जैविक खेती पद्धतियों का उपयोग कर, बाजार के साथ जुड़ाव स्थापित कर, आय उपार्जन कर एवं अपनी स्वयं की तथा अपने समुदाय की जीवन गुणवत्ता में वृद्धि करते हुए दो महिला उद्यमी जैविक खेती के प्रसार में अपना प्रभावशाली योगदान दे रही हैं। इसके साथ ही, एक व्यवहार्य एवं दीर्घकालिक व्यवसाय के रूप में जैविक खेती को अपनाने हेतु अन्य महिलाओं को उत्साहित कर रही हैं, उनका सहयोग कर रही हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने तथा खाद्य सुरक्षा सशक्त करने, गरीबी कम करने तथा लिंग आधारित समानता को बनाये रखने में महिला उद्यमी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। जैविक और स्वस्थ भोजन के लिए माँग में वृद्धि ने ग्रामीण खेतिहर महिलाओं के सामने कुछ अवसर उत्पन्न किया है। यद्यपि जैविक खेती स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए लाभकारी है, फिर भी भूमि, ऋण, बाजार, तकनीक, प्रशिक्षण एवं प्रसार सेवाओं तक पहुँच के अभाव में आज भी जैविक खेती को एक उद्यम के तौर पर अपनाने हेतु महिलाओं को बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यहाँ हम दो ऐसी सफल महिला उद्यमियों की कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिन्होंने तमाम बाधाओं को पार करते हुए जैविक खेती में कई नवाचार किये और आज वे एक सफल उद्यमी के तौर पर उभरी हैं।
श्रीमती हितेश चौधरी
श्रीमती हितेश चौधरी, उत्तर प्रदेश राज्य के अमरोहा जिले के चक चावी गाँव में रहती हैं। एक प्रगतिशील महिला किसान के रूप में, श्रीमती हितेश का मुख्य उद्देश्य, कृषिगत गतिविधियों के माध्यम से किसानों की आय को बढ़ाना था। प्रारम्भ में, वे खेती के पारम्परिक तरीकों को अपनाकर गेंहूं, लेमन ग्रास, गन्ना, हल्दी एवं सरसों की खेती करती थीं।
वह एक ऐसी व्यक्ति हैं, जो ख्ेाती में हमेशा नये विचारों एवं तकनीकों को अपनाने हेतु उत्सुक रहती हैं। उन्होंने अपनी ऊर्जा को कुछ क्षेत्रों की ओर मोड़ा और जैविक विधि से लेमन ग्रास की खेती पर काम किया, पोषण युक्त गृहवाटिकाओं को प्रबन्धित किया, जैविक निवेश उत्पादन तकनीकों पर विशेषज्ञता विकसित की एवं अपने साथी किसानों को जैविक खेती पर प्रोत्साहित एवं प्रशिक्षित किया।
वर्ष 2018 में पतंजलि जैविक शोध संस्थान, हरिद्वार द्वारा आयोजित प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण में सहभागिता करने के पश्चात्, उन्होंने जैविक एवं प्राकृतिक पद्धतियों से खेती करना प्रारम्भ किया। वर्तमान में वे अपने दो एकड़ खेत में सरसो, सब्ज़ियां, लेमन ग्रास, गेंहूं, गन्ना, हल्दी एवं अमरूद की खेती कर रही हैं। उन्होंने अपनी भूमि के एक बड़े टुकड़े को जैविक खेती में भी बदल दिया है।
पोषण वाटिका में, इन्होंने प्याज, आलू, गाजर, मूली, पालक, धनिया, बन्दगोभी, मेथी, फलदार पौध केला व पपीता, बैगन, गंजी, शलजम, अमरूद के पौधे, अरवी, लौकी, तोरई उगाई।
इन्होंने बीजामु्रत, पंचगव्य, जीवामु्रत एवं घनजीवामु्रत नाम से प्राकृतिक विधियों के माध्यम से तैयार किये गये खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग प्रारम्भ किया। इन्होंने गाय के गोबर का उपयोग कर कम्पोस्ट तैयार किया। साथ ही गौमूत्र को एकत्र कर उससे प्राकृतिक खेती निवेश बनाया, जिससे फसल उपजाने के लिए निवेशों पर होने वाली लागत में बड़ी बचत हुई और खेती पर होने वाले व्यय को कम करने में सहायता मिली।
इन्होंने लेमन ग्रास से तैयार तेल, गेंहूं, गन्ना, सरसो, बाजरा, हल्दी को सीधे उपभोक्ताओं को और मण्डी में बेचा। वे अपने घरेलू उपभोग के लिए जैविक सब्ज़ियों, अनाजों और सरसो को उगाती हैं। इन्होंने न केवल अपनी आय में सुधार किया है, वरन् जैविक खेती पद्धतियों को अपनाने से उनकी आय दोगुनी हो गयी है।
प्रारम्भ में, उन्हें परिवार और समुदाय के स्तर पर काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। बिना किसी पारिवारिक या आर्थिक सहयोग के, उन्होंने अपने आत्म-विश्वास के साथ अपनी यात्रा प्रारम्भ की और आज वह इस स्थिति में पहुँच गयी हैं कि जैविक खेती के मामले में वह दूसरों का सहयोग करती हैं। उन्होंने अमरोहा जिले में बहुत सी स्वयं सहायता समूहों एवं फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों को सहयोग प्रदान किया है।
