10- ड्रम इकाई सिद्धान्त- जैव संसाधन प्रबन्धन हेतु एक स्थाई ढाँचा

Updated on March 3, 2025

यद्यपि स्थाई खेती की तरफ लोगों का झुकाव व बदलाव आशानुरूप है, लेकिन चुनौतियां बनी हुई हैं। खरीफ ऋतु के दौरान भारी बारिश से राईजोम सड़न जैसी समस्याएं और बढ़ रही हैं। इसकी वजह से कुछ किसानों को रासायनिक निवेश बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। परिणामतः उनकी खेती पर लागत बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में इन चुनौतियों के स्थाई समाधान की दिशा में 10-ड्रम इकाई सिद्धान्त जैसे नवाचार किसानों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।


वॉटरशेड आर्गनाइजेशन ट्रस्ट, महाराष्ट्र के जालना, सोलापुर एवं धाराशिव जिलों में खेती में स्थाईत्व एवं जलवायु अनुकूलन व लचीलापन को बढ़ावा दे रहा है। नवोन्वेषी अभ्यासों एवं समुदाय संचालित दृष्टिकोणों के माध्यम से वॉटरशेड आर्गनाइजेशन ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य, फसल उत्पादन को बढ़ाना, खेती की लागत को कम करना एवं खेती के पर्यावरण-सम्मत तरीकों को बढ़ावा देना है। जैव संसाधनों के प्रबन्धन के लिए एक स्थाई ढाँचा 10-ड्रम इकाई सिद्धान्त का क्रियान्वयन उनके प्रमुख हस्तक्षेपों में से एक है, जो स्थानीय किसानों के जीवन को परिवर्तित कर रहा है।

10-ड्रम इकाई सिद्धान्त, लाभकारी सूक्ष्मजीवों, खनिजों और पोषक तत्वों के साथ 10 अलग-अलग मिश्रणों का एक समूह है, जिसके उपयोग से एक तरफ तो कीटों एवं बीमारियों का प्रबन्धन किया जाता है तो दूसरी तरफ यह मिट्टी के कार्बनिक कार्बन को बढ़ाकर और प्रोटीन, लिपिड व पौधे के द्वितीयक मेटाबोलाइट्स के संश्लेषण को बढ़ाकर पौधों की वृद्धि में सहायक होता है। ईएम-2, डीएफ-1, ह्यूमिक एसिड, फुल्विक एसिड, अपशिष्ट डिकम्पोजर और सात अनाजों की स्लरी सहित पहले पाँच मिश्रणों को ड्रिप सिंचाई के माध्यम से पौधों की जड़ों में दिया जाता है। जबकि कीट व रोग प्रबन्धन तथा पौधो की वृद्धि के लिए बाद के पांच मिश्रणों – ईएम दशपर्णी अर्क, ईएम एमिल अर्क, ईएम वेमिल अर्क, ईएम देशी केल्प और ईएम फल अर्क का पत्तियों पर छिड़काव किया जाता है।

 

रविन्द्र जैसे किसान, जो अपशिष्ट- मुक्त खेती के प्रति शुरूआत में बहुत आश्वस्त नहीं थे, वे अब इसके लाभों को समझने लगे हैं। 10-ड्रम इकाई के निरन्तर उपयोग से मृदा स्वास्थ्य उन्नत हुआ है और अदरक जैसी फसलों में प्राकृतिक सहनशीलता विकसित हुई है। प्रकृति सहनशील हुई हैं। खरीफ ऋतु के दौरान भारी बारिश के कारण जड़ सड़न जैसी चुनौतियों के बावजूद, किसान रासायनिक निवेशों पर अपनी निर्भरता को बहुत हद तक कम करने में सफल हुए हैं।

उदाहरणार्थ, पिछले वर्ष रविन्द्र ने उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर 60,000-65,000 रू0 खर्च किया। जबकि इस वर्ष, 10-ड्रम इकाई प्रणाली के अन्तर्गत, उनकी कुल निवेश लागत रू0 30,000.00 तक कम हो गयी है और बाद में विकास के चरणों में जल- घुलनशील उर्वरकों के लिए रू0 10,000.00 की अतिरिक्त लागत का अनुमान है। लगभग 20,000.00 रू0 की यह बचत अपशिष्ट-मुक्त खेती के लाभों को बताती है।

