बीज से धान की सीधी बुवाई जैसी तकनीकें, जल संरक्षण, किसान की आय में सुधार एवं पर्यावरणीय परिणामों को बढ़ाने के लिए एक परिवर्तनकारी कदम हैं। विभिन्न संगठनों के संयुक्त प्रयासों के साथ, तथा एक सशक्त नीति का सहयोग प्राप्त कर, यह तकनीक धान की खेती में क्रान्ति ला सकती है, तथा बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।
भारतीय संयुक्त राष्ट््र के सतत् विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए तय समय-सीमा 2030 की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में कृषि सेक्टर देश की रणनीति के केन्द्र में बना हुआ है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और लाखों लोगों के लिए आजीविका का एक प्रमुख स्रोत है। जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में तय किये गये स्थाई विकास लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कृषि सेक्टर में असीम संभावनाएं हैं। विशेष रूप से लक्ष्य सं0 2- शून्य भूख और लक्ष्य सं0 12 जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन को पाने के लिए कृषि सेक्टर सर्वाधिक संभावना पूर्ण सेक्टर है। परिणामतः कृषि सेक्टर में तकनीकी हस्तक्षेप इन लक्ष्यों को साकार करने हेतु अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
पूरे विश्व में मीठे पानी की खपत में कृषि का योगदान 70 प्रतिशत है, और भारत विश्व भर में बड़े कृषि उत्पादकों में से एक है, जो इसे पानी सहित कृषि निवेशों का एक महत्वपूर्ण उपभोक्ता बनाता है। इतना ही नहीं, भारत में मीठे पानी के योगदान में कृषि का योगदान 80 प्रतिशत है। यहाँ प्रतिवर्ष 245 बिलियन क्यूबिक मीटर से भी अधिक भूजल का उपभोग होता है, जिसमें से 90 प्रतिशत सिर्फ कृषि कार्याें में खर्च होता है। यह सघन जल उपभोग अस्थाई है। विशेषकर ऐसे में, जब देश भूजल की कमी से जूझ रहा है और मुख्य कृषिगत क्षेत्रों में जल संकट बढ़ता जा रहा है।
विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन ने अनुमान लगाया है कि 2050 तक भोजन की वैश्विक आवश्यकता को पूरा करने हेतु किसानों को 10 प्रतिशत अतिरिक्त पानी की आवश्यकता होगी। इस माँग का अधिकाँश हिस्सा पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहे क्षेत्रांे में केन्द्रित होगा। इसलिए जल संकट को और अधिक बढ़ने से रोकने हेतु अधिक कुशल जल-उपयोग अभ्यासों को अपनाना अनिवार्य हो जाता है।
भारत ने इस चुनौती को पहचाना है और जल उपयोग दक्षता को प्रोत्साहित करना सरकारों के अन्तर्गत लगातार नीतिगत प्राथमिकता रही है। वर्ष 2015 में, प्रत्येक खेत की लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु ‘‘हर खेत को पानी’’ के दृष्टिकोण के साथ प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना सामने लाई गयी। यह पहल ‘‘प्रति बूँद से अधिक फसल’’ के महत्व को रेखांकित करती है और कृषि उत्पादकता बढ़ाने हेतु कुशल जल उपयोग की आवश्यकता पर जोर देती है।
जल प्रबन्धन में चुनौतियां
चावल दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण प्रमुख भोजन है और बढ़ती वैश्विक माँग को देखते हुए अगले 25 वर्षों में चावल उत्पादन में नाटकीय ढंग से 25 प्रतिशत की वृद्धि होने की उम्मीद है। चावल का उत्पादन विशेषतया जल-सघन है और एशिया स्तर पर सभी सिंचाई जल का लगभग 50 प्रतिशत और वैश्विक सिंचाई जल का 34-43 प्रतिशत चावल उत्पादन में ही उपयोग होता है। अन्तर्राष्ट््रीय चावल शोध संस्थान के अनुसार, भारत में 1 किग्रा0 चावल उत्पादित करने में लगभग 3000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। पारम्परिक तरीके से चावल की खेती करना इसका मुख्य कारण है। इसके अन्तर्गत पानी भरे खेत में धान के पौधों की रोपाई की जाती है, जिससे सतही वाष्पीकरण और रिसाव के माध्यम से पानी की उल्लेखनीय क्षति होती है।
