नीला गार्डन- सफलता की ओर ले जाने वाला उत्साह

Updated on January 9, 2026

अपने उत्साह को आगे बढ़ाने का दृढ़ संकल्प एक उद्यमी के रूप में शानदार सफलता हासिल कर सकता है। यह कहानी है सुश्री सुभद्रा कुमारी की, जिन्होंने अपने बागवानी उद्यम को फलने-फूलन के लिए पोषित किया।


मिलिये 63 वर्षीय दूरदर्शी सुभद्रा कुमारी से, जिन्होंने नीला बगीचा की संभावनाओं को देखा और उस पर काम करना प्रारम्भ किया। नीला बगीचा केरल के वायनाड के शान्त परिदृश्य में फलता-
फूलता उद्यम है, जो बागवानी के प्रति उनके जुनून व गहरे प्रेम को दर्शाता है।

मूलतः पथनमथिट्टा की रहने वाली सुभद्रा का परिवार 1975 के आस-पास वायनाड जिले में आकर बस गया। एसएसएलसी तथा दूरसंचार व टाइपराइटिंग में डिप्लोमा प्राप्त करने के बाद, सुभद्रा का पौधों के प्रति बचपन का आकर्षण और अधिक तेजी से बढ़ने लगा था। विशेषकर फूलों वाले पौधों के प्रति उनके आकर्षण व उत्साह को देखते हुए परिवार ने उनके वनस्पति विज्ञान के शौक को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से फूलों के पौधों को मंगवाकर उनका सहयोग किया।

सुभद्रा सुल्तान बाथरी स्थिति फूलों की खेती में रूचि रखने वालों की एक संस्था ‘‘एग्री-हार्टी सोसायटी’’ की सदस्य बन गयीं। यह सोसायटी कृषि विभाग द्वारा कटे हुए फूलों के व्यवसाय पर संचालित की जाती थी। इसके सदस्य पूरे वायनाड जिले से थे। सुभद्रा ने 2003 मेें एन्थुरियम फूल पर प्रशिक्षण प्राप्त किया और वास्तव में उसी समय से उन्होंने फूलों की खेती करनी प्रारम्भ कर दी। यह प्रशिक्षण एन्थुरियम के कटे हुए फूलांे के संग्रह, खेती व प्रसंस्करण पर दिया गया था। उस समय वायनाड में कृषि विपन्न समिति नामक सरकारी थोक बाजार के माध्यम से बिक्री की जाती थी।

वह याद करती हैं कि किस प्रकार वह अपनी ननद के साथ स्थानीय बस का उपयोग कर सीखने के लिए जाती थीं। बस किराये के लिए पैसा कम होते हुए भी वह बस से ही जाती थीं, क्योंकि पौधों के प्रति उनके प्रेम का कोई अन्त नहीं था। उनके बहुत से साथी, जो पहले समिति के सदस्य थे, उन्होंने फूलों के प्रबन्धन में आने वाली आर्थिक कठिनाईयों के साथ ही जंगली जानवरों से पौधों को होने वाली हानियों के कारण समिति से बाहर हो गये। लेकिन बहुत सी चुनौतियों को झेलने के बावजूद इन्होंने फूलों की खेती जारी रखी। अन्त में, वर्ष 2008 में इनकी रूचि सुन्दर आर्किड फूलों की तरफ हुई।

कृषि विभाग, त्रिवेन्द्रम के अधिकारियों ने एक भ्रमण के दौरान, उन्हें आर्किड की खेती के विचार से परिचित कराया। प्रारम्भ में, उन्होंने त्रिवेन्द्रम में निजी दुकान से थोड़े से पौधों को खरीदकर शुरूआत की, जो अन्ततः उनकी फूलों की खेती की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उस समय, आम धारणा यह थी कि वायनाड के पहाड़ी क्षेत्र की जलवायु में आर्किड की कई प्रजातियां अच्छी तरह से विकसित नहीं हो पायेंगी। लेकिन उन्होंने फिर भी अपना प्रयास जारी रखा और अपने घर पर ही आर्किड का विस्तार किया। प्रारम्भ से ही उनकी योजना, अपना स्वयं का आर्किड का संग्रहालय बनाने की थी। जैसे-जैसे पौधे बड़ी संख्या में फैलते गये, उन्होंने अपने संग्रह में मौजूद आर्किड की बहुत सी प्रजातियों को बेचने का कार्य प्रारम्भ कर दिया। राज्य भर में, आर्किड की अप्रयुक्त बाजार क्षमता को पहचानते हुए सुभद्रा ने अपने प्रयासों को तेज कर दिया।

