ओडिशा में मोटे अनाज की खेती प्रणाली को पुनर्जीवित करती महिला-नीत संस्थाएं

Updated on December 2, 2024

परिवार की समग्र आय बढ़ाने और पोषण सुरक्षा जैसे मुद्दों से निपटने की दिशा में मोटे अनाज एक गेम चेंजर की भूमिका में सामने आ रहे हैं। संस्थाएं एक साथ मिलकर, इस परिवर्तन को लाने के विषय में एकमत हैं और एक साथ मिलकर काम कर रही हैं। एफपीओ में मूल्य श्रृँखला के सभी पहलुओं में महिला नेतृत्व ओडिशा मोटे अनाज मिशन के माध्यम से सुव्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाया गया है।


मंडिया (बाजरा या रागी का स्थानीय उडिया नाम) की चर्चा आज ओडिशा के शहरों एवं गाँवों के कोने-कोने में व्याप्त है। आज कैफे से लेकर रेस्टोरेण्टों तक में इस लोकप्रिय मोटे अनाज से भोजन, नाश्ता, केक एवं बिस्किट आदि बनाकर शहरी जनसमुदाय को परोसा जा रहा है।

मंडिया की खेती जहाँ होती है, वह जगह देखने के लिए हमें ओडिशा के सुदूर अछुते आदिवासी क्षेत्रों तक पहुँच बनाने हेतु यात्रा करनी चाहिए। दिसम्बर के महीने में ओडिशा के कोरापुट जिले के मंकदिताड़ा गाँव में लकड़ी के ड्रम पर बजते बाजे के साथ परजा गीत के हृदयस्पर्शी भजन गाती हुई महिलाओं द्वारा मंडिया फसल की कटाई का दृश्य किसी को भी आकर्षित कर सकता है। यह घरेलू फसल अपनी अधिकतम उपज के साथ ओडिशा के कोरापुट और नबरंगपुर जिले के व्यवसायिक मंडियों तक पहुँच चुकी है।

यह सब कुछ आदिवासी महिलाओं व ओडिशा मिलेट मिशन के संयुक्त रूप से किये गये ठोस प्रयासों से संभव हो सका और इस कार्य में बड़े पैमाने पर मोटे अनाजों की खेती करने-कराने वाली एक गैर सरकारी संस्था, हर्षा ट््रस्ट ने सहयोग प्रदान किया। अधिक लागत वाली मक्का व धान की फसल आधारित खेती प्रणाली को छोड़कर अपने ऊपरी (पहाड़ी) खेतों में कम लागत के साथ अच्छी उपज देने वाली इस फसल का चयन कर, फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों ने अग्रणी भूमिका निभाई, साथ ही स्वस्थ आहार के कारण यह उपभोक्ताओं की भी पसन्द बन गयी है।

ओडिशा की पहाड़ियों में मोटे अनाजों की यात्रा
आदिवासियों एवं संस्कृति के जिले कोरापुट और नबरंगपुर में कुल 2977 गाँव हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार इन जिलों की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी आदिवासी जनजातियां हैं। ये आदिवासी समुदाय अपने भोजन और आजीविका के लिए खेती, पशुपालन और गैर-इमारती वनोत्पादों पर निर्भर करते हैं। यहाँ आदिवासी महिलाएं घरेलू अर्थव्यवस्था की संचालिका होती हैं।

यह वह समय था, जब कोरापुट जिले के बोरीगुम्मा एवं कुन्द्रा के आदिवासी किसानों ने खेती के अलावा अन्य बेहतर विकल्पों की तरफ देखना प्रारम्भ कर दिया था। वास्तव में, कोरापुट में लघु एवं सीमान्त किसानों की संख्या 80 प्रतिशत है। उनमें से 90 प्रतिशत किसानों के पास अपलैण्ड है जिससे बहुत कम उपज मिलती है। सीमान्त किसानों ने आस-पास के शहरों और राज्यों में दैनिक मजदूर के तौर पर काम करने हेतु पलायन किया।
वे वर्षों तक अधिक लागत लगने वाली मक्का और धान जैसी फसलों की खेती कर-करके निराश हो रहे थे, क्योंकि लगातार बढ़ रही सूखा अवधि, कीटों के आक्रमण, अपर्याप्त फसल निवेशों, खराब गुणवत्ता वाली भूमि और कम होती उपज के कारण इनका जीवन प्रभावित हो रहा था। ये स्थितियां तुरन्त एक ऐसे हस्तक्षेप की माँग कर रही थीं, जो पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली आदिवासी महिला किसानों के लिए स्थाई व सस्ती हों साथ ही उनके मनोनुकूल भी हों।

