स्थाई मत्स्य पालन में ऐसी गतिविधियां शामिल हैं, जिनसे एक तरफ तो पारिस्थितिकी संतुलन सुनिश्चित होता है, तो दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण भी होता है। साथ ही समुदाय संचालित स्थाई कृषिगत बदलाव भी आता है। स्थाई मत्स्य पालन को अपने मुख्य पहल में शामिल कर, एक स्वैच्छिक संगठन सफल ने आसाम व ओडिशा में 7000 मत्स्य पालकों की आजीविका को सवंर्धित करते हुए उन्हें सशक्त बनाया है।
ग्रामीण भारत में, किसानों की आय वृद्धि तथा समुदायों की खाद्य व पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के सन्दर्भ में, मत्स्य पालन एक आजीविका के स्थाई माध्यम के तौर पर उभर रहा है। छोटे मत्स्य पालकों को संसाधन-कुशल मत्स्य पालन पद्धतियों को अपनाने हेतु आवश्यक ज्ञान एवं दक्षता से सम्पन्न बनाने हेतु एकीकृत मत्स्य पालन के माध्यम से खाद्य सुरक्षा परियोजना क्रियान्वित की गयी। इस परियोजना को स्थानीय तौर पर खाद्य एवं आजीविक के लिए स्थाई मत्स्य पालन ;एसएएफएएलद्ध नाम से जाना गया। आर्थिक सहयोग एवं विकास के लिए जर्मन फेडरल मंत्रालय ;बीएमज़ेडद्ध द्वारा वित्तपोषित यह एसएएफएएल परियोजना डाॅयचे गेसेलशाफ्ट फर इण्टरनेशनल जुसामेनार्बीट ;जीआईज़ेडऋ जीएमबीएच, द्वारा भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन व दुग्धपालन मंत्रालय के सहयोग से क्रियान्वित किया गया। आसाम व ओडिशा के मत्स्य पालन विभाग के साथ सघन रूप से मिलकर कार्य करते हुए इस परियोजना के अन्तर्गत आसाम के 12 जिलों व ओडिशा के 5 जिलों के 7000 से अधिक मत्स्यपालक किसानों को प्रशिक्षित किया गया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्थाएं मजबूत हुई हैं और स्थाई मत्स्यपालन अभ्यासों को बढ़ावा मिला है।
मत्स्य पालक समुदायों के सशक्तिकरण हेतु एसएएफएएल का दृष्टिकोण
इस पहल को स्थाई बनाने के लिए, एसएएफएएल स्थाई मत्स्यपालन अभ्यासों को मौजूदा सरकारी योजनाओं व नीतियों के साथ एकीकृत करता है। इसका लक्ष्य मत्स्य उत्पादन को बढ़ाना, खाद्य व पोषण सुरक्षा में सुधार करना तथा किसानों की आय में वृद्धि करना है। यह परियोजना एक सहयोगात्मक प्रयास है और आसाम राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन, स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों तथा इस क्षेत्र के अन्य हितभागियों के साथ मिलकर कार्य करती है।
पहले से प्रशिक्षित 140 सामुदायिक रिसोर्स व्यक्तियों के सहयोग से 500 से अधिक लोगों को सामुदायिक रिसोर्स व्यक्ति के रूप में प्रशिक्षित व सक्रिय करना इस पहल का एक प्रमुख घटक है। ये सामुदायिक रिसोर्स व्यक्ति फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों एवं कम्पनियों, उत्पादक समूहों एवं स्वयं सहायता समूहों के एक भाग के तौर पर ये सामुदायिक रिसोर्स व्यक्ति, समुदाय-संचालित व स्थाई ज्ञान हस्तान्तरित करना सुनिश्चित करते हैं। फार्मर प्रोड्यूूसर संगठन किसानों के लिए स्थानीय केन्द्रों के रूप मंे कार्य करते हैं, प्रशिक्षण व परामर्श सेवाएं प्रदान करते हैं। साथ ही आपसी शिक्षा व सामूहिक-आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देते हैं।
