बंजर भूमि से समृद्धि जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन की ओर एक यात्रा

Updated on July 9, 2026

कृषि-वानिकी पर आधारित यह माॅडल, जिसमें दलहनी अंतर फसलों व उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों के साथ बेंत के वृक्षारोपण को एकीकृत किया जाता है, बंजर भूमि के सुधार हेतु एक व्यवहारिक व जलवायु-अनुकूल समाधान प्रदान करता है। यह माॅडल दर्शाता है कि संस्थागत सहयोग से व किसान-नेतृत्व वाले नवाचार, जलवायु अनुकूलन के लिए अनुकरणीय मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।


हिमाचल प्रदेश की निचली पहाड़ियों में, जहां अनियमित वर्षा व खराब मिट्टी खेती के लिए गंभीर चुनौतियां उत्पन्न करती हैं, वहां पर रहने वाले एक प्रगतिशाली किसान श्री अंकुश को एक मुश्किल वास्तविकता का सामना करना पड़ा। उनके पास बंजर भूमि का एक बड़ा टुकड़ा था, जिस पर उपज न के बराबर होती थी। क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी, मृदा की खराब गुणवत्ता व अप्रत्याशित जलवायु के कारण उस भूमि पर खेती करना लगभग असंभव सा हो गया था। लेकिन श्री अंकुश ने हार मानने के बजाय, अपनी भूमि व आजीविका दोनों में सुधार लाने हेतु जलवायु परिवर्तन के अनुकूल वैकल्पिक तरीकों की खोज की।

12 वर्षों पहले, श्री अंकुश ने एक साहसिक कदम उठाने का निर्णय लिया। समस्या स्पष्ट थी – मिट्टी की उर्वरता में ह्रास, मृदा में जल धारण क्षमता की कमी व आर्थिक उत्पादन का अभाव। समाधान प्रकृति आधारित, कम लागत वाला व स्थानीय कृषि पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। विशेषज्ञों से परामर्श करने के बाद, उन्होंने नौनी स्थित डाॅ0 यशवंत सिंह परमान बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के वृक्ष सुधार एवं आनुवांशिक संसाधन विभाग का भ्रमण किया व वहां पर बेंत की उन्नत प्रजातियांे का क्षेत्र प्रदर्शन देखा।

श्री अंकुश ने बेंत की उन्नत प्रजातियों ;सैलिक्सद्ध को लगाने का निश्चय किया। यह एक तेजी से बढ़ने वाली, मजबूत वृक्ष की प्रजाति है, जो अपने पारिस्थितिक एवं व्यवसायिक मूल्य के लिए जानी जाती है। बेंत तेजी से लग जाते हैं, इनकी बाहरी जड़ें अधिक फैलती हैं और बढ़ते मौसम में उच्च वाष्पोत्सर्जन होने के कारण ये मौसमी रूप से जलभराव वाले क्षेत्रों अथवा चारागाह वाले पहाड़ी क्षेत्रों में भी मृदा संरक्षण के लिए आदर्श होते हैं। पोषक तत्वों के चक्रण, कार्बनिक पदार्थों के जमाव, उन्नत मृदा संरचना, जल अन्तप्र्रवाह में वृद्धि तथा मृदा क्षरण के प्रभावी नियंत्रण के माध्यम से मृदा उर्वरता को पहले जैसा ही बनाये रखने में बेंत की प्रजातियां प्रमुख भूमिका निभाती हैं। पर्णपाती प्रजाति होने के कारण, इनके पत्तों का कचरा कार्बनिक पदार्थों में महत्वपूर्ण योगदान देता है, जिससे सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ती है और मिट्टी के कणों का आपस में जुड़ाव बेहतर होता है। महीन जड़ों के व्यापक जाल से युक्त बेंत की रेशेदार जड़ प्रणाली जल व पोषक तत्वों के कुशल अवशोषण करने में सहायक होती हैं साथ ही मिट्टी को बांधकर रखती हैं, जिससे मृदा अपरदन रूकता है।

प्रक्रिया
वर्ष 2013 में, श्री अंकुश ने बेंत की उत्कृष्ट प्रजातियों के पौधों को खरीदा और डाॅ0 वाईएसपीयूएचएफ, नौनी, सोलन, हिमाचल प्रदेश के वैज्ञानिकों से तकनीकी सहयोग प्राप्त कर खेती प्रारम्भ किया। इन प्रजातियों का चयन उनकी अनुकूलनशीलता, पौधों की सीधी लम्बाई ;औद्योगिक उपयोग के लिए एक वांछनीय गुणद्ध व तने की कलमों द्वारा आसानी से लग जाने की क्षमता के आधार पर सावधानीपूर्वक किया गया। इन्होंने अपनी बंजर भूमि पर बेंत के पौधों को लगाया। बेंत की खेती के साथ अन्तःखेती के तौर पर इन्होंने राजमा व मटर जैसी दलहन फसलों को लगाया, जिससे एक तरफ तो वायुमंडलीय नाइट््रोजन स्थिरीकरण में सहयोग हुआ तो दूसरी तरफ सूक्ष्मजीवों की विविधता बढ़ने से मिट्टी की जैविक सामग्री में वृद्धि हुई। इन सुधारों से उत्साहित होकर, आय बढ़ाने के उद्देश्य से पुनसर््थापित क्षेत्र में सेब के पौधे लगाये गये।

