कृषि प्रणाली में विविधता और विभिन्न उद्यमों का एकीकरण खाद्य व पोषण सुरक्षा, आय तथा संसाधनों के यथेष्ट उपयोग जैसी विविध आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करता है। श्रीमती मंजुला की कहानी इस कथन को सिद्ध करती है। ।
लघु व सीमान्त किसान भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं और कुल कृषक समुदाय का 85 प्रतिशत हिस्सा है। एकीकृत कृषि प्रणाली को खाद्य सुरक्षा व पोषण सुरक्षा, बेहतर आय व संसाधनों के कुशल उपयोग के लिए एक बेहतर उपाय के रूप में जाना जाता है। इस प्रणाली के अन्तर्गत एक घटक से उत्पादित वस्तुओं ;जिन्हें कभी-कभी अपशिष्ट भी माना जाता हैद्ध को पुनर्चक्रित करके दूसरे घटक के लिए निवेश के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। एकीकृत कृषि प्रणाली कृषि उद्यमों का एक मिश्रण है, जैसे- अनाज, दालों की खेती, औद्यानिक फसलों जैसे- सब्ज़ियां, आम, पशुपालन- डेयरी, चारा फसलों के साथ-साथ खेत के तालाब में जलीय कृषि, मुर्गी पालन आदि ताकि संसाधनों के कुशल उपयोग से सस्ते व स्थाई कृषि उत्पादन प्राप्त किया जा सके।
श्रीमती मंजुला बोकनेकर की कहानी
43 वर्षीय मंजुला बोकनेकर, कर्नाटक राज्य के धारवाड़ जिले के धारवाड़ तालुक स्थित कुम्बरकोप्पा गांव की रहने वाली हैं। वह एक परम्परागत व आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से सम्बन्ध रखती हैं। वह शिक्षित नहीं हैं और उनकी शादी 18 वर्ष की ही उम्र में एक कृषि मजदूर श्री नारायण बोकनेकर से हो गयी थी। अब वह 6 बच्चों की दादी हैं।
एक खेतिहर परिवार से होने के कारण श्रीमती मंजुला ने खेत में अपने पति की सहायता करनी प्रारम्भ कर दी। वर्ष 1999 में, उन्होंने ऋण लेकर कुम्बरकोप्पा में 4 एकड़, 3 गुण्टा खेत खरीदा। यह सिंचित भूमि थी। इस खरीदी गयी भूमि के एक एकड़ में उन्होंने आम का बगीचा लगाया। प्रारम्भ में, वर्ष में दो फसलें उगाती थीं। साथ ही परिवार के उपभोग हेतु सभी प्रकार की सब्ज़िया, चना, मूंग, उर्द जैसी दलहन फसलों की भी खेती की।
बाक्स 1: अखिल भारतीय समन्वित शोध परियोजना – कृषि में महिलाएं भारत की स्वतन्त्रता के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में, आज़ादी का अमृत महोत्सव के एक भाग के तौर पर, पोषण अभियान को सुदृढ़ करने हेतु ‘‘पोषण स्मार्ट गांव’’ कार्यक्रम शुरू किया गया। इस नयी पहल का उद्देश्य अखिल भारतीय समन्वित शोध परियोजना के नेटवर्क के माध्यम से भारत के 12 राज्यों के 13 केन्द्रों द्वारा संचालित 75 गांवों में पहुंच बनाना है। |
मजदूरों की कमी तथा बढ़ते श्रम मूल्य से निपटने हेतु उन्हांेने सब्ज़ियों के साथ गन्ने की मिश्रित खेती करनी प्रारम्भ कर दी। प्रारम्भ में, वे सिर्फ अपने घर के उपयोग हेतु सब्ज़ियां उगाती थीं, बाद में बढ़ती मांग को महसूस करते हुए वे अधिक क्षेत्रफल में सब्ज़ियां उगाने लगीं। शुरूआत में अधिक सब्ज़ियां होने पर वे सिर्फ अपने गांव के आस-पास ही बेचती थीं, धीरे-धीरे वे बेलगाम शहर में भी सब्ज़ियों की आपूर्ति करने लगीं। यद्यपि बडे़ क्षेत्र मे ंबोये गये टमाटरांे तथा अन्य लतावर्गीय सब्ज़ियों की तुड़ाई करने में इन्हें दिक्कतें भी आ रही थीं।
