नीली अर्थव्यवस्था आर्थिक सशक्तिकरण व पर्यावरणीय स्थाईत्व को बढ़ावा दे सकती है। स्वयं सहायता समूहों, सामुदायिक सन्दर्भ व्यक्तियों एवं स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं के साथ मिलकर जलजीविका ने मत्स्य पालन को आजीविका के व्यवहारिक व सफल तरीके के तौर पर अपनाने की संभावना को प्रदर्शित किया है। जलजीविका के मुख्य प्रयासों, चुनौतियों एवं सफलताओं के कारण भारत में छोटे स्तर के मत्स्य पालकों हेतु मत्स्य पालन आधारित आजीविका के सशक्त व स्थाई साधन विकसित हुए हैं।
मत्स्य पालन व एक्वाकल्चर, पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा, आर्थिक विकास एवं स्थाई आजीविका सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक्वाकल्चर उत्पादन के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा देश होने के बावजूद भारत में छोटे पैमाने पर मत्स्य पालन करने वाले मछुआरांे एवं एक्वाकल्चर करने वाले किसान, विशेषकर महिलाओं एवं सीमान्त समुदायों की ज्ञान, तकनीक एवं बाजार जुड़ाव तक पहुंच में समस्याओं एवं चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जलीय आजीविकाओं को सशक्त करने हेतु प्रतिबद्ध संस्था ‘‘जलजीविका’’ जलीय खेती के समक्ष आने वाली कमियों को दूर करने में एक मुख्य भूमिका निभा रही है। पिछले दस वर्षों में इस संस्था ने बड़े पैमाने पर अपनाये जा सकने वाले व समुदाय-आधारित एक्वाकल्चर माॅडलों को सफलतापूर्वक अपनाया है, डिजिटल समाधानों को एकीकृत किया है और ंमहिला-पुरूष में भेद-भाव किये बिना मत्स्य पालन के क्षेत्र मे विकास को प्रोत्साहित किया है।
इस लेख में रिजीलियेण्ट व स्थाई मत्स्य आधारित आजीविका विकल्प विकसित करने की दिशा में जलजीविका के मुख्य हस्तक्षेप, चुनौतियों एवं सफलताओं का उल्लेख किया गया है। और यह बताने का प्रयास किया गया है कि नीली अर्थव्यवस्था आर्थिक सशक्तिकरण एवं पर्यावरणीय स्थाईत्व को प्रोत्साहित करने में किस प्रकार सहयोगी हो सकती है।
हस्तक्षेप की शुरूआत: बारिश पर निर्भरता वाले क्षेत्रों में मत्स्य पालन आधारित आजीविका के लिए पायलट परियोजना
वर्ष 2013 में, जलजीविका ने भारत के कुछ ऐसे इलाकों में मछली पालन से जुड़ी आजीविका की संभावनाओं को तलाशने का मिशन प्रारम्भ किया, जहां पानी की भारी कमी थी। छह राज्यों- मलकानगिरी ;ओडिशाद्ध, बांकुरा ;पश्चिम बंगालद्ध, पलामू ;झारखण्डद्ध, मधुबनी ;बिहारद्ध, महबूबनगर ;तेलंगानाद्ध एवं देवास ;मध्य प्रदेशद्ध में पायलट परियोजनाएं शुरू की गयीं। इन पायलट परियोजनाओं के अन्तर्गत ऐसे क्षेत्रों को चुना गया, जहां छोटे-मझोले किसान मुख्य रूप से बारिश के पानी पर ही निर्भर थे। इन क्षेत्रों में मौसमी जल-स्रोतों की उपलब्धता के बावजूद भी, मछली पालन का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा था।
