कृषि उद्यमी बनने की यात्रा – महिला किसानों के लिए चुनौतियां एवं आगे का रास्ता

Updated on July 14, 2025

महिलाओं के नेतृत्व में कृषिगत उद्यमों को प्रोत्साहित अब एक विकल्प नहीं, वरन् स्थाई विकास के लिए एक आवश्यक आवश्यकता बन गयी है। ग्रामीण परिवेश में महिलाओं द्वारा संचालित व्यवसायों को सुनिश्चित करने से न केवल कृषि क्षेत्र की अप्रयुक्त क्षमता का उपयोग होगा, वरन् इससे गरीबी कम करने में मदद मिलेगी, रोजगार का सृजन होगा और एक अधिक लैंगिक समानता वाला समाज भी बनेगा।


भारत के थार रेगिस्तान में स्थित जोधपुर जिले के फलोदी ब्लॉक में सुदूर स्थित मोखेई गाँव की रहने वाली 56 वर्षीय जमना देवी एक किसान हैं। वह एक स्वैच्छिक संगठन ग्रामीण विकास विज्ञान समिति (जीआरएवीआईएस) द्वारा अपने क्षेत्र में चलाई जा रही बहुत सी कृषिगत गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता करती हैं। वह अपने गाँव में गठित बुधर दास किसान रूचि समूह ;थ्ंतउमत प्दजमतमेज ळतवनचद्ध की सदस्य होने के साथ ही साथ धोरा धरती फार्मर प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन की बोर्ड सदस्यों में से एक हैं।

वर्ष 2019 में किसान रूचि समूह से जुड़ने के बाद जमना देवी मासिक बैठकों में नियमित रूप से प्रतिभाग करती थीं। उनके लिए यह बहुत आसान नहीं था, लेकिन अन्ततः उन्होंने कई अन्य महिलाओं के साथ नेतृत्व क्षमता, वित्तीय साक्षरता, व्यापार नियोजन, लेखा-जोखा रखना, उत्पादन तकनीक सहित जीरे की खेती पर प्रक्षेत्र प्रशिक्षण, कीट एवं बीमारियों का प्रबन्धन, पोषण एवं जल प्रबन्धन और कटाई के बाद प्रबन्धन जैसे विषयों पर प्रशिक्षण प्राप्त किया।

स्थानीय स्तर पर जीरे के बीजों का अभाव एक मुख्य चुनौती थी और यह इन बैठकों के दौरान नियमित रूप से चर्चा का विषय होती थी। एक एक्सपोजर विजिट के दौरान उनके मन में बीज बैंक खोलने का विचार आया था, जिसे उन्होंने मूर्त रूप दिया और एक बीज बैंक की स्थापना की। उन्होंने तुरन्त जीसी4 प्रजाति की 60 किग्रा जीरा के बीजों को एकत्र किया और किसानों के स्थानीय और पारम्परिक पद्धतियों का उपयोग करते हुए मिट्टी के बर्तनों में भण्डारित किया। उल्लेखनीय है कि ये बीज बाजार में मुश्किल से मिलते हैं। इन्होंने यह बीज बैंक अपने घर में खोला है और समूह की अन्य सदस्यों के साथ मिलकर इसका प्रबन्धन करती हैं।

अगले बुवाई ऋतु में, समूह के सदस्यों ने 60 किग्रा0 जीरा के बीजों को 25 किसानांे के बीच वितरित किया। जब किसानांे ने फसल की कटाई कर ली, तब उनसे अगले रबी ऋतु में उपयोग करने हेतु दुगुनी मात्रा में जीरा के बीजों को खरीदा गया और उसे 50 किसानों के बीच वितरित किया गया। आज की तारीख में, इस बीज बैंक में 240 किग्रा0 बीज उपलब्ध है। उनके गाँव के किसान अब अच्छी गुणवत्ता के बीजों को अपने दरवाजे पर प्राप्त करने में सक्षम हैं, इससे उनके समय और पैसे दोनों की बचत हो रही है साथ ही साथ बाहर से निवेश आपूर्तिकर्ता एवं कमीशन एजेण्टों पर उनकी निर्भरता भी घटी है। जमना देवी उन्नत कृषिगत अभ्यासों का उपयोग करने हेतु अपने गाँव की बहुत सी महिलाओं को उत्प्रेरित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

