टर्की पालन महिलाओं के लिए आजीविका का एक वैकल्पिक स्रोत

Updated on October 21, 2025

पश्चिम बंगाल के दक्षिण परगना जिले की महिलाएं सफलतापूर्वक टर्की पालन कर रही हैं। स्थानीय कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा प्रोत्साहित इस अभिसारी मॉडल ने विकास के अवरोधों को तोड़ दिया है तथा महिला समूहों की छुपी हुई प्रतिभाएं खुलकर सामने आ गयी हैं।


मुर्गी के मांस व अंडों की उच्च माँग, एकीकृत मूल्य श्रृँखला का विकास, मुर्गी पालन के क्षेत्र में निरन्तर शोध व नवाचार जैसे कारकों के कारण भारत में पोल्ट्री क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगभग 8 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि देखी जा रही है (तूर व गोयल, 2022)। पिछले कुछ दशकों में इसके स्वरूप मंे उल्लेखनीय बदलाव आया है और अब यह घर के पिछवाड़े मुर्गी पालन से अधिक व्यवसायिक गतिविधि के रूप में अधिक पहचानी जाने लगी है। यद्यपि अपने घर के पिछवाड़े में छोटे झुण्डों में परम्परागत रूप से मुर्गी पालन करने वाले लघु व सीमान्त किसान तथा खेतिहर महिला किसानों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी इसके बारे में नहीं जानता है। उनके पास मुर्गी पालन के लिए न तो पर्याप्त धन है और न ही ब्वॉयलर पालन के लिए सघन तकनीकी विशेषज्ञता व जानकारी ही है।

इसी पृष्ठभूमि में, वर्ष 2016 में, कोलकाता के दक्षिण 24 परगना जिले के शस्य श्यामला कृषि विज्ञान केन्द्र (एसएस केवीके) ने विभिन्न कारकों के कारण महिलाओं के लिए वैकल्पिक आजीविका रणनीति के तौर पर बैकयार्ड टर्की (मैलिएग्रिस गैलोपावो) पालन को बढ़ावा देने का प्रयास किया। टर्की पक्षी पालन बहुत आसानी से किया जा सकता है और इसमें लागत भी बहुत कम लगती है। ये सघन पालन प्रणाली में रखे गये बॉयलर पक्षियों की तरह इन्हें बहुत सी बीमारियां नहीं होती हैं। इन पक्षियों का मांस पाचन मंे हलका होने की गुणवत्ता, विशिष्ट स्वाद व सुगन्ध जैसी विशिष्टताओं के कारण टर्की पक्षियों का मांस शहरी उपभोक्ताओं द्वारा बहुत पसंद किया जाता है। शोधों के परिणाम यह भी बताते हैं कि टर्की के मांस में ब्रॉयलर के मांस की तुलना में कम कैलोरी होती है और इसलिए स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने वाले लोग इसे अपने खाने के लिए अधिक उपयुक्त मानते हैं। ऐसा माना गया था कि कोलकाता शहर के शहरी उपभोक्ता टर्की के मांस के लिए एक अच्छा बाजार बन सकते हैं।

टर्की पालन कार्यक्रम अपनाने हेतु लक्षित महिला समूहों को संगठित करना
अतिरिक्त आय उपार्जन हेतु कुछ महिलाएं पहले भी घर पर मुर्गी पालन का काम करती थीं। वे छोटे-छोटे समूहों में कुरोइलर/आरआईआर नस्ल की मुर्गियां पालती थीं। लेकिन धीरे-धीरे तीन प्रमुख कारकों की वजह से उन्होंने मुर्गी पालन का काम कर दिया। ये कारक थे-
* ब्रॉयलर नस्ल की अपेक्षा इस नस्ल से कम आर्थिक लाभ होना।
* कोई निश्चित विपणन प्रणाली या श्रृँखला न होने के कारण अण्डों व तैयार मुर्गियों को बिचौलियों को बेचने पर मजबूर होना।
* साथ ही इन नस्ल के पक्षियों की मृत्यु दर बहुत अधिक थी।

जब उन्हें वैकल्पिक आजीविका अपनाने हेतु टर्की पालन का विकल्प दिया गया तो उन्होंने इसमें रूचि दिखाई। इस प्रकार दक्षिण 24 परगना जिले के तीन विकास खण्डों- सोनारपुर, बरूईपुर और बज बज द्वितीय की लगभग 15 स्वयं सहायता समूहांे की नेताओं को टर्की पालन के लिए चुना गया।

