उत्तराखण्ड के जंगलों में, चीड़ की पत्तियां, जंगल की आग बढ़ाने का एक प्रमुख कारण बनती थीं, और इनका प्रबन्धन एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती थी, लेकिन चीड़ की अतिरिक्त पत्तियों से कोयला बनाने की पहल ने अल्मोड़ा जिले में चीड़ की पत्तियों को एक मूल्यवान संसाधन में बदल दिया है। यह पहल स्थाई ग्रामीण विकास का एक प्रभावी माॅडल है, जो जेण्डर सशक्तिकरण को पर्यावरणीय व आर्थिक उद्देश्यों के साथ विश्व सुरक्षा व विकास संघ ‘‘जल, उर्जा, खाद्य-जंगल, पारिस्थितिकी तंत्र, जेण्डर ;डब्ल्यूईएफ-एफईजीद्ध’’ के समन्वय ढांचे के अन्दर प्रभावी तरीके से एकीकृत करता है।
उत्तराखण्ड का मध्य हिमालयी क्षेत्र कृषि-पारिस्थितिकी व सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का एक जटिल ताना-बाना प्रस्तुत करता है। पारिस्थितिकी रूप से चीड़ ;पाइनस राक्सबर्गी सर्ग.द्ध के जंगल काफी दूर तक फैले हुए हैं। विभिन्न प्रकार के ओक व अन्य चैड़ी पत्तियों वाले पेड़ों के स्थान पर चीड़ के पेड़ों की अधिकता हो जाने से यहां का परिदृश्य काफी हद तक बदल गया है। इस बदलाव के गम्भीर परिणाम हुए हैं। चीड़ की गिरी हुई सूइयां, जिन्हें स्थानीय भाषा में पिरूल कहा जाता है, जमीन पर घनी, रालयुक्त व जलरोधी परत बनाती हैं। यह परत जल के रिसाव को रोकती है। जमीन के अन्दर पानी का रिसाव न होने से आस-पास के खेतों में नमी की मात्रा घट जाती है साथ ही जमीन के अन्दर रिसाव न होने से पानी तेजी से बह जाता है और मृदा क्षरण को बढ़ावा देता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पिरूल की यह रालयुक्त घनी परतें एक अत्यन्त ज्वलनशील पदार्थ बन जाती हैं, जिससे प्रत्येक वर्ष जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे जैव विविधता नष्ट होती है, भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है और मृदा स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है।
सामाजिक रूप से, इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों पर आधारित है, जहां लोगों की आजीविका मुख्य रूप से खेती एवं वन आधारित संसाधनों पर निर्भर है और यह व्यवस्था मुख्य रूप से महिलाओं के श्रम पर टिकी है। खेती व पशुधन प्रबन्धन के साथ-साथ महिलाएं प्रतिदिन कई-कई घण्टों तक लकड़ी इकट्ठा करने का कठिन कार्य भी करती हैं। और इस प्रकार उत्पादक उद्यम अवसर उनके लिए सीमित हो जाते हैं साथ ही उनके जीवन-स्तर पर भी प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त, आजीविका तलाश में अन्य सुदूर शहरों की ओर पुरूषों के पलायन की वजह से खेती की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के उपर हो जाने से महिलाओं की जिम्मेदारी व श्रम बोझ तो बढ़ गया, लेकिन निर्णय लेने की शक्ति या संसाधनों तक पहुंच में कोई वृद्धि नहीं हुई है। पारिस्थितिकी में होेने वाले ह्रास ने महिलाओं के श्रम बोझ को और अधिक बढ़ाया है, जिससे स्थाई भूमि प्रबन्धन में उनकी भागीदारी पहले से कम हो गयी है।
रणनीतिक दृष्टिकोण:
एक एकीकृत सम्बन्ध: विकास के लिए किये जाने वाले परम्परागत प्रयासों में अक्सर वन अग्नि, ग्रामीण उर्जा व महिलाओं की आजीविका को अलग-अलग करके देखा जाता था। उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा वित्तपोषित परियोजना को जी0बी0 पन्त राष्ट््रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान ;जीबीपीएनआईएचईद्ध द्वारा 2022 से 2024 तक क्रियान्वित किया गया। इस परियोजना का उद्देश्य उत्तराखण्ड के ग्रामीण लोगों के लिए रोजगार व आय सृजन हेतु पर्यावरण अनुकूल उर्जा को बढ़ावा देने के लिए चीड़ के पत्तों पर आधारित जैव-कोयला बनाने की तकनीकों का प्रदर्शन व विस्तार करना है। इस परियोजना ने एक रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाकर विकास की उस परम्परागत प्रणाली को तोड़ा है, जिसके अन्तर्गत पहाड़ी क्षेत्रों में वन अग्नि, ग्रामीण उर्जा व महिलाओं की आजीविका को अलग-अलग करके देखा जाता है। यह पहल इस मूल विचार पर आधारित थी कि चीड़ की सूईयां, जो कि एक आम समस्या है, स्वयं ही इसका समाधान हो सकती हैं।
यह रणनीति चार प्रमुख स्तम्भों पर आधारित थी- उपयुक्त व कम लागत वाली तथा आसानी से सीखी जा सकने वाली तकनीक को सामने लाना, परिवर्तन के प्राथमिक सूत्रधार के रूप मंे महिलाओं को केन्द्र में रखना, समूहों व सहकारी समितियों केे माध्यम से सामूहिक कार्यवाही को बढ़ावा देना व परियोजना की अवधि के बाद भी आर्थिक सहयोग होता रहे, इसके लिए शुरू से ही उद्यमशीलता की भावना को विकसित करना।
पहल: प्रदर्शन से उद्यम तक
परियोजना का क्रियान्वयन तीन प्रमुख चरणों के अन्तर्गत किया गया। पहला चरण बड़े पैमाने पर क्षमता वर्धन की गतिविधियों पर केन्द्रित था। इसके अन्तर्गत अल्मोड़ा जिले के 30 गांवों से 835 लोगों को जैव-कोयला बनाने की प्रक्रिया के बारे में सघन रूप से प्रशिक्षित किया गया। इस प्रक्रिया में चीड़ की सूखी सूईयों को एकत्रित करना, चारकोल बनाने हेतु बिना आॅक्सीजन वाले गढ्ढे में इनका कार्बनीकरण करना और फिर उस चारकोल में गीली मिट्टी को मिलाकर एक साधारण लोहे के सांचे की मदद से कोयला बनाना शामिल था ;चित्र 1द्ध। प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों में 66 प्रतिशत महिलाएं थीं, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि उर्जा संकट से सर्वाधिक प्रभावित लोगों तक इस तकनीक की पहुंच हुई है।
क्रियान्वयन के दूसरे चरण में, इस पहल की वैज्ञानिक व आर्थिक नींव को सशक्त करने के उपर कार्य किया गया। इसमें ईंधन की दक्षता व सुरक्षा का सत्यापन करना तथा एक आर्थिक विश्लेषण करना शामिल था। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि परियोजना समाप्ति के बाद भी इस उद्यम की निरन्तरता बनी रहे और लोगों को आर्थिक लाभ होता रहे। इस विश्लेषण से प्रति बैच 165 रू0 का शुद्ध लाभ व 1.49 का लाभ-लागत अनुपात सामने आया, जो उद्यम की आर्थिक सशक्तता व व्यवहार्यता का सिद्ध करता है। यह भी उल्लेख करना महत्वपूर्ण होगा कि स्थानीय स्तर पर स्वामित्व तथा निरन्तरता बनाये रखने हेतु छह महिलाओं को मास्टर ट््रेनर के रूप में तैयार किया गया ;चित्र 2द्ध। तीसरे चरण में एक सहायक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया गया, जिसके तहत् कोयले की बिक्री को सरल बनाने व कोयला बनाने की इस पहल को स्थानीय अर्थव्यवस्था में स्थापित करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों, सरकारी विभागों व निजी व्यापारियों के साथ 30 प्रभावशाली जुड़ाव स्थापित किये गये।