एक बोर्ड सदस्य के तौर पर, अपने फार्मर प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन के लिए 3 वर्षीय स्थाईत्व/व्यापार नियोजन गतिविधि विकसित करने में सक्रिय रूप से शामिल रहीं हैं और इसे एक क्रियात्मक कृषि उद्यम बनाने में योगदान देने के लिए तैयार हैं। यद्यपि उद्यम को सफल बनाने के लिए कुछ समय और सीखने की आवश्यकता है, लेकिन थार जैसे क्षेत्र में, जो अस्थिर जलवायु, नियमित रूप से पड़ने वाला सूखा, जल संकट, बालू का क्षरण और अम्लीय होना जैसी समस्याओं से ग्रस्त है और छोटे व सीमान्त किसानों की परेशानियों को बढ़ाता है, वहाँ पर जमना देवी की कहानी अभी भी एक अपवाद है और बताती है कि थार के क्षेत्र में कठिनाईयांे के साथ जीवित रहने का कोई सटीक नियम नहीं है। अधिकाँशतः महिलाओं के ऊपर सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव पड़ता है, क्योंकि उनके समय का सबसे अधिक हिस्सा लम्बी दूरी से पानी ढोकर लाने में बीत जाता है। इसके अलावा, घर में परिवार के सदस्यों की देख-भाल करने, दैनिक कृषिगत कार्य करने के साथ ही पशुपालन गतिविधियों एवं घरेलू कार्यों को करने में उनका समय बीत जाता है। इन कार्यों का बोझ उनके ही ऊपर पड़ जाने से पढ़ने, अपनी देख-भाल करने और आयजनक अवसरों के लिए अपने-आप को विकसित करने हेतु उनको समय ही नहीं मिल पाता है।

महिलाओं के नेतृत्व में कृषि उद्यम
ग्रामीण पृष्ठभूमि में महिलाओं नेतृत्व वाले कृषि उद्यमों को बहुत सी बाधाओं का सामना करना पड़ता है जिससे उन्हें लाभकारी व्यवसाय को स्थापित करने एवं स्वयं को स्थाईत्व प्रदान करने में काफी दिक्कतें आती हैं। इनमें सस्ती व गुणवत्तापूर्ण कृषिगत आपूर्ति एवं निवेश, कार्यशील पूँजी, बाजार, तकनीक, व्यक्तिगत सलाह और सहायता तक पहुंच की कमी के अतिरिक्त शिक्षा का अभाव, सीमित गतिशीलता, पेशेवर नेटवर्कों तक पहुँच का अभाव एवं उद्योग के विषय में सीमित जानकारी सहित बहुत से कारक शामिल हैं। वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं को उद्यमशील व्यवसायों को अपनाने हेतु प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें पारम्परिक जेण्डर भूमिकाओं तक सीमित रखती है।

सामान्यतः महिलाएं कृषि में निराई, रोपाई, बुवाई एवं कटाई जैसे कार्यों के साथ-साथ पशुओं के देख-रेख के कार्यों में शामिल रहती हैं। बाजार और बिक्री से सम्बन्धित सभी कार्य परिवार के पुरूष सदस्यों द्वारा किया जाता है। और कृषिगत एवं उससे सम्बन्धित गतिविधियों में उनकी अत्यधिक संलग्नता और भारी योगदान के बावजूद, महिलाओं के कार्यों को आर्थिक रूप से उत्पादक कार्यों में नहीं गिना जाता है। उन्हंे शायद ही कभी उद्यमी के रूप में गिना जाता हो, क्योंकि उनके घरेलू कार्यों और उद्यमशील गतिविधियों के बीच स्पष्ट अन्तर करना बहुत मुश्किल होता है। हालाँकि, अब कुल मिलाकर स्थितियां बदल रही हैं।

