परागणकर्ताआंे की संख्या में तेजी से आ रही कमी चिन्ताजनक है। इनकी कमी से पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जायेगा तथा खाद्य सुरखा खतरे में पड़ जायेगी। परागण करने वाले कीटों की संख्या बढ़ाने के लिए बाएफ द्वारा किये जाने वाले पायलट पहलों ने, न केवल परागण व फसल उत्पादन को बढ़ाया है, वरन् युवाआंे को कृषि-पारिस्थितिकी संरक्षण का भावी संरक्षक बनने के लिए भी सशक्त बनाया है।
जलवायु परिवर्तन तथा उसके कारण जीव-जन्तुओं के प्राकृतिक पर्यावासों की क्षति होने की वजह से आजकल कृषि-पारिस्थितिकी संरक्षण बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। हाल के अध्ययन यह बताते हैं कि दुनिया भर में कीटों की आबादी में चिन्ताजनक कमी आयी है और इसका मुख्य कारण उनके प्राकृतिक पर्यावासों का नुकसान, कीटनाशकांे का प्रयोग, प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन है। इससे खाद्य सुरक्षा व पारिस्थितिकी स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बाएफ का मानना है कि कीट आधारित प्राकृतिक नियंत्रण व प्राकृतिक परभक्षी प्रणाली को पोषित करने वाली कृषि पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को प्रोत्साहित करना कृषि पारिस्थितिकी संरक्षण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा।
मधुमक्खियों, तितलियों व अन्य कीटों सहित परागणकर्ता दुनिया के 75 प्रतिशत से अधिक फूल वाले पौधों के प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण हैं। ध्यान देने योग्य है कि इन फूल वाले पौधों में दो-तिहाई से अधिक फसल प्रजातियां शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन का अनुमान है कि पूरे विश्व में 90 प्रतिशत भोजन प्रदान करने वाली 100 प्रजातियां में से 71 प्रजातियांे को परागण मधुमक्ख्यिों द्वारा किया जाता है। इन परागणकर्ताओं के बिना, पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जायेगा और खाद्य सुरक्षा संकट में पड़ जायेगी। वैश्विक उत्पादन में परागणकर्ता कीटों के योगदान से इसका महत्व प्रदर्शित होता है। (संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन, 1996)
लाभकारी कीट कार्बनिक पदार्थों को विधटित करने वाले अपधटक के रूप में काम करते हैं और कीटों की संख्या को नियन्त्रित करने वाले शिकारी माने जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, लेडी बग (लाल कीड़ा) और लेसविंग्स (हरा फीताकृमि या जालपंख) फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले माहो व अन्य कीटों को खा जाते हैं, जिससे कीटों के प्रकोप को कम करने के लिए रसायनिक कीटनाशकों के छिड़़काव की आवश्यकता कम हो जाती है। परागणकर्ता व मित्र कीटों के रूप में पहचाने जाने वाले, ये छोटे जीव न केवल हमारे प्राकृतिक परिदृश्य को स्वस्थ बनाये रखने का काम करते हैं, वरन् कृषि में स्थाईत्व व उत्पादकता को भी बढ़ाते हैं।
कृषि पारिस्थितिकी में कीट संरक्षण की उल्लेखनीय भूमिका को पहचानते हुए, एक स्वैच्छिक संगठन बाएफ ने, कृषिगत क्षेत्रों में कीटों की संख्या बढ़ाने हेतु कुछ पायलट कार्यक्रम क्रियान्वित कर रहा है। इसके साथ ही यह भी आवश्यकता महसूस की गयी कि युवा पीढ़ी को शामिल किया जाये, युवा पीढ़ी को सम्मिलित करते हुए पहलों का क्रियान्वयन किया गया, जिनका उल्लेख यहाँ किया जा रहा है –
विद्यालयों में तितलियों का उद्यान:
बाएफ विद्यालय परिसर के अन्दर ‘‘तितलियों का उद्यान’’ को बढ़ावा देकर समुदाय के बीच जैव-विविधता एवं इसके लाभों पर जागरूकता अभियान चला रहा है, जिससे युवाओं को रोमांचक ढंग से समग्र तौर पर सीखने के अवसर मिल रहे हैं।
