मैं नीलम ग्राम- मोहम्मदपुर कलां, विकासखण्ड- भिनगा, जनपद- श्रावस्ती की रहने वाली हूं। नेपाल बार्डर से सटा श्रावस्ती पहाड़ों पर होने वाली बारिश एवं राप्ती नदी के कारण बाढ़ग्रस्त क्षेत्र की श्रेणी में आता है। मेरा गांव राप्ती नदी के किनारे बसा हुआ है और मेरे परिवार में मेरी सास, पति, दो बच्चे और स्वयं मैं, कुल 5 लोगों का परिवार है। परिवार की आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि है और हमारे पास दो बीघा खेती है, जो बाढ़ प्रभावित होने के कारण प्रायः हर वर्ष ही खेती में नुकसान उठाना पड़ता है।
नेपाल से आने वाला पानी क्षेत्र में बाढ़ लाता है तो जल निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण खेतों में लम्बे समय तक जल-जमाव भी बना रहता है। हमारी धान की खेती को बाढ़ बहा ले जाती है तो रबी फसलों की बुवाई देर से होने के कारण गेंहूं की उपज पर भी असर पड़ता है। हमारे परिवार को पूरे वर्ष भर खाद्य उपलब्धता में कठिनाई आती है। खाने व अन्य जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है, जिसे चुकाने के लिए मुझे व मेरे पति को मजदूरी करनी पड़ती है।
इन्हीं परिस्थितियों से जुझते हुए लगभग 5 वर्षों पूर्व मेरा जुड़ाव जी0ई0ए0जी0 ;गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुपद्ध संस्था से हुआ। संस्था से जुड़े लोगों ने बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में खेती की तकनीकों तथा जैविक खाद के फायदे व खाद बनाने की तकनीकों को बताया। संस्था के मार्गदर्शन में हमने वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाना प्रारम्भ किया व उनका उपयोग करते हुए सब्ज़ियों की जैविक खेती करना प्रारम्भ किया। इससे हमारी खेती में बाढ़ के कारण होने वाले नुकसान को कम करने में सफलता मिली। जैविक खाद के प्रयोग से खेती की लागत में कमी आयी, पोषणयुक्त व ताजी सब्ज़ियों की उपलब्धता सुनिश्चित हुई तथा समय से खेती करने के कारण सब्ज़ियों का बेहतर दाम मिला। सफलता से उत्साहित होकर तथा हमारे काम व लाभ को देखकर गांव की अन्य महिलाएं भी इस काम से जुड़ने की इच्छुक हुईं और हमने अन्य महिलाओं को भी जोड़ना शुरू किया। हमने गांव में दो महिला स्वयं सहायता समूहों- मां दुर्गा व मां काली स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाओं को छोटी-छोटी बचत से जोड़ा साथ ही सामूहिक रूप से खाद बनाने की प्रक्रिया से भी जुड़ाव सुनिश्चित किया। देखकर सीखने की प्रक्रिया के तहत् नरेन्द्रदेव कृषि विश्वविद्यालय, कुमारगंज, फैजाबाद, भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी आदि प्रतिष्ठित शैक्षणिक एवं शोध संस्थानों का हमने स्वयं भ्रमण स्वयं किया एवं अन्य महिला सदस्यों का भी एक्सपोजर भ्रमण सुनिश्चित कराया। इस प्रकार संस्था की तरफ से प्राप्त बौद्धिक, तकनीकी एवं व्यावहारिक ज्ञान के माध्यम से हमने समाज में अपनी एक पहचान बनाई।
यद्यपि यह सफर बहुत आसान नहीं था। घर पर सास व पति को समझाना, आस-पास के लोगों की बातों का जवाब देना तथा घर पर बच्चों व घर की सारी जिम्मेदारी पूरी करना कठिन था, लेकिन इसी में हमने रास्ता तलाश किया और जब खेती से लाभ होने लगा, घर का खाद उपयोग करने से खेती की खाद वाली लागत में कमी आयी तो पति का भी साथ मिलने लगा और कठिनाई कम होने लगी।
खाद बनाने तथा खेती की तकनीकों के उपर मास्टर ट््रेनर के रूप में हमारी पहचान जिले स्तर पर हुई। जिले के कृषि विभाग व कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अनुभव आदान-प्रदान के लिए मास्टर ट््रेनर के तौर पर हमें बुलाया जाता है। खेती एवं समूह के रूप में बेहतर कार्य करने के लिए हमें राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की तरफ से प्रशंसा पत्र भी प्रदान किया गया है। इसके साथ ही समुदाय में भी हमारी पहचान बनी है। अपने गांव के साथ ही आस-पास के अन्य गांवों के किसान अब हमसे खेती की नवीन तकनीक के उपर जानकारी लेने के लिए सम्पर्क कर रहे हैं।
अर्चना श्रीवास्तव
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