स्वयं सहायता समूहों, सामुदायिक सन्दर्भ व्यक्तियों एवं स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं के साथ मिलकर जलजीविका ने मछली पालन को आजीविका के व्यवहारिक व सफल तरीके के तौर पर अपनाने की संभावना को प्रदर्शित किया है। तालाब की तैयारी, जल की गुणवत्ता का प्रबन्धन, मत्स्य बीज पालन एवं बाजार से जुड़ाव आदि विषयों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये गये। इन हस्तक्षेपों से न केवल परिवारों की आय में सुधार हुआ व पोषण सुरक्षा बढ़ी, वरन् इससे कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले समुदायों के लिए छोटे स्तर पर मछली पालन को एक स्थाई आर्थिक माॅडल के तौर पर भी स्थापित किया गया।
काम के दौरान जलजीविका को यह समझ आ गया कि मात्र तकनीकी जानकारी प्रदान करने से इस माॅडल को बड़े पैमाने पर नहीं अपनाया जा सकता। इस बात को समझते हुए संस्था ने समुदाय की भागीदारी एवं संस्थागत विकास पर जोर दिया। इसी क्रम में मत्स्य पालन सहकारी समितियों का गठन किया गया। मत्स्य पालन सहकारी समितियों के गठन से छोटे स्तर के मत्स्यपालकों की आजीविका व आय में स्थिरता आयी तथा सामूहिक मोल-भाव करने की क्षमता विकसित हुई, जिससे साझा समृद्धि का माॅडल विकसित हुआ।
इसके अतिरिक्त, जल संकट एवं अप्रत्याशित वर्षा पद्धति के मुद्दों से निपटने हेतु जलजीविका ने जलवायु-रिजीलियेण्ट जलीय खेती तकनीकों को प्रोत्साहित किया। रिजीलियेन्स बढ़ाने तथा अधिकतम उत्पादकता प्राप्त करने की दृष्टि से विभिन्न अनुकूलन अभ्यासों जैसे- धान-मछली की एकीकृत खेती, कृषि-पारिस्थितिकी दृष्टिकोण एवं एकीकृत बहु-पोषी मत्स्य पालन आदि को अपनाया गया।
मनरेगा ;महात्मा गांधी राष्ट््रीय रोजगार गारण्टी अधिनियमद्ध कार्यक्रम में मत्स्य पालन ;एक्वाकल्चरद्ध को शामिल करना इस चरण की एक प्रमुख उपलब्धि रही। इसका एक फायदा यह रहा कि, तालाब व मत्स्य पालन से जुड़ी सुविधाएं विकसित करने हेतु चल रही सरकार द्वारा सहायतित रोजगार योजनाओं से जुड़ कर आर्थिक स्थिरता बनाये रखने में ग्रामीण समुदायों को मदद मिली।
नवाचार का विस्तार: आंध्र प्रदेश में पिंजरा मत्स्य पालन को आगे बढ़ाना
अपने पायलट परियोजना के दौरान मिले अनुभवों के आधार पर, जलजीविका ने मत्स्य पालन की दृष्टि से सशक्त पारिस्थितिकी प्रणाली वाले क्षेत्र आंध्र प्रदेश में अपने काम का विस्तार किया। पारम्परिक तालाब-आधारित खेती की सीमाओं को समझते हुए, इसने जलाशयों में पिंजरा मत्स्य पालन की शुरूआत की, ताकि मौजूदा जल-स्रोतों में मत्स्य पालन करके संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सके। पिंजरा मत्स्यपालन के अन्तर्गत मछलियों को खुले पानी के स्रोतों जैसे- नदी, झील, जलाशय या समुद्र में तैरते हुए जालीदार पिंजरों के अन्तर्गत पाला जाता है। जाली के कारण पानी का निरन्तर आना-जाना बना रहता है, जिससे मछलियों को प्राकृतिक आॅक्सीजन व स्वच्छ वातावरण मिलता रहता है। पिंजरे में मछली पालन से निम्न लाभ होते हैं -
ऽ कम स्थान में अधिक मछलियां पाली जा सकती हैं।
