मिश्रित खेती, पारम्परिक बीज एवं समुदाय के नेतृत्व में कृषि पारिस्थितिकी अधिक स्थाई भविष्य की कुंजी है। अनन्त की यात्रा इसका एक उदाहरण है।
दशकों तक, हरित क्रान्ति के प्रभाव से देशज समुदाय अपनी रिज़ीलियेण्ट, जैव विविधतापूर्ण कृषि प्रणालियों से दूर हो गये और चावल व अन्य फसलों की एकल फसली खेती पर उनकी निर्भरता हो गयी। मोटे अनाज, दालें व अन्य पारम्परिक फसलें उनके खेतों से गायब हो गयीं व इनके स्वाद को भी लोग भूल गये हैं।
लेकिन, इसी समय ओडिशा के रायगड़ा जिले के काशीपुर ब्लाॅक के सुदूर इलाकों में, हरे-भरे पहाड़ों की गोद में बसे छोटे से आदिवासी गांव कोडिगुडा में पूर्वजों के ज्ञान की याद से निकला एक मौन परिवर्तन धीरे-धीरे आकार ले रहा है।
यहां अनन्त मांझी नाम का एक सीमान्त किसान कृषि की नवीनतम तकनीकों से नहीं, वरन् कृषि सम्बन्धी सदियों पुराने ज्ञान व जानकारी से जमीन में फिर से जान फूंक रहा है, भूले-बिसरे बीजों की खेती को पुनर्जीवित कर रहा है और दृढ़ संकल्प के साथ अपने समुदाय की खाद्य सम्प्रभुता को पुनः प्राप्त करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
यह मात्र खेती की कहानी नहीं है, बल्कि यह अपनी पहचान को पुनः वापस पाने, प्रकृति के साथ फिर से संतुलन स्थापित करने तथा यह सुनिश्चित करने की कहानी है कि आने वाली पीढ़ियां भूखी न रहें अथवा यह न भूलें कि वे कौन हैं।
बदलाव का अदृश्य मूल्य
विगत चालीस वर्षों में, भारत के कृषिगत परिदृश्य में नाटकीय तरीके से बदलाव आया है। हरित क्रान्ति की तकनीकों व प्रसार के साथ, मोटे अनाजों व धान की स्थानीय प्रजातियांे व देशी फसलों का स्थान धान व अन्य नकदी फसलों की उच्च उपज देने वाली व संकर प्रजातियों ने ले ली। यद्यपि इससे कुछ स्थानों पर लाभ हुआ, लेकिन अनन्त जैसे आदिवासी समुदायों पर इसका प्रभाव चिन्ताजनक था।
कोडिगुडा व आस-पास के अन्य गांवों में, खेती कभी जीवन का एक सुरक्षित व चक्रीय आधार हुआ करती थी। लेकिन जैसे-जैसे व्यावसायिक हित हावी होते गये व आधुनिक कृषि पद्धतियों का विकास हुआ, वैसे-वैसे भारत का कृषि परिदृश्य बदलता गया। आधुनिक कृषि पद्धतियों ने पारम्परिक खेती का स्थान ले लिया, मिश्रित खेती की जगह एकल फसलों की खेती होने लगी। एक तरफ तो विकास कार्यक्रमों में पौष्टिक भोजन की आवश्यकताओं, स्थानीय परिस्थितियों व पारिस्थितिक संतुलन का ध्यान दिये बगैर चावल जैसी एकल खेती की फसलों को प्रोत्साहित किया गया। दूसरी तरफ, मौसम में भी तेजी से अनियमितता आने लगी और फसलों पर कीटों का प्रकोप बढने लगा, जिससे फसलों का नष्ट होना एक आम बात हो गयी।
अनन्त कहते हैं, ‘‘जमीन अब पहले जैसी रही नहीं।’’ आगे वे कहते हैं, ‘‘खेती महंगी होती जा रही है। फसलों की विविधता समाप्त हो गयी है। जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं और पुराने बीज लुप्त हो गये हैं।’’
