जलवायुगत अनिश्चितताओं से निपटने हेतु खेती में विभिन्न प्रकार की पद्धतियां हैं जो किसानों की मदद करती हैं। धान-मछली की एकीकृत खेती भी एक ऐसी ही पद्धति है जो अप्रत्याशित वर्षा के प्रभाव स्वरूप होने वाले जल-जमाव के प्रबंधन की एक लाभकारी प्रणाली है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में सक्षम यह प्रणाली स्थायी कृषि के लिए एक आशाजनक दृष्टिकोण होने के साथ ही इससे फसल के शु़द्ध लाभ में भी वृद्धि होती है। इस बात को गोरखपुर के जल-जमाव ग्रस्त गाँव शिवलहिया की शारदा देवी ने सिद्ध किया है, जिन्होंने धान और मछली पालन का एकीकृत मॉडल अपनाकर अपनी आय में वृद्धि की है।
जल-जमाव की परिस्थिति किसानों के लिए समस्या बन जाती है। परन्तु धान और मछली पालन अर्थात मिश्रित खेती (प्दजमहतंजमक त्पबम ंदक थ्पेी थ्ंतउपदह) इस क्षेत्र की जलभराव समस्या को आर्थिक अवसर में बदल सकता है। यह प्रणाली किसानों को धान उत्पादन के साथ-साथ मछली पालन से अतिरिक्त आय प्रदान करने में सक्षम बनाती है।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद के कैम्पियरगंज विकासखंड में स्थित ग्राम पंचायत शिवलहिया जनपद मुख्यालय से 30 किलोमीटर उत्तर में, विकासखण्ड कार्यालय से 3 किलोमीटर दूरी पर तथा राप्ती नदी से लगभग 2.5-3 किलोमीटर पूरब दिशा में स्थित है। इस ग्राम पंचायत के उत्तर दिशा में लगभग 7 किलोमीटर की दूरी पर सरूआ ताल है जिससे निकलने वाला नाला जो अब अपना स्वरूप बदल चुका है एवं जिसका ढलान क्षेत्र इस ग्राम पंचायत के खेती योग्य भू-भाग के पास से निकलता हैं। मानसून के बाद सरूआ ताल में अत्यधिक जलभराव होने से इस नाले का फैलाव हो जाता है और पानी शिवलहिया के खेतों में भी आ जाता है। इस क्षेत्र की प्रमुख भौगोलिक विशेषता इसके निचले भू-भाग हैं, जहाँ प्रत्येक वर्ष मानसून के बाद अत्यधिक वर्षा के कारण जलभराव की समस्या उत्पन्न होती है। इस गाँव के 15-16 एकड़ खेती योग्य भू-भाग पर लगभग 3-4 माह जल-जमाव रहता है। जलभराव के कारण यहाँ के किसानों की खेती प्रभावित होती है, जिससे फसल उत्पादन में चुनौतियाँ आती हैं।
हस्तक्षेप का प्रारम्भ
स्थाई कृषि एवं पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर 1975 से कार्य करने वाली संस्था गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप राज्य से लेकर राष्ट््रीय स्तर तक लघु एवं सीमान्त किसानों के साथ जुड़ कर लम्बे समय से कार्य कर रही है। मुख्य रूप से खेती एवं खेती आधारित आजीविका, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय संतुलन, लैंगिक समानता आदि से जुड़े मुद्दों पर क्षेत्र में लम्बे समय से काम कर रही संस्था ने उपरोक्त समस्याओं को संज्ञान में लिया और ‘‘लचीली खेती’’ परियोजना के तहत् जिले के कैम्पियरगंज विकास खण्ड के 18 गाँवों में कार्य करना प्रारम्भ किया जिसमें ग्राम शिवलहिया भी शामिल है।
वर्ष 2024 में प्रारम्भ हुई इस परियोजना के शुरूआती दौर में परियोजना के उद्देश्यों के अनुरूप प्रत्येक गांव में मॉडल किसानों तथा संस्था के कार्यों का बड़े पैमाने पर विस्तार करने के उद्देश्य से मास्टर ट््रेनरों का चयन किया गया। कार्यों को गति प्रदान करने के उद्देश्य से आच्छादित गाँवों में सघन बैठकें की गयीं। जुड़े हुए किसानों का विभिन्न विषयगत क्षमतावर्धन किया गया और प्रत्येक माह किसान विद्यालयों का आयोजन कर किसानों को उनकी खेती एवं खेती से सम्बद्ध अन्य घटकों से सम्बन्धित समस्याओं के निराकरण का प्रयास किया गया।
नई पहल की अग्रदूत: शारदा देवी
शिवलहिया गाँव में संस्था द्वारा की जाने वाली बैठकों में महिला किसान शारदा देवी ने भागीदारी की और उनकी रूचि एवं जुड़ाव की प्रतिबद्धता को देखते हुए उनका चयन परियोजना अन्तर्गत मॉडल किसान के तौर पर किया गया।
