ग्रामीण युवा – भविष्य के किसान

Updated on July 14, 2025

भारत में बढ़ती युवा जनसंख्या देश की एक सम्पत्ति के तौर पर है और राष्ट्र निर्माण में इस सम्पत्ति का उपयोग करने की आवश्यकता है। ग्रामीण युवाओं के लाभ के लिए विविध विकासात्मक कार्यक्रम क्रियान्वित किये जा रहे हैं। ग्रामीण युवाओं की आकांक्षाओं एवं कृषि में उनको बनाये रखने में मदद करने वाले कारकों को समझने के लिए महाराष्ट्र में एक अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष तथा अन्तर्दृष्टि कृषि में युवाओं कोे बनाये रखने के लिए उचित रणनीति बनाने में सहयोग कर सकती है।


भारत में, युवाओं की संख्या अधिक है, ये संसाधनसम्पन्न हैं और खोजी प्रवृत्ति भी रखते हैं। भारत की वर्तमान जनसंख्या का 50 प्रतिशत से अधिक भाग 25 वर्ष की आयु से नीचे वाले लोगों का है और 35 प्रतिशत से अधिक आयु वाले लोगों की आबादी 65 प्रतिशत से ऊपर है, जिसमें से अधिकाँश ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाले लोग हैं। भारतीय जनगणना, 2011 के अनुसार, 2022 तक, यहाँ की 64 प्रतिशत आबादी कार्यशील समूह की होगी और भारत विश्व में युवा देश बन जायेगा। इस जनसांख्यिकी लाभांश का उपयोग करना और ग्रामीण युवाओं को मुख्य धारा में शामिल करते हुए राष्ट्र निर्माण के लिए उनकी रचनात्मक ऊर्जा का उपयोग करना बहुत महत्वपूर्ण है।

जबकि भारत को इस विशाल युवा समूह की क्षमताओं का लाभ उठाना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि देश में कृषि के क्षेत्र में युवाओं पर कम निवेश किया जा रहा है। हमारे देश में कृषि के क्षेत्र में युवाओं के लिए बहुत कम कार्यक्रम हैं और उनके प्रभाव भी बहुत सीमित हैं। फिर भी, कई राज्यों में नये व विविधीकृत कृषि उद्यमों को अपनाने के लिए युवाओं की क्षमता को देखते हुए आईसीएआर और कृषि विभाग उन्हें मान्यता दे रहे हैं। बहुत से युवा किसान सुरक्षित कृषि, सटीक खेती, जैविक खेती, फूलों की खेती, औषधीय एवं सुगन्धित पौधों की खेती आदि उच्च जोखिम-उच्च लाभ देने वाले कृषि उपक्रमों को अपना रहे हैं जिन्हें अधिकाँशतः बड़ी उम्र के किसान करने से बचते हैं। इन नये कृषि उपक्रमों को सरकारी एजेन्सियों एवं वित्तीय संगठनों द्वारा दक्षता प्रशिक्षण, वित एवं विपणन सहयोग आदि के द्वारा सक्रिय सहभागिता देने की आवश्यकता है ताकि युवा लाभप्रद खेती करने की तरफ प्रवृत्त हों।

युवा वर्ग बड़ी उम्र के लोगों की तुलना में तेजी से नवाचार और उद्यमिता अपनाने की क्षमता रखते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए, ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं को खेती की तरफ आकर्षित करने और उन्हें गाँवों में ही जीवन-यापन करने व ग्रामीण युवाओं के लाभ के लिए सरकार के साथ ही गैर सरकारी संगठनों द्वारा विशेषकर कृषि के क्षेत्र में बहुत से विकासात्मक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं।

ग्रामीण युवाओं को देश के भविष्य के तौर पर देखते हुए यह आवश्यक था कि उन कारकों की पहचान की जाये, जो उन्हें खेती के प्रति आकर्षित करने खेती करने के लिए एक उत्प्रेरक का काम करें। इस बात को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण युवाओं की आकांक्षाओं और उन्हें कृषि में बनाये रखने वाले कारकों को समझने हेतु एक अध्ययन किया गया था। अध्ययन इस धारणा के साथ किया गया कि अध्ययन के निष्कर्ष संभावित रणनीतियों/पहलों के बारे मेें प्रशासकों एवं नीति नियन्ताओं को एक अन्तर्दृष्टि प्रदान करंेगे जिससे खेती की तरफ युवाओं की रूचि बनाये रखने तथा उन्हें खेती के लिए तैयार करने में सहायता मिलेगी।