इसके अतिरिक्त, वर्ष 2018 में प्रमुख भारतीय फसलों की जल उत्पादकता मैपिंग पर किये गये एक अध्ययन में यह पाया गया कि, भारत में चावल की खेती का तरीका हमेशा उपलब्ध सिंचाई सुविधाओं के अनुरूप नहीं होता है, जिससे अकुशल जल उपयोग को बढ़ावा मिलता है। उदाहरण के लिए, पंजाब जो यह दावा करता है कि उसके यहाँ सबसे अधिक भूमि पर चावल उत्पादित की जाती है, वह कम सिंचाई जल उपलब्धता से ग्रस्त है जबकि छत्तीसगढ़ और झारखण्ड जैसे राज्य, अपने उच्च सिंचाई जल उपलब्धता के बावजूद, न्यून सिंचित क्षेत्र आच्छादन से जूझ रहे हैं। भारत के चावल उत्पादन में पंजाब और हरियाणा का प्रमुख योगदान होने के बावजूद, कम सिंचाई जल उपलब्धता के कारण इन्हें महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन राज्यों में, प्रति घन मीटर से लगभग 220 ग्राम चावल उत्पादित होता है, जो अकुशल जल उपयोग को दर्शाता है। इस अकुशलता से भू-जल में गम्भीर रूप से कमी आयी है। उदाहरण के लिए, हरियाणा में, चावल उत्पादन करने वाले जिलों में यह अनुभव किया गया है कि वर्ष 2000 से 2021 केे बीच भू-जल स्तर 13 मीटर तक नीचे गया है। कम सिंचाई जल उपलब्धता और चावल की खेती करने हेतु भू-जल का अत्यधिक दोहन दोनों मिलकर पंजाब और हरियाणा में खेती के स्थाईत्व को गम्भीर खतरा उत्पन्न कर रहे हैं। ये स्थितियां यह बताती हैं कि खासकर जल संसाधनों की बढ़ती कमी को देखते हुए भारत चावल की खेती अभ्यासों में तकनीकी हस्तक्षेप करने हेतु तैयार है। स्थाई कृषि के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए, चावल उत्पादन में नवीन तकनीकी हस्तक्षेपों को लागू करना महत्वपूर्ण है। विशेषकर ऐसी तकनीक, जो पानी के उपयोग को कम करे और फसल उपज को बढ़ाये।
बीज से सीधी बुवाई: जल संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण परिवर्तक
बीज से सीधी बुवाई एक ऐसी ही सफल तकनीक है। यह एक कम प्रयोग की जाने वाली प्राचीन तकनीक है, जिसमें धान के पौधों की रोपाई करने के बजाय सीधे बीजों की बुवाई की जाती है। धान की बीज से सीधी बुवाई करने से पानी की बचत होती है, मिथेन गैस का उत्सर्जन कम होता है और खेती की लागत में कमी आती है। बीज से सीधी बुवाई करने की दो तकनीकें हैं – पहला, शुष्क भूमि में बीज की सीधी बुवाई, जो वर्षा आधारित और गहरे-जल पारिस्थितिकी प्रणाली के लिए उपयुक्त होती है और दूसरा, गीली या आर्द्रभूमि में बीज की सीधी बुवाई, जहाँ पहले से अंकुरित किये गये बीजों को दलदली भूमि में बोते हैं, जो सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होती है।
सीधे बीज से बुवाई में बीजों को सही स्थान पर गिराने हेतु सटीक उपकरणों का उपयोग किया जाता है, जिससे श्रम की आवश्यकता कम हो जाती है। इस प्रक्रिया में जुताई के माध्यम से भूमि की तैयारी, हल्की सिंचाई एवं समतलीकरण (अधिकाँशतः लेजर तकनीक से) करने के बाद यथेष्ट दूरी एवं गहराई में कम अवधि के बीजों की बुवाई की जाती है। बुवाई के 8-10 दिन बाद सिंचाई प्रारम्भ हो जाती है और मृदा के प्रकार के आधार साप्ताहिक रूप से निरन्तर की जाती है।