संस्था व परियोजना से जुड़ाव से पूर्व शारदा देवी ने सालों तक धान की खेती पर पूरी तरह से भरोसा किया। खेती में धान की कम पैदावार इस किसान की मुख्य समस्या बनी रही है। साथ ही कम उत्पादन हेतु जल-जमाव एवं कीट-पतंगों का प्रकोप भी एक प्रमुख कारण है। समस्याओं को हल करने के लिए किये गये उपायों से इनकी उत्पादन लागत बढ़ती जा रही थी। शारदा देवी एक लघु-सीमांत महिला किसान है इसलिए इनका पूरा परिवार खेती के कार्यों में ही लगा रहता है, लेकिन लगातार कीट संक्रमण, अप्रत्याशित मौसम, और खेती की उच्च लागत ने उनके परिवार के लिए एक स्थिर आय अर्जित करना बहुत मुश्किल बना दिया था। यह खेतिहर परिवार इन समस्याओं को हल करने के बेहतर उपाय खोजने में लगा रहता था।
जून 2024 में संस्था द्वारा आयोजित एक बैठक में शारदा देवी ने इन समस्याओं से संघर्ष की चर्चा की और यहीं इन्हें धान एवं मछली की एकीकृत खेती के बारे में जानकारी मिली। मॉडल किसान के तौर पर चयनित होने के बाद इनके साथ मिलकर फार्म प्लानिंग कराई गयी एवं जल-जमाव वाले खेत की समस्या समाधान में बताया गया कि अपने खेत के बगल में स्थित तालाब का उपयोग करते हुए खरीफ में धान व मछली की एकीकृत खेती एक बेहतर विकल्प है। इन्होने धान-मछली कृषि प्रणाली को अपनाने का फैसला किया। यह स्थायी मॉडल एक्वाकल्चर के साथ धान की खेती को जोड़ती है।
|
उल्लेखनीय है कि शारदा देवी के घर के पास ही इनका 1 डिसमिल का एक तालाब भी है। इसमें इनके पति द्वारा मछली पालन भी किया जा रहा है जिससे साल के कुछ महीने श्रम करने से ही मछली पालन द्वारा लगभग 30,000/- रू की सालाना आय हो जाती है।
|
धान-मछली एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनाने के चरण:
2024 में, शारदा ने अपने धान के एक एकड़ क्षेत्र को धान-मछली की खेती प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने इन प्रमुख चरणों का पालन किया।
* कृषि गतिविधि में संशोधन – उन्होंने पानी के चैनल बनाने के लिए अपने धान के क्षेत्र के 2 किनारों के साथ 5-7 फुट चौड़ी छोटी खाइयों को खोदा, जहाँ मछली पनप सकती थी जिससे अलग-अलग प्रजाति की मछलियों के बच्चों (अंगुलिकाओं) को डाला जा सकें।
* धान प्रजाति का चयन- उन्होंने धान की उच्च उपज वाली ‘‘अनमोल’’ प्रजाति को चुना जो खड़े पानी को सहन कर सकता है और उपज भी भरपूर दे सकें। इससे पहले इस खेत में शारदा देवी सम्भा प्रजाति का धान बोती थीं।
* मछली का चयन – उन्होंने रोहू, ग्रास, भांगुर, और नैनी जैसी मछली की प्रजातियों का चयन किया, जो धान के साथ अच्छी तरह से विकसित हो सकते हैं। इन्होनें सितम्बर माह में छोटी-बड़ी (तीन से चार इंच तक) मछलियां पुराने तालाब से निकाल कर धान के खेतों में डाल दिया।
* कार्बनिक दृष्टिकोण – उन्होंने संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र सुनिश्चित करने के लिए कार्बनिक खाद और प्राकृतिक कीट नियंत्रण विधियों का उपयोग करते हुए रसायनिक तत्वों (उर्वरकों और कीटनाशकों ) का उपयोग अत्यन्त कम कर दिया।
लाभ और परिणाम:
इस प्रकार किसान अपने धान की फसल के साथ मछली पालन करके अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। मिश्रित खेती जलवायु जोखिम को कम करने में सहायक होती है। एकीकृत कृषि प्रणाली धान की उपज में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई। मछली की खेती ने आय का एक अतिरिक्त स्रोत प्रदान किया, जिससे 17800 रूपये का शु़द्ध लाभ हुई।
लागत-लाभ विश्लेषण
| फसल वर्ष | फसल | क्षेत्रफल (एकड़) |
जुताई (रू0) |
खाद (रू0) |
बीज (रू0) |
कीट/ खरपतवार नाशक (रू0) |
सिंचाई (रू0) |
रोपाई (रू0 | कटाई (रू0) | कुल लागत (रू0) | कुल फसल उत्पादन (कु0) | उत्पादन मूल्य (रू0) | लाभ (रू0) |