पुरूष सदस्यों के बढ़ते पलायन के परिणामस्वरूप भारतीय कृषि में महिलाओं का तेजी से प्रवेश हो रहा है और अधिक से अधिक महिलाएं कृषि आधारित उद्यमों को एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में चुन रही हैं। और जबकि यह बदलाव दिखाई देने लगा है, ऐसी स्थिति में यह एक बड़ा प्रश्न है कि क्या महिलाओं के पास ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र है जो उन्हें सूक्ष्म-उद्यमी के रूप में सक्षम बनायेगा, उन्हें व्यापार के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करेगा, पूँजी, बाजार और आपूर्ति श्रृँखला तक पहुँच सुनिश्चित करेगा। फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों का उदय छोटे और सीमान्त किसानों के लिए लाभप्रद सिद्ध हुआ है और एक साथ आने, बेहतर बाजारों तक पहुँच बनाने तथा अपनी आर्थिक संभावनाओं को बढ़ाने हेतु वे सक्षम हुए हैं। फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों से जुड़कर बहुत से किसानों के जीवन स्तर में बदलाव आया है, लेकिन क्या इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरूषों के बराबर ही अवसर मिल रहे हैं? अधिकाँशतः बहुत बार कठोर सामाजिक-सांस्कृतिक नियमों, पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण समय की कमी और निम्न सामाजिक गतिशीलता के कारण महिलाएं इन संगठनों में सहभाग करने में सक्षम नहीं होती हैं। फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों में सदस्यता और नेतृत्व की भूमिका में पुरूषों की बहुलता है। इन संगठनों के बोर्ड में महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम है और जब वे सदस्य बन भी जाती हैं तो वे अक्सर बैठकों मे शामिल नहीं होती हैं और यदि आती भी हैं तो बोलती ही नहीं हैं।

भारत विश्व में श्रम में महिलाओं की सबसे कम भागीदारी वाले देशों में से एक है। कृषि में, महिलाओं को उत्पादन के अधिकाँश संसाधनों से व्यवस्थित रूप से बाहर रखा गया है। यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि कृषि कार्यों में 70 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण महिलाओं की संलग्नता होने के बावजूद 13 प्रतिशत से भी कम महिलाओं के पास उनके नाम से अपनी जमीनें हैं। वर्ष 2020 में, भारत सरकार ने दिशा-निर्देश जारी किये कि वर्ष 2024 तक पूरे देश में 10,000 फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों की स्थापना की जाये। लेकिन दुर्भाग्य से, इस योजना में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया है कि न्यूनतम कितनी महिला एफ0 पी0 ओ0 का गठन अवश्य किया जायेगा और न ही इस बात का कहीं उल्लेख किया गया है कि एक एफ0पी0ओ0 में न्यूनतम कितनी महिला सदस्यों का होना आवश्यक है। जानकारी, गतिशीलता और पैसों तक महिलाओं की पहुँच बहुत कम है और इसीलिए महिलाओं को शामिल करने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता होगी, क्योंकि वे अपने दम पर एफ0पी0ओ0 का हिस्सा बनने पर विचार नहीं करेंगी।

