रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों पर निर्भरता से स्थाईत्व की ओर, जोखिम से मजबूती की ओर व गुजारे लायक खेती से अतिरिक्त उत्पादन की ओर पुष्पांजलि की यह यात्रा सब्ज़ी की खेती में आये बड़े बदलाव को दिखाती है। उनकी कहानी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि छोटी जोत के किसान, नवाचार व सामूहिक सहयोग के माध्यम से व्यवस्थागत चुनौतियों से निपट सकते हैं।
ओडिशा के नयागढ़ जिले में स्थित एक शान्त गांव पहेलाजू टकेरा में एक छोटी जोत की किसान पुष्पांजलि मल्लिक के नेतृत्व में उल्लेखनीय बदलाव आया है।
पुष्पांजलि के पास स्वयं की एक एकड़ जमीन है, जहां वह पहले मुख्य रूप से रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग करके धान व बैगन उगाती थीं। अपने समुदाय के कई अन्य किसानों की तरह, वह भी एक ही प्रकार की फसल उगाती थीं, जिससे बहुत कम आमदनी होती थी और धीरे-धीरे मृदा की सेहत भी खराब हो रही थी। उनके परिवार की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती थीं और उनकी वार्षिक घरेलू आय लगभग रू0 48,000.00 थी, जिससे उनका व उनके परिवार का निर्वहन बहुत कठिनाई से होता था।
सब्ज़ियों की मिश्रित खेती की ओर बदलाव
एक स्वयंसेवी संगठन निर्माण द्वारा निरन्तर सहयोग व प्रयासांे के माध्यम से किसानों के लिए क्षमता-निर्माण सत्र प्रारम्भ करने के बाद मुख्य रूप से बदलाव आया। पुष्पांजलि ने प्राकृतिक खेती पर प्रशिक्षण, वित्तीय साक्षरता कार्यशाला व समूह प्रबन्धन प्रशिक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाई। और इनके माध्यम से उन्होंने सीखा कि किस प्रकार सब्ज़ियों की मिश्रित खेती तथा खेती के प्राकृतिक पद्धतियों को अपनाकर मिट्टी की उपजाउ क्षमता बढ़ाई जा सकती है, कीटों के प्रकोप को कम किया जा सकता है और पूरे वर्ष की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
निर्माण द्वारा चलाये गये क्षमता-वर्धन सत्रों से प्रेरित होकर पुष्पांजलि ने सिर्फ एक फसली खेती करने के स्थान पर विविध तरह की फसलें उगाना प्रारम्भ किया। उदाहरण के तौर पर, दलहनी व अनाज वाली फसलों में, काला चना, मूंग, चना, देशज प्रजाति की धान, मक्का आदि, सब्ज़ियों में, बैगन, करेला, लोबिया, खीरा, तरोई, कद्दू, टमाटर, मिर्च आदि एवं फलदार फसलों व बारहमासी फसलों जैसे- पपीता एवं सहजन आदि की मिश्रित खेती करना प्रारम्भ कर दिया। इसके अतिरिक्त, अन्य उद्यमों में, बकरी पालन, देशी प्रजाति की मुर्गी पालन एवं अज़ोला की खेती भी शामिल थे।
नयी-नयी जानकारियां प्राप्त कर, पुष्पांजलि ने प्राकृतिक खेती पद्धतियों तथा करेला व लोबिया जैसे लतादार सब्ज़ियों के लिए मचान खेती की पद्धति को अपनाया। इन सामान्य व छोटे-छोटे नवाचारों के माध्यम से उनकी प्रति एकड़ उपज बढ़ी। एक फसली खेती पर निर्भरता के बजाय एक वर्ष में 4-5 प्रकार की सब्ज़ियों की खेती करती हैं। इससे अब वे कई तरह की फसलें ले पाती हैं, अपने परिवार की जरूरतें पूरी कर पाती हैं और स्थानीय बाजार में ताज़ी सब्ज़ियां उपलब्ध कराने में अपना योगदान दे पाती हैं। इस बदलाव का परिणाम बहुत अच्छा रहा है।
आज, पुष्पांजलि खरीफ व रबी दोनों ऋतुओं में मिलाकर 12-13 कुन्तल उपज प्राप्त करती हैं। उनकी सालाना आय रू0 48,000.00 से बढ़कर रू0 64,000.00 हो गयी है, जो आय में 20 प्रतिशत की वृद्धि को प्रदर्शित करती है। अब उनके परिवार को वर्ष भर तरह-तरह की पौष्टिक पोषक सब्ज़ियां मिलती हैं। अपने उपभोग के बाद बची हुई सब्ज़ियों को वे स्थानीय बाजारों में, किसान उत्पादक संगठनांे तथा स्थानीय थोक विक्रेताओं को बेच देती हैं। इस आय से वह एक नया घर बनवा रही हैं, जो उनकी हिम्मत व तरक्की की निशानी है।
अपने कार्य के दौरान आने वाली चुनौतियों के बारे में भी वह खुलकर बात करती हैं। उनका कहना है कि,
ऽ अच्छे जैविक बाजारों तक पहुंच न होने की वजह से अक्सर अपनी उपज कम कीमत पर बेचनी पड़ती है।
ऽ भण्डारण की सीमित सुविधाएं होने के कारण अपनी उपज को तुरन्त बेचना पड़ता है। चाहे उस समय बाजार में अच्छा मूल्य मिल रहा हो अथवा नहीं।
आगामी योजना
पुष्पांजलि के इस बदलाव को सभी ने महसूस किया है। उन्होंने अपनी स्वयं सहायता समूह - अनन्तखोला महिला स्वयं सहायता समूह की 10 अन्य महिला सदस्यों को सब्ज़ियों की मिश्रित खेती अपनाने हेतु प्रेरित किया है। उन्होंने सिर्फ प्रेरित ही नहीं किया, वरन् उन्होंने इन महिलाओं को प्रशिक्षण भी दिया व उन्हें आवश्यकता पड़ने पर सहयोग भी देती हैं ताकि वे भी उनके नक्शेक़दम पर चल सकें। उनके स्वयं सहायता समूह को ब्लाकस्तरीय कृषि विभाग के कार्यालय से बीज के रूप में रू0 10,000.00 की शुरूआती बीज पूंजी भी मिली, जिससे उन्हें बेहतर बीज, खेती के उपकरण और परिवहन की सुविधाएं मिल पायंी। इस आर्थिक सहयोग व निर्माण संस्था के प्रशिक्षण से मिली जानकारी से उन्हें सिर्फ गुजारे लायक खेती से आगे बढ़कर ज्यादा उपज वाली खेती करने में मदद मिली है।
अपनी बातों को समेटते हुए पुष्पांजलि कहती हैं, ‘‘हमारे स्वयं सहायता समूह से मिले सहयोग तथा कृषि विभाग से मिले बीज फण्ड ने हमें ‘‘बेल वाली सब्ज़ियों के लिए मचान बनाने की तकनीक ;ट्े्रलिस पद्धतिद्ध’’ जैसी नई तकनीकें अपनाने को प्रोत्साहित किया। मुझे गर्व है कि अब मैं अपने परिवार व समुदाय के लिए ज्यादा योगदान दे सकती हूं।’’
सिद्धार्थ कुमार राउत
राज्य कार्यक्रम अधिकारी
निर्माण प्लाट: एस-2/15,
प्रथम तल, नीलाद्रि विहार
भुबनेश्वर, ओडिशा - 751 021 Email: kksdfnirman@gmail.com
Source: Sustainable vegetable farming, LEISA INDIA, Vol. 27, No.3, September 2025