ऽ मछलियांे की देख-रेख व उन्हें पकड़ना अधिक आसान होता है।
सामान्य तौर पर पिंजरा में मछली पालन की यह संरचना लोहे के फ्रेम व नायलान या प्लास्टिक की बनी होती है, जो बहुत महंगी होती है। इसलिए, कम पूंजी वाले मछुआरे इसके प्रति बहुत आकर्षित नहीं थे। ऐसी स्थिति में, विस्तार के इस चरण में, जलजीविका ने प्रदेश के पांच जिलों में 1,500 से अधिक आदिवासी मछुआरों व सहकारी सदस्यों को स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए कम लागत वाले बांस से पिंजरा बनाने, मछली के बीज डालने व मछली के विकास चक्र को प्रबन्धित करने के उपर प्रशिक्षित किया। महंगे व्यापारिक पिंजरा प्रणाली के विकल्प के तौर पर, इस पहल ने समुदायों को अपने उत्पादन पर नियंत्रण रखने व आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में आने के लिए सशक्त बनाया।
विजयनगरम में सफलता की एक उल्लेखनीय कहानी सामने आयी, जहां महिलाओं के नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों ने कार्य सम्बन्धी एवं पैसे से जुड़ी चुनौतियों का सामना करते हुए पिंजरे में मत्स्य पालन प्रारम्भ किया और सफलता पाई। पिंजरे के डिज़ाइन को बेहतर बनाने, भोजन प्रबन्धन के अच्छे तरीके अपनाने व बाजार से जुड़ने की उनकी लगन ने उन्हें मत्स्य पालक उद्यमी बना दिया। उनका काम सिर्फ मछली उत्पादन तक ही सीमित नहीं रहा, वरन् मछली के बीज पालना, मूल्य संवर्धन प्रसंस्करण व सीधे बाजार से जुड़ना भी था। इससे यह सिद्ध हुआ कि मत्स्य पालन के क्षेत्र में महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यम भी सफल हो सकते हैं।
बाक्स 1: आजीविका के लिए मत्स्य पालन ओडिशा राज्य की सीमा से सटे, आंध्र प्रदेश के सीमावर्ती जिले विजयनगरम के पाचीपेन्टा मण्डल में, कोडिकल्लावालसा नाम का एक साधारण सा गांव अवस्थित है। विकास की दृष्टि से उपेक्षित यह गांव पेड्डागड्डा जलाशय के पास है, जो नागावल्ी नदी की एक सहायक नदी सुवर्णमुखी नदी से निकली एक सहायक नदी पर बनी मध्यम सिंचाई परियोजना है। मत्स्य पालन पुरूषों का काम था, लेकिन इससे उन्हें बहुत कम कमाई होती थी, सिर्फ इतनी कि जैसे-तैसे गुजारा हो सके। लेकिन एक स्वैच्छिक संगठन ‘‘सेण्टर फाॅर एक्वेटिक लाइवलीहुड-जलजीविका’’ के हस्तक्षेप के बाद यहां का परिदृश्य काफी बदल गया। टाटा समूह की चैरिटी संस्था ‘‘टाटा ट््रस्ट्स’’ के साथ मिलकर, जलजीविका ने मत्स्य पालन के बेहतर व प्रभावी पद्धतियों से लोगों को परिचित कराया। राज्य के मत्स्य पालन विभाग की साझेदारी में यह कार्यक्रम जनवरी 2016 में प्रारम्भ हुआ। टाटा ट््रस्ट के प्रक्षेत्र प्रमुख पद्माकर बोज्जा ने स्थानीय मत्स्य पालन सहकारी समिति के साथ बात-चीत की शुरूआत की। नीलममथल्ली स्वयं सहायता समूह की सदस्यों के साथ बात-चीत करते हुए पद्माकर ने महिलाओं को मछली पालन के लिए ‘‘पिंजरे वाली विधि’’ अपनाने का सुझाव दिया। शुरू में वे इस पहल से जुड़ने हेतु हिचकिचा रही थीं और उन्हें इस पहल से