बैठकें कीं। जिन विषयों पर चर्चा की गयी, वे मुख्य रूप से निम्नवत् रहे -
ऽ वह कीमत, जो उनके लिए चुकाना आसान हो।
ऽ वर्ष में हर उपकरण का कितने दिन उपयोग होगा।
ऽ युवाओं के लिए काम की दर क्या होगी।
ऽ डपकरण बैंक को दिया जाने वाला किराया क्या होगा।
ऽ किसान द्वारा प्रति एकड़ दिया जाने वाला किराया और
ऽ इस पहल से युवाओं को मिलने वाला रोजगार
‘‘प्रबोधक उपकरण बैंक’’ में इस समय ट््रैक्टर से चलने वाले 28 उपकरण, 5 प्रकार के स्वचालित मशीन 9 एवं 14 प्रकार के हाथ से चलने वाले 40 उपकरण, इस प्रकार कुल मिलाकर 47 विभिन्न प्रकारों के 77 उपकरण हैं।
हमने अपने क्षेत्र में नये प्रकार के पावर टिलर व वीडर के लिए वर्ष में दो बार प्रशिक्षण सत्रों का आयोजन किया। इस प्रशिक्षण में खेती से जुड़े पन्द्रह युवाओं ने प्रतिभाग किया। उन्हें इन उपकरणों को चलाने के बारे में तकनीकी जानकारी प्रदान की गयी और अभ्यास भी करवाया गया। इस कार्य हेतु उपकरण बेचने वालों एवं दुकानदारों के सहयोग से प्रशिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित कराई गयी। साथ ही हरली केन्द्र पर कार्य के दौरान प्रक्षेत्र प्रशिक्षण भी दिया गया। कभी-कभी, यदि कोई नया किसान इन उपकरणों का प्रयोग करने में रूचि प्रदर्शित करता है, तो उसे अलग से प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण का समय दो घण्ट से लेकर 2 दिन तक का हो सकता है। अभी हम मुख्य रूप से युवाओं व पुरूष किसानों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। हमने 2 युवाओं को उपकरणों के रख-रखाव व मरम्मत का प्रशिक्षण दिया है।
सामान्यतः, हमारे पास प्रत्येक उपकरण मात्रा में केवल एक ही उपलब्ध होते हैं। यह सच है कि कुछ उपकरण ऐसे हैं, जिनकी बहुत ज्यादा मांग रहती है। इसलिए, सीजन के दौरान किसी एक उपकरण की मांग बहुत बढ़ जाती है। जब उपकरण कम हों और मांग अधिक होती है, ऐसी स्थिति में, हम पूर्व में ही किसानों का पंजीकरण कर लेते हैं। चूंकि कई किसान हमारे नियमित सम्पर्क में रहते हैं, इसलिए कोई विवाद की स्थिति उत्पन्न भी होती है, तो उसे बात-चीत के माध्यम से हल कर लिया जाता है।
उपकरण परिवहन के तरीके:
हाथ से चलने वाले उपकरण छोटे आकार के होते हैं, इसलिए किसान उन्हें अपने दो-पहिया वाहनों पर लेकर जाते हैं और काम होने के बाद वापस पहुंचा जाते हैं। जिन किसानों के पास अपने वाहन नहीं हैं, उन्हें हम परिवहन की सुविधा उपलब्ध कराते हैं, लेकिन ऐसे किसानों की संख्या बहुत कम है। ट््रैक्टर से चलने वाले उपकरणों के लिए, ट््रैक्टर मालिक खुद आकर उपकरण ले जाते हैं। जबकि स्वचालित पावर टिलर जैसे उपकरणों को कम दूरी अगर है तो चलाकर ले जाते हैं। अगर दूरी ज्यादा हो तो उन्हें किसी सवारी से ले जाते हैं। अगर कार्य भारी होता है, तो किसान व काम करने वाले युवा इसका खर्च उठा सकते हैं। वर्ष में एकाध मौके ऐसे भी आते हैं, जब उपकरणों की बड़ी मरम्मत करानी पड़ जाती है, उस समय बाहरी वाहनों का प्रयोग किया जाता है।
निवेश एवं प्राप्तियां:
उपकरण बैंक के कुल उपकरणों का मूल्य रूपये 45 लाख है। हमने इन उपकरणों को रखने हेतु शेड और अन्य व्यवस्थाओं हेतु रू0 2 लाख के लगभग खर्च किया। इस प्रकार कुल पूंजीगत व्यय रू 47 लाख हुआ। पिछले वर्ष और इस वर्ष के पहले छ माह तक, हमने इस बैंक के माध्यम से उपकरणों को किराये पर देकर रू0 7.5 लाख की आय अर्जित की, जिसमें से रख-रखाव, मरम्मत, आवश्यक उपकरणों की खरीद एवं इस उद्यम में कार्य करने वाले दो युवाओं के वेतन पर कुल रू0 5 लाख खर्च हो गया। शेष रू0 2.5 लाख रिजर्व में रखे गये हैं।
पिछले डेढ़ वर्षों में, इन उपकरणों को 1,400 बार किराये पर दिया व वापस लिया गया। 25 गांवों के 290 किसान इस केन्द्र पर आकर प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हुए हैं। 15 प्रशिक्षित युवा आॅपरेटरों के एक समूह ने 6 नये गांवों में 80 किसानों को सेवाएं दी हैं। दस युवा आॅपरेटर, ट््रैक्टर के स्वामित्व वाले 15 उद्यमी और 60 किसान नियमित रूप से इन उपकरणों का उपयोग करते हैं। ट््रैक्टर मालिकों के समूह ने ट््रैक्टर से चलने वाले उपकरणों का उपयोग करके लगभग 300 किसानों को सेवाएं दी हैं। कुल मिलाकर, उपकरण बैंक से 31 गांवों के 670 किसानों को लाभ हुआ है, जिसमें 370 किसानों को प्रत्यक्ष रूप से और 300 अन्य किसानों को अप्रत्यक्ष रूप से मदद मिली है। नीचे दी गयी तालिका में एकड़ की इकाई में आच्छादित किये गये क्षेत्रफल को प्रदर्शित किया गया है -
तालिका 1: आउटरीच ‘‘धाराशिव जिले के लोहरा के हरली में स्थित ज्ञान प्रबोधिनी किसानों के लिए एक वरदान की तरह है। इन उपकरणों के उपयोग ने खेती-किसानी को और अधिक सस्ता व सुविधाजनक बना दिया है। आधुनिक मशीनरी एवं ज्ञान प्रबोधिनी के विशेषज्ञों को धन्यवाद, जिनके सरल दिशा-निर्देशन एवं सहयोग के कारण मेरी उत्पादकता एवं लाभ में वृद्धि हुई है। मेरा मानना है कि प्रत्येक गांव के पास उसका अपना एक उपकरण बैंक होना चाहिए।’’
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| क्रमांक | लाभान्वित समूह | क्षेत्रफल ;एकड़ मेंद्ध | लाभान्वित किसानों की संख्या |
| 1 | ट््रैक्टर के स्वामित्व वाले उद्यमी | 750 | 300 |
| 2 | प्रबोधक उपकरण आॅपरेटर्स | 300 | 80 |
| 3 | व्यक्तिगत किसान | 300 | 290 |
| क्ुल | 1350 एकड़ ;लगभगद्ध | 670 किसान ;लगभगद्ध |
ग्रामीण युवाओं को शामिल करना: सशक्त बनाने की एक रणनीति
प्रबोधन उपकरण बैंक प्रारम्भ करते समय मुख्य विचार युवाआंे को रोजगार उपलब्ध कराना था। हमने गांव के स्तर पर एक ऐसा माॅडल बनाने के बारे में सोचा, जिससे 10-12 युवाओं के समूह को रोजगार मिल सके। इसके साथ ही, हमने युवाओं के लिए वेल्डिंग, राजमिस्त्री, बढ़ईगिरी आदि तकनीकी प्रशिक्षण देने के बारे में भी सोचा। यद्यपि, हमने यह भी अनुभव किया कि इन कार्यों की मांग पूरे वर्ष भर नहीं रहती है। दूसरी ओर, खेती-बाड़ी में पूरे वर्ष पर्याप्त कार्य रहता है। साथ ही, हमारा मुख्य मकसर यह है कि किसान आसानी से अच्छे आधुनिक उपकरणों का उपयोग कर सकें और उनके सहयोग से कुछ नये प्रयोग भी कर सकंे।