प्रभाव: एक बहुआयामी परिवर्तन
इसका प्रभाव भौतिक, सामाजिक, आर्थिक व पारिस्थितिक क्षेत्रों में व्यापक रूप से देखा गया। पारिस्थितिक रूप से, चीड़ की सूखी पत्तियों के व्यवस्थित संग्रह से जंगलों में ज्वलशील पदार्थों की मात्रा में प्रत्यक्ष कमी आयी, जिससे जंगलों में आग लगने का खतरा कम हुआ, साथ ही लकड़ी के स्वच्छ विकल्प के रूप में जलौनी लकड़ी उपलब्ध होने से जंगल के वृक्षों पर दबाव कम हुआ। सामाजिक रूप से, इसका प्रभाव गहरा था ;चित्र 3द्ध। परियोजना के बाद किये गये सर्वेक्षणों से पता चला कि महिलाओं के आत्मविश्वास व आर्थिक स्थिति में शत-प्रतिशत की वृद्धि हुई है। परियोजना से जुड़ी 87.5 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि, अब वे अपने घरों में निर्णय लेने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं तथा सूक्ष्म उद्यमशीलता बढ़ी है। सामुदायिक वन प्रबन्धन व ग्राम सभाओं में महिलाओं की भागीदारी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो, इस पहल ने आय का एक ठोस व नया स्रोत प्रदान किया है ;तालिका 1द्ध। 30 लाभार्थियों का आर्थिक विश्लेषण करने से पता चला कि उनकी संचयी आय में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसमें व्यक्तिगत लाभ 8 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक रहा है। महिलाओं ने स्थानीय घरों, कैफे व पर्यटकों को कोयला बेचकर मासिक आय प्राप्त करना प्रारम्भ कर दिया है। इस प्रकार, एक तरफ तो एक बेकार उत्पाद को एक मूल्यवान वस्तु में बदल दिया गया व दूसरी तरफ स्थानीय उद्यमशीलता की भावना को बढ़ावा मिला।
तालिका 1: जेण्डर सम्बन्धों की दिशा में अपनाए गये हस्तक्षेप की सफलता के सूचकांकों का प्रदर्शन
| सूचकांक | आउटपुट | परिणाम | डब्ल्यूईएफ-एफईजी सम्बन्ध |
| कुल प्रशिक्षित प्रशिक्षु | 975 ;649 महिला, 326 पुरूषद्ध | समुदाय की दक्षता व क्षमता में वृद्धि | महिलाओं की भागीदारी ;66.6 प्रतिशतद्ध सशक्तिकरण व सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देती है। ;महिला, जेण्डरद्ध |
| आयोजित किये गये प्रशिक्षण सत्र | 50 से ज्यादा | ज्ञान के हस्तान्तरण एवं उपयोग में सुधार | महिला-केन्द्रित प्रशिक्षण जेण्डर समानता को बढ़ाते हैं। ;महिला, जेण्डरद्ध |
| आच्छादित ग्राम | अल्मोड़ा के कई विकास खण्डों में 30 | व्यापक भौगोलिक प्रभाव | महिलाओं की विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंच होती है एवं लाभ प्राप्त होता है। ;महिला, जेण्डरद्ध |
| प्रति बैच चीड़ के पत्तों का बायोमाॅस | कच्चा उत्पाद 30 किग्रा0, 7.2 किग्रा0 चारकोल | बायोमाॅस को उर्जा उत्पाद में बदलना | पत्ते एकत्र करने व प्रसंस्करण करने से महिलाओं को आजीविका मिलती है। ;महिला, उर्जाद्ध |
