समुदायों के बीच जागरूकता बढ़ने से तथा सामूहिक रूप से काम करने हेतु किसान समूहों के बीच उपजे आत्मविश्वास के साथ ही, आसानी से अपनाये जा सकने वाले जल संरक्षण अभ्यासों को क्रियान्वित करने हेतु मिले सहयोग की वजह से वायनाड क्षेत्र का पानी की कमी से जूझ रहे एक गाँव के पास आज प्रचुर मात्रा में पानी की उपलब्धता है।
केरल के दक्षिणी-पश्चिमी घाटांे के बीच बसा वायनाड एक सुरम्य पहाड़ी क्षेत्र है। यह अपनी प्राकृतिक सुन्दरता व कृषि विरासत के लिए मशहूर है। यद्यपि वर्तमान में मौसम की अनिश्चितता, मानव-वन्यजीव संघर्ष, मजदूरी करने वालों की कमी, खेती से कम लाभ व बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां जैसी कई चुनौतियों का सामना वायनाड को करना पड़ रहा है। कृषि आधारित आजीविका गतिविधियों से किसानों का तेजी से मोह भंग हो रहा है। क्योंकि खेती करने के दौरान उनके सामने आने वाली कई चुनौतियों में से एक प्रमुख चुनौती पानी की उपलब्धता में कमी है। केरल राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना 2023 में भी वायनाड जिले को संवेदनशील क्षेत्र के रूप में बताया गया है। चूँकि इस क्षेत्र में बार-बार सूखा पड़ता है, इसलिए जिले में कृषि एवं सम्बन्धित गतिविधियों को बनाये रखने के लिए जल संरक्षण व संसाधनों का कुशल उपयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
भौगोलिक विशिष्टता के आधार पर, वायनाड क्षेत्र को तीन कृषि-पारिस्थितिकी इकाईयों में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से, दक्षिणी उच्च पर्वतीय इकाई की जलवायु अपेक्षाकृत अधिक शुष्क है और यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तनशीलता से अधिक प्रभावित होती है, जिसके कारण इन क्षेत्रांे में सिंचाई के लिए पानी की अधिक आवश्यकता होती है। दक्षिणी उच्च पर्वतीय इकाई में स्थित ग्राम पंचायत नूलपूझा, केरल व कर्नाटक की सीमा पर स्थित है। यह वायनाड का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला क्षेत्र भी है। इसी पंचायत में वायनाड वन्यजीव अभ्यारण का महत्वपूर्ण क्षेत्र स्थित है। यह क्षेत्र जल संकट के प्रति अधिक संवेदनशील है। साथ ही, इस क्षेेत्र में सबसे कम वर्षा भी होती है। यहाँ एक बहुत बड़ा आर्द्रभूमि क्षेत्र है, जहाँ धान, अदरक व चारा फसलों की प्रमुख खेती होती है, जबकि ऊपरी क्षेत्रों में काॅफी, रबर, सुपारी, नारियल व काली मिर्च की खेती की जाती है। यहाँ सिंचाई का प्रमुख स्रोत प्राकृतिक जलधाराएं व तालाब हैं। लेकिन यह भी बताना आवश्यक होगा कि, जल संकट के कारण गर्मी में बोई जाने वाली फसलों की बुवाई में गिरावट आयी है और परती भूमि में वृद्धि हुई है। गौरतलब है कि यहाँ के लोगों की आजीविका मुख्य रूप से खेती एवं उससे सम्बन्धित गतिविधियों पर आधारित है। बार-बार सूखा पड़ने तथा जंगली जानवरों द्वारा फसलों पर बार-बार किये जाने वाले हमलों के कारण क्षेत्र के किसानों की परेशानी बढ़ गयी है। इन चुनौतियों के कारण, इस क्षेत्र के किसान बड़े पैमाने पर दुग्ध उत्पादन तथा अधिक जल खपत करने वाली फसलों व सम्बन्धित गतिविधियों की करने लगे, जिससे पानी की माँग और भी अधिक बढ़ गयी।
इस पृष्ठभूमि में, जल की उपलब्धता बढ़ाने तथा किसानों की आजीविका को सुरक्षित व स्थाई बनाये रखने के लिए, एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउण्डेशन के सामुदायिक कृषि जैव विविधत केन्द्र द्वारा 2019-2022 के दौरान नाबार्ड की एकीकृत वाटरशेड प्रबन्धन योजना को क्रियान्वित किया गया। हस्तक्षेप से पहले, 2018-19 के दौरान लगातार बाढ़ आने के कारण, गाद से भरी बड़ी एवं छोटी जल निकासी प्रणालियां, आर्द्रभूमियों का छोटा होते जाना एवं किसानों द्वारा सामूहिक प्रबन्धन का अभाव जैसी बहुत सी चुनौतियां थीं। भारी बारिश के दौरान, आर्द्रभूमियों में लगातार गाद जमा होती रही, जिससे मृदा उर्वरता का ह्रास हुआ और धान की खेती पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। कुशल बाँध संरचनाओं व जल निकासी प्रणालियों के अभाव के साथ ही मलबे व गाद के जमाव के कारण आस-पास के खेत जलमग्न हो गये। जो किसान पहले इन बंजर भूमियों में अदरक व सूरन (जिमीकन्द) उगाते थे, उन्होंने इसकी खेती करना बन्द कर दिया। बाढ़ ने फसल विविधता को प्रभावित किया व विस्थापन के कारण आजीविका संकट उत्पन्न हुआ। इसलिए, इस परियोजना के अन्तर्गत सिंचाई सुविधाओं को सशक्त करने, मौजूदा जल निकासी संरचनाओं को पुनर्जीवित करने तथा प्राकृतिक जल निकायों व पारम्परिक जल प्रणालियों में सुधार करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी।
लगभग 500 हेक्टेयर में विस्तारित नूलपूझा वाटरशेड में कारीपोर-1, कारीपोर-2, वडक्कनाड, वल्लुवाड़ी व पचड़ी कुल पाँच छोटी वाटरशेड शामिल हैं। परियोजना के नियोजन, क्रियान्वयन तथा निगरानी के लिए जमीनी स्तर पर ग्राम वाटरशेड समिति का गठन किया गया। नूलपूझा वाटरशेड में नाबार्ड आईडब्ल्यूएमएस परियोजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ग्राम वाटरशेड समिति के गठन हेतु आयोजित एक विशेष ग्राम सभा के दौरान इस समिति का गठन किया गया था। 11 सदस्यीय इस समिति में विशेष रूप से स्थानीय कमजोर जनजातीय समूह कट्टूनाइका समुदाय की एक महिला सहित 3 महिला सदस्य तथा 8 पुरूष शामिल हैं। पुरूष सदस्यों में एक अनुसूचित जनजाति, एक अन्य पिछड़ा वर्ग, एक अन्य पात्र वर्ग व 5 सामान्य वर्ग के सदस्य शामिल हैं। समिति में सभी पाँच वाटरशेडों के सदस्य शामिल किये गये हैं।
| कुंओं के पुनर्भरण से बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हुए। इसका सुझाव सबसे पहले पंचायत के ऊपरी क्षेत्रों में दिया गया। दो साल बाद, कथंगथ नामक स्थान पर, मंदिर का कुंआ बीस साल बाद फिर से भर गया। वल्लुवड़ी कुरूमा कालोनी में एक आदिवासी बस्ती को बेहतर जल आपूर्ति मिली, साथ ही बस्ती के आस-पास के 4-5 कुंओं में भी जल आपूर्ति में सुधार हुआ। |
किसानों द्वारा अपने खेत के आस-पास पड़ने वाले जल निकायों, जल निकासी लाइनों व बन्धो ंके किनारे वाली सार्वजनिक जमीनों पर किये गये अतिक्रमण को हटाना सबसे पहला काम था। इसलिए ग्रामस्तरीय पशु कल्याण समिति की पहली जिम्मेदारी जल निकासी लाइनों को चैड़ा करने हेतु अतिक्रमित भूमि को कब्ज़े से मुक्त कराने की थी। प्रारम्भ में समुदायों ने अतिक्रमित भूमि पर जल निकासी लाइनों के सुधार को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते थे। स्थानीय जन समूहों, प्रबुद्ध लोगों व अन्य प्रभावशाली लोगों के माध्यम से चलाये गये गहन जागरूकता अभियान व संवेदीकरण प्रक्रियाओं ने समुदाय को धीरे-धीरे इस प्रक्रिया से जुड़ने के लिए तैयार कर दिया। इस प्रकार समुदाय की सहभागिता से पशु कल्याण समिति ने वर्तमान जल निकायों का सफलतापूर्वक जीणोद्धार किया, जिससे बाढ़ से होने वाले नुकसानों में बहुत हद तक कमी आयी।
इस परियोजना के अप्तर्गत धीरे-धीरे, मृदा क्षरण को रोकने, सिंचाई में सुधार करने व कई मृदा व जल संरक्षण अभ्यासों को प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न संरचनाओं का निर्माण किया गया। जल संसाधन के प्रभावी प्रबन्धन हेतु लगभग 3990 मीटर जल निकासी लाइनों की साफ-सफाई व गाद निकालने के माध्यम से जल निकासी प्रणालियों को संरक्षित करने का कार्य किया गया। इसके अतिरिक्त, झाड़ियों से चेकडैम, 15233 किमी0 मिट्टी के बाँध, 4 नये तालाबों का निर्माण व 3 पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार, 13 कुंआ पुनर्भरण सुविधाओं, 3910 रिसाव गढ्ढों, 2442 सेण्ट्रीपीटल टैरेसिंग एवं 5 चेकडैमों का पुनरूद्धार भी किया गया। मिट्टी के बाँधों के निर्माण से उपजाऊ ऊपरी मदा के बहाव को नियन्त्रित करते हुए मृदा क्षरण कम करने मृदा उर्वरता बनाये रखने में मदद मिली। सेण्ट्रीपेटल टेरेसिंग व मल्चिंग से मृदा की नमी बनाये रखने में मदद मिली। समुदायों ने यह भी महसूस किया कि इन उपायों से क्षेत्र में नारियल की पैदावार में वृद्धि हुई है। मेड़ों के पास बोई गयी चारा फसलों से पोषक तत्वों की बेहतर उपलब्धता से अच्छी पैदावार हुई जिससे दुधारू पशुओं के लिए स्थाई रूप से चारा उपलब्धता सुनिश्चत हुई।
