महाराष्ट् में जल निकाय ;स्थानीय नाम बोदीद्ध आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली के क्रियान्वयन ने छोटी जोत वाले किसानोें की आय में वृद्धि की है। अपने विभिन्न एकीकृत घटकों के माध्यम से, इस माॅडल ने आय वृद्धि, परिवार के लिए पोषण, परिवार की अनुकूलन क्षमता व स्थाई को बढ़ाया है।
भारत में छोटी जोत के किसानों को पोषण एवं आजीविका प्रदान करने में मत्स्य पालन की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत में मत्स्य पालन से लगभग 14.5 मिलियन लोगों को रोजगार मिलता है। सहायक आजीविका के तौर पर समुद्र एवं महासागरीय मत्सय पालन के साथ-साथ मीठे पानी में मत्स्य पालन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यद्यपि घटते जल संसाधन एवं बढ़ते जल प्रदूषण के कारण मत्स्य पालन में बहुत सी चुनौतियां सामने आ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत से जल निकायों का कम उपयोग होता है और उनमें मत्स्य पालन की अपार संभावनाएं हैं। महाराष्ट््र के गढ़चिरौली जिले में एटापल्ली एवं भामब्रागढ़ ऐसा ही एक क्षेत्र है, जहां मत्स्य पालन को बढ़ावा देने की अपार संभावनाएं हैं।
एटापल्ली एवं भामब्रागढ़ में 80 प्रतिशत से अधिक आबादी आदिवासी समुदायों की है और वे अत्यन्त गरीबी में जीवन-यापन करते हैं। यहां बहुतायत में वन आच्छादित क्षेत्र हैं और अधिकांश परिवार अपनी आजीविका व जीवन निर्वाह के लिए कृषि एवं कुछ वन संसाधनों पर निर्भर हैं। ध्यान देने योग्य है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि व वन क्षेत्रांे पर गम्भीर प्रभाव पड़ रहा है। वर्षों से नष्ट होते प्राकृतिक संसाधन व फसल विविधता में कमी के चलते किसानों की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो गयी है।
मत्स्य पालन आधारित एकीकृत खेती: एक महत्वपूर्ण अवसर
इस क्षेत्र के आदिवासी समुदायों ने जल निकायों ;बोदीद्ध सहित कई समृद्ध पारम्परिक प्रणालियों को संरक्षित रखा है। इस क्षेत्र में अधिकांश भूमिधर परिवारों के पास छोटे-छोटे खेत तालाब हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में बोदी कहते हैं। खेतों में छोटे-छोटे जल निकाय या बोदी इस क्षेत्र की विशिष्ट विशेषता हैं। ये खेत तालाब खरीफ ऋतु में सूखा की स्थिति उत्पन्न होने पर धान की फसल के लिए सिंचाई की सुरक्षा उपलब्ध कराते हैं। कुछ किसान इन खेत तालाबों में घरेलू उपभोग के लिए मछलियां भी पालते व पकड़ते हैं।
प्रारम्भिक सर्वेक्षण के दौरान, यह पाया गया कि इन जल निकायों को सही ढंग से प्रबन्धित नहीं किया गया था। साथ ही फसल उगाने के तरीकों में भी सुधार करने की आवश्यकता थी। इसीलिए, बाएफ डेवलपमेण्ट रिसर्च फाउण्डेशन द्वारा नाबार्ड के वित्तीय सहयोग से एक जल निकाय आधारित एकीकृत खेती प्रणाली को प्रोत्साहित किया गया। इसका उद्देश्य कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देकर जरूरतमंद परिवारों की आजीविका व आत्मनिर्भरता में सुधार करना था। इस पहल को 8 गांवों में लागू किया गया।
चक्रीयता व लचीलेपन की अवधारणा