अध्ययन यह भी दर्शाते हैं कि बीज से सीधी बुवाई से पानी के उपयोग में 30 प्रतिशत तक कमी की जा सकती है, खेती की लागत में कमी की जा सकती है, श्रम की आवश्यकता को कम किया जा सकता है तथा दलदल के विघटनकारी प्रभावों से बचते हुए और स्थाई फसल चक्रों को अपनाकर मृदा स्वास्थ्य को संरक्षित किया जा सकता है।
बीज से सीधी बुवाई तकनीक अपनाने में बाधाएं
यद्यपि चावल की सीधी बुवाई तकनीक से बहुत से लाभ हैं, लेकिन भारत में अनेक चुनौतियों के कारण इसे अपनाने की गति धीमी है। सबसे उल्लेखनीय बाधा, लोगों के पास तकनीकी जानकारी का अभाव तथा उचित उपकरणों जैसे- लेजर लेवलर एवं सीड ड्र्लि की सीमित उपलब्धता है, जो चावल की सीधी बुवाई तकनीक क्रियान्वयन के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। इसलिए पारम्परिक अभ्यासों से सीधी बुवाई तकनीक की तरफ प्रवृत्त होना बहुत से किसानों, विशेषकर छोटी जोत वाले किसानों के लिए कठिन है। खर-पतवार का प्रबन्धन एक दूसरी महत्वपूर्ण बाधा है, क्योंकि धान की सीधी बुवाई वाले खेतों में कीटों का प्रकोप अधिक होता है जिससे उपज पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ सकता है। इस मुद्दे के समाधान हेतु, किसानों का सघन प्रशिक्षण और हानिकारक रसायनों पर निर्भरता को कम करते हुए स्थाई खर-पतवार नियंत्रण उपायों का क्रियान्वयन आवश्यक है।
इस तकनीक में विश्वास पैदा करने के लिए किसान स्तर पर बचत एवं लाभ को स्पष्ट तौर पर दर्शाना आवश्यक है। किसानों को अपनी झिझक दूर करने के लिए पानी की कम खपत, न्यून श्रम लागत एवं लम्बे समय में मृदा स्वास्थ्य में सुधार के सबूतों की आवश्यकता है।
धान के बीज की सीधी बुवाई के सफल क्रियान्वयन के लिए जागरूकता और क्षमता निर्माण दोनांे समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। बहुत से किसान किसी भी तकनीक को तभी अपनाने के इच्छुक रहते हैं, जब उन्हें उसके पर्याप्त साक्ष्य मिल जायें। साक्षरता अभियानों एवं प्रक्षेत्र भ्रमणों का आयोजन कर, धान के बीज की सीधी बुवाई से होने वाले आर्थिक एवं पर्यावरणीय लाभों के प्रति किसानों की समझ विकसित करने में कृषि विज्ञान केन्द्र जैसे सरकारी कार्यक्रम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
रूट्स फाउण्डेशन: धान की सीधी बुवाई तकनीक के माध्यम से किसानों को सशक्त बनाना
रूट्स फाउण्डेशन, फेरलेन्स ग्रुप के तहत् एक सामाजिक उद्यम है, जो भारत में धान की सीधी बुवाई के माध्यम स्थाई चावल उत्पादन को प्रोत्साहन देने हेतु कार्य कर रही है। फाउण्डेशन पिछले 13 वर्षों से, स्थाई कृषिगत अभ्यासों को अपनाने हेतु किसानों के क्षमतावर्धन का कार्य निरन्तर करती आ रही है। इसके प्रमुख कार्यक्रमों में, ‘‘धान के बीज की सीधी बुवाई के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ स्थाई चावल उत्पादन’’ है, जो पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सहित भारत के 10 राज्यों में संचालित है।
धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक अपनाने हेतु बहुआयामी कार्यक्रम दृष्टिकोण
धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक अपनाने हेतु किसानों का प्रशिक्षण, उनको तकनीकी सहयोग एवं नियमित निगरानी सहित एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। रूट फाउण्डेशन ने, किसानों द्वारा धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक को प्रभावी ढंग से अपनाने हेतु एक विस्तृत रणनीति के तहत् क्रियान्वयन किया जिससे जल-कुशलता में वृद्धि, श्रम लागत में कमी और चावल की खेती में बेहतर स्थाईत्व जैसे लाभ प्राप्त हों।