| प्रति बैच कोयला | 36 | नवीकरणीय उर्जा स्रोत | उत्पादन में महिलाओं की भूमिका होने से उर्जा तक पहुंच एवं आय में सहयोग मिलता है। ;महिला, उर्जाद्ध |
| एक बैच के लिए दिया गया समय | 4.3 घण्टा | कुशल उत्पादन चक्र | महिलाएं मजदूरी व घरेलू कार्यों के बीच संतुलन बनाती हैं। ;महिला, उर्जाद्ध |
| प्रति बैच शुद्ध लाभ | रू0 165.00 | आय उपार्जन | महिलाओं की आर्थिक सशक्तता वित्तीय स्वायत्ता बढ़ती है। ;महिला, खाद्यद्ध |
| प्रति कोयले का बिक्री मूल्य | रू0 10.00 | उर्जा का सस्ता विकल्प | एक उद्यमी व उपभोक्ता के रूप में महिलाओं का सहयोग होता है। ;महिला, उर्जाद्ध |
| दर्ज की गयी कुल आय | सम्मिलित रूप से रू0 4,45,642 | आजीविका में सुधार | म्हिलाओं की आय बढ़ने से परिवार की खाद्य सुरक्षा एवं रहन-सहन में सुधार होता है। ;महिला, खाद्यद्ध |
| जंगल में आग की घटनाओं में कमी | 70 प्रतिशत कमी की संभावना | पारिस्थितिकी प्रणाली सुरक्षा में वृद्धि | आग के खतरे को कम करने में महिलाओं की सहभागिता से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है। ;महिला, उर्जा, पारिस्थितिकी प्रणाली, जंगलद्ध |
| कोयले का कैलोरी मान | 2500 से कम कैलोरी/किग्रा0 | उपयुक्त स्वच्छ ईंधन | स्वच्छ ईंधन के प्रयोग से महिला मुखिया परिवारों के स्वास्थ्य परिणामों में सुधार होता है। ;महिला, उर्जा, जंगलद्ध |
| राख का उपयोग | जैविक खाद के रूप में उपयोग मृदा उर्वरता में वृद्धि | मृदा पोषण चक्र एवं उर्वरता में सुधार | स्थाई कृषि में महिला किसानों को सहायता मिलती है। ;महिला, खाद्य पारिस्थितिकी प्रणालीद्ध |
सफलता का मूल कारण:
पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण व प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन में सामाजिक भागीदारी वाली इस पहल से एक तरफ तो वन में आग लगने का जोखिम कम हुआ तो वहीं दूसरी तरफ मृदा स्वास्थ्य में भी सुधार हुआ। साथ ही कार्बन पृथक्करण, पर्यावास संरक्षण व मृदा स्थिरीकरण जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं भी प्राप्त हुई हैं, जिससे समग्र जैव विविधता व पारिस्थितिकी संतुलन बनाये रखने में मदद मिली है। इसके अतिरिक्त, इसने आंतरिक वायु प्रदूषण व स्वास्थ्य जोखिमों को कम करके सांस्कृतिक सेवाओं में भी सुधार किया है। इस पहल ने वनों की रिजीलियेन्स क्षमता को मजबूत करके, सूक्ष्म जलवायु को नियत्रित करके व आग एवं सूखा जैसे जलवायु प्रभावों के प्रति नाजुकता को कम करके सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन में भी योगदान दिया है। ये एकीकृत लाभ जलवायु रिजीलियेन्स, पारिस्थितिक स्थाईत्व व सामुदायिक कल्याण को बढ़ावा देने में इस पहल की भूमिका को बताते हैं।
इस पहल की सफलता के पीछे कई प्रमुख कारणा हैं। पहला, इसने सूखी चीड़ की पत्तियों ;पाइन नीडल्सद्ध से जुड़ी एक प्रत्यक्ष व सर्वमान्य समस्या पर ध्यान दिया, जिससे समुदाय का तुरन्त सहयोग मिला। दूसरा, इसने महिलाओं की भागीदारी व स्पष्ट व्यापार तर्क के साथ सही तकनीक का बहुत अच्छे ढंग से जुड़ाव स्थापित किया, जिससे यह सिर्फ एक कौशल ही नहीं बना, वरन् फायदे वाला व्यापार बन गया। तीसरा, समूह के साथ मिलकर काम करने पर जोर देने से संसाधनों को एकत्र करने, सामूहिक रूप से काम करने तथा सामूहिक विपणन करने में सहायता मिली और अकेले काम करने मंे आने वाली कमियों को दूर किया जा सका। और अन्त में, सहयोगियों का एक बड़ा नेटवर्क बनाने से इस व्यापार को जरूरी बाजार जुड़ाव व विश्वसनीयता मिली, जिससे यह लम्बे समय तक चल सका।
