राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में कैर, सांगरी, बेर, लसोड़ा व एलोवेरा जैसे कई पौधे स्वाभाविक रूप से उगते हैं। यदि इन उत्पादों का सरल प्रसंस्करण व मूल्यवर्धन कर उत्पाद तैयार किये जाये ंतो यह शहरी महिलाओं के लिए आय व आत्मनिर्भरता का प्रभावी साधन बन सकता है।
राजस्थान का मरूस्थलीय क्षेत्र शुष्क जलवायु के बावजूद कई उपयोगी वनस्पतियों से समृद्ध है। यहां कैर, सांगरी, बेर, लसोड़ा, काचरी, खजूर, ग्वार, मोठ व एलोवेरा जैसे पौधे प्राकृतिक रूप से पाये जाते हैं। ये पौधे कम वर्षा व कठिन परिस्थितियों में भी पनपते हैं और पोषण की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। खास बात यह है कि इन प्राकृतिक वनस्पतियों से प्राप्त उत्पादों को अनेक मूल्य सवंर्धित उत्पादों में बदलते हुए इन्हें संरक्षित व सुरक्षित किया जा सकता है, जो पोषण व आय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी संगठनों द्वारा इस दिशा में प्रयास करते हुए पोस्ट हार्वेस्ट तकनीकों के माध्यम से राजस्थान के शहरी क्षेत्रों में निवास करने वाली महिलाओं के लिए आय की नई संभावनाएं उत्पन्न की गयी हैं।
पोस्ट हार्वेस्ट तकनीक की भूमिका
फसल कटने के बाद उसे सुरक्षित रखने, खराब होने से बचाने व अचार, पाउडर, सूखे उत्पाद आदि बनाकर उसका मूल्य बढ़ाने की तकनीकों पर आधारित है। इन तकनीकों के माध्यम से कृषि उत्पादों की भण्डारण अवधि बढ़ती है और उनका बाजार मूल्य भी कई गुना तक बढ़ सकता है।
मरूस्थलीय क्षेत्रों में प्रचुर धूप उपलब्ध होने के कारण सौर सुखाने ;ैवसंत क्तलपदहद्ध जैसी तकनीकें विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होती हैं। इससे उर्जा की बचत होती है तथा उत्पादों की गुणवत्ता भी बनी रहती है।
मूल्यवर्धन से बढ़ती आय
उचित भण्डारण व प्रसंस्करण के अभाव मे ंनाशवान कृषि उत्पादों का एक बड़ा भाग खराब हो जाता है। कई बार फल व सब्ज़ियों में 20 से 40 प्रतिशत तक की हानि हो जाती है। यदि सौर-सुखाने, अचार बनाने, निर्जलीकरण व स्वच्छ पैकेजिंग जैसी सरल तकनीकों का उपयोग किया जाये तो इन उत्पादों की भण्डारण अवधि बढ़ाई जा सकती है और उनका बाजार मूल्य कई गुना तक बढ़ाया जा सकता है। नीचे दी जा रही तालिका के माध्यम से हम उत्पादों के संभावित मूल्यवर्धित उत्पाद तथा उनके उपयोग को जान सकते हैं:
तालिका 1: मरूस्थलीय उत्पादों के संभावित मूल्यवर्धित उत्पाद व उनका उपयोग
| क्रमांक | उत्पाद | उपयोग की दृष्टि से मूल्यवर्धित उत्पाद |
| 1 | कैर | अचार व सूखा कैर के पारम्परिक व्यंजन |
| 2 | सांगरी | सूखी सांगरी, कैर-सांगरी मिश्रण के पैक्ड फूड |
| 3 | बेर | सूखा बेर, बेर पाउडर, जैम, चटनी, स्क्वैश व अचार |
| 4 | लसोड़ा | अचार |
| 5 | काचरी | सूखा काचरी, पाउडर, मसाला |
| 6 | ऐलोवेरा | जेल, जूस, साबुन व स्वास्थ्य व सौन्दर्य उत्पाद |
| 7 | खजूर | पाउडर, कैंडी, मिठाई |
महिलाओं के लिए संभावित उद्यम
शहरी महिलाएं घर आधारित लघु-उद्यम के रूप में इस प्रकार के उत्पाद तैयार कर सकती हैं। इन उत्पादों को ‘‘घरेलू’’ या ‘‘पारम्परिक’’ पहचान के साथ स्थानीय बाजारों तथा डिजिटल माध्यमों के जरिये बेचा जा सकता है।
प्रशिक्षण व विपणन की आवश्यकता
कृषि विज्ञान केन्द्रों, अनुसंधान संस्थानों व स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को प्रसंस्करण, पैकेजिंग व विपणन का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। डिजिटल प्लेटफार्म व ई-कामर्स के उपयोग से इन उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाया जा सकता है।
स्थानीय पहल से नई संभावनाएं
मरूस्थलीय क्षेत्र की इन खूबियों को पहचानते हुए जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय व केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर ;कजरीद्ध द्वारा जोधपुर व आस-पास के शहरी क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन कर इन उत्पादों के मूल्य संवर्धन की दिशा में कार्य प्रारम्भ किया गया। वर्तमान में पे्ररणा, गिरिराज, पिक्कल्स, ताना-बाना, सतरंगी विधा आदि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से शहरी क्षेत्रों की महिलाएं कैर व संागरी से अचार तथा मसाला मिश्रण तैयार कर स्थानीय बाजारों में बेच रही हैं। पहले ये उत्पाद केवल घरेलू उपयोग तक सीमित थे, लेकिन प्रसंस्करण व पैकेजिंग के बाद इनकी मांग बढ़ने लगी है। यद्यपि अभी इस तरह के प्रयास बहुत छोटे स्तर पर हैं तथापि, ऐसे छोटे प्रयास यह संकेत देते हैं कि मरूस्थलीय क्षेत्रों की पारम्परिक उपज भी महिलाओं के लिए आय का स्थाई स्रोत बन सकते हैं।
निष्कर्ष
उपरोक्त विभिन्न महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से किये गये छोटे-छोटे प्रयास यह सिद्ध करते हैं कि राजस्थान के मरूस्थलीय क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन शहरी महिलाओं के लिए आजीविका का सशक्त आधार बन सकते हैं। यदि कैर, सांगरी, बेर, लसोड़ा व एलोवेरा जैसे उत्पादों का सरल तकनीकों के माध्यम से प्रसंस्करण किया जाये तो महिलाएं स्थाई आय अर्जित कर सकती हैं।
इस प्रकार मरूस्थलीय उत्पादों का मूल्यवर्धन न केवल महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में सहायक है, वरन् यह स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण व स्थाई कृषि आधारित आजीविका को भी बढ़ावा देता है।
प्रो0 एल.एन. हर्ष
पूर्व कुलपति, जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय,
जोधपुर, राजस्थानडाॅ0 अरूण कुमार
पूर्व प्रधान वैज्ञानिक,
केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान ;सीएज़ेडआरआईद्ध, राजस्थान
16-ई-19, चैपासनी हाउसिंग बोर्ड, जोधपुर-342 008
राजस्थान
Email: akpurohitcazri@gmail.com



