कई बार, बदलाव लाने के लिए केवल एक बेहतर तरीका ही पर्याप्त होता है। बिहार के बंका जिले में नर्सरी उगाने की एक सरल तकनीक ने काफी लोकप्रियता प्राप्त की है, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में सब्जी की खेती में वृद्धि हुई है। साथ ही, इसे उद्यम के तौर पर अपनाकर तथा सब्ज़ी उत्पादन को प्रोत्साहित करते हुए कई किसान उद्यमी अच्छी कमाई कर रहे हैं और सम्मानजनक जीवन यापन कर रहे हैं।
पूर्वी बिहार में स्थित बंका जिला, बिहार के पिछड़े जिलों में से एक है। लोगों की आजीविका का मुख्य आधार खेती है। यहां लोगों के पास विविध फसलें चयन करने के अवसर हैं, लेकिन मुख्य रूप से खाद्य फसलों की खेती की जाती है। लोगों की जोत का आकार कम है। छोटे खेत व एकल खेती में कम उत्पादकता के कारण, आदिवासी किसान परिवार मुश्किल से एक वर्ष में रू0 50,000.00 की आय प्राप्त कर पाते हैं। वह भी उस स्थिति में, जब मौसम में कोई विशेष उतार-चढ़ाव न हो।
मानसून ऋतु में पर्याप्त वर्षा ;जून से सितम्बर तक लगभग 700 मिमी0द्ध होने के बावजूद, जिले के कई क्षेत्रों में, मानसून के मौसम में सब्ज़ी की खेती कम की जाती है। सब्ज़ियों की खेती हेतु तकनीकी ज्ञान की कमी तथा विश्वसनीय नर्सरी आदि की अनुपलब्धता के कारण किसान सब्ज़ियों की खेती करने में हिचकिचाते हैं। सामान्यतः सब्ज़ियों की नर्सरी देर से तैयार की जाती है। परिणामतः सब्ज़ियांे का बेहतर मूल्य न मिलने के कारण किसानों को सही लाभ नहीं मिल पाता है। घरों के आस-पास व उंची जमीनें सब्ज़ियों की खेती के लिए आदर्श होती हैं, परन्तु वहां मक्का जैसी कम लाभ वाली फसलों की खेती की जाती है। इसके पीछे मुख्य कारण स्थानीय बाजारों में सही गुणवत्ता वाली बीजों व पौधों का न मिल पाना है, जिसके कारण पौधों की उच्च मृत्यु दर, कम उत्पादकता जैसी समस्याएं किसानों के समक्ष आती हैं और उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
तालिका सं0 1: प्रत्येक सब्ज़ी के लिए प्रति पैकेट बीजों की संख्या
| क्रमांक | फसल का नाम | प्रति 10 ग्राम पैकेट में बीजों की संख्या |
| 1 | फूलगोभी | 2000-2200 बीज |
| 2 | मिर्च | 2000-2200 बीज |
| 3 | बैगन | 2000-2200 बीज |
| 4 | टमाटर 3000 बीज | 3000 बीज |
| 5 | करैला/लौकी | 50-55 बीज |
| 6 | खीरा | 80 बीज |
सब्जियों की खेती की सफलता बहुत हद तक पौधों की गुणवत्ता व नर्सरी तैयार करने के दौरान की गयी देख-भाल पर निर्भर करती है। नर्सरी तैयार करने के दौरान बीज उपचार, मृदा कीटाणुशोधन, जड़ क्षेत्र प्रबन्धन व समय पर जैविक खाद एवं पोषक तत्वों का प्रयोग जैसे महत्वपूर्ण चरण बहुधा जागरूकता या सहयोग की कमी के कारण छूट जाते हैं, जिससे पोधों की वृद्धि रूक जाती है, कीटों का प्रकोप बढ़ता है अथवा पौधे नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार घरेलू व समूह दोनों स्तरों पर उत्पादकता प्रभावित होती है। पारम्परिक रूप