अपने संग्रहालय को और समृद्ध करने तथा व्यापार को बढ़ाने हेतु उन्होंने अपनी व्यवसायिक मित्र रीना की सहायता से, थाइलैण्ड और ताईवान से विदेशी आर्किडों का आयात किया। वर्ष 2010 में, सुभद्रा ने अपने आर्किड विपणन उद्यम की शुरूआत अधिकारिक रूप से की। उनके परिवार का प्रत्येक कदम पर महत्वपूर्ण सहयोग रहा। एन्थुरियम और इनडोर पौधों की बिक्री से शुरूआत करते हुए उनके विशाल आर्किड संग्रह के माध्यम से उद्यम का विस्तार हुआ। बाद में उन्हें बागवानी विभाग से अनुदान भी मिला, क्योंकि उन्होंने वायनाड में आर्किड के प्रचार-प्रसार में व्यापक सहयोग दिया। इससे उन्हें अपने उद्यम को बढ़ाने में मदद मिली। हाल ही में, उन्होंने वायनाड के आर्किड किसानों के लिए बागवानी विभाग की एक योजना का भी लाभ लिया है। साथ ही वायनाड के अम्बालावायल स्थित केरल कृषि विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र से आर्किड की खरीद भी की।

आज, नीला गार्डन के उनके बगीचे में एन्थुरियम, फर्न, बेगोनिया, अफ्रीकन वाॅयलेट, होया एवं अन्य इनडोर पौधों का विशाल संग्रह है। उनके आर्किड संग्रह में डेन्ड््रोबियम की 100 से अधिक प्रजातियां, फेलेनोप्सिस, मोकरा, ओन्सिडियम, कैटलया, वांडा, सिम्बिडियम, ग्राम्मटोफिलियम आदि कुछ उल्लेखनीय पौधे शामिल हैं, साथ ही देशी आर्किड का भी एक बेहतर संग्रह है।

वर्ष 2017 में, दूरदर्शन पर प्रसारित लोकप्रिय राष्ट््रीय कार्यक्रम ‘‘कृषि दर्शन’’ में उनकी यात्रा को दिखाया गया। वह प्रत्येक वर्ष अगस्त माह में आयोजित होने वाले बैंगलोर फ्लावर शो, वायनाड कृषि विभाग के कृषि मेले, आरएआरएस के पूपोली पुष्प महोत्सव, कलपेट्टा पुष्प प्रदर्शनी और कई अन्य कार्यक्रम जैसे विभिन्न आयोजनों में अपने संग्रह का प्रदर्शन करती हैं।

अपने वेबसाइट और देश भर में लगने वाली प्रदर्शनियों के माध्यम से सुभद्रा के ग्राहक पूूरे देश में फैले हुए हैं, जिनमें केरल व बैंगलोर प्रमुख बाजार बनकर उभरे हैं। इसके अलावा, उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट््र से लेकर कोलकाता तक के खरीददारों को अपनी सेवाएं दी हैं। वे पौधों की पैकेजिंग का प्रबन्धन अच्छी देख-भाल व गुणवत्ता के साथ करती हैं ताकि ग्राहकों के साथ लम्बे समय तक सम्बन्ध बना रह सके।

वर्तमान में, मात्र पौधों की बिक्री से ही वह औसतन रू0 50,000.00 का लाभ प्राप्त कर रही हैं। व्यवसायिक सफलता के अतिरिक्त, सुभद्रा वनस्पतियों को बढ़ावा देने व ज्ञान साझा करने की संस्कृति को पोषित करने हेतु प्रतिबद्ध हैं। वह अपने बगीचे में आने वाले आगंतुकों का गर्मजोशी से स्वागत करती हैं और फूलों के प्रति अपनी प्रबल रूचि को उनके साथ साझा करती हैं। वह आर्किड की खेती में रूचि रखने वाले नये लोगों को प्रशिक्षण व परामर्श सेवाएं भी प्रदान करती हैं।

वह आगे कहती हैं कि अभी तक वायनाड में कटे हुए फूलों के प्रसंस्करण और भण्डारण के लिए कोई पूर्ण सुविधा नहीं है। उन्हें पूरी उम्मीद है कि सरकार विशेषकर आस-पास के बैंगलोर जैसे बड़े बाजारों को देखते हुए कटे हुए फूलों की व्यवसायिक संभावनाओं को साकार करने हेतु पहल कर सकती है।

सुभद्रा का दृढ़ संकल्प और पौधों के प्रति प्रेम यह दर्शाता है कि कठोर श्रम व लगन से अपने सपनों को साकार किया जा सकता है। जैसे-जैसे वह अपने बगीचे को विकसित कर रही हैं, अपने रचनात्मक विचारों से दूसरों को प्रेरित कर रही हैं। वह आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती हैं कि कोई भी व्यक्ति उम्र व लिंग की परवाह किये बगैर अपने उत्साह को आगे बढ़ा सकता है।


अर्चना भट्ट
वैज्ञानिक – सामुदायिक कृषि जैवविविधता केन्द्र
एमएस स्वामीनाथन शोध संस्थान
वायनाड, केरल
ई-मेल: archanabhatt1991@gmail.com 

 

Source: Farm Women Breaking barriers, LEISA INDIA, Vol. 26, No.1, March 2024

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