जोड़ने हेतु बहुत मेहनत करनी पड़ी, तब जाकर मार्च 2016 में 40 महिलाएं जिला मत्स्य पालन अधिकारी के साथ बैठक में शामिल हुईं। उन्हें अन्तःस्थली मत्स्य पालन से होने वाले आर्थिक लाभों से परिचित कराने हेतु, उन्हें महाराष्ट््र के पुणे में स्थित डिंभे जलाशय का भ्रमण कराया गया। वहां उन्होंने देखा कि कैसे ग्रामीण महिलाएं स्वैच्छिक संगठन की बात मानकर प्रति माह रू0 6,000- रू0 8,000 की आय प्राप्त कर रहीं हैं। इस भ्रमण के बाद कोडिकल्लावालसा की 10 महिलाओं ने इस विधि को सीखने में रूचि दिखाई। जलजीविका ने उनके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये और उन्हें बांस जैसी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री से पिंजरा बनाना सिखाया। ;ई-कामर्स प्लेटफाॅर्म पर मछली के पिंजरे 1.2 लाख रू0 तक में बिकते हैं। संस्था ने महिलाओं को पिंजरे बनाना, पिंजरे में मत्स्य पालन, उसकी देख-भाल, सजावटी मछली पालन, मछली के चारे का प्रबन्धन, रोग प्रबन्धन आदि के बारे में शिक्षित किया। राज्य मत्स्य पालन विभाग के सहयोग से, महिलाओ का क्षमतावर्धन करने हेतु बडे़ पैमाने पर उपाय किये गये और महिलाओं ने बारी-बारी से शिफ्ट में एक पिंजरे की देख-भाल शुरू कर दी। उनके प्रयासों का असर दिखने लगा और वे पिंजरे के अन्दर बड़ी होती हुई रोहू मछलियों को देख पा रही थीं। हालांकि उन्हें इस बात का अन्दाजा नहीं था कि जब ये मछलियां बड़ी हो जायेंगी तो वे पिंजरे से कूद कर तालाब में जा सकती हैं। जब उनकी अधिकांश मछलियां गायब हो गयीं, तब उन्हें इस समस्या की जानकारी हुई। उन्होंने आपस में बात-चीत की और पिंजरे को ढंकने के लिए अपनी पुरानी साड़ियों का उपयोग करने का निश्चय किया। स्वयं सहायता समूह की महिला सदस्यों ने प्रयास व गलती से सीखते हुए दृढ़ता दिखाई और लाभान्वित हुईं। 9 अक्टूबर, 2017 उन्होंने लगभग 65 किग्रा0 वजन वाली 5,000 छोटी मछलियों को बेचकर 10,800 रू0 कमाये। मत्स्य पालन में महिलाओं की सफलता ने पुरूषों को भी प्रेरित किया है। फिशरीज़ सहकारी समिति के अध्यक्ष कोंडल राव कहते हैं, ‘‘अब पुरूषों की सहकारी समिति ने भी स्थाई आय प्राप्त करने की दिशा में काम करना प्रारम्भ कर दिया है। वे मत्स्य पालन से होने वाली आर्थिक संभावनाओं से इतने प्रेरित व उत्साहित हैं कि अब वे जिले की सबसे अच्छी फिशरीज़ सहकारी समिति बनना चाहते हैं।’’ कोडीकल्लावालसा गांव की सफलता से उत्साहित होकर, मिश्रा का कहना है कि उनका स्वैच्छिक संगठन इस वर्ष देश भर में 10,000 तालाबों में मत्स्य पालन शुरू करना चाहता है। 2017 में टाटा ट््रस्ट व जलजीविका ने आंध्र प्रदेश के चार जिलों - विशाखापत्तनमाापत्तनम, विजयनगरम, श्रीकाकुलन व अनंतपुर में 160 से अधिक ग्रामीणों को मत्स्य पालन की बेहतर पद्धतियों से परिचित कराया। संस्था के अनुसार, ऐसे स्थानीय कामों से एक साल में लगभग 1.1 करोड़ की आय हुई। नोट: यह लेख https://www. indiawaterportal.org/people-and-culture/culture/fishing-survival प्रकाशित मूल लेख का संशोधित रूपान्तरण है। |