इन परिस्थितियों में अनन्त के लिए बस एक ही रास्त बचता था कि वो अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिहाड़ी मजदूरी के रूप में काम करें। उनकी छोटी सी जमीन, जो कभी एक विविध व स्थाई पारिस्थितिकी तंत्र हुआ करती थी, अब वैसी नहीं रह गयी थी। इससे उनकी खेती से होने वाली आय पर विपरीत असर पड़ा था। वे कहते हैं, ‘‘हमने हारी-बीमारी से लेकर नाते-रिश्तेदारी, शादी-ब्याह हर काम के लिए कर्ज लिया। सरकार द्वारा राशन दिये जाने के बावजूद, हमें साल में तीन से चार महीने तक भोजन की कमी का सामना करना पड़ता था।’’
समृद्ध कृषिगत अतीत को याद करना
वर्ष 2023 में अनन्त के जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव आया। यह बदलाव किसी नई तकनीक को अपनाने से नहीं, वरन् लिविंग फाम्र्स के सहयोग से पुरानी यादों को फिर से सहेजने के कारण हुआ। लिविंग फाम्र्स से बात करते हुए अनन्त ने अपने गांव की पहाड़ी की उंची खतरनाक भूमि पर अपने पिता द्वारा खेती में अपनाये जाने वाले तरीकों को याद करना प्रारम्भ किया। वे बहुत गर्व से कहते हैं, ‘‘लगभग 30 वर्ष पहले, हम चार प्रकार के रागी, तीन प्रकार के टांगुन, बार्नयार्ड बाजरा, पोरसो मोटे अनाज, दो प्रकार का मक्का, दो प्रकार का ज्वार, बाजरा, अरहर, चना जैसी कई फसलें उगाते थे।’’ ये फसलें सिर्फ भोजन ही नहीं थीं, वरन् जीवन का भरोसा भी थीं।
उनकी बुवाई व कटाई का समय अलग-अलग होने के कारण परिवार को कभी भी खाली हाथ नहीं रहना पड़ा। वे कहते है, ‘‘सूखे के दौरान भी, मेरे पिता ने अगस्त में बाजरा बोया था और फिर भी हमारी फसल अच्छी हुई थी। वर्ष भर हमारा भोजन जमीन व जंगल से आता था।’’ लेकिन वह विविधतापूर्ण प्रणाली अब विलुप्त हो गयी है। कोडिगुडा में रागी व बाजरा की अब केवल एक-एक प्रजाति ही बची हुई है। अनन्त कहते हैं, ‘‘अब जब बारिश नहीं होती है, तो सभी फसलें बरबाद हो जाती हैं।’’ अब हमारे भोजन का स्वाद भी पहले जैसा नहीं रहा। अब हमारी खेती प्रणाली पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। यह नियंत्रण हमसे धीरे-धीरे छिनता जा रहा है।
निर्णायक मोड़: पुनरूद्धार के बीज
वास्तविक चिंगारी तब लगी, जब लिविंग फाम्र्स ने 2022 और 2023 की शुरूआत के बीच कोडिगुडा में चिंतन सत्रों का आयोजन किया। इन सत्रों में बुजुर्ग व युवा, दोनों तरह के किसानों ने प्रतिभाग किया। पुरूष एवं महिला किसानों सहित लगभग 30 से 40 किसानों ने इन ‘‘चिंतन’’सत्रों में सहभागिता की। इन चिंतन सत्रों में बुजुर्ग व अनुभवी किसानों ने अपनी पारम्परिक कृषि पद्धतियों, फसल विविधता, बीज विरासत, पारम्परिक फसल व आदिवासी संस्कृति के बीच सम्बन्ध आदि की कहानियां साझा कीं। ये कहानियां युवा किसानों के लिए बिलकुल नयी व अनसुनी थीं। ग्राम स्तर पर आयोजित इस दो घण्टे लम्बे चिंतन सत्रों में बुजुर्ग किसानों ने