ग्रामीण क्षेत्रों में उपकरण बैंक प्रारम्भ करने से पहले, हमने यह पता लगाया कि क्या महाराष्ट््र में पहले से ऐसी कोई पहल क्रियान्वित है, लेकिन हमें ऐसी कोई पहल नहीं मिली। हमने अपनी पिछली जानकारी व किसानों के साथ बात-चीत के आधार पर खेती में काम आने वाले उपकरणों का चयन किया। इन उपकरणों को खरीदने का निर्णय करते समय हमे ंयह भी पता चला कि कम से कम 100 किमी0 दूर ही ये उपकरण मिलेंगे। साथ ही हमारे क्षेत्र में इन उपकरणों की देख-रेख व मरम्मत के लिए कोई कुशल कारीगर या ऐसी सेवाएं भी उपलब्ध नहीं थीं। इसलिए, हमने देख-रेख व मरम्मत का प्रारम्भिक प्रशिक्षण देने व कुशल कारीगर तैयार करने का निर्णय लिया।
सभी आॅपरेटर्स इन उपकरणों के उपयोग एवं रख-रखाव के उपर प्रशिक्षित हैं। इस प्रयोग के दौरान, यह देखा गया कि एक युवा दिन में 8 घण्टे काम करके प्रतिदिन रू0 800.00 की आय प्राप्त कर सकता है, जिससे यह एक इच्छित रोजगार बन सकता है। उपकरणों का किराया और ईंधन का खर्च निकालने के बाद, युवा प्रतिदिन रू0 800.00 से रू0 2,000.00 के बीच आय अर्जन कर सकते हैं।
पूरा उपकरण बैंक युवा समूह द्वारा प्रबन्धित किया जाता है। इस युवा समूह में एक ट््रैक्टर आॅपरेटर, रख-रखाव एवं मरम्मत के लिए एक प्रशिक्षित मैकेनिक एवं एक रिकार्ड रखने वाला/लेखाकार होते हैं। उपकरणों के किराये से होने वाली आय से इन लोगों का वेतन व अन्य रख-रखाव लागत पूरी की जाती है। पिछले 18 माह में, उपकरणों के किराये से लगभग रू0 7.5 लाख की आय हुई है।
अपने अनुभवों के आधार पर, हम कह सकते हैं कि, यदि गांव में 10-12 ऐसे युवाओं का समूह हो, जो सकारात्मक सोच वाला हो और रोजगार की तलाश में हो तो गांव में खेती को प्रोत्साहित करने के लिए युवाओं का एक ‘‘किसान समूह’’ बनाया जा सकता है। वास्तव में, इससे खेती में छोटे किसानों का काम आसान हो जाता है। साथ ही बड़े किसानों को भी लाभ पहुंचता है। इस उपकरण बैंक में आॅटोमेटेड उपकरणों की उपलब्धता ने प्रगतिशील किसानों को नई तकनीकों के साथ प्रयोग करने का मौका दिया है। युवाओं ने भी ‘‘युवा प्रबोधन उपकरण आॅपरेटर समूह’’ से जुड़कर पहल करना प्रारम्भ कर दिया है।
ब्राॅड बेड फरो प्लाण्टर व पावर टिलर जैसे आधुनिक उपकरणों ने स्थानीय किसानों को खेती के नये तरीकों से परिचित कराया है। इनके लाभों को स्वयं देखने के बाद, आधुनिक खेती में उनका भरोसा बढ़ा है। इस पहल से युवाओं के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न हुए हैं और ट््रैक्टर मालिकों की आय में वृद्धि हुई है। साथ ही, किसानों को अपनी आवश्यकता के हिसाब से उपकरण मिल पाये हैं तथा खेती से जुड़े कार्य समय पर पूरे हो सके हैं, जिससे उत्पादकता बढ़ी है व निवेश की लागत कम हुई है। एआई व ड््रोन जैसी आधुनिक तकनीकें शारीरिक श्रम पर निर्भरता को कम कर सकती हैं, जैसे- ड््रोन से छिड़काव करने वाले उपकरणांे का उपयोग। यह समझने की आवश्यकता है कि सही कृषि उपकरणों का प्रयोग करके खेती युवाओं को रोजगार देने व किसानों के लिए मुनाफा कमाने का एक बड़ा जरिया बन सकती है।
सुरेश मार्गले
प्रमुख-यूथ विंग
ज्ञान प्रबोधिनी केन्द्र, हराली
ग्राम- हराली, पोस्ट- तोरम्बा
तालुक- लोहरा, जिला- धाराशिव - 413 604
महाराष्ट््र Email: sureshmargale123@gmail.com
Source: Sustainable farm mechanisation, LEISA INDIA, Vol. 27, No.4, December 2025