सबसे पहले इन महिलाओं को टर्की पालन पर प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें राज्य सरकार की निगरानी में चलाये जा रहे एक मध्यम आकार टर्की पालन व्यवसाय को दिखया गया। समय-समय पर किसानों के खेतों में बेल्ट्सविले छोटे सफेद टकी नस्ल का उपयोग कर वैज्ञानिक टर्की पालन पर फ्रण्ट लाइन प्रदर्शन भी किया गया। इससे महिलाओं के अन्दर आत्मविश्वास बढ़ाने तथा गतिविधियों के प्रसार में मदद मिली। बैकयार्ड टर्की पालन की गतिविधि मुख्य रूप से वैज्ञानिक आवास, वैज्ञानिक आहार व रोक-थाम व देख-भाल के कड़े नियमों पर अधारित थी। समुचित देख-भाल व प्रबन्धन के आधार पर सामान्यतः एक टर्की पक्षी लगभग 5 महीनों में 5 किग्रा0 का हो जाता है और फिर उसे बाजार में बेच दिया जाता है।

बड़े पैमाने पर अनुकूलन
इस कार्यक्रम को तब सफलता मिली, जब कृषि विज्ञान केन्द्र ने स्वयं सहायता समूह के सदस्यों द्वारा पाले गये टर्की पक्षियों के विपणन के लिए पश्चिम बंगाल सरकार की एक सहायक कम्पनी, पश्चिम बंगाल पशुधन विकास निगम (डब्ल्यूबीएलडीसी) के साथ समझौता किया। इस समझौते के तहत्, पश्चिम बंगाल पशुधन विकास निगम ने किसानों के घरों से तैयार टर्की पक्षियों को लेना प्रारम्भ कर दिया। जीवित टर्की पक्षियों के लिए औसतन किसानों को 270 प्रति किग्रा0 की दर से भुगतान किया जाता है, जो व्यवसायिक ब्रॉयलर पक्षियों की तुलना में काफी अधिक है। पश्चिम बंगाल पशुधन विकास निगम किसानों को यह राशि सीधे उनके खाते में भेजता है। इस प्रकार 20 पक्षियों के औसत समूह वाला एक टर्की उत्पादक प्रति पालन चक्र रू0 15,000-20,000.00 की शुद्ध आय अर्जित कर सकता है। यदि पक्षियों को बाजार से चारा खरीद कर खिलाने के बजाय स्थानीय रूप से उपलब्ध चारा, रसोई घर से निकले जूठन, फलों व सब्ज़ियों के कचरों को खिलाया जाये तो शुद्ध आय और भी बढ़ सकती है।
इस प्रकार समूह के सदस्यों से प्राप्त टर्की का मांस, पूरे पश्चिम बंगाल में पश्चिम बंगाल पशुधन विकास निगम के विभिन्न खुदरा दुकानों पर फ्रोजन मीट के रूप में ‘‘हरिनघटा मीट’’ ब्राण्ड नाम से बेचा जाता है।

एक स्थापित मॉडल (चित्र 1) के माध्यम से 2019 से प्रारम्भ हुआ टर्की पालन को अपनाने का व्यापक कार्यक्रम अब धीरे-धीरे गति पकड़ रहा है। चित्र यह बताता है कि ऋण हेतु वित्तीय संस्थानों, तकनीकी सहयोग के लिए पश्चिम बंगाल के विभिन्न संम्बन्धित विभागों तथा बाजार से जुड़ाव हेतु पश्चिम बंगाल पशुधन विकास निगम के साथ समुदायों का अच्छी तरह एकीकरण है। टर्की पालन और उसके विपणन कार्यक्रम का समग्र नेतृत्व कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा किया गया।

वर्तमान वर्ष मंे, महिला स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 160 से भी अधिक महिला सदस्य सफलतापूर्वक टर्की पालन कर रही हैं। टर्की पालन से जुड़ी अधिकांश महिला किसान लघु, सीमान्त एवं पिछड़े खेतिहर समुदायों से आती हैं। ये सभी मिलकर पश्चिम बंगाल पशुधन विकास निगम को प्रत्येक त्रैमास में लगभग 1.5 जिन्दा टर्की की आपूर्ति करती हैं। समूहों से जुड़ी इन महिलाओं ने टर्की पालन के माध्यम से ग्रामीण विकास के बड़े परदे पर अपनी सफलता की कहानी स्वयं लिखी है। टर्की पालन न सिर्फ इनके लिए आय का एक अतिरिक्त जरिया है, वरन् इससे इनके अन्दर आत्मविश्वास की भावना बलवती हुई है, साथ ही यह इनकी संतुष्टि, गर्व व परिवार के पोषण का एक बड़ा स्रोत है।

महिला टर्की पालकों के इन उदाहरणों से प्रेरित होकर पश्चिम बंगाल सरकार के पशु संसाधन विभाग ने वर्ष 2023 से सोनारपुर विकासखण्ड में इस कार्यक्रम को बढ़ाने हेतु पहल करना प्रारम्भ कर दिया है। एक विशिष्ट योजना के तहत्, खेतिहर परिवारों को बेहतर आय दिलाने के उद्देश्य से पशु संसाधन विभाग द्वारा कृषि विज्ञान केन्द्र के साथ मिलकर ग्रामीण युवाओं को टर्की के चूजे वितरित किये जा रहे हैं।