जल निकाय आधारित प्रणाली से कृषि प्रणाली में चक्रीयता स्थापित करने में सहायता मिलेगी। यह चक्रीयता जल निकाय आधारित कृषि प्रणाली के चारों तरफ घूमेगी। जल निकायों को गहरा करने से उनकी जल धारण क्षमता बढ़ेगी और आस-पास के खेतों की नमी की मात्रा में सुधार होगा। जल निकायों में जलीय पौधों के संवर्धन के लिए विभिन्न उपाय किये जा रहे हैं। इससे जमीनी पानी में मत्स्य पालन के लिए उपयुक्त परिस्थितियां बनेंगी। जल निकायों के किनारे मुर्गी व बत्तख पालन शुरू किया गया है। इन मुर्गियों व बत्तखों के अपशिष्ट जल निकायों में पड़ी मछलियों के विकास के लिए आहार का काम करते हैं। मत्स्य पालन अपशिष्ट जल में पौधों के पोषक तत्वों की उपलब्धता को और बेहतर बनायेगा। इस जल का उपयोग बागवानी पौधों व सब्ज़ियों की सिंचाई के लिए किया जायेगा। पोषक तत्वों से भरपूर यह जल पौधों की वृद्धि में सुधार करेगा व फसलों की पैदावार बढ़ाने में सहायक होगा, साथ ही रासायनिक उर्वरता पर किसानांे की निर्भरता को भी कम करेगा।
सामाजिक संगठन व क्षमता निर्माण
किसानों को आठ ग्राम नियोजन समितियों में संगठित किया गया है, जिन्हें ‘‘ग्राम नियोजन समिति’’ के नाम से जाना जाता है। ये ग्राम नियोजन समितियां खेत तालाब या जल निकायों ;बोड़ीद्ध किसानों के लिए ग्राम स्तर पर किये जाने वाले पहलों की योजना बनाने व उनका अनुपालन करने व कराने में सक्रिय रूप से शामिल हैं। ये समितियां किसानों को प्रशिक्षण व क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के लिए एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आगे चलकर, क्लस्टर स्तर पर एक किसान उत्पादक संगठन बनाने के लिए समितियों का एक संघ बनाने की भी योजना है। भविष्य में, कच्चे माल की सामूहिक खरीद करने की जिम्मेदारी एफपीओ की होगी। साथ ही तैयार कृषि उत्पाद की बिक्री हेतु बाजार से सम्पर्क भी स्थापित करेगा।
किसानों को मत्स्य पालन की विभिन्न उन्नत पद्धतियों के बारे में जागरूक व प्रशिक्षित किया गया। इन प्रशिक्षणों में जल निकाय तैयार करना, जल गुणवत्ता आकलन करना, तालाबों में छोटी मछलियों को छोड़ना, उनका चारा प्रबन्धन, मछलियों को होने वाले रोगों की पहचान, मछली वृद्धि निगरानी आदि पर वास्तविक क्षेत्र प्रदर्शन शामिल थे। लगभग 300 किसानों को प्रशिक्षित किया गया।
शुरूआत में, प्रशिक्षण देने वाले लोग अर्थात् प्रशिक्षकों को स्थानीय आम भाषा मड़िया न आने के कारण प्रतिभागियों से उनका जुड़ाव नहीं हो पा रहा था। इस चुनौती को दूर करने के लिए, बाएफ ने गांवों से ऐसे सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों ;सीआरपीद्ध की पहचान की जो मराठी भाषा समझ सकते थे। इन सन्दर्भ व्यक्तियों ने प्रशिक्षण व प्रदर्शनों के दौरान अनुवाद में सहायता की।
प्रशिक्षण सामग्री का भी मड़िया भाषा में अनुवाद किया गया। इन प्रशिक्षण सामग्रियों को चित्रात्मक भाषा में तैयार किया गया, ताकि ये लोगों को आसानी से समझ में आ जायें।
जमीनी स्तर पर पहल
यहां परम्परागत रूप से जल निकायांे का उपयोग धान के खेतों की सुरक्षात्मक सिंचाई हेतु जल के एक स्रोत के तौर पर किया जाता रहा है। अधिकांश जल निकाय गाद से पट गये थे, जिससे उनकी जल भण्डारण क्षमता कम हो गयी थी। सबसे पहले जल निकायों से गाद निकाली गयी। इन निकाली गयी गाद को खेतों में डाल दिया गया। अब जल निकायों का उपयोग उन्नत तरीके से मत्स्य पालन के लिए किया जा रहा है।
