महाराष्ट्र में महिला उद्यमियों ने आवश्यक वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग प्राप्त कर गुणवत्तापूर्ण सामान और सेवाएं उपलब्ध कराने हेतु आत्मविश्वास विकसित किया गया। पहले इन महिलाओं द्वारा अपने घर अथवा खेत पर किये जाने वाले कामों की कहीं कोई गिनती नहीं होती थी, लेकिन अब वे एक मजबूत व सफल उद्यमी के तौर पर उभरी हैं, आर्थिक रूप से उनका योगदान दिखने लगा है और उनके योगदान को सामाजिक तौर पर मान्यता भी मिल रही है।
भारत की 40 करोड़ ग्रामीण महिलाएं हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनदायिनी हैं। अपने घरों को संभालने के अलावा, वे कृषि एवं पशुपालन में भी शामिल हैं। कृषि में तीव्र गति से महिलाओं की भागीदारी बढ़ने के साथ ही उनकी भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है।
आँकड़े बताते हैं कि भारत के 6 करोड़ 30 लाख सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) में से 20 प्रतिशत उद्योग महिलाओं के स्वामित्व वाले हैं जो 2 करोड़ 20 लाख से लेकर 2 करोड़ 27 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में 18.42 प्रतिशत की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों की ज्यादा भागीदारी (22.24 प्रतिशत) है। फिर भी, महिला-नेतृत्व वाले इन उद्यमों को मान्यता न मिलना चिन्ता का विषय बना हुआ है। तथ्य यह है कि महिला उद्यमिता कम आय वाले कृषि एवं सम्बन्धित क्षेत्रों में केन्द्रित है और यही कारण है कि महिला-आधारित उद्यमों को शायद ही कभी स्वीकार किया जाता हो। यह एक सामान्य सोच है कि ये सारे कार्य तो प्रतिदिन की गतिविधियां हैं और इनसे कोई आमदनी नहीं होती है।
बाक्स 1: महिला उद्यमियों के लिए पारिस्थितिकी प्रणाली सम्बन्धी चुनौतियां अ) उद्यमिता को प्रोत्साहित करना जिसमें उद्यमिता के विभिन्न अवसरों के बारे में जागरूकता और ज्ञान वर्धन शामिल हैं। |
छठीं आर्थिक जनगणना के अनुसार, महिलाओं के स्वामित्व वाले सभी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों का 34.3 प्रतिशत उद्यम कृषिगत गतिविधियों में संलग्न है। इसमें सबसे ज्यादा अर्थात् 92.2 प्रतिशत हिस्सेदारी पशुधन सम्बन्धित उद्यमों की है। इसके बाद वानिकी से जुड़े उद्यम 4.5 प्रतिशत, गैर-फसल खेती से 1.9 प्रतिशत और मत्स्य से सम्बन्धित उद्यम 1.4 प्रतिशत हैं। महिलाओं के 99 प्रतिशत से अधिक उद्यम सूक्ष्म क्षेत्र में हैं। यह देखा गया है कि महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यम और उद्यम के आकार में विपरीत सम्बन्ध हैं। जैसे-जैसे व्यवसाय बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों का अनुपात घटता जाता है। महिला उद्यमिता की सीमित सफलता में व्यक्तिगत, सामाजिक और पारिस्थितिकी प्रणाली से जुड़े सभी कारकों का योगदान हो सकता है। एमएसएमई से जुड़ी महिलाओं के सामने आनी वाली व्यक्तिगत एवं सामाजिक चुनौतियों पर बहुत बार चर्चा की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त, पारिस्थितिकी प्रणाली की बड़ी बाधांए भी हैं। कुछ चिन्हित बाधाओं को बाक्स सं0 1 में दिया जा रहा है –
महिलाओं के नेतृत्व में किये गये पहल
कृषि एवं महिला विकास जैसे मूलभूत विकास सम्बन्धी मुद्दों पर सघनता के साथ काम करने वाली गैर लाभकारी संस्था बाएफ डेवलपमेण्ट रिसर्च फाउण्डेशन ने अपने कार्य आच्छादित क्षेत्रों में 4000 से अधिक महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन किया। समूह से जुड़ी महिलाओं की वित्तीय और डिजिटल साक्षरता को बढ़ाते हुए उनकी आत्मनिर्भरता में वृद्धि और उत्पादकता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बाएफ ने इन महिलाओं को नर्सरी, मशरूम की खेती, मुर्गी पालन, बीज संरक्षण और सिलाई केन्द्र जैसे अपने स्वयं के उद्यम स्थापित करने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और मार्गदर्शन प्रदान किया। बीज संरक्षक के रूप में कार्य करने वाली कुछ महिला उद्यमियों की कहानी यहाँ प्रस्तुत की जा रही है –