से मिट्टी में उगायी जाने वाली नर्सरियों में अंकुरण दर कम होती थी और व विल्ट जैसी मृदा जनित रोगों के प्रति संवेदनशील होती थीं, जिससे उत्पादकता कम हो जाती थी। दक्षिण बिहार में अनियमित वर्षा के कारण प्रायः खेत तैयार करने में देरी होने जाने के कारण फसलों की बुवाई समय पर नहीं हो पाती थी। इन सभी कारणों से पौधों को उगाने के लिए प्रो-ट््रे नेट हाउस नर्सरी जैसी उन्न पद्धति की आवश्यकता महसूस की गयी।
प्रो-ट््रे नेट हाउस नर्सरी उद्यम
इस तकनीक के माध्यम से नर्सरियां उगाने की प्रक्रिया निम्नवत् है –
अद्ध ट््रे का चयन: भूमि की आवश्यकता व पौधों की मांग के आधार पर प्रो-ट््रे का चयन व उसमें खानों की संख्या निर्भर करती है। पौध उगाने वाले खानों की आकार इतना होना चाहिए कि उसमें पौध उगाने के लिए आवश्यक मीडिया ;नर्सरी उगाने के लिए मिट्टी का विकल्पद्ध की मात्रा के साथ ही पानी भी पड़ जाये। फसल की आवश्यकता के आधार पर 98 या 50 खाने वाली ट््रे को चुनते हैं। उदाहरणस्वरूप, टमाटर, बैगन, मिर्च आदि फसलों के 98 खानांे वाली ट््रे तथा फैली जड़ों वाली फसलों जैसे- करैला, लौकी, तरबूज आदि की नर्सरी तैयार करने हेतु 50 खानों वाली ट््रे का चुनाव करते हैं।
बद्ध ग्रोइंग मीडिया की तैयारी: नर्सरी उगाने से पहले ग्रोइंग मीडिया तैयार करना एक महत्वपूर्ण चरण है। यह उगाये जाने वाले पौधों के प्रकार के आधार पर किया जाना चाहिए। मीडिया के भौतिक व रासायनिक गुण पौधों के अंकुरण व विकास को प्रभावित करते हैं। मीडिया के महत्वपूर्ण तत्व जल, वायु व पोषक तत्वों को धारण करने की क्षमता जितनी अच्छी होगी, उतना ही अच्छा जड़ों का विकास भी होगा। मीडिया का पीएच भी अंकुरण को प्रभावित करता है। मीडिया का चयन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि वह न कम न ज्यादा, बल्कि पर्याप्त नमी बनाये रखे।
बाक्स: 1 नर्सरी चक्र
| क्रमांक | माह | फसल |
| बैच 1 | जून – जुलाई | खीरा, करेला इत्यादि |
| बैच 2 | अगस्त – सितम्बर | बन्दगोभी, फूलगोभी, टमाटर, मिर्च, बैगन |
| बैच 3 | दिसम्बर – जनवरी | तरबूज, करेला आदि |
नर्सरी में पौधों को उगाने के लिए सामान्यतया कोकोपिट मीडिया का उपयोग किया जाता है। 5 किलो कोकोपिट की ईंट को 25 लीटर पानी में रात भर भिगोकर रखना चाहिए। उसके बाद, कोकोपिट को मच्छरदानी से 5-6 बार धोकर उसमें मौजूद अतिरिक्त नमक को निकाल देना चाहिए, जिससे स्वस्थ्य विकास के लिए पीएच 7 का तटस्थ स्तर बना रहे। फिर अतिरिक्त पानी निकालने के लिए कोकोपिट को सुखाया जाता है। कोकोपिट में नमी के स्तर की जांच करने का सबसे विश्वसनीय व सरल तरीका हाथ से नमी जांचना है। इसके लिए, ट््रे या ग्रोइंग मीडिया से मुट्ठी भर कोकोपिट लें व उसे अपनी मुट्ठी में कसकर दबाएं। अगर दबाते समय पानी टपकता है तो इसका अर्थ है कि अभी उसमें नमी की मात्रा अधिक है और वह बहुत अधिक गीला है, जिससे हवा का संचार कम हो सकता है और