बाक्स 1: सोनमोनी देवी की सफलता की कहानी असम में ब्रम्हपुत्र नदी के दक्षिणी तट पर स्थित दोरोंगी गांव की किसान सोनमोनी देवी को एक वर्ष के अन्दर ही मत्स्य पालन से होने वाले लाभ में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। यह वृद्धि एसएएफएएल परियोजना के तहत् मत्स्य पालन की वैज्ञानिक पद्धतियों पर प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद हुई। वर्ष 2022 से पहले, सोनमोनी मुख्य रूप से मछली पालन के पारम्परिक तरीकों पर निर्भर करती थीं, जिसमें मछली पालन केवल घरेलू उपयाग तक ही सीमित था। मछली पालन पर वैज्ञानिक ज्ञान की कमी तथा संसाधनों की अनुपलब्धता के कारण उत्पादन कम होता था। यद्यपि, स्थाई मछली पालन पर प्रशिक्षण में भाग लेने के बाद, उन्होंने मछली पालन के लिए क्षेत्रफल के हिसाब से बीजों की संख्या को तय करना, चारे की गुणवत्ता में सुधार करना व तालाब पारिस्थितिकी तंत्र का कुशलतापूर्वक प्रबन्धन करना सीखा। अपने अनुभवों को बताते हुए सोनमोनी कहती हैं, ‘‘प्रशिक्षण से पहले, मैं अपने 0.06 हेक्टेयर के तालाब में मछलियों के 2,000 बीज डालती थी, लेकिन अधिक संख्या होने के कारण प्रत्येक वर्ष 400 मछलियां मर जाती थीं। मैं उन्हें चावल की भूसी व बचा हुआ खाना खिलाती थी, जिससे उनकी वृद्धि धीमी हो जाती थी। परन्तु प्रशिक्ष्ण के पश्चात्, अब मैं तालाब के पारिस्थितिकी को बनाये रखने, मछली के बीजों की वृद्धि सुनिश्चित करने तथा संतुलित पोषण देने के महत्व को समझने लगी हूं।’’ मत्स्य पालन के स्थाई तकनीकों के बारे में अपने नये ज्ञान के साथ, इन्होंने व्यवसायिक रूप से मछली पालन के लिए एक और तालाब पट्टे पर लिया और अपने व्यवसाय का विस्तार किया। 2023-2024 के दौरान, इनके तालाबों में मछली का उत्पादन 150 किग्रा0 से बढ़कर 200 किग्रा0 हो गया और इस प्रकार ये अपनी आय को दोगुना करने में सफल रहीं। |
एसएएफएएल के दृष्टिकोण का मुख्य आधार क्षमता निर्माण है। परियोजना के अन्तर्गत व्यवहारिक प्रशिक्षण माॅडल को अपनाया जाता है, जिसमें कक्षा सत्रों के साथ-साथ प्रक्षेत्र प्रदर्शन भी शामिल है। सामुदायिक सन्दर्भ व्यक्ति मत्स्य पालन विशेषज्ञों से न केवल मछली पालन तकनीकों पर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं, वरन् प्रौढ़ किसानों को सिखाने एवं उन्हें अभ्यासों से जोड़ने की प्रभावी पद्धतियों के विषय में भी विशिष्ट प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। प्रत्येक सामुदायिक सन्दर्भ व्यकित, दो घण्टे के सत्रों के माध्यम से 25 किसानों को प्रशिक्षित करता है, जिन्हें पूरे फसली सीज़न के दौरान निर्धारित किया जा सकता है। इन सत्रों को किसानों की कृषि व घरेलू जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन किया गया है, ताकि विशेषकर महिलाएं आसानी से इन सत्रों से लाभान्वित हो सकें। इन सत्रों में मछली पालन के प्रमुख पहलुओं जैसे- मछली के बीज डालने से पहले की प्रक्रिया, प्राकृतिक आहार, जल गुणवत्ता प्रबन्धन, मछली के बीज डालने के बाद की प्रक्रिया व कृषि अर्थशास्त्र की बुनियादी बातों आदि को शामिल किया गया है। सत्रों के दौरान दी गयी जानकारी को नियमित रूप से बनाये रखने तथा व्यवहारिक प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सन्दर्भ सामग्रियों जैसे- किसान पुस्तिकाएं, फिलपबुक, पोस्टर व कृषि रिकार्ड किताब जैसी शिक्षण सामग्रियों को विशेषज्ञों, सम्बन्धित हितभागियों एवं किसानों के सहयोग से तैयार कर वितरित किया जाता है।
