शौकिया तौर पर किसानी शुरू करने से लेकर एक उद्यमी किसान के रूप में विकसित श्रीमती इन्दुमती ने एक लम्बा सफर तय किया है। बढ़ती उम्र को चुनौती देकर उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि जैविक खेती का अभ्यास कर, उसमें विविधता लाकर और खेत में श्रम को कम करने वाले मशीनों का उपयोग करते हुए कृषि आय को बढ़ाया जा सकता है। खेती के प्रति उनका उत्साह बताता है कि नये कौशल सीखना और कृषि कार्य में शामिल होने की कोई उम्र नहीं होती है।
भारत में खेतिहर समुदायों के लिए कृषि आजीविका का मुख्य विकल्प है। यह हमारी अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है। फिर भी, कम आय तथा जलवायु परिवर्तन एवं प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के कारण आज का युवा खेती से विमुख हो रहा है। प्रत्येक व्यक्ति एक आधुनिक व सुविधापूर्ण जीवन जीना चाहता है और वह अपनी आजीविका के लिए खेती को नहीं अपनाना चाहता है। इसलिए, वे नौकरी की तलाश में आस-पास के शहरों की ओर पलायन करते हैं। इन परिस्थितियों में, एक 55 वर्ष की महिला द्वारा खेती में काम करने हेतु शहर से गांव की ओर जाना एक बहुत ही असामान्य बात लगती है। यह कहानी एक महिला श्रीमती इन्दूमती पी. चन्नल की कहानी है जो बेलगाम जिले के गोकक तालुक के धवलेश्वरा गांव की रहने वाली हैं और एकीकृत खेती प्रणाली अपनाते हुए जैविक विधि से खेती कर रही हैं।
महत्वाकांक्षी होने के बावजूद, वह केवल 7वीं कक्षा तक ही पढ़ सकीं, क्योंकि उस समय लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था। उनकी शादी संयुक्त परिवार के श्री पंडप्पा चन्नाल से हुई। अपनी सभी पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने बाद, वह उपलब्ध संसाधनों से ही कुछ अलग करना चाहती थीं।
श्रीमती चन्नल ने 2000-2001 से खेती करना प्रारम्भ किया। उन्होंने दो एकड़ खेत में जैविक विधि से एकीकृत खेती प्रणाली को अपनाया। कृषि-औद्यानिक-वानिकी फसल पद्धति का अभ्यास किया। एक फार्म हाउस बनाया और खेत पर काम करना प्रारम्भ कर दिया। वे अपने दो एकड़ खेत में फसलों विविध तरह की फसलें उगाती हैं। 30 गुण्टा में हल्दी उगाती हैं। हल्दियों के बीच में घरेलू उपभोग के लिए टांगुन व सब्ज़ियां, उगाती हैं। साथ पशुओं के उपयोग के लिए चारा भी उगाती हैं। हल्दी और टांगुन की कटाई के बाद, स्थानीय प्रजाति डिकोकुम गेहूं उगाती हैं। नवाने का उपयोग बेचने के बजाय, घरेलू उपभोग के लिए करती हैं। खेतों की मेड़ों पर, उन्होंने टीक के लगभग 300 पौधों को लगाया है और उनके बीच में नारियल के वृक्ष लगाये हैं।
उनके खेत से आम, केला, नारियल, इमली एवं हल्दी की गांठ जैसे स्वस्थ जैविक उत्पाद मिलते हैं। हल्दी उगाकर, वे प्रतिवर्ष रू0 65,000.00 की शुद्ध आय प्राप्त कर रही हैं। हल्दी की गांठों को घर पर चक्की का उपयोग कर पाउडर बनाती हैं और इस प्रकार वे शुद्ध हल्दी पाउडर तैयार करती हैं। कमीशन एजेन्सी के माध्यम से वे सांगली बाजार में हल्दी की गांठ और पाउडर दोनों बेचती हैं। सागौन के पौधों से उन्हें भविष्य में लगभग एक करोड़ रू0 की आय होने का अनुमान है। नारियल को वे स्थानीय स्तर पर बेचने के साथ ही नज़दीकी शहर के होटलों में बेचती हैं। नारियल की बिक्री से उन्हें, रू0 40,000.00 की आय हुई। उन्होंने अपने खेत में केले के लगभग 200 पौधे भी लगाये हैं जिससे उन्हें प्रतिवर्ष रू0 1 लाख की आमदनी होती है। इसके अलावा, उन्होंने अपने खेत में विभिन्न प्रकार के फलदार पोधों को लगाया है, जिसमें चीकू, शरीफा, रत्नागिरी आम की विविध प्रजातियां शामिल हैं। आम के वृक्षों ने फल देना प्रारम्भ कर दिया है। खेत में इमली, नीबू, चेरी, रामफल भी उगाये जा रहे हैं, जिनकी नर्सरी को धारवाड़ से मंगाया गया है। इन सभी वृक्षों से प्राप्त फलों का उपयोग घरेलू उपभोग के लिए किया जा रहा है।
तलिका 1: फसल प्रणालियां, व्यय एवं शुद्ध लाभ