जड़ों में सड़न हो सकती है। अगर हाथ से दबाने पर पानी नहीं टपकता है, लेकिन हाथ में नमी महसूस होती है और कोकोपिट एक मुलायम गुच्छे की तरह आपस में जुड़ा रहता है तो इसका अर्थ है कि इसमें पौधों के विकास के लिए नमी का आदर्श स्तर है। वहीं अगर कोकोपिट सूखा, ढीला व बिखरने लगता है तो इसका अर्थ है कि मीडिया बहुत सूखी है और उसमें तुरन्त पानी देने की आवश्यकता है। जड़ों के स्वस्थ विकास व पौधों के जीवित बने रहने के लिए नमी का सही संतुलन बनाये रखना बहुत आवश्यक है।
कोकापिट को पोषक तत्वों व सुरक्षात्मक जैव एजेण्टों से समृद्ध बनाने हेतु, कम्पोस्ट व जैविक योजकों का संतुलित मिश्रण उपयोग में लाना चाहिए। पोषक तत्व एवं जैविक सामग्री से समृद्ध बनाने हेतु प्रत्येक 5 किग्रा0 कोकोपिट में 5 किग्रा0 ब्राउन गोल्ड मिलाये। फिर इस मिश्रण में 100 ग्राम ट््राइकोडर्मा एवं 100 ग्राम स्यूडोमोनाॅस फ्लोरेसेंस मिलायें। ये जैविक एजेण्ट जड़ क्षेत्र में कवक व जीवाणु रोगों को रोकने में मदद करते हैं तथा पौधों के समग्र स्वास्थ्य में सुधार भी करते हैं। सभी घटकों को अच्छी तरह से मिलायें ताकि वे समान रूप से एक साथ मिल जायें। तैयार होने के बाद, मिश्रण को प्रो-ट््रे में भरने से पहले कुछ घण्टों के लिए छाया में रख दें। यह संयोजन स्वस्थ पौध विकास के लिए पोषक तत्वों से भरपूर व रोग-रोधी नर्सरी मीडिया प्रदान करता है।
गद्ध अंकुरण व रोपण: ट््र के प्रत्येक खाने को तैयार मीडिया से ढीले ढंग से भरें व मीडिया को थोड़ा जमने के लिए ट््रे को धीरे से थपथपाएं। प्रो-ट््रे नर्सरी में अंकुरण के लिए आदर्श वातावरण बनाने हेतु बीज बोने के बाद, ट््रे को एक के उपर एक रखना एक सरल व प्रभावी तरीका है। एक बार ट््रे को ढेर में रखने के बाद, उसे हलके गीले जूट की बोरी से ढंक दें ताकि गर्मी व नमी बनी रहे। ये स्थितियां अंकुरण की दर को तेज करने तथा एक समान अंकुरण करने हेतु सहायक होती है।। जूट की बोरी पर प्रतिदिन पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए, ताकि वह नम रहे और उसकी वजह से ट््रे के अन्दर नमी बनी रहे।
अनुकूल परिस्थितियां होने पर, मिर्च, टमाटर व फूलगोभी जैसी अधिकांश सब्ज़ियों के बीज, आम तौर पर 3-4 दिनों में अंकुरित होने लगते हैं। हां, करेले के बीज थोड़े कड़े होते हैं, इसलिए उनका अंकुरण समय 6-7 दिन हो सकता है। बीज अंकुरित हो रहे हैं, अथवा नहीं, इसको जानने हेतु प्रतिदिन ट््रे को देखना चाहिए। क्योंकि जैसे ही किसी ट््रे में अंकुरण दिखाई दे, उसे ट््रे से निकालकर शेड नेट या नेट हाउस के नीचे फैला दें, जहां पौधों को छायादार प्रकाश व उचित हवा मिल सके। यह प्रक्रिया फफूंदस ंक्रमण को रोकने में मदद करती है तथा अंकुरण के बाद पौधों का स्वस्थ विकास सुनिश्चित होता है। सभी पौधों की एक समान बढ़त व विकास के लिए प्रति लीटर पानी में 2-3 ग्राम एनपीके 19ः19ः19 मिलाकर छिड़काव सुनिश्चित करें।