‘‘तितली शैक्षणिक उद्यान’’ नाम से यह जागरूकता कार्यक्रम महाराष्ट्र के पालघर जिले में स्थित जवहर तालुक के दंेगाचिमेट गाँव में चलाया जा रहा है। स्थानीय आश्रम विद्यालय अर्थात् आदिवासी आवासीय विद्यालय में वर्ष 2014 में प्रारम्भ किया गया, इस विद्यालय आधारित कार्यक्रम में छात्रों एवं शिक्षकों को शामिल कर उन्हें पौधांे व कीटों विशेषकर तितलियों के बीच के आपसी सम्बन्धों को देखने व समझने के ऊपर प्रशिक्षित किया गया। प्रत्येक वर्ष 9 एवं 10 कक्षा के छात्रों का एक नया बैच उत्साहपूर्वक इस कार्यक्रम में प्रतिभाग करता है। यह कार्यक्रम पिछले एक दशक से सफलतापूर्वक चल रहा है और प्रति वर्ष 10 छात्रों (प्रत्येक कक्षा से 5) का चयन अवलोकन परियोजना के लिए किया जाता है। इन छात्रों का मार्गदर्शन विद्यालय के शिक्षक करते हैं। वे विद्यालय में स्थित ‘‘तितलियों के उद्यान’’ में तितलियों के जीवन चक्र को देखते हैं व उनका दस्तावेजीकरण करते हैं। वे अपने अवलोकनों को सटीक रूप से पहचानने व अपनी नोटबुक में लिखने के लिए गाइडबुक का उपयोग करते हैं। कीटों के जीवन चक्र का अवलोकन करके, विद्यार्थी वनस्पतियों व जीवों, उनके सम्बन्धों व मौसमों को समझते हैं। इस प्रकार व्यवहारिक अनुभवों के माध्यम से, वे परागणकर्ताओं व मित्र कीटों के महत्व को समझते हैं।
परागण उद्यान
पिछले चार वर्षों से, शुष्क मौसम के दौरान पराग व पराग स्रोत फसलों को बढ़ावा देने के प्रयास किये जा रहे हैं। पालघर जिले के विक्रमगढ़, जौहर व दहानु विकास खण्डों के मालावाड़ा, कौलाले, गंजड़, सेंसरी, गंगोड़ी एवं दभाड़ी गाँवों में काला तिल, सरसों, तीसी, सूरजमुखी, गाजर बीज, अल्फाल्फा, सहजन, नीबू व करी पत्ता जैसी फसलें उगायी जाती हैं। 25-30 वर्ष आयु समूह के कुल 540 किसान इस गतिविधि में सक्रिय रूप से शामिल हैं, जिनमें 65 युवा मधुमक्खी पालक भी शामिल हैं।
खेतों में परागणकर्ता कीटों की उपस्थिति तथा परागण को बढ़ाने की दृष्टि से ये युवा किसान परागण उद्यानों की स्थापना करते हैं व उनका रख-रखाव करते हैं। परागण उद्यान स्थापित करने हेतु परिवारों को भी प्रोत्साहित किया जाता है। क्योंकि ये परागण उद्यान न केवल इन कीटों के लिए आश्रय स्थल के रूप में काम करते हैं, वरन् एक स्वस्थ वातावरण बनाने के लिए जीवित प्रयोगशालाओं के तौर पर भी कार्य करते हैं।
मधुमक्खी कालोनियों एवं मधुमक्खी होटलों को बढ़ावा देना
युवाआंे को जोड़ कर किये जाने वाले विभिन्न सामुदायिक कार्यक्रमांे के बीच, एपिस सेराना इण्डिका का प्रबन्धन एक विशिष्ट पहल है। यह भारत के आदिवासी क्षेत्रों में, मधुमक्खी की एक प्रचलित प्रजाति है, और औद्यानिक पौधों में पायी जाती है।
पहले पेड़ों के खोखले स्थानों या अन्य उपयुक्त स्थानों पर अकेली मधुमक्खियां अण्डे दे सकती थीं। लेकिन शहरीकरण के फेर मंे पेड़ कटते गये व इन जीव-जन्तुओं के प्राकृतिक आवासों पर अतिक्रमण होने के कारण इनके आवास इनसे छिनते गये। प्राकृतिक घोंसले बनाने के लिए स्थानों की कमी के कारण अकेली मधुमक्खियों को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