गतिविधि शुरू करने से पहले किसानों को तालाब के मापन व तालाब तैयार करने की उचित विधियों के उपर प्रशिक्षित किया गया। तालाब तैयार करने में जुताई व चूने का प्रयोग जैसी उचित पद्धतियां शामिल थीं। मुख्य रूप से मछलियों की रोहू, कतला, ग्रास कार्प व कामन कार्प जैसी प्रजातियों का पालन किया गया। गतिविधि से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से सतह पर भोजन करने वाली, तल पर भोजन करने वाली व मध्य स्तर पर भोजन करने वाली मछलियांे अर्थात तीनों तरह की मछलियों को मिलाकर उनका पालन किया गया। प्रत्येक तालाब में पानी की उपलब्धता के आधार पर मछली के बच्चों की संख्या की गणना करने की विधि के उपर किसानों को प्रशिक्षित किया गया। साथ ही, मछली के चारे के उचित प्रबन्धन पर किसानों का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें मछलियों के चारे के लिए गोबर, तिलहन खली व उर्वरकों के प्रयोग के बारे में बताया गया। क्षेत्र में समय पर व गुणवत्तापूर्ण मछली के बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु, क्लस्टर में एक मछली हैचरी को भी प्रोत्साहित किया गया।
जल निकायों पर मचान बनाकर उसमें मुर्गियों के रहने की जगह बनाई गयी। मत्स्य पालन में सहयोग करने की दिशा में मुर्गियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनके अपशिष्ट मछलियों के लिए चारा का काम करते हैं। इसके अतिरिक्त, किनारों पर लगायी गयी पोषण वाटिकाओं से प्राप्त सब्ज़ियां परिवार की पोषण आवश्यकताएं पूरी करती हैं और मुर्गियों के अण्डे व उनका मांस किसानों के लिए आय का एक अतिरिक्त स्रोत होता है। मुर्गी पालन के सन्दर्भ में मुर्गियों के समुचित टीकाकरण एवं रख-रखाव अभ्यासों के उपर किसानों को प्रशिक्षित किया गया।
इस क्षेत्र में धान एक मुख्य फसल होने के कारण, धान की उन्नत प्रजातियों सहित बेहतर खेती पद्धतियों को अपनाया गया। खेत की मेड़ांे व जल निकायों की मेड़ों के किनारे सीताफल व नीबू जैसी औद्यानिक फसलें लगायी गयीं। छोटे-छोटे भूखण्डों पर पोषण वाटिका के रूप में विभिन्न प्रकार की सब्ज़ियांे की फसलें लगायी गयीं। मत्स्य पालन के कारण जल निकायों का पानी कुछ निश्चित पोषक तत्वों से भरपूर है। इसी पानी का उपयोग फसलों की सिंचाई के लिए किया जाता है, जिससे पौधों को आवश्यक पोषक तत्व मिल जाते हैं। किसानों को खाद बनाने व वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन के माध्यम से जैविक पदार्थों के पुनर्चक्रण की विभिन्न पद्धतियों पर प्रशिक्षित किया गया। वन वृक्षों के रख-रखाव व गैर लकड़ी वनोत्पादों की नियमित कटाई को रोकने हेतु जागरूकता व क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किये गये।
परिणाम:
जल निकाय आधारित एकीकृत खेती प्रणाली के प्रमुख परिणाम इस प्रकार हैं:-
प्रत्येक जल निकाय में उत्पादित मछली की औसत मात्रा प्रति परिवार लगभग 30 किग्रा0 थी। उन्नत पद्धतियों को अपनाकर, किसान प्रति जल निकाय प्रति वर्ष लगभग 128 किग्रा मछली उत्पादित करने में सक्षम हुए। इससे उनकी आय में वृद्धि हुई है। औसत कृषि प्रतिफल बढ़कर 200 करोड़ रू0 से 100 करोड़ रू0 हो गया। प्रति वर्ष आय 45,000 रू0 से बढ़कर लगभग 1 लाख रू0 तक हो सकता है। भविष्य में, फलदार वृक्षों से इस आय में और अधिक वृद्धि होगी। किसानों के कौशल में सुधार होेने से मत्स्य पालन व मुर्गी पालन से होेने वाली आय में भी वृ़िद्ध होगी। हस्तक्षेप से पहले व बाद में स्रोतवार आय तालिका 1 में प्रस्तुत की गयी है –