निर्माण गतिविधियों के अलावा, जलवायु अनुकूलन व शमन के ऊपर समुदाय के बीच जागरूकता अभियान भी चलाये गये। समुदायों के प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण के एक भाग के तौर पर, जैविक खेती, जल साक्षरता, जल संसाधन प्रबन्धन, जलवायु स्मार्ट कृषि अभ्यास, एकीकृत कीट प्रबन्धन, एकीकृत खेती प्रणाली, पशुधन एवं पोल्ट्री प्रबन्धन, वित्तीय साक्षरता, मशरूम खेती एवं मूल्य संवर्धन जैसे विषयों पर 11 प्रशिक्षण आयोजित किये गये। माॅडल प्रक्षेत्रों का भ्रमण किया गया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप समुदायों में जागरूकता बढ़ी और किसान समूहों में सामूहिक रूप से काम करने का आत्मविश्वास बढ़ा, जिससे भविष्य में किसान उत्पादक संगठन बनाने की संभावना बनी।
तालाबों के जीर्णोद्धार व बाँधों के पुनरूद्धार से गर्मियों में आर्द्रभूमि में खेती के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित हुई। लगभग पचास हेक्टेयर बंजर भूमि को कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित कर धान की आर्द्रभूमि कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित किया गया और धान की खेती के अन्तर्गत क्षेत्रफल में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। साथ ही, कुंओं के पुनर्भरण, सीढ़ीदार खेती व मिट्टी के बाँधों से सूखे की तीव्रता कम हुई व सघन पशुपालन को बढ़ावा मिला। कंकरीट बाँध व ढीले पत्थरों के बाँध बनाकर धाराओं के प्रभावी उपयोग के कारण पानी की उपलब्धता में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके अतिरिक्त, गाद रहित व पुनरूद्धार किये गये तालाबों में वर्षा ऋतु में 40 प्रतिशत अधिक पानी संग्रहित करने में मदद मिली। यह भी उल्लेखनीय है कि जल संरक्षण उपायों से दूर के स्रोतों से पम्पिग द्वारा सिंचाई पर होने वाला किसानों का खर्च कम हुआ।
इन गतिविधियों ने परियोजना आच्छादित क्षेत को ‘‘जल की कमी वाले क्षेत्र से जल की प्रचुरता वाले क्षेत्र’’ में बदल दिया और क्षेत्र में कृषि के पुनरूद्धार में सहयोग हुआ। क्षेत्र के किसानों ने परती पड़ी रहने वाली व अन्य फसलों के लिए अनुपयुक्त जमीनों पर पानी की अधिक खपत वाली धान की खेती फिर से प्रारम्भ कर दी। इसके अतिरिक्त, इन गतिविधियों से कुल मिलाकर, 4690 से अधिक श्रम दिवसों का सृजन हुआ। परियोजना के हस्तक्षेप से कुल 905 किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिला।
इन गतिविधियों का महत्वपूर्ण लाभ यह मिला कि इनसे समुदाय व विभिन्न विभागों के बीच सम्बन्धों का विकास हुआ। गतिविधियों की निरन्तरता व प्रभावशीलता बनाये रखने तथा फण्ड सम्बन्धी बाधाओं को प्रबन्धित करने के लिए, जल संरक्षण जैसी गतिविधियों जैसे- जल निकासी लाइन उपचार व चेकडैम निर्माण को बेहतर बनाने व व्यापक स्तर पर लागू करन के लिए एमजीएनआरईजीएस, केसीएसटीई व सिंचाई विभाग के साथ सम्बन्ध स्थापित किये गये। उपरोक्त प्रयासों की सफलता के परिणामस्वरूप, स्थानीय पंचायत ने भी सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में इस विचार को अपनाया व इसके लिए अलग से बजट आवंटित किया। ये प्रयास दर्शाते हैं कि जलवायु अनुकूलन व शमन के लिए समान भू-जलवायु परिस्थिति वाले क्षेत्रों में जल संरक्षण उपायों को और आगे बढ़ाया जा सकता है।
विपिनदास पी
विकास समन्वयकअर्चना भट्ट
वैज्ञानिक
सुजीथ एम.एम. एवं नौशीक पी.एम.
विकास एसोसियेट्स
एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउण्डेशन-समुदाय
कृषि-जैवविविधता केन्द्र
पुथुरवायल, पोस्ट- मेपाड़ी
वायनाड, केरल - 673 577
Source: Water Management, LEISA INDIA, Vol. 25, No.2, June 2023