उगायी गयी फसलें | व्यय | लाभ | उद्देश्य | बिक्री का तरीका/ उपभोक्ता |
हल्दी के मित्रों के माध्यम से | 35,000.00 | 65,000.00 | घरेलू उपभोग एवं बिक्री | कमीशन एजेन्सी और उपभोक्ताओं |
नवाने | | | घरेलू उपभोग | |
सागौन | 5,000.00 | भविष्य में एक करोड़ की आय होने का अनुमान | | |
इमली | 100.00 | 5,000.00 | घरेलू उपयोग एवं बिक्री दोनों के लिए | स्थानीय स्तर पर बिक्री |
नारियल | 2,000.00 | 40,000.00 | घरेलू उपयोग एवं बिक्री दोनों के लिए | निकटस्थ शहरों के होटलों में |
केला | 10,000.00 | 1,00,000.00 | घरेलू उपयोग एवं बिक्री दोनों के लिए | निकटस्थ शहर के बाजार में |
आम एवं अन्य फलदार पौधे | 2,000.00 | 20,000.00 | अधिकांश फलों का उपयोग घरेलू उपयोग के लिए किया जा रहा है | निकटस्थ शहर के बाजार में |
जैविक खेती को सहयोग प्रदान करने के लिए, इन्होंने होलस्टीन फ्रीजियन प्रजाति की 4 गायें पाल रखी हैं। ये गायें 5 लीटर दूध देती हैं, जिसे ये धवलेश्वर में स्थित स्थाई डेयरी इकाई पर प्रतिदिन रू0 50 प्रति लीटर की दर से बेच देती हैं। ये अपने खेत में वर्मी कम्पोस्ट, पंचगव्य, जीवाम्रुथ, बॉयो-डाइजेस्टर, कास्य ;विभिन्न वृक्षों की पत्तियांे से तैयार किया गयाद्ध आदि को तैयार करती हैं और उन्हें, उर्वरक, पौधों की वृद्धि बढ़ाने वाले और प्राकृतिक कीटनाशकों के तौर पर खेतों में उपयोग करती हैं। ये खेती में मशीनों और श्रम कम करने वाले उपकरणों का भी उपयोग करती हैं, जिसमें आटाचक्की, नारियल तोड़ने वाली मशीन, नारियल क्लाइम्बर, आम तुड़ाई उपकरण आदि शामिल हैं। ये अपने खेतों पर बूंद सिंचाई का भी उपयोग करती हैं।
तालिका 2: उद्यम एवं उपकरणों पर व्यय
विवरण | | व्यय ;रू0 मेंद्ध |
डेयरी | | 25,000.00 |
वर्मी कम्पोस्ट | | 100.00 |
जैव-अपघटक | | 5,000.00 |
बूंद सिंचाई | | 20,000.00 |
खाद बनाना | | 500.00 |
मशीन एवं श्रम कम | कोकोनट शेलर | 1,500.00 |
करने वाले उपकरण | | |
| कोकोनट क्लाइम्बर | 4,500.00 |
| | |
| मैंगो हार्वेस्टर | 300.00 |
| आटाचक्की | 10,000.00 |
| कुल | 66,800.00 |
कुल मिलाकर, यह प्रतिवर्ष लगभग 2.5 लाख की आय प्राप्त करती हैं। यह वर्ष भर अपने घर के लिए कुछ सब्ज़ियां उगाती हैं, जिससे सब्ज़ियों पर होने वाली व्यय कम हो जाता है। बचाया हुआ पैसा ही कमाया हुआ पैसा है।
खेती में इनके उत्साह, समर्पण और उपलब्धियों को मान्यता देते हुए कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, धारवाड़ ने इन्हें वर्ष 2009-10 में सर्वश्रेष्ठ कृषक महिला पुरस्कार से सम्मानित किया। बागवानी विज्ञान विश्वविद्यालय, बागलकोट द्वारा किसान से किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम में इन्हें एक सन्दर्भ व्यक्ति के तौर पर चयनित किया गया था। उनकी उद्यमशीलता को देखने उनके खेत पर आने वाले बहुत से भ्रमणकर्ता इस उम्र में भी खेती के प्रति उनकी समर्पण भावना एवं उत्साह की सराहना करते हैं। कृषि उन लोगों का हाथ थाम लेती है, जो इसे पकड़ते हैं। खेती करने की कोई उम्र नहीं होती, वरन् इसके लिए दृढ़ संकल्प, कड़ी मेहनत और उत्साह की आवश्यकता है, श्रीमती चन्नल इसका जीवन्त उदाहरण हैं। विविधता और एकीकरण तथा जैविक खेती पद्धतियों को अपनाने से एक तरफ तो अच्छी गुणवत्ता की उपज प्राप्त होती है तथा दूसरी तरफ उर्वरकों एवं पौध सुरक्षा तकनीकों पर होने वाला व्यय भी बहुत कम होता है। इस प्रकार खेती लाभकारी और लाभदायक बनती है। श्रीमती चन्नल युवा और बुजुर्ग सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
विजय होसामनी
असिस्टेण्ट प्रोफेसर (कृषि प्रसार)
एस ए एस विभाग
औद्यानिक कालेज,
बागलकोट – 587 104
माला पाटिल
असिस्टेण्ट प्रोफेसर (कम्प्यूटर साइंस)
एस ए एस विभाग
औद्यानिक कालेज,
बागलकोट – 587 104
Source: Farm Women Breaking barriers, LEISA INDIA, Vol. 26, No.1, March 2024