वर्तमान समय में ग्रामीण विकास विज्ञान समिति 2 फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों और 50 किसान रूचि समूहों के साथ काम कर रही है और ऐसा करते हुए समिति द्वारा यह सुनिश्चित किया गया है कि निर्णय लेने और बाजार से सम्बन्धित गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाने में महिलाओं की हिस्सेदारी कम से कम 33 प्रतिशत हो। महिलाओं के अन्दर उचित कौशल और क्षमता का निर्माण करते हुए इन समूहों में महिलाओं को बोर्ड के सदस्यों और शेयरधारकों के रूप में नेतृत्व की स्थिति में शामिल किया गया है। उन्हें डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से सीखने, मसालों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अच्छी कृषि पद्धतियों और एकीकृत मसाला जैविक खेती और बुवाई, खेत पर प्रशिक्षण और प्रदर्शन, भूमि की तैयारी, खरीददारी, इन्वेन्ट्री प्रबन्धन, मूल्य, खरीददारों के साथ समन्वयन एवं समझ के साथ वित्तीय सेवाओं की एक पूरी श्रृँखला तक पहुँच बनाने हेतु हेतु तकनीकी उपकरण के बारे में प्रशिक्षित किया गया।

राजस्थान के जोधपुर जिले के ओसियां व फलोदी ब्लॉक के एक हजार लघु एवं सीमान्त जीरा व धनिया उत्पादकों को नामांकित किया गया और किसान रूचि समूहों तथा किसान उत्पादक संगठनों के माध्यम से सामूहिक व्यापार शुरू किया गया। मसाला उत्पादक किसानों की व्यक्त्गित व सामूहिक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 914 एकड़ भूमि पर बेहतर तकनीकों एवं प्रबन्धन अभ्यासों को अपनाते हुए खेती की गयी और वृद्धिशील बिक्री की मात्रा तथा मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गयी। बैंक और किसान क्रेडिट कार्डों के माध्यम से वित्तीय सेवाओं तक शत-प्रतिशत पुरूष एवं महिला किसानों तथा मूल्य श्रृँखला से जुड़े अन्य प्रतिभागियों की पहुँच सुनिश्चित की गयी है। सभी किसानों के पास बैंक में अपना व्यक्तिगत खाता है और वे इसकी वित्तीय सेवाओं से लाभान्वित हो रहे हैं। इतनी उपलब्धियों के बावजूद, इसमें शामिल किसानों को अपनी आजीविका की स्थिरता बनाये रखने हेतु अभी भी एक लम्बा रास्ता तय करना है और मसाला किसानों, विशेषकर महिलाओं के किसान रूचि समूहों तथा महिलाओं के नेतृत्व में स्थापित किसान उत्पादक संगठनों की संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित करने, कुशल सामाजिक-आर्थिक वातावरण प्रदान करने तथा बेहतर आय एवं लाभ के लिए प्रत्यक्ष जुड़ाव के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण कृषिगत निवेश प्राप्त करने हेतु ग्रामीण विकास विज्ञान समिति द्वारा निरन्तर सहयोग दिया जाना होगा।

महिला कृषि उद्यमिता को सशक्त बनाना
उद्यमिता को आगे बढ़ाने की इच्छुक ग्रामीण महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों को दूर करने के क्रम में, एक ऐसे सहयोगपूर्ण वातावरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो कौशल प्रशिक्षण, मूल्य संवर्धित निवेशों, बेहतर वित्तीय पहुँच, जोखिम साझाकरण और बाजार के साथ समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ मार्गदर्शन प्रदान करता हो। महिला कृषि उद्यमिता को प्रोत्साहित व सशक्त करने वाले कुछ अन्य कारक निम्नवत् हैं –
ऽ महिला उद्यमियों के लिए डिजिटल वित्तीय साक्षरता प्रशिक्षण कार्यक्रम।

ऽ किसान उत्पादक संगठन को उत्पादन आधारित कम्पनी से एक बाजार आधारित सामाजिक उद्यम के रूप में विकसित करने की दक्षता से महिलाओं को सुसज्जित करना। पर्याप्त मात्रा में उत्पादन करना महत्वपूर्ण है, लेकिन माँग को समझना और किसानों को गुणवत्ता और बाजार की प्रक्रिया आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तैयार करने की भी आवश्यकता है। केवल मूल्य संवर्धन ही किसान उत्पादक संगठनों को स्थाई बनाये रखने में सहयोग कर सकता है।