तालिका 1: स्रोतवार वार्षिक कृषि प्रतिफल
| हस्तक्षेप | हस्तक्षेप से पहले ;रू0 मेंद्ध | हस्तक्षेप के बाद ;रू0 मेंद्ध |
| मत्स्य पालन | 5313 | 22400 |
| मुर्गी पालन, अण्डे एवं चिड़ियाद्ध | 0 | 19512 |
| पोषण वाटिका से सब्ज़िया ;5 आरद्ध | 0 | 6653 |
| खरीफ – धान ;3 एकड़द्ध | 35320 | 47560 |
| रबी – चना | 0 | 4660 |
| गैर इमारती वनोत्पाद | 4500 | 4500 |
| कुल | 45133 | 105285 |
चुनौतियों से निपटना
जल निकाय आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली को प्रोत्साहित करने के शुरूआती दौरम में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन चुनौतियों को इस प्रकार देख सकते हैं –
ऽ पहली चुनौती प्रतिभागियों के आत्मविश्वास को बढ़ाना था। इस चुनौती से निपटने हेतु चर्चाओं एवं प्रदर्शनों का सहारा लिया गया।
ऽ क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण मछली के बीजों की उपलब्धता भी एक चुनौती थी। आस-पास के प्रतिष्ठित मत्स्य पालन केन्द्रों से सम्पर्क स्थापित करके इस चुनौती का समाधान किया गया। साथ ही इस समस्या के दीर्घकालिक समाधान के लिए क्षेत्र में एक नया मत्स्य पालन केन्द्र/हैचरी भी विकसित किया जा रहा है।
ऽ छुट्टा पशु जल निकाय संरचनाओं के साथ-साथ फसलों को भी नुकसान पहूंचा रहे थे। ग्राम पंचायतों के अनुसार मुर्गी पालन किसानों के लिए आय का एक अतिरिक्त स्रोत है और इसकी रक्षा करने हेतु पंचायत स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता पर चर्चा कर कार्य किया गया। ग्राम पंचायतों के इस निर्णय ने कई अन्य किसानों को भी जल निकाय आधारित पद्धति अपनाने व रबी फसलों की खेती करने हेतु प्रोत्साहित किया।
ऽ मछली, सब्ज़ियों व मुर्गी के बच्चों की चोरी व जंगली जानवरों द्वारा मुर्गियों को मारने, उठा ले जाने की दिक्कतें भी किसानों को झेलनी पड़ रही थीं। इन समस्याओं से निपटने हेतु किसान जल निकायों के पास ही अपना अस्थाई निवास स्थान बनाकर रहने लगे हैं। साथ ही खेतों के चारों ओर कम लागत वाली बाड़ लगाने का भी प्रयास किया जा रहा है।
भावी योजना
चुनौतियों के बावजूद, इस कार्यक्रम से 226 से अधिक परिवार लाभान्वित हुए। इसके अतिरिक्त, 600 इसके विस्तारीकरण के चरण में 600 परिवारों को लाभान्वित किया जायेगा। जल निकाय आधारित एकीकृत खेती प्रणाली से किसानों के लिए आजीविका के कई स्रोत सृजित हुए हैं। इससे खेती प्रणाली की विविधता में वृद्धि हुई है और परिवार स्तर पर पोषण विविधता बढ़ी है। अपने विविध एकीकृत घटकों के माध्यम से जल निकाय आधारित एकीकृत खेती प्रणाली से खेती की अनुकूलन क्षमता में वृद्धि हुई है और स्थाईत्व को प्रोत्साहन मिला है। इस क्षेत्र में बेहतर व स्थाई आजीविका व स्थाई मत्स्य पालन के परिणामों को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह एक आसानी से अपनाया जाने वाला माॅडल है
योगेश सावंत
प्रमुख थिमेटिक कार्यक्रम अधिशासी
खेत आधारित आजीविका एवं जलवायु कार्यद्ध
बाएफ डेवलपमेण्ट रिसर्च फाउण्डेशन
बाएफ भवन, डाॅ0 मणिभाई देसाई नगर
वारजे, पुणे - 411 058
Email: ygsawant@baif.org.in
Source: Sustainable Aquaculture, March 2025, LEISA INDIA, Vol. 27, No.1, March 2025