संरक्षण से जुड़े कार्यों के प्रभाव को बढ़ाने व उन्हें आपस में जोड़ने हेतु सुझाव
जमीनी स्तर पर काम करने वालों के लिए, अगला कदम ऐसी मशीनरी या उपकरण लाना है जो अलग-अलग स्तरों के लिए हों और महिलाओं को उनका उपयोग करने में आसानी है। जैसे- सामान रखने के लिए एर्गोनामिक रैक तथा सामान इकट्ठा करने वाले उपकरण ताकि मेहनत कम हो काम की क्षमता बढ़े। पोषक तत्वों से भरपूर कोयले की राख को जैविक खाद के तौर पर पैक करके व बेचकर या ऐसे दूसरे उत्पाद बनाकर अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है। सफल समूहों का ‘‘महिला उत्पादक कम्पनियों’’ के अन्तर्गत पंजीकरण कराने से पैसे व बाजार तक उनकी बेहतर पहुंच होगी तथा ग्राहकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखने वाली मूल्य-श्रृंखला विकसित हो सकेगी।
नीति बनाने वालों के लिए, इस माॅडल को राष्ट््रीय योजनाओं में शामिल करना बहुत आवश्यक है। मनरेगा के तहत् ‘‘जंगल की आग से बचाव के लिए सूखी चीड़ की पत्तियां एकत्र करना’’ के कार्य को मंजूरी देने से पत्तियों को एकत्र करने वाले लोगों को मजदूरी मिलेगी व उद्योगों को कच्चा माल मिलेगा। जंगल की जमीन से पत्तियां साफ करने वाले समुदायों को प्रत्येक हेक्टेयर के लिए ‘‘ग्रीन के्रडिट’’ या सीधा भुगतान करने से इस पर्यावरण-अनुकूल कार्य को आधिकारिक मान्यता व प्रोत्साहन मिलेगा। अन्त में, कोयला बनाने वाले उपकरण के लिए खास अनुदान देने व सरकारी एजेन्सियों द्वारा बड़े पैमाने पर कोयले की खरीद में मदद करने से यह माॅडल बड़े पैमाने पर लागू हो सकेगा और इसका स्थाईत्व बना रहेगा।
महिलाओं के नेतृत्व में, पाइन की सूईयों से कोयला बनाने की यह पहल, पहाड़ी सामाजिक-पारिस्थितिकी प्रणाली में उर्जा, पर्यावरण व आजीविका के आपस में जुड़े क्षेत्रों को एक साथ जोड़कर एकीकृत जुड़ाव वाली सोच का बेहतर उदाहरण प्रस्तुत करती है। जंगल के बेकार अपशिष्टों को स्थाई उर्जा में बदलकर, यह पहल एक तरफ तो जंगल की आग के खतरों को कम करती है ;पर्यावरणद्ध तो वहीं दूसरी तरफ घर के अन्दर वायु प्रदूषण को कम करने वाला स्वच्छ ईधन देती है ;उर्जाद्ध और आजीविका की दृष्टि से देखें तो उद्यमिता के नये अवसरों को प्रदान करते हुए यह ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाती है। यह बदला हुआ जुड़ाव ढांचा पानी, उर्जा, भोजन, जंगल, पारिस्थितिकी तंत्र व जेण्डर को एक साथ लाता है। यह दिखाता है कि कैसे जंगल की देख-भाल जल-संतुलन बनाये रखती है, स्वच्छ उर्जा तक पहुंच समुदाय की भलाई को बढ़ावा देती है, टिकाउ खेती खाद्य सुरक्षा में मदद करती है और जैव-विविधता का संरक्षण पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत बनाये रखता है। साथ ही, इनके बीच के जटिल आपसी सम्बन्धों को संभालने का एक एकीकृत तरीका भी देता है, जिसमें जेण्डर-समावेशी आर्थिक गतिविधियां शामिल हैं, जो सामाजिक मजबूती व संसाधनों के समान उपयोग को बढ़ावा देती हैं। ये सभी आपस में जुड़े तत्व मिलकर एक दृष्टिकोण बनाते हैं और दुनिया भर के पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए एक ऐसा माॅडल प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें अपनाया जा सके।