सफलता के कारक:
कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा आयोजित प्रशिक्षणों, प्रदर्शनियों एवं प्रेरणा कक्षाओं का खेतिहर समुदायों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। प्रशिक्षण व जागरूकता कार्यक्रमों ने इस कार्यक्रम को न केवल वैज्ञानिक आधार प्रदान किया, वरन् इसने प्रत्येक स्वयं सहायता समूह के सदस्य के अन्दर छिपी हुई प्रतिभा को भी उजागर करने का कार्य किया।

कृषि विज्ञान केन्द्र, आई0सी0ए0आर-आई0वी0आर0आई और पश्चिम बंगाल सरकार के पशु संसाधन विभाग द्वारा तकनीकी सहायता के साथ-साथ सुनिश्चित विपणन सम्बन्धों ने इस कार्यक्रम को और अधिक सफल बनाया।

कोविड महामारी के दौरान, जब कई अन्य कृषि क्षेत्र ठप्प पड़े थे, उस समय में भी इस सुनिश्चित विपणन श्रृँखला के कारण ही टर्की पालन करने वाले समुदाय को बहुत सहयोग मिला था। पश्चिम बंगाल सरकार का पशु संसाधन विभाग कार्यक्रम के प्रारम्भ से ही इस कार्यक्रम में सहयोग कर रहा है और टर्की के एक दिन के चूजों की गाँवों में निरन्तर आपूर्ति व टीकाकरण कार्यक्रमों के माध्यम से टर्की उत्पादकों की मदद कर रहा है। यह सहयोग यथोचित मूल्य श्रृँखला को बनाये रखने में सहायक साबित हुआ है। महानगर से निकटता व टर्की मांस के प्रति रूचि रखने वाले महानगरवासी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा सफल टर्की पालन के एक महत्वपूर्ण कारक हैं। इस अभिसारी मॉडल ने विकास की बाधाओं को तोड़ा है और महिला समूहों की क्षमताओं को सामने लाया है। टर्की पालन की सफलता को स्थानीय प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी व्यापक रूप से स्थान दिया गया है।

इसके अतिरिक्त, वैज्ञानिक ज्ञान व दृष्टिकोण का उपयोग करके विविधीकरण के माध्यम से कृषि आय को बेहतर करने के उद्देश्य से स्वयं सहायता समूहों, किसान क्लबों और किसान उत्पादक संगठनों जैसे अधिक से अधिक किसान संगठनों को इस वैकल्पिक लेकिन लाभकारी उद्यम से जोड़कर इस पर जोर दिया जा सकता है।

सन्दर्भ:
 घोष सर्बस्वरूप एवं मनिदीप्ता साहा (2023), ‘‘पश्चिम बंगाल (भारत) के दक्षिण 24 परगना जिले में बैकयार्ड टर्की (मैलिएग्रिस गैलोपावो) उत्पादन प्रणाली की स्थिति’’ जर्नल ऑफ द इण्डियन सोसायटी ऑफ कोस्टल एग्रीकल्चरण रिसर्च 41ः1 ीजजचेरूध्ध्कवपण्वतहध्10ण्54894ध्रपेबंतण्41ण्1ण्2023ण्128933
 घोष सर्बस्वरूप, नारायण चन्द्र साहू एवं अविजीत हालदार (2023), ‘‘पश्चिम बंगाल (भारत) के दक्षिण 24 परगना जिले में लघु किसानों द्वारा उत्पादित टर्की पक्षियों का विकास प्रदर्शन व मांस की गुणवत्ता’’ एक्सप्लोरेट्री एनिमल एवं मेडिकल रिसर्च 13ः2, पृष्ठ 184-190
 तूर जे0एस0 एवं गोयल आर0 (2022) ‘‘पंचाब के विशिष्ट सन्दर्भ के साथ भारत में मुर्गी पालन: एक अवलोकन’’ एग्रीकल्चरण साइंस डाइजेस्ट, डी0ओ0आई: 10.18805/ए0जी0 डी-5540 (13) (पीडीएफ) ीजजचेरूध्ध्ूूूण्तमेमंतबीहंजमण्दमजध्चनइसपबंजपवदध्362220105ऋच्वनसजतलऋ थ्ंतउपदहऋपदऋप्दकपंऋूपजीऋैचमबपंसऋत्ममितमदबमऋजवऋच्नदरंइऋ।दऋव्अमतअपमू ख्ंबबमेेमक थ्मइ 10 2024,


सर्बस्वरूप घोष
शस्य श्यामला कृषि विज्ञान केन्द्र
रामकृष्ण मिशन विवेकानन्द एजुकेशनल एवं शोध संस्थान
अरापंच, सोनारपुर, दक्षिण 24 परगना,
पश्चिम बंगाल
ईमेल: drsarba@rediffmail.com
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Source: Farm Women Breaking barriers, LEISA INDIA, Vol. 26, No.1, March 2024

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