श्री अंकुश ने कृषि विज्ञान केन्द्र से बेंत की उन्नत प्रजातियों तथा तकनीकी दिशा-निर्देशन सहित सघन संस्थागत सहयोग प्राप्त किया। इस सहयोग में वृक्षारोपण ;गढ्ढे खोदना, पौधों के बीच आपस में उचित दूरी, गढ्ढे की भराई के लिए प्रयोग होने वाली सामग्रीद्ध, सिंचाई का समय व खर-पतवार प्रबन्धन शामिल थे। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा नियमित रूप से क्षेत्र भ्रमण के माध्यम से निगरानी की गयी साथ ही किसानों को डाॅ0 वाईएसपीयूएचएफ में स्थापित बेंत वृक्षारोपण स्थलों का भ्रमण कराया गया। इससे किसानों की बेंत की खेती करने की क्षमता बढ़ी तथा भूमि का वैज्ञानिक प्रबन्धन सुनिश्चित हुआ।

प्रभाव
बेंत की नई प्रजातियां अपने अंतिम उपयोग के आधार पर विविध आर्थिक लाभ प्रदान करती हैं। इनमें चारा ;पत्तियां व नयी-नयी टहनियांद्ध, पौधों के उपचार के लिए बायोमाॅस, ईंधन व टोकरी बनाने जैसी शिल्प गतिविधियों के लिए डण्डे शामिल हैं। ईंधन व टोकरी आदि बनाने के लिए लकड़ियों की तुड़ाई आमतौर पर बेंत लगाने के 12 वर्षों बाद की जाती है, क्योंकि पेड़ तब तक परिपक्व हो चुके होते हैं। आज श्री अंकुश, इमारती लकड़ी, ईंधन व औद्योगिक उपयोग के लिए बेंत की लकड़ी से नियमित रूप से आय अर्जित करते हैं। बेंत की ये प्रजातियां, पारम्परिक भारतीय बेंत की तुलना में अधिक सीधी होने के कारण, इनका अधिक मूल्य मिलता है और प्लाईवुड निर्माण, खेल सामग्री ;विशेष रूप से क्रिकेट बल्ले का उत्पादनद्ध और यहां तक कि शिटाके मशरूम की खेती के लिए आधार के रूप में भी इनकी मांग है।

कुछ ही वर्षों में इनका पारिस्थितिक प्रभाव दिखने लगा। बंजर भूमि हरे-भरे क्षेत्र में बदल गयी, जिससे पक्षी आकर्षित होने लगे, जैव-विविधता में वृद्धि हुई व स्थानीय सूक्ष्म जलवायु में भी सुधार हुआ। मृदा में नमी बढ़ने से अन्य जमीनी वनस्पतियों के विकास में भी सहायता मिली है।
पुनसर््थापन के दौरान, अंकुश ने एक अलग खेत पर सेब व दलहन फसलें उगाकर अपनी आजीविका चलाई। इससे उसे नियमित आय मिलती रही, जबकि बंजर भूमि पर बेंत वृक्षों के प्रयोग से पारिस्थितिकी सुधार किया गया।
इस पहल का पूरे समुदाय पर व्यापक प्रभाव पड़ा। आस-पड़ोस के किसान, जो पहले इस हस्तक्षेप के बारे में सन्देह कर रहे थे, उन्होंने भी इसी तरह के माॅडल अपनाने प्रारम्भ कर दिये। इसके आसानी से प्रसार व प्रत्यक्ष लाभों को देखते हुए, बहुत से किसानों ने अपने बंजर खेतों में बेंत की सेलिक्स प्रजाति के पौधे लगाने प्रारम्भ कर दिये हैं। इस प्रकार उन्होंने कृषि-वानिकी को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल आजीविका रणनीति के रूप में अपनाया है।