* किसानों का प्रशिक्षण एवं प्रदर्षन: किसानों को धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक के सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक पहलुओं पर शिक्षित करने हेतु रूट्स फाउण्डेशन समूह चर्चा, बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं व्यक्तिगत सत्र जैसे पारस्परिक तरीकों का उपयोग करता है। प्रक्षेत्र भ्रमण के माध्यम से किसान करके सीखने का अनुभव प्राप्त करते हैं, मशीनों एवं तकनीकों के उपयोग को किसान देखते हैं और पारम्परिक पद्धति तथा धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक के बीच के अन्तर को प्रदर्शित किया जाता है।
* तकनीकी सहयोग: संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए, यह कार्यक्रम सीडर, खर-पतवार प्रबन्धन उपकरण एवं सिंचाई प्रणालियों सहित उन्नत मशीनों तक किसानों की पहुंच को सुनिश्चित करता है। साथ ही इन मशीनों के संचलन, रख-रखाव एवं मरम्मत आदि पर किसानों को प्रशिक्षित भी करता है ताकि किसान तकनीकी समस्याओं को दूर करने में सक्षम हो सकें।
इसके साथ ही, इस तकनीक में उपज नुकसान को कम करने के लिए, पीआई इण्डस्ट््री द्वारा डिजाइन किये गये खर-पतवार नाशी इकेइटीएसयू स्प्रे जैसी नवीन तकनीकों का लाभ उठाया। बिस्पाइरिबैक सोडियम, क्लोरिमुरोन एथिल और मेटसल्फ्यूरान मिथाइल के संयोग से बनी यह तकनीक खर-पतवार को प्रभावी ढंग से प्रबन्धित करती है जिससे उपज को बढ़ाने में मदद मिलती है।
* निगरानी एवं सहायता: रूट्स फाउण्डेशन फील्ड कार्यकर्ताओं के माध्यम से किसानों को निरन्तर सहयोग देना सुनिश्चित करता है। ये फील्ड कार्यकर्ता किसानों के यहां भ्रमण करते हैं, उनकी समस्याओं का समय से निवारण सुनिश्चित करते हैं, सिंचाई और खर-पतवार नियंत्रण हेतु मार्गदर्शन करते हैं। इस लगातार जुड़ाव से धान के बीज की सीधी बुवाई के अभ्यासों को और परिष्कृत करने, चुनौतियों से निपटने और स्थाई कृषि के लक्ष्यों को प्राप्त करने में किसानों को मदद मिलती है।
प्रशिक्षण, तकनीक एवं निरन्तर सहयोग के एकीकरण के माध्यम से रूट्स फाउण्डेशन ने एक सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र बनाने का प्रयास किया है जिससे किसानों को धान के बीज की सीधी बुवाई की तरफ सफलतापूर्वक बदलाव करने में सक्षम बनाया जा सके और चावल की खेती में लम्बे समय तक स्थाईत्व बना रह सके।
ठोस परिणाम
फाउण्डेशन के प्रयासों से विशेषकर पंजाब एवं हरियाणा में जल संरक्षण, आर्थिक लाभ एवं पर्यावरणीय स्थाईत्व सहित कई उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त हुए हैं। आज की तारीख तक, 10 लाख से अधिक किसानों को धान के बीज की सीधी बुवाई के लाभों के बारे में संवेदित किया जा चुका है और 5 लाख से अधिक किसानों को 2000 से अधिक प्रदर्शन प्रक्षेत्रों के माध्यम से प्रत्यक्ष तौर पर प्रशिक्षित किया जा चुका है। सबसे अधिक उल्लेखनीय उपलब्धि तो यह रही कि, प्रशिक्षण कार्यक्रमों में 2000 से अधिक महिलाओं का समावेशन किया गया, जिससे कृषिगत अभ्यासों में जेण्डर समानता को बढ़ावा मिला है।
इस तकनीक से होने वाले कुछ ठोस परिणाम निम्नवत् हैं –
* चावल की खेती में पानी के उपयोग में 35-40 प्रतिशत तक की कमी आयी है।
* मिथेन एवं कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में 35-40 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गयी है।