 

 

अपशिष्ट मुक्त खेती को बढ़ावा देना
वॉलमार्ट फाउण्डेशन से वित्तीय सहयोग प्राप्त प्रोराइज परियोजना के अन्तर्गत, वॉटरशेड आर्गनाइजेशन ट्रस्ट ने स्थानीय खेतिहर समुदायों को अपशिष्ट-मुक्त खेती अभ्यासों से परिचित कराया है। परियोजना के अन्तर्गत 11 किसान उत्पादक कम्पनियों में 10-ड्रम इकाई सिद्धान्त की 16 इकाईयां लगायी गयी हैं। ये इकाईयां बॉयो-स्टिमुलेण्ट, बॉयो-फर्टिलाइजर्स, जैविक फार्मुलेशन एवं बॉयो-पेस्टिसाइड्स जैसे आवश्यक कृषिगत निवेश उत्पादित करती हैं।

10-ड्रम इकाई सिद्धान्त के उपयोग से स्थानीय स्तर पर और अत्यन्त कम लागत में उच्च-गुणवत्ता युक्त कृषिगत संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित होती है। इस प्रणाली को अपनाने वाले किसानों ने खेती की लागत में कमी, फसल उत्पादकता और जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहतर लचीलापन व अनुकूलन क्षमता में वृद्धि दर्ज की है। इसके अतिरिक्त, इन इकाईयों के प्रबन्धन और देख-रेख करने हेतु महिला स्वयं सहायता समूहों को सशक्त किया गया, जिससे स्थाई आजीविका का एक मॉडल तैयार हुआ।

10-ड्रम इकाई सिद्धान्त को सफल बनाने में महिला स्वयं सहायता समूहों ने प्रमुख भूमिका निभाई। प्रारम्भ में, इन महिलाओं को विविध प्रकार के निवेशों को तैयार करने का सघन प्रशिक्षण दिया गया। आज, वे न सिर्फ इन निवेशों को तैयार कर रही हैं वरन् इन्हें किसान उत्पादक संघों के माध्यम से बेच कर अपनी आर्थिक स्वतन्त्रता में भी योगदान दे रही हैं। एक 10-ड्रम इकाई की स्थापना करने में लगभग रू0 2 लाख का व्यय आता है। 6 माह के अन्दर, सभी 16 इकाईयों ने सामूहिक रूप से लगभग 16 लाख रू0 का राजस्व उत्पन्न किया, जो इस पहल की आर्थिक संभावना को दर्शाता है।

निष्कर्ष
10-ड्रम इकाई सिद्धान्त केवल एक कृषिगत ढाँचा मात्र नहीं है, वरन् यह स्थाई विकास और सामुदायिक सशक्तता का एक मॉडल भी है। निवेश लागत में कमी लाकर, मृदा स्वास्थ्य में सुधार कर एवं पर्यावरण सम्मत कृषि अभ्यासों को बढ़ावा देकर, इसने लचीली खेती के सुरक्षित भविष्य का एक रास्ता तैयार किया है। निरन्तर सहयोग और कुछ पहलों का विस्तार करते हुए, किसान एक तरफ तो लम्बी अवधि में स्थाईत्व और आर्थिक स्थिरता का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं और दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण में भी अपना योगदान दे सकते हैं।


पृथ्वीराज गायकवाड़
वरिष्ठ कृषि अधिकारी,
वॉटरशेड आर्गनाजेशन ट्रस्ट
ई-मेल: prithviraj.gaikwad@wotr.org.in

सचिन करादकर
कृषि प्रसार अधिकारी
वॉटरशेड आर्गनाजेशन ट्रस्ट
ई-मेल: sachin.karadkar@wotr.org.in

प्रवीण एकुण्डे
कृषि अधिकारी
वॉटरशेड आर्गनाजेशन ट्रस्ट
ई-मेल: pravin.ekunde@wotr.org.in

सन्दीप वाघमारे
कृषि प्रक्षेत्र अधिकारी
वॉटरशेड आर्गनाजेशन ट्रस्ट
ई-मेल: sandip.waghmare@wotr.org.in


Source: Technologies and Sustainable Agriculture, LEISA INDIA, Vol. 26, No.4, Dec. 2024

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