परिवार के पोषण एवं आय हेतु घर के पिछवाड़े पोषण वाटिका

Updated on July 7, 2026

वर्षा आधारित खेती पर आधारित किसानों की आजीविका जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है। ऐसी स्थिति में वैकल्पिक कृषि उद्यम किसानों को खेती से जुड़े रहने के लिए आवश्यक सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। घर के पिछवाड़े गृहवाटिका बनाना एक ऐसा ही उद्यम है, जिससे न सिर्फ महिलाएं सशक्त बनती हैं, वरन् इससे उनकी व उनके परिवार की भोजन, पोषण व आय सुरक्षा जैसी कई आवश्यकताएं भी पूरी होती हैं।


चन्नापुर व चैरागुडा गांव कर्नाटक राज्य के धारवाड़ जिले में पड़ने वाले हुबली तालुक में अवस्थित हैं। यहां अधिकांश किसान लघु व सीमान्त किसानों की श्रेणी में आते हैं, जिनके पास बहुत कम खेत हैं और उस पर वे वर्षा आधारित खेती करते हैं तथा फसलों की सिंचाई के लिए लगभग पूरी तरह से वार्षिक मानसून पर निर्भर करते हैं। मृदा की कमजोर गुणवत्ता तथा रसायनांे एवं कीटनाशकों के अन्धाधुन्ध उपयोग से न केवल खेती की लागत बढ़ी है, वरन् बाहरी निवेशों पर उनकी निर्भरता भी बढ़ी है, उत्पादन में कमी आयी है, आय अनिश्चित हुई है तथा खाद्य पदार्थों में रसायनिक पदार्थों का प्रयोग बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन जनित मौसम में हो रहे अनियमित बदलावों के कारण, उनकी खेती जैसी जोखिमपूर्ण आजीविका और भी अधिक अनिश्चित हो गयी है। परिवारों की खाद्य व पोषण सुरक्षा खतरे में पड़ गयी है। प्रमुख व नामचीन संस्थाओं की तरफ से पर्यावरण-सम्मत खेती के उपर कोई ठोस दिशा-निर्देश न मिलने के कारण विशेषकर युवा किसान खेती-किसानी से दूर होते जा रहे हैं।

इसी सन्दर्भ में, वर्ष 2023 के दौरान, एएमई फाउण्डेशन ने रोटरी क्लब इन्दिरानगर के संयुक्त तत्वाधान में किसानों की आजीविका को उन्नत करने हेतु स्थाई खेती को प्रोत्साहित करने के उपर एक परियोजना का क्रियान्वयन किया। इस परियोजना का उद्देश्य शुष्क भूमि पर खेती करने वाले समूहों को व्यवस्थित कृषि पद्धतियों को अपनाने व वैकल्पिक कृषि पद्धतियों को लागू करने में सहायता प्रदान करना था। फसलों जैसे- मक्का, सोयाबीन एवं बाजरा जैसी फसलों में स्थाई कृषि पद्धतियों पर किसानों का मार्गदर्शन करने के साथ ही किसानों को अपने परिवार की पोषण एवं आय की भी सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु सक्षम बनाने की दृष्टि से गृहवाटिकाओं को भी प्रोत्साहित किया गया।

घर के पिछवाड़े गृहवाटिका

एक महत्वपूर्ण पहल के तहत्, खेतिहर महिलाओं को अपने घर के पिछवाड़े गृहवाटिका स्थापित करने में मदद की गयी। इस पहल का उद्देश्य, पहल से जुड़े परिवारों के आहार की विविधता बढ़ाना तथा सब्ज़ियों के लिए बाजार पर उनकी निर्भरता को घटाना था। प्रत्येक इच्छुक परिवारों को 10-13 प्रकार की सब्ज़ियों के बीज प्रदान किये गये। गृहवाटिका लगाकर महिलाएं कई प्रकार की सब्ज़ियां उगा सकीं।

वर्ष 2023-24 के दौरान, 70 समूह सदस्यों को 13 विविध सब्ज़ियों के बीजों के किट प्रदान किये गये। जिन लोगों ने बीजों की बुवाई पहले कर दी थी, अत्यधिक बारिश होने के कारण बीजों का जमाव नहीं हुआ। लेकिन देर से बुवाई करने वाली लगभग 40 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी गृहवाटिका से सब्ज़ियों की उपज प्राप्त की। महिलाओं ने रसोई घर से निकले अपशिष्ट, गृहवाटिका में पौधों की कटाई-छंटाई के बाद निकले अपशिष्ट, व सूखे पत्तों से समृद्ध जैविक कम्पोस्ट तैयार किया। इन्होंने पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने तथा बढ़वार को तेज करने हेतु तरल जैविक उर्वरकों जैसे- पंचगव्य व जीवामृत को भी तैयार किया। कीटों एवं बीमारियों को प्रबन्धित करने हेतु, इन लोगों ने नीम तेल का उपयोग एक प्राकृतिक कीटनाशक के तौर पर किया। मृदा की नमी बनाये रखने, खर-पतवारों को दबाने व मृदा की गुणवत्ता में सुधार करने हेतु पौधों के चारों तरफ पुआल व सूखे पत्तों जैसी जैविक खाद डाली गयी। प्रत्येक परिवार ने बैगन, भिण्डी, टमाटर, लौकी, खीरा, मूली व अन्य हरी पत्तेदार सब्ज़ियां उगायीं और एक ऋतु में प्रत्येक परिवार ने औसतन रू0 2,500-3,000/ की सब्ज़ियां उत्पादित कीं।