इन चुनौतियों से निपटने हेतु मधुमक्खी होटल/मधुमक्खी घर/कीट होटल आदि नामों से घोंसलों के कृत्रिम ढाँचे तैयार किये जा रहे हैं ताकि ये अकेली मधुमक्खियां एक सुरक्षित व संरक्षित वातावरण में अपने अण्डे दे सकें। ये ढाँचे न केवल अकेली मधुमक्खियों को महत्वपूर्ण आश्रय प्रदान करते हैं, वरन् जैव विविधता व पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को बनाये रखने में परागणकर्ताओं के महत्व के बारे में भी जागरूक करते हैं। साथ ही मधुमक्खियांे की विविध प्रजातियों को संरक्षित करने में भी उल्लेखनीय योगदान देते हैं। अकेली मधुमक्खी प्रजातियों विशेषकर मिस्त्री मधुमक्खी तथा पत्ती काटने वाली मधुमक्खियों के लिए मधुमक्खी होटल विशेष रूप से सहयोगी होते हैं। मधुमक्खी प्रजातियों की एक विविध श्रृँखला को अपनी तरफ आकर्षित करते हुए मधुमक्खी होटल जैव विविधता को बढ़ाने, व पारिस्थितिकी तंत्र के रिजीलियेन्स को बढ़ाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं। परिणामतः पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का स्वास्थ्य बेहतर होता है।
मधुमक्खी होटल की संरचनाएं मप्रकार की होती हैं और उन सभी को अकेले रहने वाली मधुमक्खियों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के हिसाब से सावधानीपूर्वक डिजाइन किया गया है। आम तौर पर, ये मधुमक्खी होटल एक लकड़ी के फ्रेम से बने होते हैं, जिसमें कई डिब्बे या नलियां होती हैं, जो पेड़ों में प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले खोखले स्थानों का आभास कराते हैं, जिससे अकेले रहने वाली मधुमक्खियों को यह लगता है कि वे पेड़ पर ही बैठी हैं। ड्रिल किये गये छेदों वाले लकड़ी के बक्से एक तरफ तो बहुत साधारण होते हैं और आसान स्थान की खोज करने वाले लोगों के लिए एक सरल विकल्प होते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ मधुमक्खियों को कार्यात्मक आवास उपलब्ध कराने के साथ ही बाहरी स्थानों की सुन्दरता बढ़ाने में भी योगदान देते हैं। इस प्रकार मधुमक्खी होटल प्राकृतिक व कलात्मक दोनों तरह के लगते हैं। यहाँ रहने वाली मधुमक्खियों को एक सुरक्षित व रसायन-मुक्त वातावरण देना सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक व अनुपचारित सामग्रियों को प्राथमिकता दी जाती है। मधमक्खियों को बचाये रखने की दृष्टि से इन्हें इस प्रकार बनाया जाता है कि ये वास्तविक लगें, साथ ही इन होटलों को बनाने में सामान्यतः लकड़ी के टुकड़े, बांस के तने व ड्रिल की गयी मोटी लकड़ियों का उपयोग किया जाता है ताकि ये स्थाई पर्यावरण-सम्मत भी हों। इसके अतिरिक्त, इन होटलों को झोपड़ी जैसा दिखाने के लिए, छत के रूप में 2 या 3 गांठ वाले बांसों का उपयोग किया जाता है। बांस की गांठ के ठीक ऊपर, छेद करके, परागण करने हेतु सबसे महत्वपूर्ण बढ़ई मधुमक्खियों के लिए घोंसला बनाते हैं। यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि मधुमक्खी के घर को उत्तर-दक्षिण दिशा में रखना सर्वोत्तम होता है।
| काॅलोनियां बनाने वाली मधुमक्खियों के विपरीत, अकेले रहने वाली मधुमक्खियां अलग-अलग घोंसले बनाने को वरीयता देती हैं। मधुमक्खी होटल में मादा एकाकी मधुमक्खियों द्वारा निर्धारित घोंसले के छिद्रों में अण्डे देने से इनका जीवन चक्र शुरू होता है। लार्वा के विकास के दौरान उनके पोषण के लिए इन अण्डों को पराग व रस दिया जाता है। ये अकेले रहने वाली मधुमक्खियां एक खाने में एक ही अण्डा देना सुनिश्चित करती हैं। ताकि प्रत्येक अण्डे सुरक्षित व आत्मनिर्भर बने रहें। जैसे ही अण्डे फूटते हैं, घोंसले के प्रत्येक छिद्र से मधुमक्खियों की एक नई पीढ़ी निकलती है, जो जीवन चक्र के एक महत्वपूर्ण चरण का प्रतीक है। ये नई-नई निकली मधुमक्खियां आस-पास के वातावरण में जाकर परागण की आवश्यक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। |