यह इस बात पर भी जोर देता है कि एक क्षेत्र में दबाव या परिवर्तन अन्य क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं और संसाधनों के स्थाई प्रबन्धन के साथ-साथ सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत सामंजस्य व अन्तर-क्षेत्रीय सहयोग जरूरी होता है। ताल-मेल व सामंजस्य की पहचान करना, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के महत्व को समझना, समावेशी शासन को प्रोत्साहन देना व नवाचार के माध्यम से रिजीलियेन्स बढ़ाना वर्तमान ढांचे के सशक्त पहलू हैं। इस एकीकृत जुड़ाव के माध्यम से, चीड़ आधारित जैव-कोयला पहल के क्रियान्वयन करते हुए स्थाई वन प्रबन्धन, चीड़ की पत्तियों के बाॅयोमास को हटाने तथा स्वच्छ व नवीकरणीय उर्जा उत्पादन में सहयोग प्रदान किया जाता है। इससे वनाग्नि के जोखिम को कम करने तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को न्यून करने में सहायता मिलती है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र आधारित अनुकूलन में वृद्धि होती है। साथ ही, यह पहल बाॅयोमास संग्रहण व कोयला उत्पादन के क्षेत्र में आजीविका के अवसर उत्पन्न करके महिलाआंे को आर्थिक रूप से सशक्त भी बनाती है, जिससे पहाड़ी समुदायों में सामाजिक रिजीलियेन्स मजबूत होता है।
इस प्रकार, इन आपसी निर्भरतओं को पहचान कर व उन पर ध्यान देकर, जल, उर्जा, खाद्य-जंगल, पारिस्थितिकी तंत्र, जेण्डर ;डब्ल्यूईएफ-एफईजीद्ध का यह जुड़ाव यह सुनिश्चित करता है कि पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को समुदाय की भलाई व स्त्री-पुरूष समानता से जोड़ा जाये। इस तरह का मिला-जुला तरीका ऐसी विशिष्ट स्थितियों के अनुसार समाधान तैयार करने में मदद करता है जो संसाधनों के उचित उपयोग व सामाजिक-पर्यावरणीय सशक्तता को बढ़ाते हैं। इससे यह ढांचा संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में जलवायु के अनुकूल ढलने व स्थाई विकास के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। जुड़ाव का यह व्यापक दृष्टिकोण ‘‘पिरूल जैव-कोयला परियोजना’’ को दुनिया भर के पहाड़ी इलाकों के लिए एक ऐसे माॅडल के तौर पर प्रस्तुत करता है, जिसे वे आसानी से बड़े पैमाने पर अपना व दुहरा कर, जलवायु के प्रति रिजीलियेण्ट, जेण्डर की दृष्टि से समान तथा पर्यावरण की दृष्टि से स्थाई आर्थिक प्रणाली तैयार कर सकते हैं।
हर्षित पन्त
वैज्ञानिक - सामाजिक-आर्थिक विकास केन्द्र ;सीएसईडीद्ध
जी0बी0 पन्त हिमायली पर्यावरण राष्ट््रीय संस्थान
कोसी-कतरमाल, अल्मोड़ा - 263 643, उत्तराखण्ड Email: harshit.pantj@gbpihed.nic.in
Source: Sustainable Aquaculture, March 2025, LEISA INDIA, Vol. 27, No.4, December 2025