* बाजार से जुड़ाव को बढ़ाकर किसानों के आय में 50-100 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
* प्रति हेक्टेयर खेती की लागत में रू0 6,000.00-रू0 8,000.00 तक की बचत हुई है।
इस कार्यक्रम और अन्य स्थाई कृषिगत पहलों के अन्तर्गत किसानों के बीच पड़ने वाले प्रभावों के कारण रूट्स फाउण्डेशन को सामाजिक क्षेत्र में एक एडवोकेसी मंच सोशियो स्टोरी, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2021 में आयोजित इण्डिया इम्पैक्ट समिट में ‘‘सामाजिक परिवर्तन के नेता’’ का सम्मान प्रदान किया गया। इसके साथ अन्य बहुत से पुरस्कारों एवं प्रशंसा पत्रों से सम्मानित किया गया। इन परिणामों से किसानों को न केवल मूल्यवान संसाधनों को बचाने में मदद मिली है, वरन् वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हुए हैं। रूट्स फाउण्डेशन किसानों को प्रशिक्षण प्रदान करने के साथ ही धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक के कुशलतापूर्ण उपयोग पर ज्ञान से सुसज्जित कर रहा है, जिससे किसान तकनीक के साथ प्रारम्भ में आने वाली चुनौतियों से निपटने में सक्षम हो सकें।
सार्वजनिक-निजी भागीदारी की भूमिका
धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक को अपनाने में आने वाली बाधाओं को पार करने में किसानों, स्वैच्छिक संगठनों, सरकारी एजेन्सियों एवं निजी कम्पनियों के बीच सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) जागरूकता अभियान चला सकती है, वित्तीय प्रोत्साहन दे सकती है और आवश्यक उपकरणों एवं तकनीकों तक लोगों की पहुँच सुनिश्चित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, किसानों के प्रशिक्षणों एवं बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र के साथ भागीदारी धान के बीज की सीधी बुवाई से होने वाले आर्थिक एवं पर्यावरणीय लाभों को दर्शा सकती है।
फेयरलेन्स ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर रित्विक बहुगुणा सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच समन्वय के महत्व पर जोर देते हैं। वे कहते हैं, ‘‘चावल उगाना एक जटिल और अधिक निवेश चाहने वाली प्रक्रिया है। धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक से फसलें तेजी से और आसानी से बोई जाती हैं, कम अवधि की होती हैं, पानी का कम उपभोग होता है और जलवायु-अनुकूल होती हैं।’’ यद्यपि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि इस तकनीक को व्यापक रूप से अपनाने के लिए खर-पतवार प्रबन्धन और जागरूकता की कमी जैसी चुनौतियों का समाधान किया जाना चाहिए। फेयरलेन्स समूह के एक भाग के तौर पर, रूट्स फाउण्डेशन पायलट परियोजनाओं और प्रक्षेत्र प्रदर्शनों के माध्यम से तकनीक एवं जागरूकता के मुद्दे पर कार्य कर रहा है, किसानांे को व्यवहारिक अनुभव प्रदान कर रहा है। इन पहलों से किसान तकनीक अपनाने हेतु आवश्यक तकनीक एवं दक्षता प्राप्त कर सशक्त हो रहे हैं और इसे व्यापक रूप से अपनाने हेतु जमीन तैयार हो रही है।
सरकार निवेशों पर दिये जाने वाले अनुदानों को स्थाई खेती अभ्यासों के साथ जोड़कर धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक को अपनाने हेतु प्रोत्साहन देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उदाहरण के लिए, सीड ड््िरलों एवं लेजर लेवलर जैसे आवश्यक उपकरणों के लिए अनुदान धान के बीज की सीधी बुवाई को उल्लेखनीय रूप से आसान बना सकता है। इसके अतिरिक्त, स्थाई खेती तकनीकों जैसे- जैविक अभ्यासों के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देकर