सफलता के कारक
बेंत-आधारित भूमि पुनसर््थापन माॅडल की सफलता का श्रेय संदर्भ-विशिष्ट, वैज्ञानिक व सामाजिक-आािर्थक कारकों के संयोजन को दिया जा सकता है। सर्वप्रथम, स्थानीय कृषि-जलवायुविक परिस्थितियों के अनुकूल बेंत की प्रजातियों का चयन करने से बहुत कम पौधे खराब हुए तथा बंजर भूमि को प्रभावी ढंग से उर्वर भूमि में बदला जा सका। डाॅ0 वाईएसपीयूएचएफ विश्वविद्यालय व कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों से प्रजातियों का चयन, रोपण तकनीक, सिंचाई एवं नियमित अन्तराल पर निगरानी आदि के रूप में मिलने वाले निरन्तर तकनीकी दिशा-निर्देश ने प्रमुख भूमिका निभाई। यह हस्तक्षेप कम लागत वाला था। इसमें न्यूनतम निवेश व रख-रखाव की आवश्यकता थी, जिससे यह छोटे व सीमान्त किसानों के लिए अत्यधिक सुलभ हो गया। इस हस्तक्षेप का एकीकृत व चरणबद्ध दृष्टिकोण इस माॅडल की एक प्रमुख विशेषता थी- पारिस्थितिकी पुनसर््थापन के लिए बेंत रोपण किया गया, उसके बाद मृदा को समृद्ध करने के लिए दलहनी अंतर्फसलें व अंततः आय सृजन के लिए सेब जैसी फसलों को लगाने की शुरूआत की गयी। इस प्रकार चरणबद्ध दृष्टिकोण ने भी इस माॅडल को सफल बनाया। इसने आर्थिक विकास का अवसर प्रदान करते हुए भूमि का क्रमिक लेकिन स्थाई परिवर्तन सुनिश्चित किया। सबसे बढ़कर, किसान अंकुश की दूरदर्शिता, धैर्य व दीर्घकालिक प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण थी। संस्थागत सहयोग के साथ-साथ उनके 12 वर्षों के निरन्तर प्रयासों के परिणामस्वरूप बंजर भूमि को एक उपजाउ व जलवायु-लचीली कृषि-वानिकी प्रणाली में सफलतापूर्वक परिवर्तित किया गया।

श्री अंकुश द्वारा पारिस्थितिकी पुनसर््थापन के लिए किया गया यह प्रयास आज आस-पास के किसानों के लिए एक रोल माॅडल बन चुका है। और लोग इस माॅडल को अपनाकर दीर्घकालिक लाभ के तौर पर बंजर जमीनों में सुधार करते हुए स्थाई आय उपार्जन की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं।
निष्कर्ष व संस्तुतियां

यह पहल कृषि-वानिकी पर आधारित भूमि पुनसर््थापन का एक अनुकरणीय माॅडल प्रस्तुत करती है, जिसमें बेंत वृक्षारोपण को दलहनी अंतरफसलों के साथ एकीकृत किया जाता है और उसके बाद सेब जैसी उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों को शामिल किया जाता है। यह किसान-नेतृत्व वाला एक नवाचार है, जिसे वैज्ञानिक व संस्थागत सहयोग प्राप्त है, जो खराब भूमि के सुधार के लिए एक व्यवहारिक व जलवायु-लचीला समाधान उपलब्ध कराती है।

श्री अंकुश की कहानी, जलवायु-स्मार्ट कृषि-वानिकी की क्षमता का उदाहरण है, जो खराब, अनुत्पादक भूमि को एक उपयोगी स्थाई सम्पत्तियों में बदल सकती है। उनका माॅडल दर्शाता है कि संस्थागत सहयोग से किसान-नेतृत्व वाले नवाचार जलवायु अनुकूलन के लिए अनुकरणीय मार्ग तैयार कर सकते हैं। यह वृक्ष-आधारित कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित करने, लम्बी अवधि की फसलों का सहयोग करने व गैर पारम्परिक कृषि उत्पादों के लिए बाजार संपर्क प्रदान करने वाले नीतिगत ढांचों की तत्काल आवश्यकता को भी प्रदर्शित करता है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन पारम्परिक कृषि के लिए चुनौतियां उत्पन्न कर रहा है, ऐसे जमीनी अनुभवों से न केवल सीख मिलती है, वरन् यह उम्मीद भी जगती है कि सही प्रयासों से जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से निपटा जा सकता है।


शिखा भगत, उषा शर्मा, अजय ब्रगत व नागेन्दर पाल बुटैल
कृषि विज्ञान केन्द्र
रोहरू, शिमला, हिमाचल प्रदेश - 171 207
Email: bhagtashikha@gmail.com

जय पाल शर्मा
औद्यानिक एवं वानिकी काॅलेज
थुनाग, मण्डी, हिमाचल प्रदेश - 173 230

Source: Sustainable Aquaculture, March 2025, LEISA INDIA, Vol. 27, No.2, June 2025

Recent Posts

बायोमाॅस प्रबन्धन का पर्यावरणीय व सामाजिक-आर्थिक सम्बन्ध महिलाओं के नेतृत्व वाली उद्यमशीलता

बायोमाॅस प्रबन्धन का पर्यावरणीय व सामाजिक-आर्थिक सम्बन्ध महिलाओं के नेतृत्व वाली उद्यमशीलता

उत्तराखण्ड के जंगलों में, चीड़ की पत्तियां, जंगल की आग बढ़ाने का एक प्रमुख कारण बनती थीं, और इनका प्रबन्धन एक बड़ी...

जल निकाय आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली आदिवासी परिवारांे के लिए एक वरदान है

जल निकाय आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली आदिवासी परिवारांे के लिए एक वरदान है

महाराष्ट् में जल निकाय ;स्थानीय नाम बोदीद्ध आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली के क्रियान्वयन ने छोटी जोत वाले किसानोें की...

मरूस्थलीय उत्पादों का प्रसंस्करण: राजस्थान की शहरी महिलाओं के लिए आर्थिक सशक्तिकरण की राह

राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में कैर, सांगरी, बेर, लसोड़ा व एलोवेरा जैसे कई पौधे स्वाभाविक रूप से उगते हैं। यदि इन...