समुदाय के नेतृत्व वाली हस्तक्षेपों को और अधिक बढ़ावा देने के लिए, जलजीविका ने पिंजरे में मत्स्य पालन हेतु सहकारी मालिकाना हक वाले माॅडल विकसित किये ताकि लाभ को स्थानीय मत्स्य पालन ढांचे में पुनः निवेश किया जा सके। इसके अतिरिक्त, वित्तीय संस्थानों व माइक्रोफाइनेन्स एजेन्सियों के साथ साझेदारी से कार्यशील पूंजी मिलना सरल हो जाने से छोटे स्तर के उद्यमियों को अपने काम को बढ़ाने व उन्हें स्थाई बनाये रखने में सहयोग हुआ।
जानकारियों का संस्थानीकरण: एक्वा स्कूल माॅडल
व्यवस्थित प्रशिक्षण एवं ज्ञान के निरन्तर प्रसार की आवश्यकता को महसूस करते हुए, जलजीविका ने सीख केन्द्र-एक्वा स्कूल स्थापित किया, जहां पर मत्स्य पालन के आधुनिक अभ्यासों पर लोगों का प्रशिक्षण दिया जाने लगा।
एक्वा स्कूल के पाठ्यक्रम में मृदा एवं जल गुणवत्ता का आकलन, मछली बीज पालन, हैचरी प्रबन्धन, बाॅयोफ्लाक तकनीक, पिंजरे में मत्स्य पालन, हाइड््रोपोनिक्स, एक्वापोनिक्स एवं खेत से मछली बीज उत्पादन जैसे आवश्यक विषयों को शामिल किया गया। बिहार, महाराष्ट््र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना एवं झारखण्ड में संचालित 7 एक्वा स्कूलों के माध्यम से 12,000 से अधिक मछुआरों व किसानों का मत्स्य पालन पर क्षमता वर्धन किया गया।
प्रशिक्षण के अतिरिक्त, एक्वा स्कूलों ने मत्स्य पालकों को वित्तीय संस्थानों, सरकारी कार्यक्रमों एवं बाजार नेटवकों से जुड़ाव स्थापित करने हेतु जानकारी सम्पन्न बनाया ताकि वे अपने कार्यों का व्यवसायीकरण कर सकें। इसके साथ ही, महिलाओं के नेतृत्व में प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित होने से मत्स्य पालन में महिला सहभागिता को सशक्त करने, तथा मत्स्य पालन व्यवसाय को सफलतापूर्वक चलाने हेतु तकनीकी एवं औद्योगिक दक्षता से सम्पन्न करने का कार्य भी बखूबी किया गया।
ई-मत्स्य मित्र पहल के माध्यम से डिजिटल बदलाव को स्वीकार करना:
भौतिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के पूरक के तौर पर, जलजीविका ने ई-मत्स्य मित्र का प्रारम्भ किया। ई-मत्स्य मित्र एक बहुभाषी चैटबोट आधारित परामर्श सेवा होती है, जो मत्स्य पालन की उत्तम विधियों, रोग प्रबन्धन एवं सरकारी योजनाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने हेतु मत्स्य पालकों को जानकारी उपलब्ध कराते हुए सहायता करता है।
इस डिजिटल पहल से, विशेषकर उन सुदूर क्षेत्रों में, जहां पर प्रसार सेवाएं बहुत सीमित हैं, वहां पर सूचनाओं तक लोगों की पहंुच सुनिश्चित करने में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इसके अतिरिक्त, जलजीविका ने समय-समय पर जल की गुणवत्ता की निगरानी सेन्सरों को एकीकृत करते हुए एलओटी-आधारित स्मार्ट तालाब प्रबन्धन प्रणाली की एक पायलट परियोजना प्रारम्भ की थी ताकि पीएच में उतार-चढ़ाव, आॅक्सीजन की कमी एवं अमोनिया लेवल कम-अधिक होने की स्थितियों से मत्स्यपालकों को रूप से समय पर आगाह किया जा सके। इन हस्तक्षेपों से उत्पादकता बढ़ाने, नुकसान को कम करने तथा संसाधनों का यथोचित उपयोग करने में मदद मिली।