किसानों को पर्यावरण-सम्मत तरीके अपनाने हेतु उत्प्रेरित किया जा सकता है। इस तकनीक को अपनाने हेतु किसानों के खाते में सीधे पैसे भेजना अत्यन्त प्रभावी हो सकता है। जैसाकि हरियाणा में देख जा रहा है, जहाँ वर्ष 2019 से 44,000 से अधिक किसान इस तकनीक को अपना रहे हैं। इन प्रयासों को पूरा करने के लिए, संयुक्त रूप से जागरूकता अभियान चलाना और बड़े पैमाने पर प्रदर्शन परियोजनाओं में निवेश करना महत्वपूर्ण है। अनुदान, प्रोत्साहन, जागरूकता और क्षमता निर्माण का यह संयुक्त दृष्टिकोण, धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक को मुख्यधारा में शामिल करने और अपने स्थाई विकास लक्ष्यों की दिशा में भारत की प्रगति को गति देने में सहायक सिद्ध होगा।
भविष्य की संभावनाएं: भारतीय कृषि के लिए एक स्थाई भविष्य
भारत जैसे-जैसे अपने स्थाई विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, धान के बीज की सीधी बुवाई जैसी तकनीकें, जल संरक्षण, किसान की आय बढ़ाने और पर्यावरणीय परिणामों में वृद्धि करने हेतु एक परिवर्तनकारी अवसर प्रदान करती हैं। रूट्स फाउण्डेशन एवं सशक्त नीति सहयोग के संयुक्त प्रयासों से धान के बीज की सीधी बुवाई जैसी तकनीक चावल की खेती में क्रान्ति ला सकती है और बढ़ती हुई आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।
धान के बीज की सीधी बुवाई तकनीक के भारत के अनुभव को पूरे विश्व में दूसरे जल-संकट क्षेत्रों में एक मॉडल के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रभावी समन्वयन के माध्यम से इस तरह के नवाचारों को आगे बढ़ाकर, राष्ट््र आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य सुरक्षित करते हुए स्थाई कृषि में वैश्विक प्रयासों का नेतृत्व कर सकता है।
सन्दर्भ
- https://tracextech.com/water-conservation-insustainable-agriculture/
- *http://www.knowledgebank.irri.org/ericeproduction/III.1_water_usage_in_rice.html.
- Rehman, H.U., S.M.A. Basra and M. Farooq (2011), ‘Field appraisal of seed priming to improve
- the growth, yield, and quality of direct seeded rice’, Turkish Journal of Agriculture and Forestry, Vol. 35, pp. 357–65.
- https://www.nabard.org/auth/writereaddata/tender/1806181128Water%20Productivity%20
- Mapping%20of%20Major%20Indian%20 Crops,%20Web%20Ver s ion%20(Low%20
- Resolution%20PDF).pdf
- https://tile.loc.gov/storage-services/service/gdc/gdcovop/2018305076/2018305076.pdf?utm_
- source=chatgpt.com
- https://www.irri.org/news-and-events/news/making-rice%E2%80%93cultivation-waterefficient-and-sustainable-haryana?utm-source=chatgpt.com
- https://www.asiapathways-adbi.org/2023/10/revitalizing-south-asias-groundwater-resourceswith-
- direct-seeded-rice/?utm_source=chatgpt.com
ईशानी शर्मा
रिसर्च एसोसियेट, फेयरलेन्स
ई-मेल: ishani@farlense.com
रित्विक बहुगुणा
फाउण्डर, रूट्स फाउण्डेशन एवं डायरेक्टर, फेयरलेन्स समूह
ई-मेल: rb@rootsfoundation.in
ए0पी0 सिन्हा
सलाहकार, रूट्स फाउण्डेशन एवं डायरेक्टर, फेयरलेन्स समूह
ई-मेल: p.sinha@rootsfoundation.in
रूट्स फाउण्डेशन,
रु 104, भवन नं0 32, ग्लोबल बिजनेस स्क्वायर
(32जीबीएस) द्वारा आईएनएमएसीएस
सेक्टर 44, गुरूग्राम, हरियाणा – 122 003
Source: Technologies and Sustainable Agriculture, LEISA INDIA, Vol. 26, No.4, Dec. 2024