बाएफ ने कृत्रिम घोंसला बनाने के समाधानों के माध्यम से आवास उपलब्ध कराकर देशी, जंगली, सामाजिक, असामाजिक व एकाकी परागणकर्ताओं की संख्या बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित किया है। उदाहरणस्वरूप, जाइलोकोपा एमेथिस्टिना, ऐपिस सेराना इंडिका, सेराटिनिडिया प्रजाति, टेराटोगोनुला इरिडिपेनिस, नोमिनाई और हैलिक्टिना लैसियाग्लोसम आदि मधुमक्खी प्रजातियां परागण करने का कार्य अधिक करती हैं और इनके लिए मधुमक्खी होटल अधिक उपयुक्त हुए। इन मधुमक्खी होटलों में लकड़ी के ढाँचे, खोखली टहनियां, कटे हुए बांस व आइपोमिया टहनियां शामिल हैं। जाइलोकोपा प्रजाति अर्थात् बढ़ई मधुमक्खी के लिए अधिक उपयुक्त बांस के गांठ वाले भाग में छेद करके खेतों में तिरछा रखा जाता है ताकि वर्षा जल का रिसाव रोका जा सके।
कुछ परिणाम:
इस प्रकार की गतिविधियों से, युवा खेतिहर न सिर्फ मित्र कीटों एवं परागणकर्ताओं के महत्व के विषय में जागरूक हुए, वरन् वे एक स्वस्थ पर्यावरण के लिए कृषि-पारिस्थितिकी संरक्षण में भी सक्रिय सहभागिता निभा रहे हैं। सी0एस0आर0 के वित्तीय सहयोग से स्थाई कृषिगत अभ्यासों पर प्रशिक्षण एवं जागरूकता सत्रों का आयोजन किया गया, परिणामतः मधुमक्खी कालोनियों के रख-रखाव पर 65 युवा प्रशिक्षित हुए। ये युवा न केवल परागण क्रियाएं बढ़ाने हेतु पहलों का नेतृत्व कर रहे हैं, वरन् कृषिगत अभ्यासों में मधुमक्खी कालोनियों को एकीकृत करने के फायदों पर स्थानीय लोगांे व भ्रमण करने आने वाले किसानों को प्रोत्साहित व प्रेरित भी करते हैं।
परागण सेवाएं बढ़ी हैं और घोंसले बनाने के लिए उपयोग किये जाने वाले मधुमक्खी होटलों से एकल मधुमक्खी की 9 प्रजातियां दर्ज की गयी हंैं। कृषि क्षेत्रों में अन्य लाभकारी कीट भी बड़ी संख्या में हैं, जिनमंे जाइलोकोपा, प्रजाति, जाइलोकोपा एमेथिस्टिना और मेगाचेलिड अधिक लाभकारी परागणकर्ता हैं। लाभकारी कीटों के फसलों पर आने से फसलों के परागण में वृद्धि हुई है।
प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने वाले तत्वों को वयस्क अवस्था में पराग की आवश्यकता होती है। जैसे-जैसे पराग के स्रोत बढ़ते हैं, चेलोनस प्रजाति जैसे प्राकृतिक नियंत्रण कारक कीट नियंत्रण में मदद करते हैं। इससे कीटनाशकों का उपयोग काफी कम हो जाता है, परिणामतः खेती की लागत कम हो जाती है। इस पहल से आम, काजू, मिर्च, बैगन व खीरे जैसी फसलों की पैदावार में भी सुधार हुई है, जो बेहतर परागण के ठोस लाभों को दर्शाता है। उनकी भागीदार से न केवल कृषि उपज में सुधार हुआ, वरन् किसानों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को भी सरल बनाया है। इस प्रकार, युवा कृषि पारिस्थितिकी संरक्षण के भविष्य के संरक्षक बन गये हैं।
सन्दर्भ:
1. बुचमैन, एस.एल एवं नभान, जी.पी., द फारगाटेन पाॅलिनेटर्स, 1996
2. क्लेन ए.एम., बैसिएरे बी.ई., केन जे.एन., स्टीफन-डेवेंटर आई., कनिंघम एस.ए., क्रेमेन सी. एवं त्सचन्र्टके टी, विश्व फसलों के लिए बदलते परिदृश्यों में परागणकर्ताओं का महत्व। राॅयल सोसायटी बी की कार्यवाही: जैविक विज्ञान, 2007
3. हाॅलमैन सी.ए., सोर्ग एम, जोंगेजंस ई, सीपेल एच. हाॅफलैण्ड एन., श्वान एच. एवं अन्य, 2017। संरक्षित क्षेत्रों में कुल उड़ने वाले कीट बायोमाॅस में 27 वर्षों में 75 प्रतिशत से अधिक की कमी। पी.एल.ओ.एस एक 12 (10): ई0185809ं। ीजजचेरूध्ध्कवपण्वतहध्10ण्1371ध्: जर्नल. पोन.0185809 सम्पादक: एरिक गार्ड
विनोद बोरसे
वरिष्ठ परियोजना अधिकारी
बाएफ डेवलपमेण्ट एण्ड रिसर्च फाउण्डेशन
महाराष्ट्र
ई-मेल: vinod.borse@baif.org.in
Source: Youth and Agriculture, LEISA INDIA, Vol. 26, No.2, June 2024