बीज संरक्षक:
कृषि जैव विविधता को संरक्षित और पुनर्जीवित करने के लिए वर्ष 2015 में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के अकोले ब्लॉक में ‘‘कलसुबाई परिसर बियाने संवर्धन सामाजिक संस्था’’ नाम से बीज सुरक्षित करने वाली महिलाओं का समूह गठित किया गया। मूल रूप से भारत के एक जैव संसाधन समृद्ध कृषि जलवायु क्षेत्र अकोले में हाल के वर्षों में कृषि का तेजी से व्यवसायीकरण हुआ है। इससे फसल की प्रजातियों की विविधता में कमी आयी है। परिणामस्वरूप, उत्पादकता कम हुुई है तथा कीटों के संक्रमण और बीमारियों की घटनाएं बढ़ी हैं। इसके अलावा, एकल-फसल के बढ़ते प्रचलन के कारण मिट्टी की सेहत खराब हो रही है, खेती की लागत बढ़ रही है और स्थानीय आदिवासी समुदायों के पोषण सम्बन्धी परिणामों पर हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है। साथ ही ज्ञान का क्षरण हुआ है, और प्रबन्धन और संरक्षण की पारम्परिक प्रथाएं अनिश्चित होती जा रही हैं।
घर के आस-पास की जमीनों पर वर्षा आधारित कृषि अकोले के लोगों का प्राथमिक व्यवसाय है। शीत ऋतु एवं शुष्क ग्रीष्म ऋतु के दौरान, स्थानीय लोग अधिकाँशतः महादेव कोली और ठाकर आदिवासी समुदाय के लोग या तो कृषि मजदूर के तौर पर काम करते हैं अथवा अपने आस-पास के शहरी क्षेत्रांे में मजदूरी करने/रोजगार की तलाश में चले जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ रहने वाले लोगों को वर्ष भर न तो आमदनी होती है और न ही उनकी खाद्य सुरक्षा बनी रहती है।
शुरूआत में, केन्द्रित समूह चर्चाओं, प्रक्षेत्र भ्रमणों एवं व्यक्तिगत साक्षात्कार के माध्यम से प्राथमिक आँकड़ों का संग्रह किया गया। अकोले ब्लॉक के विभिन्न भागों से फसल एवं जमीनों का मानचित्रण व संग्रहण किया गया। कुछ जानकार लोगों की मदद से बीज बचाने वालों की पहचान की गयी और इसी क्रम में बीजों के शुद्धिकरण तथा वैज्ञानिक अध्ययन के लिए 10 संरक्षण केन्द्रों की स्थापना की गयी। स्थानीय देशी सब्ज़ियों और कन्दों को दस्तावेजित किया गया और उनके जर्मप्लाज्म को एकत्र कर ग्राम/क्लस्टर स्तर पर स्थापित बीज बैंकों मंे जमा किया गया। वर्ष भर उपलब्धता एवं पोषण मूल्य के आधार पर फसलों का चयन कर योग्य फसल प्रजातियों के बीजों का उत्पादन समुदाय स्तर पर किया गया।
इन संरक्षण केन्द्रों को सुचारू रूप से संचालित करने हेतु 11 सदस्यीय बीज बचाओ समिति का गठन किया गया जिसका पंजीकरण वर्ष 2017 में एक ट्रस्ट के तौर पर कराया गया था। अपने गठन के बाद से ही, आदिवासी महिलाओं के नेतृत्व वाली यह पहल, फसल की विविधता, बीज और जंगली खाद्य पौधों पर ध्यान केन्द्रित करके कृषि जैवविविधता संरक्षण और प्रबन्धन के प्रयासों का नेतृत्व कर रही है। इन प्रयासों के अन्तर्गत जैविक निवेश उत्पादन के साथ-साथ मल्चिंग, बीज चयन और उचित भण्डारण के उपयोग पर क्षेत्र स्तर पर प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही बीज बैंक स्तर पर बीज का अंकुरण परीक्षण और बीज की भौतिक शुद्धता का कार्य किया जाता है।
बीज की पैकेजिंग और विपणन का कार्य कलसुबाई परिसर बियाने संवर्धन सामाजिक संस्था द्वारा किया गया। गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन, बीज आदान-प्रदान का प्रबन्धन एवं बाजार से जुड़ाव स्थापित करने का कार्य समिति सुनिश्चित करती है। इसके अतिरिक्त, वे वैज्ञानिक कृषिगत अभ्यासों पर स्थानीय समुदायों के लिए एक्सपोजर भ्रमण के साथ-साथ प्रक्षेत्र प्रशिक्षणों का आयोजन करते हैं। सदस्यों को बीज प्राप्ति रजिस्टर के रख-रखाव एवं दस्तावेजीकरण, बीजों की खरीद व बिक्री तथा अनाज उत्पादन पर प्रशिक्षित किया गया और अब वे दिन-प्रतिदिन के कार्यों का प्रबन्धन पूरे आत्मविश्वास से करती हैं। बीज संरक्षणकर्ता पद्मश्री राहीबाई पोपेरे और राष्ट्रीय आनुवांशिकता संरक्षण किसान पुरस्कार प्राप्त ममता भांगरे ने अपने ज्ञान जागरूक प्रयासों और विज्ञान व तकनीक के समन्वयन के माध्यम से स्वदेशी बीजों और जंगली सब्ज़ियों के संरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया है जिससे इन बीजों/प्रजातियों पर शोध करने तथा स्थानीय से वैश्विक स्तर तक इन बीजों की पहुँच बनाने का लक्ष्य प्राप्त किया गया है।