‘‘पोषण-स्मार्ट-गाँव’’ परियोजना पहल (बाक्स देखें) के अन्तर्गत, एक वैज्ञानिक ने उनके खेत का भ्रमण किया और उन्हें बड़े पैमाने पर सब्ज़ियों की खेती करने तथा उन्नत सब्ज़ियां उगाने की तकनीकों व एकीकृत खेती पद्धतियों से परिचित कराया। मार्गदर्शन के अतिरिक्त, विभिन्न सब्ज़ियों एवं लतावर्गीय सब्ज़ियों के बीजों तथा टमाटर, बैगन एवं मिर्च के पौधों का वितरण किया गया। सहमत होने के बाद, मंजुला ने इन तकनीकों को अपने खेत में अपनाया।
मल्चिंग व स्टेकिंग विधि को अपनाकर, मंजुला ने तरोई व लौकी की खेती बड़े पैमाने पर सफलतापूर्वक की। वह पालक, धनिया, सेपू एवं चैलाई जैसी पत्तेदार सब्ज़ियां भी उगाती हैं और बाजार में उन्हें ऊँचे दामों पर बेचती हैं। टमाटर की खेती वे गन्ने के साथ मिश्रित खेती के तौर पर करती हैं, जबकि बैगन की खेती में स्टेकिंग विधि का उपयोग करती हैं।
उन्होंने डेयरी व रेशम उत्पादन जैसे घटकों को अपनाया। उन्होने सिर्फ एक गाय से डेयरी की शुरूआत की थी, लेकिन आज उनके पास एक गाय व दो बैल हैं। अपने परिवार के उपभोग से बचे हुए दूध को वह बेचती हैं जानवरों से मिलने वाले गोबर का उपयोग खेत में खाद के तौर पर करती हैं। उन्हांेने शहतूत की खेती भी प्रारम्भ की है। बाद में, उनकी योजना रेशम उत्पादन घटक को भी जोड़ने की है। चूंकि शहतूत के पौधे अभी छोटे हैं, इसलिए वह उनके साथ मिश्रित खेती के रूप में सब्ज़ियों की खेती कर रही हैं।
वह अपने घरेलू उपभोग के लिए, चार प्रकार की दालों- कुल्थी, मूंग, लोबिया व मोठ उगाती हैं। वह मक्का, धान तथा गन्ना उगाती हैं, ताकि उन्हें बाजार में बेचकर आय प्राप्त होती रहें। उन्होंने अपने एक एकड़ खेत में आम का बगीचा लगा रखा है। प्रारम्भ में, वह सिर्फ अपने घर के उपभोग के लिए सब्ज़ियां उगाती थीं। अब वह बड़े पैमाने पर सब्ज़ियों की खेती करती हैं। आम के अलावा उनके पास नीबू, करी पत्ता, अमरूद, नारियल एवं चीकू के पेड़ भी हैं। आम तो बिक जाते हैं, लेकिन अन्य फल घरेलू उपभोग के लिए प्रयुक्त होते हैं।
वह जैविक खाद तैयार करती हैं। जैविक ठोस कचरे को पुनर्चक्रित करके उससे कम्पोस्ट तैयार करती हैं। परियोजना के अन्तर्गत कम्पोस्ट खाद तैयार करने हेतु मिले कल्चर से उन्होंने कम्पोस्ट इकाई बना रखी है। कृषि विभाग द्वारा चलायी जा रही एक अन्य योजना के तहत्, उन्होंने वर्षा जल संचयन के लिए कृषि होंडा का निर्माण किया है। इससे लगभग पाँच एकड़ खेत की सिंचाई में मदद मिल सकती है।
श्रीमती मंजुला बोकनेकर की खेती से होने वाली आय 2 लाख रूपये से बढ़कर 2,97,500.00 रूपये हो गयी है। वह गर्व से कहती हैं कि अब हमें विभिन्न प्रकार की सब्ज़ियां व कृषि उत्पाद आसानी से उपलब्ध होते हैं। साथ ही, वह अपने खेत की ताज़ी सब्ज़ियां व फल अपने मित्रों, परिचितों व रिश्तेदारों को भी बांटती हैं। उनके खेत व खेती माॅडल को देखने हेतु बहुत से किसान उनके खेत पर आ चुके हैं। वह बहुत से किसानों के लिए आदर्श बन चुकी हैं। उनके उदाहरण से पता चलता है कि एकीकृत खेती प्रणाली माॅडल छोटे किसानों को स्वस्थ व पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ बेहतर शुद्ध आय अर्जन करने में मदद करता है।
राजेश्वरी देसाई
वरिष्ठ वैज्ञानिक (खेत संसाधन प्रबन्धन)
एआईसीआरपी-डब्ल्यूआईए रिसर्च काम्पेलक्स यूएएस
धारवाड़ – 580 005, कर्नाटक
गीता चन्नाल
वरिष्ठ वैज्ञानिक (प्रसार)
एआईसीआरपी-डब्ल्यूआईए रिसर्च काम्पेलक्स यूएएस
धारवाड़ – 580 005, कर्नाटक
Source: Farm Women Breaking barriers, LEISA INDIA, Vol. 26, No.1, March 2024