कार्य प्रणाली
इस अध्ययन के लिए एक खोजपरक शोध डिजाइन का उपयोग किया गया। यह अध्ययन महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के दो जिलों अर्थात् अमरावती राजस्व प्रभाग के से यवतमाल और नागपुर राजस्व प्रभाग के से नागपुर में किया गया। प्रत्येक जिले से 3 तालुका एवं प्रत्येक तालुका से 5 ऐसे गाँवों का चयन किया गया, जहां सबसे अधिक ग्रामीण युवा जनसंख्या थी। इस प्रकार कुल 30 गाँवों से, 300 ग्रामीण युवाओं का साक्षात्कार लिया गया। ग्रामीण युवाओं का जिनका चयन रैण्डम आधार पर किया गया था। सभी उत्तरदाता 16-30 वर्ष आयु समूह के थे और इनका मुख्य कार्य खेती-किसानी था। कृषि कार्य में लगे हुए थे।

अध्ययन के निष्कर्ष
अध्ययन के निष्कर्षों से पता चला कि अध्ययन के तहत् पन्द्रह स्वतन्त्र बिन्दुओं में से केवल पाँच बिन्दु ही ऐसे थे, जो ग्रामीण युवाओं को खेती की तरफ आकर्षित करते थे। इसमें शिक्षा, खेती के अनुभव, वार्षिक आय, सूचना के स्रोत और सामाजिक सहभागिता शामिल थे। ग्रामीण आकांक्षाओं के प्रति इन पाँच बिन्दुओं के योगदान को प्रतिशत में देखें तो, शिक्षा का प्रतिशत सबसे अधिक 42.60, वार्षिक आय 17.50 प्रतिशत, सामाजिक भागीदारी 01.80 प्रतिशत, सूचना के स्रोत की हिस्सेदारी 00.90 प्रतिशत और खेती का अनुभव की भागीदारी 00.80 प्रतिशत थी। ये परिणाम यह सिद्ध करते हैं कि कृषि के प्रति उच्च आकांक्षाओं को प्राप्त करने में इन पाँच महत्वपूर्ण बिन्दुओं की उल्लेखनीय भूमिका है।

अध्ययन के अन्तर्गत 15 स्वतन्त्र बिन्दुओं में से केवल 6 बिन्दु ऐसे थे, जो युवाओं को खेती करने के लिए उत्साहित करने में योगदान दे रहे थे। इनमें शिक्षा, खेती के अनुभव, पारिवारिक पेशा, वार्षिक आय, आर्थिक उत्प्रेरणा और प्राप्त किये गये प्रशिक्षण शामिल थे। युवाओं को खेती कार्य में जोड़े रखने वाले इन 6 बिन्दुओं के योगदान को प्रतिशत के रूप मे ंहम निम्नवत् देख सकते हैं- शिक्षा 43.75 प्रतिशत, वार्षिक आय 07.66 प्रतिशत, खेती के अनुभव 01.54 प्रतिशत, आर्थिक उत्प्रेरणा 01.16 प्रतिशत, पारिवारिक पेशा 01.01 प्रतिशत और प्राप्त प्रशिक्षण 00.66 प्रतिशत। ये परिणाम युवाओं को खेती कार्यों से जोड़े रखने में इन 6 महत्वपूर्ण बिन्दुओं का उल्लेखनीय योगदान को बताते हैं।

निष्कर्ष और आगे का रास्ता
यह देखा गया कि खेती के प्रति ग्रामीण युवाओं में रूचि जगाने और उन्हें खेती से जोड़े रखने में शिक्षा एक प्रमुख योगदान कारक के तौर पर है। इसी प्रकार ग्रामीण युवाओं की खेती के प्रति रूचि और जुड़ाव को बढ़ाने हेतु आय एक महत्वपूर्ण कारक है। ग्रामीण युवाओं की व्यक्तिगत, सामाजिक-आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और संचार विशेषताएं भी खेती के प्रति उनकी रूचि जगाने और उन्हें खेती से जोड़े रखने के लिए आवश्यक कारक थे।