वर्ष 2024 में धारवाड़ जिले को पुनः भारी बारिश का सामना करना पड़ा। बेमौसम बारिश ने तबाही मचाई व फसलों को नुकसान पहुंचाया। किसानों को फसल हानि का सामना करना पड़ा। ऐसी स्थिति में लगभग 25 महिला किसानों ने अपने घरों में पोषण वाटिका लगाया। प्रत्येक परिवार ने एक मौसम में रू0 3,000-4,000 मूल्य की सब्ज़िया उत्पादित कीं। फसल हानि के कारण खाद्य संकट का सामना कर रहे इन परिवारों के लिए ये गृहवाटिकाएं वरदान बन गयीं।

बाक्स 1: सैनाज़ा की कहानी

श्रीमती सैनाज़ा एम. शेतासनादी धारवाड़ जिले के हुबली तालुक में पड़ने वाले गांव चन्नापुर में अपने चार सदस्यीय परिवार के साथ रहती हैं। उनका परिवार मुख्य रूप से खेती पर निर्भर करता है। उनके पास दो एकड़ कृषि भूमि है। इनके घर के पीछे भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा है। ये अपने परिवार के लिए ताजी व जैविक सब्ज़ियां उगाना चाहती थीं और इस हेतु इन्होंने स्थाई बागवानी अभ्यासों को अपनाया। स्थाई बागवानी अभ्यासों को अपनाकर एक छोटे से भूखण्ड को पर्यावरण-सम्मत बागीचों में बदलने की पद्धति सीखने हेतु वे बहुत उत्सुक थीं।

गृहवाटिका पर प्रशिक्षण तथा विभिन्न सब्ज़ियों के बीजों से युक्त गृहवाटिका किट प्राप्त करने वाली महिलाओं में से सैनाज़ा भी एक थीं। उन्होंने अपने घर के पिछवाड़े एक ऐसा क्षेत्र चुना, जहां भरपूर धूप आती है। वहां की मिट्टी भुरभुरी कर उसमें घर की बनी जैविक खाद व गोबर मिलाया। स्थान का अधिकतम उपयोग करने हेतु उन्होंने उंची क्यारियों, उध्र्वाधर बागवानी संरचनाएं व गमले को अपनी गृहवाटिका में शामिल किया।
इन्होंने रसोई से निकले फलों, सब्ज़ियों के छिलके, जूठन आदि, पौधों की कटाई-छंटाई से निकले अवशेष, सूखे पत्तों आदि को मिलाकर एक समृद्ध जैविक खाद तैयार की। इस खाद का उपयोग क्यारियों को उपजाउ बनाने के लिए किया जाता है। इन्होंने पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने व बढ़वार को तेज करने हेतु पंचगव्य व जीवामृत जैसे जैविक तरल उर्वरकों का उपयोग किया। प्राकृतिक रूप से कीट नियंत्रण के लिए नीम का तेल, स्पे्र व पानी का प्रयोग किया। मिट्टी की नमी बनाये रखने के लिए इन्होंने पुआल व सुखे पत्तों से जैविक मल्चिंग की। इससे खर-पतवारों का भी नियंत्रण हुआ व मृदा गुणवत्ता में सुधार हुआ।

अपनी उपलब्धियों के बारे में बात करते हुए सैनाज़ा का कहना है, पहले हम घर के लिए सब्ज़ियों पर हर माह करीब रू0 800-1,000 व्यय करते थे, लेकिन अब हम इन्हें अपने घर के पीछे तैयार किये गये गृहवाटिका में उगा सकते हैं। स्वयं सब्ज़ियां उगाकर हम रू0 3,800 की बचत कर सकते हैं।
इस तरीके से न केवल वे अपने परिवार को ताज़ी व पौष्टिक भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित होती है, वरन् पर्यावरणीय स्थाईत्व व सामुदायिक भागीदारी को भी बढ़ावा मिलता है। गृहवाटिका पर अपने ज्ञान व जानकारियों को वे अपने पड़ोसियों के साथ साझा करती हैं। अपने अनुभव व ज्ञान को साझा करके, वे उन्हें भी स्थाई बागवानी पद्धतियों को अपनाने हेतु प्रेरित व प्रोत्साहित करती हैं और इस प्रकार हरित व स्वस्थ वातावरण बनाने में सहयोग करती हैं। गृहवाटिका की सफलता से उत्साहित होकर समूह की कई सदस्य अपनी स्वयं की गृहवाटिका तैयार करने हेतु प्रोत्साहित हुईं हैं, जिसससे स्थाई जीवन शैली की संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है।

 

एएमई फाउण्डेशन
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Source: Sustainable Aquaculture, March 2025, LEISA INDIA, Vol. 27, No.3, September 2025

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