मत्स्यपालन के क्षेत्र में पारदर्शिता एवं लाभ को बढ़ाने के उद्देश्य से, जलजीविका ने समूहश्रृंखला आधारित पता लगाने की क्षमता प्रणालियों को भी विकसित किया। इससे उच्च गुणवत्ता वाली मछलियों की मांग रखने वाले अच्छे बाजारों तक मत्स्यपालकों की पहुंच सुनिश्चित हो सकी।
भारत की नीली अर्थव्यवस्था का भविष्य: जलजीविका के कार्यों का विस्तार
जलजीविका की बदलाव लाने वाली यात्रा यह दिखाती है कि मत्स्यपालन आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश एव ंपर्यावरणीय स्थाईत्व को आगे बढ़ाने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती है। संस्था के भावी लक्ष्य निम्नवत् हैं -
ऽ ई-मत्स्य मित्र के माध्यम से 1,00,000 मत्स्य पालकों तक डिजिटल परामर्श सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करना।
ऽ बाजार से जुड़ाव तथा मूल्य श्रृंखला एकीकरण को सशक्त करने की दृष्टि से महिला नेतृत्व वाली मत्स्य उत्पादक कम्पनियों की स्थापना करना।
ऽ सतही एवं आद्रभूमियों में मत्स्यपालन के लिए नियामक ढांचों को शामिल करते हुए स्थाई मत्स्यपालन नीतियों की वकालत करना।
ऽ बाजार एवं आयात अवसरों को बढ़ाने हेतु ईको-पंजीकरण एवं पता लगाने की क्षमता को प्रोत्साहित करना।
ऽ सूक्ष्मवित्त एवं ऋण तक छोटे स्तर के मत्स्यपालक उद्यमियों की पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से वित्तीय सहभागिता को सशक्त करना।
ऽ पर्यावरणीय एवं जलवायुविक परिवर्तनों के प्रति रिजीलियेन्स सुनिश्चित करने हेतु आधुनिक जलवायु-स्मार्ट मत्स्यपालन अभ्यासों को बढ़ावा देना।
तकनीक, सहकारी उद्यम माॅडलों एवं वित्तीय समावेश के एकीकरण द्वारा, जलजीविका एक ऐसे मछली पालन क्षेत्र की परिकल्पना करती है, जो रिजीलियेन्ट हो, समावेशी हो और पर्यावरणीय रूप से टिकाउ हो। संस्था के प्रयास भारत की आर्थिक अर्थव्यवस्था एजेण्डा के अनुरूप हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि छोटे स्तर पर मत्स्यपालन का कार्य करने वाले मत्स्यपालक और मछुआरे देश की मत्स्यपालन-आधारित आर्थिक तरक्की को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायें।
शोध, नीतिगत वकालत एवं सामुदायिक सशक्तिकरण में लगातार निवेश करते हुए, जलजीविका मत्स्य पालन को सिर्फ गुजारे के लिए की जाने वाली गतिविधि से बदलकर एक फलते-फूलते आर्थिक क्षेत्र में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
नीलकण्ठ मिश्रा सीईओ एवं फाउण्डर, जलजीविका 11, स्नेहकुंज अपार्टमेण्ट्स जमभूलकर चैक, विकास नगर वानोवरी, पुणे - 411 040 ;भारतद्ध Email: neelkanth.mishra@jaljeevika.org
Source: Sustainable Agriculture, LEISA INDIA, Vol. 27, No.1, March 2025