ऽ आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय होना चाहिए। अपना व्यापार स्थापित करने, सम्पत्ति खरीदने और मकान बनाने आदि के लिए बैंकों एवं अन्य वित्तीय संस्थाओं से आसान शर्तों पर ऋण प्राप्त करने में महिलाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

ऽ ग्रामीण क्षेत्रों में पात्र महिला कृषि मजदूरों को नीतियांे एवं कार्यक्रमों के माध्यम से वैकल्पिक और बेहतर रोजगार के अवसर प्रदान करना।

ऽ महिला उद्यमियों को लक्ष्य करने बनाये गये कार्यक्रमों में उनके समय एवं धन से सम्बन्धित मुद्दों का समाधान किया जाना चाहिए। महिला किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अनुकूलित वित्तीय उत्पाद एवं सेवाएं प्रदान की जानी चाहिए।

ऽ महिलाओं के लिए वैकल्पिक क्रेडिट स्कोर प्रणाली बनाना व उन्हें अपने उत्पादों को बेचने के लिए विभिन्न ई-कॉमर्स मंचों पर पंजीकृत करना ताकि गतिशीलता सम्बन्धी बाधाओं और अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों पर काबू पाया जा सके।

ऽ छोटे और स्थानीय किसान उत्पादक संगठनों को संगठित होने का लाभ पाने के लिए कई राज्य और राष्ट्रीय स्तर के उत्पादकों को सामूहिक प्लेटफार्म पर लाने में सहयोग करना।

ऽ महिलाओं को नवीनतम और सस्ती मशीनरी और प्रौद्योगिकी आदि के बारे में जानकारी तक उनकी पहुँच में सुधार करने के लिए राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के व्यापार मेलों और प्रदर्शनियों में भाग लेने हेतु प्रोत्साहित करना।

ऽ महिला उद्यमियों को उनके लिए प्रासंगिक सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी प्रदान करके सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना। केन्द्र संचालित योजनाएं उन उद्यमों के लिए वित्त पोषण का एक अच्छा स्रोत हो सकती हैं जो वित्त के अभाव से जूझ रहे होते हैं।

ऽ महिलाओं के नेतृत्व वाले कृषि उद्यमों को संचार, ब्राण्डिंग, गुणवत्ता प्रबन्धन, मूल्य निर्धारण और वितरण चैनलों के साथ मदद करने के लिए कुशल प्रोफेशनलों एवं उद्योग विशेषज्ञों से जोड़ना ताकि वे बाजार में अपनी पकड़ बना सकें।

महिलाओं के नेतृत्व वाले कृषि उद्यमों को बढ़ावा देना अब एक विकल्प नहीं, वरन् स्थाई विकास के लिए एक आवश्यकता बन गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा संचालित व्यवसायों को सुनिश्चित करने से न केवल कृषि क्षेत्र की अप्रयुक्त क्षमता को प्रोत्साहन मिलेगा, वरन् गरीबी भी कम होगी, रोजगार के नये अवसर पैदा होंगे और अधिक लैंगिक समानता वाला समाज बनेगा। सार्वजनिक, वाणिज्यिक और नागर समाज क्षेत्रों सहित एक क्रास-सेक्टोरल दृष्टिकोण नवाचार और विकास को दिशा देने में महत्वपूर्ण होगा साथ ही उन कई अन्तरों को पाटने में भी महत्वपूर्ण होगा, जो भारत में कृषि परिदृश्य की मूल मशालवाहक महिलाओं की आकाँक्षाओं और प्रगति को रोकते हैं।


क्रुपा गाँधी
संचार एवं प्रसार कन्सल्टेण्ट
ग्रामीण विकास विज्ञान समिति (ग्राविस)
3/437, 458, एम एम कॉलोनी, पाल रोड
जोधपुर – 342008, भारत
ई-मेल: krupa@gravis.org.in
वेबसाइट: www.gravis.org.in


Source: Farm Women Breaking barriers, LEISA INDIA, Vol. 26, No.1, March 2024

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