अपने गौरवशाली अतीत को याद किया, जिस पर युवा किसान कभी तो संदेह करते और कभी स्वीकार करते हैं। इसके बाद बाद चर्चा आधुनिक कृषि पद्धतियों व आदिवासी आत्मनिर्भर कृषि पर उनके नकारात्मक प्रभावों पर केन्द्रित हुई। तीन से चार चिंतन सत्रों के बाद, न केवल अनन्त, वरन् गांव के अन्य युवा किसान भी अपनी पारम्परिक स्थाई कृषि पद्धतियों की प्रासंगिकता व संभावित लाभों को समझने लगे। इन साझा सत्रों ने युवा किसानों को वर्तमान परिस्थितियों में सामने आ रही चुनौतियों पर विचार करने तथा अपनी पारम्परिक कृषि प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के निर्णय लेने में मदद की। उन युवा किसानों में अनन्त भी एक था।
यह महसूस किया गया कि पारम्परिक बीज प्रजातियांे तक पहुंच सुनिश्चित करना सफलता के लिए मुख्य है। कोडिगुडा गांव की महिला सदस्यांे ने लिविंग फाम्र्स की मदद से गांव में बीज बैंक की स्थापना की साथ ही संस्था द्वारा कृषि-पारिस्थितिकी पर प्रशिक्षण सत्रों का आयोजन किया गया। शुरूआत में, वर्ष 2023 के प्रारम्भ में, गांव की 10 महिलाएं बीज-बैंक की स्थापना हेतु आगे आयीं। उन्होंने सिन्दूरघाटी, सुंगेर, गोदिबली जैसे पड़ोसी ग्राम पंचायतों से बाजरा, दलहनों तिलहनों, ज्वार की कुछ प्रजातियों को इकट्ठा किया, क्योंकि ये प्रजातियां उनके अपने गांवों मंे नहीं उपलब्ध थीं। उन्होंने इन्हें अपने-अपने घरों में रखे मिट्टी के बर्तनों मंे इकट्ठा किया। पड़ोसी ब्लाॅकों- बिसम कटक, मुनीगुदा एवं चन्दरपुर से जलवायु-प्रतिरोधी मड्ुवा, कुटकी, काकुन, सांवा एवं देशी धान एवं सुगन्धित धान की कुछ प्रजातियों तक पहुंच सुनिश्चित करने एवं उन्हें एकत्रित करने में लिविंग फाम्र्स ने इन महिलाओं को सहयोग प्रदान किया। लिविंग फाम्र्स ने केवल बीज ही नहीं उपलब्ध कराये, वरन् उन्होंने समुदाय को जैविक खेती, बीज संरक्षण और मृदा पुनसर््थापन पर भी प्रशिक्षित किया। वर्ष 2023 में चयनित किसान नेताओं के लिए किसान नेतृत्व प्रशिक्षण के दो बैच आयोजित किये गये। इनके साथ ही, कोडिगुडा सहित काशीपुर ब्लाॅक के 60 गांवों में जैविक खाद तैयार करने, मिश्रित खेती प्रक्रियाओं व किसान सहभागिता कार्यशालाओं पर ग्राम स्तरीय प्रशिक्षण व प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किये गये।
प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले किसानों में अनन्त भी शामिल थे। गतिविधियों से जुड़ाव सुनिश्चित करने हेतु अनन्त सबसे पहले आगे आये। उन्हें बीज बैंक से सांवा, चेना, मड़ुआ ;दशहराद्ध एवं काकुन की दो प्रजातियां मिलीं। ये प्रजातियां कभी अनन्त के बचपन में उनका मुख्य भोजन हुआ करती थीं। उन्होंने 500 ग्राम से लेकर 1 किग्रा0 तक की मात्रा में प्रत्येक प्रजाति के बीजों को बीज बैंक से उधार लिया और लगभग 2 एकड़ उंची जमीन पर इनकी खेती की। वर्ष 2023 में अनन्त के साथ-साथ 17 अन्य किसानों ने भी बीज उधार लिये। अपनी बात साझा करते हुए अनन्त कहते हैं, ‘‘मैंने फसल कटाई के बाद बीज बैंक को डेढ़ गुना बीज वापस करने का वादा किया है, ताकि दूसरे किसान भी लाभान्वित हों। ऐसा लगता है, जैसे हम अपनी पुरानी व्यवस्था को पुनर्जीवित कर रहे हैं।’’