इस समूह ने तीन बीज बैंक स्थापित किये हैं और चावल, मोटे अनाजों व दलहनों सहित 40 फसलों की 118 प्रजातियों का संरक्षण किया है। समूह ने 21600 से अधिक गृहवाटिका किटों तथा लगभग 39 मीट्रिक टन गुणवत्तापूर्ण बीजों का उत्पादन और विपणन किया। उनकी सफलता सिर्फ उनके आस-पास तक ही सीमित नहीं है, वरन् उसका विस्तार दूर-दूर तक हो रहा है। उन्होंने नवीन विपणन तकनीकों को सफलतापूर्वक अपनाया। परिणामतः छत पर लगाये जाने वाले बगीचे के बीजों की बिक्री हुई और ग्रामीण-शहरी जुड़ाव को बढ़ावा मिला। उनके प्रयासों से आज की तिथि तक 46 लाख रू0 का व्यवसाय हुआ है। पोषण सखी नामक महिला सन्दर्भ व्यक्तियों के माध्यम से समुदाय में क्षमता निर्माण पर भी व्यापक जोर दिया जा रहा है। पोषण सखियों के प्रयासांे तथा बीज बचाओ समिति द्वारा गुणवत्तापूर्ण पोषण वाटिका किटों की आपूर्ति किये जाने के कारण, क्षेत्र में प्रमुखता से पोषण वाटिकाएं लगायी जा रही हैं। इन पोषण वाटिका किटों में 12-15 फसलों के बीज और पौध होते हैं ताकि पोषण विविधता में वृद्धि सुनिश्चित हो सके और लगभग 10 माह तक खाद्य की उपलब्धता बनी रहे। महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्यों के बीच बीज संरक्षण को भी प्रोत्साहित किया जाता है ताकि अगले फसली ऋतु में उत्पादन सुनिश्चित हो सके। शुरूआती दिनों में, इस पहल हेतु महाराष्ट्र सरकार के राजीव गाँधी विज्ञान एवं तकनीकी आयोग से सहयोग प्राप्त हुआ। बाद में, महाराष्ट्र सरकार के आदिवासी विकास विभाग, शबरी आदिवासी वित तथा विकास संस्था मर्यादित, नासिक, के सहयोग से इसे और विस्तारित किया गया।
उपसंहार:
इस प्रकार, महिलाओं के नेतृत्व में कृषि क्षेत्र में नये और हित उद्यमों को प्रोत्साहित करने की पर्याप्त गुँजाइश है जो या तो विशिष्ट उत्पाद या सेवा आधारित उद्यम या फिर दोनों का मिला-जुला स्वरूप हो सकते हैं। चूँकि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में ऐसी वस्तुओं और सेवाओं की अधिक माँग है, इसलिए ग्रामीण-शहरी जुड़ाव का लाभ उठाने की आवश्कता है। कुछ प्रारम्भिक सहयोग, दिशा-निर्देश और प्रशिक्षण के साथ, महिला उद्यमियों ने गुणवत्तापूर्ण वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करने का आत्मविश्वास विकसित किया है। इस प्रकार घरों या खेतों तक ही सीमित रहने वाले उनके अदृश्य योगदान अब समाज में प्रत्यक्ष तौर पर दिखने लगे हैं और वे एक सफल उद्यमी के तौर पर उभरी हैं और समाज भी उनके योगदान को मानने लगा है।
इन कृषि आधारित उद्यमों ने महिलाओं को पूरे वर्ष आय के साथ-साथ आजीविका का एक सम्मानजनक साधन प्रदान किया है। साथ ही इन उद्यमों से मिलने वाले उच्च आय से पूरे परिवार के लिए अधिक द्वितीयक लाभ भी मिल रहा है। इन उद्यमों में विभिन्न आदिवासी भौगोलिक क्षेत्रों में दोहराये जाने और महिलाओं के लिए अधिक लाभप्रदता सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर बढ़ने की क्षमता है। भारत में महिलाओं के लिए कृषि आजीविका का एक बड़ा स्रोत हो सकती है, साथ ही महिलाओं के नेतृत्व वाले कृषि उद्यम भारतीय अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभर सकते हैं।
सन्दर्भ
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राजश्री जोशी
कार्यक्रम निदेशक
बाएफ डेवलपमेण्ट रिसर्च फाउण्डेशन, पुणे
ई-मेल: rajeshreejoshi@baif.org.in
संतर्पणा चौधुरी
एसोसियेट कार्यक्रम मैनेजर
बाएफ डेवलपमेण्ट रिसर्च फाउण्डेशन, पुणे
ई-मेल: santarpana.choudhury@baif.org.in
Source: Farm Women Breaking barriers ,LEISA INDIA, Vol. 26, No.1, March 2024