| खरीफ 2023 | धान | 1 | 3000 | 2272 | 720 | 400 | 3600 | 1500 | 2100 | 13595 | धान 12 | 21600 | 8005 |
| खरीफ 2024 | धान व मछली | 1 | 3000 | 1975 | 1720 | 400 | 1500 | 3900 | 5200 | 19195 |
धान 15 मछली 50 |
37000 | 17805 |
कम लागतः मछलियों से उत्सर्जित पदार्थ प्राकृतिक खाद के रूप में कार्य करते हैं, जो मृदा में कार्बनिक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाकर मिट्टी को समृद्ध करते हैं। मछली का अपशिष्ट नाइट्रोजन, फास्फोरस, और पोटेशियम तत्वों से समृद्ध है, जो धान के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व हैं। प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों की पूर्ति होने पर किसानों के लिए खेती की लागत कम हो जाती है। रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की कम आवश्यकता से खेती की लागत में लगभग 10 प्रतिशत की बचत हुई।
प्राकृतिक कीट नियंत्रणः मछली, धान के फसल को नुकसान पहुँचाने वाले कीट-पतंगों और खरपतवारों को अपने भोजन की तरह उपयोग करती है। मछलियां कीट नियंत्रण कर फसल रोग के जोखिम को कम करती हैं। इस प्रकार रसायनिक कीटनाशकों/खरपतवारनाशी की आवश्यकता कम हो जाती है।
पर्यावरणीय लाभः एकीकृत खेती ने जैव विविधता को बढ़ावा दिया, स्वाभाविक रूप से कीटों को कम किया। जलजमाव प्रभावित धान के खेतों में मछलियों के आवागमन (हलचल) से लाभकारी सूक्ष्मजीवों का विकास भी होता है। जिससे कार्बनिक पदार्थों का विघटन होता है और धान के फसल में विघटित पोषक तत्वों का अवशोषण आसानी से होता है।
मछली पालन विभिन्न प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से धान के खेतों में मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है जो पोषक तत्वों की उपलब्धता और मिट्टी की संरचना में सुधार करते हैं। परिणाम स्वरूप मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार से भविष्य की खेती अधिक उत्पादक हो जाती है।
किसानों के लिए प्रेरणास्रोत:
उनकी सफलता को देखकर, उनके गाँव के 3 अन्य किसानों ने उसी पद्धति/प्रणाली (धान-मछली) को अपनाना शुरू कर दिया। शारदा देवी अब लचीली खेती परियोजना के लर्निंग लैब (किसान विद्यायल) में खेती संबंधित अपने ज्ञान व अनुभवों को भी साझा करती हैं और अन्य किसानों को स्थायी कृषि की गतिविधियों हेतु प्रोत्साहित करती हैं। उनकी सफलता को देखकर, पड़ोसी किसानों तथा परियोजना के अन्य किसानों को इस विधि के बारे में बताया गया है। शारदा देवी के पति श्री साधूसरन को कृषि प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अपने अनुभव को साझा करने एवं नये हुनर सीखने के लिए मछली विभाग द्वारा भी आमंत्रित किया गया।
एक उज्जवल भविष्य:
ग्राम पंचायत शिवलहिया की भौगोलिक परिस्थितियाँ खेती के लिए चुनौतियाँ हैं, लेकिन ये मिश्रित कृषि प्रणाली (धान और मछली पालन) के लिए अत्यधिक अनुकूल हैं। इस पद्धति को अपनाकर किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं और जलभराव की समस्या को एक लाभदायक अवसर में परिवर्तित कर सकते हैं। शारदा देवी की इस सफलता को देखने के लिए आस-पास के अन्य गाँवों के किसान उनके खेत पर भ्रमण करते रहते हैं। शारदा देवी ने भविष्य में मछली और नई धान की प्रजाति को शामिल कर आय बढ़ाने के प्रति आशान्वित हैं। वित्तीय संघर्ष से समृद्धि ओर की इस यात्रा का प्रारम्भ इस बात का प्रमाण है कि खेती में नवाचार से सफलता मिल सकती है। उनकी कहानी अन्य किसानों के लिए एक प्रेरणा के रूप में कार्य करती है, यह दिखाती है कि सही दृष्टिकोण के साथ, चुनौतियों को अवसरों में बदला जा सकता है।
अंजू पाण्डेय
गोरखपुर एनवॉयरन्मेन्टल एक्शन ग्रुप,
गोरखपुर
ई-मेल: geagmis224@gmail.com
असलम खान
गोरखपुर एनवॉयरन्मेन्टल एक्शन ग्रुप,
गोरखपुर
ई-मेल: procurement@gmail.com



