यदि समुचित सहायता प्रणालियां उपलब्ध कराई जाये ंतो महिला किसान खेती से सम्बन्धित कार्यों के साथ ही खेती कार्यों में प्रयुक्त मशीनों का प्रयोग अधिक आत्मविश्वास व गर्व के साथ करने हेतु सशक्त हो सकती हैं। बाएफ से छोटा से सहयोग प्राप्त कर कर्नाटक, महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश की चैम्पियन महिला किसानों ने यह दिखा दिया है कि महिलाएं न सिर्फ कुशलतापूर्वक खेती में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों को चला सकती हैं, खेत की उत्पादकता बढ़ा सकती हैं, वरन् वे अन्य महिलाओं को सशक्त भी कर सकती हैं।
स्थाई कृषि के लिए खेती में महिलाआंे की सहभागिता आवश्यक है। विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय खाद्य संगठन द्वारा जारी किये गये वर्ष 2009 के आँकड़ों के अनुसार छोटी जोत वाले परिवारों के अधिकाँष पुरूषों द्वारा आजीविका की तलाश में पलायन करने के कारण लगभग 80 प्रतिशत महिलाएं खेती के कार्यों में संलग्न रहती है। लेकिन बिडम्बना ही है कि इनमें से अधिकाँश महिलाएं खेतिहर मजदूर के रूप में कार्य करती हैं।
एक तथ्य यह भी है कि, खेती में जब कार्य अधिक रहता है, उस समय पर्याप्त मजदूरों के न मिलने के कारण खेती में मशीनों का प्रयोग आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार, खेती कार्यों को मशीनों से कराये जाने को प्राथमिकता दी जाने लगी। चूँकि ये मशीनें महँगी होती हैं और इनका उपयोग कुछ ही समय के लिए होता है, इसलिए किसानों द्वारा व्यक्तिगत रूप से इन्हें खरीदना मूल्य की दृष्टि से प्रभावी नहीं होता है।
बाएफ डेवलपमेण्ट रिसर्च फाउण्डेशन, अपने सभी कार्यक्रमों में महिला सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करते हुए कस्टम हायरिंग केन्द्रों को बढ़ावा दे रहा है। कस्टम हायरिंग केन्द्रों को परियोजना ‘‘प्रेरणा’’ के अन्तर्गत प्रोत्साहित किया गया था। यह परियोजना जमीनी स्तर पर फसल उत्पादकता बढ़ाने तथा खेती में मशीनीकरण को बढ़ावा देने हेतु महिला किसानों की भागीदारी बढाने पर केन्द्रित एक सशक्तिकरण माॅडल से सम्बन्धित थी। इस परियोजना के माध्यम से, कर्नाटक, महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश में 6 स्वयं सहायता समूहों द्वारा कस्टम हायरिंग केन्द्र स्थापित किये गये थे।
परियोजना के सदस्यों द्वारा विशेष सत्रों का आयोजन कर, नवोन्वेषी किसानों द्वारा किये गये गतिविधियों का भ्रमण प्रदर्शन कर तथा प्रशिक्षण के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों की क्षमताओं को विकसित किया गया। इन अध्ययन भ्रमणों से एक तरफ जहां उन्हें दिन-प्रतिदिन के कार्यों को समझने में मदद मिली, वहीं दूसरी तरफ उद्यम के प्रबन्धन पर भी उनकी समझ विकसित हुई। आत्मविश्वास व क्षमता विकसित होने के बाद, वे अपने परिवार के पुरूषों के सहयोग व निर्देशन के बिना ही खेती सम्बन्धित गतिविधियों को करने लगीं।
कृषि मशीनरी एवं उनका उपयोग
कृषि मशीनरी की उपलब्धता सुनिश्चित होने के कारण- कृषि कार्य समय से हुए, निवेशों का प्रभावी उपयोग संभव हुआ, किसानों द्वारा जलवायु रिजीलियेन्ट अभ्यासों एवं तकनीकों का अनुकूलन किया जाने लगा, श्रम में कमी आई, फसल की सघनता में वृद्धि हुई, फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण होने लगा परिणामतः फसल अपशिष्टों को जलाये जाने की घटनाओं में कमी आयी, खेती की लागत में कमी आयी और कुशल श्रमिकों तथा छोटे-छोटे कारीगरों के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न हुए।