फसल के अनुसार, 21-30 दिन की उम्र वाले पौधों की रोपाई करें। रोपाई में होने वाले नुकसान को कम करने हेतु सुबह जल्दी या शाम को देर से रोपाई करना सुनिश्चित करें।
नर्सरी चक्र-व्यवसायिक माॅडल: इस तकनीक को दो प्रकार की संरचनाओं का उपयोग करके अपनाया जा सकता है। 1200 वर्ग फुट का एक पाॅली हाउस, जिसमें 6 साल तक चलने वाली स्थाई संरचना हो, उसकी लागत लगभग 156000 रू0 होगी। एक कम लागत वाला वैकल्पिक माॅडल बांस की संरचना से बना है। यह माॅडल 2 वर्षों तक चलता है। बांस की नर्सरी स्थापित करने की कुल लागत 17830.00 रू0 है।
तालिका सं0 2: 6 चक्र में नर्सरी पौधों के उत्पादन पर लागत-लाभ का ब्यौरा
| क्रम | सामग्री | प्रति चक्र | प्रति इकाई मूल्य | 6 चक्रों के लिए | मूल्य |
| 1 | ट््रे | 250 ट््रे 98 खाने व 50 ट््रे 50 खाने | 98 खाने – रू0 18.50 50 खाने – रू0 22 | 250 ट््रे 98 खाने व व 50 ट््रे 50 खाने | 5725 |
| 2 | कोकोपिट | 60 किग्रा0 | रू0 40 | 360 किग्रा0 | 14400 |
| 3 | ब्राउन गोल्ड | 60 किग्रा0 | रू0 28 | 360 किग्रा0 | 10080 |
| 4 | ट््राइकोडर्मा | 1.2 किग्रा0 | रू0 130 | 10 किग्रा0 | 1300 |
| 5 | स्यूडोमोनास या मित्र जीवाणु | 1.2 किग्रा0 | रू0 140 | 10 किग्रा | 1400 |
| 6 | एनपीके 19ः19ः19 | 1.2 किग्रा0 | रू0 120 | 10 किग्रा0 | 1200 |
| 7 | दवाएं | एकमुश्त | रू0 100 | एकमुश्त | 1000 |
| 8 | फूलगोभी/मिर्च/ बैगन/टमाटर 10 ग्राम | 12 पैकेट | रू0 500 | 72 पैकेट | 36000 |
| 9 | करेला/लौकी 10 ग्राम | 50 पैकेट | रू0 150 | 300 पैकेट | 45000 |
| कुल | 116105 | ||||
| प्रत्येक वर्ष पाॅली हाउस में नर्सरी तैयार करने में 6 चक्रों पर आया कुल खर्च | 140690 | ||||
| प्रत्येक वर्ष नेट हाउस में नर्सरी तैयार करने में 6 चक्रों पर आया कुल खर्च | 123605 | ||||
| 6 चक्रों में तैयार हुए पौध की संख्या ;250 ट््रे 98 खानेग6 चक्रद्ध त्र 147000 | |||||
| 6 चक्रों में तैयार हुए पौध की संख्या ;250 ट््रे 98 खानेग6 चक्रद्ध त्र 147000 | |||||
| शुद्ध प्राप्ति त्र 81310 ;पाली हाउस सेद्ध, 98395 ;नेट हाउस नर्सरी सेद्ध | |||||
| कुल आय: 147000 ग रू0 1़़ 15000 ग रू0.5 त्र 2,22,000 |
बाक्स 2: महिलाओं की भूमिका को पुनर्भाषित करती मुनिया मुर्मू की कहानी बंका जिले के कटोरिया प्रखण्ड के इनरावरन गांव में मुनिया मुर्मू ने 2022 में एक क्रान्तिकारी कृषि व्यवसाय माॅडल की शुरूआत की। इसके अन्तर्गत इन्होंने प्रदान व एचडीएफसी बैंक परिवर्तन के सहयोग से एक ट््रे नर्सरी स्थापित की और मिट्टी की क्यारियों में नर्सरी हेतु पौधों को उगाने की पारम्परिक तकनीक के बजाय कोकोपिट माध्यम वाली विशेष ट््रे का उपयोग कर स्वस्थ व रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले पौधों को उगाया। इस नवाचार से न केवल बाजार में नर्सरी के पौधों की कमी दूर हुई, वरन् मुनिया को उस क्षेत्र में कृषि नवाचार में अग्रणी स्थान दिलाया, जहां महिलाओं की तकनीकी विशेषज्ञता को शायद ही कभी मान्यता दी जाती है। उनकी यह यात्रा इतनी आसान भी नहीं थी। जब उन्होंने पहली बार एक रू0 प्रति पौधा बेचना शुरू किया तो, गांव के लोगों ने उनके इस काम को नकार दिया। उस समय को याद करते हुए मुनिया कहती हैं, ‘‘लोग कह रहे थे कि एक रूपये का पौधा कौन खरीदेगा, यह तो बहुत महंगा है। उन्होंने कहा कि हमें नुकसान होगा।’’ यहां तक कि उनके घर में भी लोग भी उनका साथ नहीं दे रहे थे। उनका मानना था कि मैं कुछ बेकार का काम शुरू कर रही हूं, पता नहीं यह सफल होगा या नहीं।’’ शुरूआती दौर में मुनिया को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। तकनीक का उपयोग करने के सन्दर्भ में पर्याप्त अनुभव न होने के कारण नर्सरी के 5000 पौध नुकसान हो गये। फिर भी मुनिया ने हार नहीं मानी और उनकी मेहनत रंग लाई। किराये के एक छोटे जमीन के टुकड़े से शुरू किये गये इस उद्यम को अब वे स्वयं की कमाई से खरीदी हुई 8 कट्ठा जमीन पर कर रही हैं। इसका आर्थिक प्रभाव उल्लेखनीय रहा। वह गर्व से कहती हैं, ‘‘पहले साल मैंने रू0 90,000.00 कमाए। दूसरे वर्ष मेरी कमाई बढ़कर एक लाख अस्सी हजार हो गयी।’’ फिलहाल, वह इस वर्ष दो लाख रू0 से अधिक कमाने की ओर अग्रसर हैं। उनकी नर्सरी में विभिन्न प्रकार के पौध तैयार होते हैं, जिनमें 1.5 लाख मिर्च के पौधे, 1 लाख पत्तागोभी के पौधे और करेला, खीरा, टमाटर व बैगन के हजारों पौधे होते हैं। व्यक्तिगत रूप से लाभ कमाने के अतिरिक्त मुनिया अपने उद्यम के माध्यम से स्थानीय आर्थिक पारिस्थितिकी प्रणाली को भी मजबूत कर रही हैं। वे कहती हैं, ‘‘हमने इसे इसलिए बनाया ताकि गांव का पैसा गांव में ही रहे।’’ वह इस बात पर प्रकाश डालती हैं कि किस प्रकार उनका व्यापार स्थानीय महिला उत्पादक समूहों एवं अन्य उद्यमियों के साथ एकीकृत है। शायद सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि, उनकी सफलता ने उनके पारिवारिक सम्बन्धों को बदल दिया है। उनके पति, जो पहले काम की तलाश में बाहर जाते थे, वे अब उनके साथ मिलकर नर्सरी में काम करते हैं। अपने उद्यम के माध्यम से, मुनिया एक आर्थिक रूप से निर्णय लेने वाली महिला तथा सामुदायिक संसाधन बनकर उभरी हैं और उनके द्वारा तैयार किये गये प्रत्येक पौध के माध्यम से लैंगिक रूढ़ियां टूट रही हैं। मुनिया के गांव की अन्य महिलाएं भी इसी तरह के उद्यम प्रारम्भ करने में रूचि ले रही हैं। मुनिया की कहानी यह दर्शाती है कि कृषि उद्यमिता ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका को कैसे नया रूप दे सकती है, लैंगिक बाधाओं को सशक्तिकरण तथा सामुदायिक विकास के अवसरों में बदल सकती है। |
राजेश परिदा लिविंग फाम्र्स परियोजना अधिशासी प्रदान कटोरिया, बंका,-813 106 ;बिहारद्ध ई-मेल: rajeshparida@pradan.net
Sustainable vegetable farming, LEISA INDIA, Vol. 27, No.3, September 2025