श्रीमती हितेश को प्रगतिशील एवं नवाचारी किसान के रूप में सामाजिक संगठनों एवं जिला प्रशासन द्वारा सम्मानित किया गया है। उन्होंने निदेशालय, भारत सरकार के कृषि मंत्रालय, सरदार वल्लभभाई पटेल विश्वविद्यालय के कुलपति, कृषि मंत्रालय, उत्तर प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से भी सम्मान प्राप्त किया है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उनका नाम पद्मश्री पुरस्कार के लिए भी संस्तुत किया गया है।
श्रीमती सविता जे. येल्ने
महाराष्ट्र के वर्धा जिले के कान्हापुर गाँव में रहने वाली श्रीमती सविता जे. येल्ने ने अपने एक एकड़ खेत में वर्ष 2008 में जैविक खेती करनी प्रारम्भ की। उन्होंने तेलँगाना, सिकन्दराबाद में स्थित स्वैच्छिक संगठन सेण्टर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (सीएसए) से प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसी क्रम में इन्होंने राज्य कृषि विभाग, महाराष्ट्र द्वारा आयोजित प्रशिक्षण में भी भागीदारी की। एक प्रक्षेत्र भ्रमण यात्रा के दौरान, इन्होंने पूरे महाराष्ट्र में ‘‘स्मार्ट किसान’’ के रूप में जाने जाने वाली किसान श्री सुभाष शर्मा के खेत का भ्रमण किया। वर्ष 2012 में, 6 एकड़ खेत को जैविक खेती में बदलने के बाद, उन्होंने जैविक खेती के अन्तर्गत 3 एकड़ खेत खरीदा। वे ‘‘महाराष्ट्र राज्य जीवन उन्नति अभियान’’ से जुड़ गयीं। इसके माध्यम से ये अब वर्धा जिले की महिला किसानों को जैविक खेती पर प्रशिक्षण दे रही हैं। ये पतंजलि जैविक शोध संस्थान के योगाहार कार्यक्रम की एक सदस्य भी हैं। यह कार्यक्रम विशुद्ध रूप से जैविक खेती को समर्पित है। वर्तमान में यह पतंजलि जैविक शोध संस्थान द्वारा एक प्रशिक्षक के तौर पर भी चयनित हैं। वह समय-समय पर जैविक खेती करने हेतु इच्छुक किसानों के साथ अपने अनुभवों को भी साझा करती हैं। आस-पास के किसान सविता के कार्यों से प्रोत्साहित हुए हैं और अब 30 से अधिक किसान विशेषकर अपने घर के उपभोग एवं बचे हुए उपज को बेचने के उद्देश्य से जैविक भोजन उगाना प्रारम्भ कर दिये हैं। श्रीमती सविता ने इन सभी किसानों के लगभग 15 एकड़ खेत को पूर्णतया जैविक बना दिया है और लगभग 50 एकड़ खेत 50 प्रतिशत जैविक हैं।
धीरे-धीरे इन्होंने अपने खेत से तैयार उत्पादों को वर्धा-नागपुर सड़क पर स्थित अपने खेत के बाहर बेचना प्रारम्भ किया। उनकी जैविक दुकान वर्धा-नागपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। वहाँ वह मौसमी सब्ज़िया, गेंहूं का आटा, दालें, सरसो, धनिया एवं मेथी दाना तथा गन्ना का रस बेचती हैं। उनके द्वारा प्रसंस्कृत एवं मूल्य सवंर्धित किये गये फसलों में, गेंहूं, गन्ना, सरसो एवं अरहर हैं। विशेषकर मई-जून के महीने में वे अपने दुकान के बाहर गन्ना का रस बेचती हैं। वह अपने खेत से निकलने वाली सब्ज़ियां, प्रसंस्कृत चना एवं अरहर, हल्दी पाउडर एवं पपीता सभी बेचती हैं। सोयाबीन और शेष बचे अरहर को वे बाजार मूल्य पर मण्डी में बेच देती हैं। लोग उनके दुकान से जैविक/प्राकृतिक तरीके से उगाये गये उत्पादों को खरीदना पसन्द करते हैं, क्योंकि वे जैविक के नाम पर बाजार मूल्य से अधिक दाम नहीं वसूलती हैं।
पोषण प्रबन्धन हेतु कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट एवं अन्य जैविक स्रोतों का उपयोग, मल्चिंग, फसल चक्र आदि नवोन्वेषी जैविक कृषि अभ्यासों को अपनाने हेतु उनके द्वारा किये जा रहे प्रयासों के लिए तालुका और जिले स्तर के अधिकारियों द्वारा श्रीमती सविता को सम्मानित किया गया।
वह एक व्यक्तिगत उद्यमी हैं। बात-चीत के दौरान श्रीमती सविता कहती हैं, ‘‘प्रारम्भ में उन्हें समाज से काफी विरोध का सामना करना पड़ा था। लोग उन्हें पागल कहते थे। लोगों का कहना था, ये अपने पति को कुछ नहीं समझती है, स्वयं खेती करती है लेकिन आज चीजें बदल गयी हैं और वे जो मुझे बुरा-भला कहते थे, वे भी आज जैविक विधि से खेती करना प्रारम्भ कर दिये हैं।’’ वे अपने आस-पास के किसानों को जैविक खेती अभ्यासों को करने हेतु प्रोत्साहित और प्रशिक्षित भी करती हैं।
श्रीमती सविता अपनी यात्रा से बहुत प्रसन्न हैं और अपने बच्चों को वाँछित शिक्षा दिलाने में सक्षम हैं। उनकी पुत्री ने हाल ही में बी0ई0 की डिग्री पूरी की है और उनके बेटे ने भी कृषि में परास्नातक किया है। खेत प्रबन्धन में उनके पति और बच्चों का भी पूरा सहयोग रहता है।
पवन कुमार, मनोहरी राठी एवं अपूर्वा तिवारी
पतंजलि जैविक शोध संस्थान
हरिद्धार, उत्तराखण्ड, भारत
ई-मेल: manoharirathi19@gmail.com
Source: Farm Women Breaking barriers, LEISA INDIA, Vol. 26, No.1, March 2024