इन कस्टम हायरिंग केन्द्रों पर उपलब्ध कृषि मशीनरीं में सीड ड््िरल, पावर वीडस, स्पे्रयर, रोटावेटर, प्याज बुवाई मशीन, वीडर, रागी हार्वेस्टर एवं अन्य खेत आधारित उपकरण शामिल थे। महिलाओं ने देखा कि ड््िरप व स्प्रिंकलर सेट की उपलब्धता से अधिक खेतों की सिंचाई की जा सकती है और पानी का वितरण भी खेत में समान रूप से होता है। सीड-सह-उर्वरक ड््िरल से न सिर्फ अन्तर-फसली खेती को प्रारम्भ करने तथा अन्तर-फसली खेती के अन्तर्गत क्षेत्रफल को बढ़ाने में मदद मिली, वरन् महंगे रासायनिक उर्वरकों का कुशल उपयोग भी सुनिश्चित हुआ, जिससे एक तरफ तो वातावरण में नाइट््रस आॅक्साइड उत्सर्जन भी कम हुआ, वहीं दूसरी तरफ रासायनिक उर्वरकों के कुशलतापूर्वक उपयोग से खेती की लागत में भी कमी आयी। इन कस्टम हायरिंग केन्द्रों पर उपलब्ध उपकरण हल्के व संचालित करने में सरल तथा कुशल थे। पावर स्पे्रयर ने शारीरिक श्रम को कम किया, जबकि पावर वीडर और हैण्ड हो का उपयोग करने से महिलाओं को झुक कर या बैठ कर खर-पतवार निकालने जैसे कठिन मेहनत वाले कार्यों में लगने वाले मेहनत में कमी आयी। केन्द्र में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के फसल थे्रशर से किसान कम लागत पर समय पर कटाई करने में सक्षम हुए। इससे चक्रवात, पाला आदि जैसी प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों में फसलों को होने वाले नुकसान से बचाने में सहयोग मिला। जीरो टिल ड््िरल से समय, पानी व ईंधन की बचत हुई, फसल तैयार होने की अंतिम अवस्था में अधिक गर्मी पड़ने से फसल व उपज को होने वाली क्षति में कमी आयी तथा किसान रबी फसलों की समय से पहले कटाई सुनिश्चित करने में भी सक्षम हुए। गेंहूं, सोयाबीन और मक्का के लिए ब्राॅड बेड फरो तकनीक अपनाने से त्वरित जल निकासी होने के कारण जल-जमाव की स्थितियां नहीं बनीं और मृदा में अधिक नमी के कारण होने वाला फसल नुकसान नहीं हुआ। उपयोग की दृष्टि से देखें तो, 766 महिला किसानों ने 187 दिनों तक इन कृषि उपकरणों का प्रयोग किया और कस्टम हायरिंग केन्द्रों को रू0 74,730 की आय हुई।
महिलाओं को भारी मशीनों को चलाने का भी प्रशिक्षण दिया गया। 395 महिलाओं में से, 55 महिलाओं को ट््रैक्टर चलाने का भी प्रशिक्षित किया गया।
इन पहलों के माध्यम से, बाएफ ने महिलाओं के नेतृत्व वाले कृषि उद्यमों को लोकप्रिय बनाया, महिलाओं को विकास में अग्रणी बनने तथा अपने क्षेत्रों में कृषि की गतिशीलता में बदलाव लाने हेतु सशक्त बनाया है। किसान समूहों द्वारा संचालित कस्टम हायरिंग केन्द्रों के कारण उचित दरों पर खेती के लिए आवश्यक उपकरणों तक किसानों की आसान पहुंच सुनिश्चित हुई है। ये साहसी महिलाएं एक बेहतर भविष्य की उम्मीद की आशा के साथ भविष्य की ओर पूरे आत्मविश्वास के साथ बढ़ रही हैं।
चैम्पियन महिला किसानों को प्रोत्साहित करना कृषि विशेषज्ञता व नवाचार से लैस चैम्पियन महिला किसानों ने बैठकों व व्यवहारिक प्रशिक्षणों के माध्यम से अन्य महिला किसानों के साथ अपनी विशेषज्ञता साझा की। प्रत्येक चैम्पियन महिला किसान ने कृषि विकास पर 10 अन्य महिलाओं का मार्गदर्शन किया, परिणामस्वरूप स्वतन्त्र रूप से कार्य करने वाली महिला किसानों की एक पूरी श्रृंखला तैयार हुई और आगे हो भी रही है। |
सुजाता कांगुडे
थिमेटिक प्रोग्राम एक्सक्यूटिव – महिला एवं विकास
बाएफ डेवलपमेण्ट रिसर्च फाउण्डेशन
बाएफ भवन,
डाॅ0 मणिभाई देसाई नगर
वारजे, पुणे – 411 058
ई-मेल: sujata@baif.org.in
Source: Technologies and Sustainable Agriculture, LEISA INDIA, Vol. 26, No.1, March 2024