अनन्त ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों से हांडी खाता ;जैविक खादद्ध एवं तरल खाद बनाना सीखा। इन्होंने अपने आस-पास से गाय का गोबर, गौमूत्र, नीम, निर्गुण्डी, दलहनी पौधों व अरखा की पत्तियों को एकत्र कर उनसे जैविक खाद तैयार किया और उनको अपनी मक्के की फसल में प्रयोग किया। इसके साथ ही इन्होंने अपनी गृहवाटिका बनाते समय भीउनका उपयोग किया और बेहतर परिणाम प्राप्त किया। वह कहतें हैं, ‘‘ इस खाद ने यूरिया की अपेक्षा अधिक बेहतर परिणाम दिया। इसके उपयोग से हमारी मृदा में पुनः जीवन वापस आने लगा है अर्थात् मृदा की उर्वरता में वृद्धि हो रही है।’’
उम्मीद का बगीचा
खरीफ ऋतु में, अनन्त व उनकी पत्नी ने कोंहड़ा, टमाटर, चैलाई, पालक, भिण्डी, बैगन, तुलसी, करेला, तोरई, लौकी आदि सहित 14 प्रकार की परम्परागत सब्ज़ियों के बीजों का उपयोग कर पोषण वाटिका बनाया। वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ, जब उनके घर में ताजी व रसायन-मुक्त सब्ज़ियों से टोकरी भरी हुई थी। उन्होंने अपनी गृहवाटिका में जैविक खादों का उपयोग कर अच्छी उपज प्राप्त की। यद्यपि सभी सब्ज़ियों से प्राप्त उपज की सटीक मात्रा उन्हें याद नहीं थी, लेकिन वह कहते हैं, ‘‘हमारे दो बच्चों सहित पांच सदस्यीय परिवार के लिए पर्याप्त से अधिक सब्ज़ियां थीं।’’ अनन्त की पत्नी गर्व से चमकते हुए कहती हैं, ‘‘अपने उपभोग से अधिक सब्ज़ियों को हमने अपने रिश्तेदारों एवं पड़ोसियों को भी बांटा। जब हमारे बच्चों को मेरे द्वारा उगायी गयी सुरक्षित सब्ज़ियां खाने को मिलीं तो मुझे सच्ची खुशी मिली।’’
समुदाय जाग रहा है
इस यात्रा में अनन्त अकेले नहीं हैं। इस वर्ष अर्थात् 2024 में, अनाजों, दलहन, तिलहन एवं कन्द सहित 11-12 पारम्परिक फसलों को मिश्रित खेती के माध्यम से पुनर्जीवित करने हेतु 35 किसानों ने सामूहिक रूप से काम किया। एक साथ आये। यह उनके द्वारा पहले उगायी जाने वाली दो या तीन फसलों से एक बड़ा बदलाव है। साथ ही खरीफ 2025 के दौरान, और बहुत से किसान इस अभियान से जुड़ने के इच्छुक हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि, महिलाएं जो अक्सर पारम्परिक ज्ञान व बीजों की संरक्षक होती हैं, वे आगे बढ़कर बीज बैंकों का नेतृत्व कर रही हैं, एक दूसरे के साथ श्रम का आदान-प्रदान कर रही हैं और आपसी सहयोग की सदियों पुरानी प्रणाली को पुनर्जीवित कर रही हैं। जो कार्य कभी एक सपना लगता था, आज वह उनकी प्रेरणा व नेत्ृत्व के कारण एक आंदोलन बन गया है।
भविष्य को संवारना:
कोडिगुडा में पारम्परिक खेती का पुनरूद्धार केवल एक स्थानीय सफलता की कहानी नहीं है, वरन् यह जलवायु परिवर्तन व खाद्य असुरक्षा के रूप में दोहरे खतरे का सामना कर रहे पूरे भारत के समुदायों के लिए एक आदर्श है। स्वदेशी फसलों व कृषि-पारिस्थितिकी पद्धतियों को अपनाकर, अनन्त व उनके साथी किसान एक ऐसी कृषि प्रणाली का निर्माण कर रहे हैं जो जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी, पौष्टिक व सांस्कृतिक ज्ञान पर आधारित है।
अनन्त कहते हैं, ‘‘मैं अपनी पुरानी खाद्य प्रणाली को पुनर्जीवित करने के बारे में सोचता रहता था, लेकिन कहां से शुरू करूं, यह समझ में नहीं आता था। अब हमने शुरूआत कर दी है और अब हम रूकेंगे नहीं। हम हर उस बीज, हर उस अभ्यास को वापस लायेंगे, जिसने हमें मजबूत बनाये रखा है।’’
अनन्त को पूरा विश्वास है कि अब स्थितियां बदलेंगी। वे आशा व्यक्त करते हुए कहते हैं, ‘‘अब युवा एक बैठकर हमारी खाद्य प्रणाली, हमारी भूमि व पर्यावरण संरक्षण के तरीकों पर चर्चा कर रहे हैं। अगर हम अभी शुरूआत करंेगे तो वे इसे आगे बढ़ायेंगे।’’
खाद्य व खेती के क्षेत्र में बढ़ते संकटों का समाधान खोजने वाले नीति-नियन्ताओं व कृषिगत संस्थानों को अनन्त जैसे किसानों की स्पष्ट, व्यवहारिक व ज्ञान से भरी आवाजों को सुनना चाहिए। मिश्रित फसलें, स्वदेशी बीज व समुदाय आधारित कृषि पारिस्थितिकी एक अधिक स्थाई भविष्य की कुंजी हो सकती है।
| लिविंग फाम्र्स एक स्वयंसेवी संगठन है, जो वर्ष 2008 से ओडिशा के दक्षिणी भाग के 3 जिलों में 150 से अधिक गांवों में खाद्य सम्प्रभुता के मुद्दे पर काम कर रही है। लिविंग फाम्र्स एक ऐसी पहल है, जो समुदायों के साथ सहभागिता से कार्य करने को प्रोत्साहित करती है ताकि उनमें आलोचनात्मक चेतना विकसित हो सके, आदिवासी किसान अपनी तात्कालिक समस्याओं का समाधान करने की क्षमता विकसित कर सकें और चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो सकें। लिविंग फाम्र्स स्थानीय समुदायों, विशेषकर महिलाअेां की क्षमताओं व ज्ञान को बहुत अधिक महत्व देती है। लिविंग फाम्र्स विभिन्न स्थानीय जमीनी स्तर की पहलों व विविध हितधारकांे के बीच जुड़ाव एवं एकजुटता स्थापित करता है। यह शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, मीडिया व सरकार के बीच नये संवादों को प्रोत्साहित कर इस तरह के जुड़ाव स्थापित करता है। साथ ही स्थानीय व पारम्परिक ज्ञान को महत्व देने की आवश्यकता को बताता है ताकि सामुदायिक कल्याण के लिए नैतिक कार्यवाही को प्रोत्साहित किया जा सके व पारिस्थितिक संकट का समाधान किया जा सके। |
बिचित्र विश्वास एवं अनिल लीमा लिविंग फाम्र्स रत्नाकर बाग-2, टंकापानी रोड, भुवनेश्वर, ओडिशा-751018 ई-मेल: livingfarmersoffice@gmail.com
Source: Climate resilient farming, LEISA INDIA, Vol. 27, No.2, June 2025