व्यक्तिगत प्रशिक्षणों के अलावा, फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों, किसान उत्पादक समूहों एवं स्वयं सहायता समूहों ने सामूहिक रूप से कार्य करने, संगठन चलाने व व्यवसायिक क्षमताओं को बढ़ाकर भी अपने-आप को सशक्त बनाया है। ये संस्थाएं सामूहिक निर्णय लेने, बाजार तक पहुंच में सुधार करने एवं सर्वोत्तम अभ्यासों को लोगों से साझा करने के मंच के रूप में कार्य करती हैं। इन किसान संगठनों को सशक्त बनाने से किसानों के अन्दर मोल-भाव करने की ताकत बढ़ी है, गुणवत्तापूर्ण निवेशों तक उनकी पहुंच बढ़ी है और ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए संभावनाएं विकसित हुई हैं।
फार्मर प्रोड्यूसर संगठन, किसान उत्पादक समूह एवं सामुदायिक सन्दर्भ व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्रों में कृषिगत कियोस्क के रूप में कार्य करने वाले नव स्थापित क्लस्टर सूचना केन्द्रों एवं सेटेलाइट केन्द्रों को चलाने का काम करते हैं। ये लोग सरकारी योजनाआंे के माध्यम से फण्ड की जानकारी एवं स्थाई मछली पालन पर ज्ञान व सर्वोत्तम अभ्यासों व प्रशिक्षण सामग्रियों तक पहुंच बनाने हेतु कम्प्यूटर अथवा स्मार्ट फोन चलाने जैसी तकनीकों से युक्त होते हैं। ये केन्द्र स्थानीय ज्ञान के प्रसार को मजबूत करते हैं, सूचित निर्णय लेने में किसानों को सहयोग करते हैं और बैठकों एवं आपसी सम्पर्कों के केन्द्र के रूप में कार्य करते हैं।
स्थाई मत्स्य पालन को प्रोत्साहित करना एसएएफएएल के प्रयासों का मूल आधार है। ये अभ्यास पारिस्थितिकी संतुलन सुनिश्चित करते हैं, पर्यावरण संरक्षण को सुदृढ़ करते हैं और समुदाय- संचालित स्थाई कृषि बदलाव को बढ़ावा देते हैं। यह पहल भारत व जर्मनी के बीच हरित एवं स्थाई विकास साझेदारी के उद्देश्यों को सहयोग प्रदान करती है।
प्रभाव व आगे की राह:
आज तक, 500 से अधिक सामुदायिक रिसोर्स व्यक्तियों के माध्यम से 7000 से अधिक किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जो अपने समुदायों में घर-घर जाकर लोगों को सक्रिय सहायता प्रदान कर रहे हैं। सोनमोनी देवी ;जो स्वयं एक सीआरपी हैं।द्ध जैसी किसानों के लिए, एसएएफएएल परियोजना केवल आय बढ़ाने का अवसर नहीं है, वरन् यह अनुकूलन/रिज़ीलियेन्स व आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का एक मार्ग है। वे कहती हैं, ‘‘सीआरपी प्रशिक्षण प्राप्त करना मेरे जीवन में एक बड़ा बदलाव लाने वाला अनुभव रहा है। मैंने इस प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान को अपने समुदाय में लोगों को बताया। इससे न केवल समुदाय के अन्दर मेरी पहचान बनी, वरन् मैं महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने में भी सक्षम हुई।
एसएएफएएल माॅडल को भारत के अन्य राज्यों में सफलतापूर्वक दुहराया जा सकता है। इससे मछली पालन करने वाले समुदायों की रिज़ीलियेण्ट क्षमता मजबूत होगी। यह परियोजना इस बात का उदाहरण है कि स्थाई परिवर्तन लाने, खाद्य व पोषण सुरक्षा में सुधार करने व भावी पीढ़ियों के लिए आजीविका सुनिश्चित करने की दिशा में जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण किया जाना एक महत्वपूर्ण पहल है।
बेटिना रेन्नेर
निगरानी एवं मूल्यांकन
जूनियर विशेषज्ञ – जन सम्पर्क
ई-मेल: E bettina.renner@giz.de
प्रताप सिन्हा
प्रोजेक्ट लीडर – एसएएफएएल
जी0आई0ज़ेड रीज़नल कार्यालय, गुवाहाटी
मकान नं0 54 ;एद्ध, बनफूल पथ,
गुवाहाटी- 781038, आसाम
Source: Sustainable Aquaculture, LEISA INDIA, Vol. 27, No.1, March 2025