इस अध्ययन के निष्कर्षों से पता चला कि ग्रामीण युवाओं में से अधिकाँश की वार्षिक आय निम्न-मध्यम श्रेणी में आती है। ऐसे युवाओं को खेती से जोड़े रखने के लिए, खाद्य प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, डेयरी, बकरी पालन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और लघु उद्योग जैसे सहायक कृषि आधारित उद्यम स्थापित करने के लिए सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है जो ग्रामीण युवाओं को कृषि आय के साथ-साथ पूरक आय प्रदान करेंगे। इसी तरह, सरकारी एजेन्सियों द्वारा ऋण और विपणन सुविधाओं का सहयोग देने के अलावा बेहतर ज्ञान और प्रशिक्षण प्रदान करने के प्रयास किये जाने चाहिए।

खेती कार्यों से ग्रामीण युवाओं को जोड़े रखने में उनको दिये गये प्रशिक्षणों का भी उल्लेखनीय योगदान था। इसलिए, यह सुझाव दिया जाता है कि ग्रामीण युवाओं को विभिन्न प्रशिक्षण दृष्टिकोणों एवं उन्नत कृषि आधारित तकनीकों को एकीकृत करके वैज्ञानिक ज्ञान और कौशल से अवगत कराया जाना चाहिए। कृषि विश्वविद्यालयों के सहयोग से राज्य कृषि विभागों और अन्य विकास विभागों द्वारा ग्रामीण युवाओं को आय-जनक उद्यम शुरू करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।

ग्रामीण युवाओं की खेती के प्रति बढ़ती आकांक्षाओं के लिए सामाजिक सहभागिता को भी एक योगदान देने वाले कारक के तौर पर पाया गया। इसलिए सुझाव दिया गया कि प्रक्षे़त्र स्तर प्रसार कार्यकर्ताओं के माध्यम से विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में ग्रामीण युवाओं को शामिल करते हुए उन्हें ज्ञान और कौशल से सशक्त बनाया जाना आवश्यक है। कृषि में नित हो रहे नये विकास के बारे में प्रसार कार्यकर्ताओं/ तन्त्र को समय-समय पर अद्यतन करना होगा। इसके साथ ही, ग्रामीण युवाओं को कृषि और उससे जुड़ी जानकारियों के लिए मॉस मीडिया/सोशल मीडिया मंचों का उपयोग करने हेतु भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्योंकि वर्तमान समय डिजिटल तकनीकों का है और लोग बड़ी संख्या में इसके माध्यम से जुड़ते हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि, चूंकि आज के समय में जब मौसम एवं जलवायु में तेजी से हो रहे परिवर्तन के कारण खेती घाटे का सौदा सिद्ध हो रही है, ऐसे में खेती से विमुख होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। ग्रामीण युवाओं को खेती से जोड़े रखने में आर्थिक प्रेरणा एक महत्वपूर्ण कारक है, इसलिए अनुदान प्रदान करने के प्रयास किये जाने चाहिए। वाणिज्यिक कृषि में अपनी भागीदारी बढ़ाने और सामूहिक कृषिगत गतिविधियों में सहभागिता करने हेतु ग्रामीण युवाओं को उत्प्रेरित करने का कार्य प्रसार एजेन्सियों द्वारा किया जाना चाहिए। ये सामाजिक प्रक्रियाएं युवा पीढ़ी के बीच कृषि के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करती हैं। इससे कृषि के क्षेत्र में विशेष रूप से कृषि उद्यमिता से जुड़े ग्रामीण युवा कार्यकर्ता समूह या समुदाय सशक्त बनते हैं।


ए.एस. गोमसे
वरिष्ठ शोध सहायक
एसोसियेट डीन (निर्देश)
डॉ0 पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ
अकोला – 444104, महाराष्ट्र
ई-मेल: anilgomase2002@yahoo.co.in

वी.एस.टेकले
एसोसियेट डीन
कृषि महाविद्यालय, मुल, चन्द्रपुर
डॉ0 पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ
अकोला – 444104, महाराष्ट्र


Source: Youth and Agroecology, LEISA INDIA, Vol. 26, No.2, June 2024

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