समग्र घरेलू अर्थव्यवस्था में सुधार करने और पोषण सुरक्षा सम्बन्धी मुद्दों के ऊपर कार्य करने की दृष्टि से मोटे अनाजों की खेती की तरफ मुड़ना एक संभावित गेम चेन्जर साबित हुआ। इसके लिए एक समान दृष्टिकोण के साथ समान विषय पर काम करने वाली संस्थाओं को एक साथ आने की जरूरत थी।

संस्थागत सहयोग से मोटे अनाजों का पुनरूद्धार प्रारम्भ हुआ
मोटे अनाजों की खेती सामान्यतः वर्षा आधारित क्षेत्रों में की जाती है। इसलिए यह जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा सूखा स्थितियों से निपटने में काफी मददगार साबित होती है। जलवायु अनुकूलित एवं पोषक विकल्प के तौर पर मोटे अनाजों की क्षमता को महसूस करते हुए खेत एवं थाली में मोटे अनाजों को पुनर्जीवित करने हेतु वर्ष 2017 में ओडिशा मिलेट मिशन की शुरूआत की। हर्षा ट्रस्ट के साथ साझेदारी करके, इस कार्यक्रम ने आदिवासी महिला किसानों को आगे लाने के कार्य को प्राथमिकता दी। इससे पहले, प्रासंगिक वास्तविकताओं को समझने हेतु, हर्षा ट्रस्ट आदिवासी महिला किसानों की आजीविका सुनिश्चित करने के साथ-साथ उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने पर काम कर रहा है। इस सन्दर्भ में, इस क्षेत्र की महिला किसानों के साथ अप्रैल 2014 से काम कर रही संस्था ने उन्हें स्वयं सहायता समूहों के रूप में संगठित किया। प्रारम्भ में, 350 किसानों की सदस्यता के साथ 32 स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया। इन सभी स्वयं सहायता समूहों को संचालित करने वाला एक स्वयं सहायता समूह था, जिसे नोडल स्वयं सहायता समूह का नाम दिया गया। बाद में इसी नोडल स्वयं सहायता को कम्पनीज़ अधिनियम के तहत् फार्मर प्रोड्यूसर कम्पनी के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। हर्षा ट्रस्ट ने जुलाई 2017 में ओडिशा मिलेट मिशन के साथ काम करना प्रारम्भ किया।

बाक्स 1
‘‘पहले मैं सिर्फ अपने परिवार के उपभोग हेतु मात्र 1.5 एकड़ में रागी की खेती करता था। उपज 2 कुन्तल से अधिक नहीं मिलती थी। मुझे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि रागी भी बेहतर लाभ दे सकता है। हर्षा ट्रस्ट के सहयोग से ओडिशा मिलेट मिशन के साथ जुड़ाव स्थापित होने के बाद, मैंने मोटे अनाजों की खेती की उन्नत तकनीकों पर प्रशिक्षण प्राप्त किया और स्वस्थ बीज चयन के महत्व को सीखा। इस वर्ष, मैंने अपने उसी डेढ़ एकड़ में 5 कुन्तल रागी की उपज प्राप्त की। इससे हमारे परिवार के उपभोग के बाद शेष बचे उपज से हमें रू. 16,475.00 की अतिरिक्त आमदनी हुई।’’
बनमाली चालन (43 वर्ष), बड़ापिण्डापडार गाँव, बोरीगुम्मा ब्लाक, कोरोपुट

 

किसान उत्पादक संगठनों की रणनीति का एक प्रमुुख जोर चरणबद्ध तरीके से मोटे अनाजों को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करना था। स्वयं किसानों के नेतृत्व में एफपीओ ने मोटे अनाज मूल्य श्रृँखला के लिए एक सक्षम पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य किया। इसने शहरी उपभोक्ताओं के बीच स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता का प्रसार करते हुए घरेलू उपभोग हेतु मोटे अनाजों की माँग बढ़ाई। पोषण सम्बन्धी ऊर्जा गृह के रूप में काम करते हुए, लोगों द्वारा की जाने वाली माँग में बढ़ोत्तरी से प्रेरित होकर, मोटे अनाजों से तैयार किये गये मूल्यवर्धक एवं आधुनिक उत्पाद के लिए उच्च स्तर के मंचों, शहरी कार्यक्रमों, सरकारी बैठकों, सेमिनारों एवं संभाओं के माध्यम से नये रास्ते तलाशे गये हैं।

उत्पादन की उन्नत तकनीकों व लागत-लाभ पहलुओं पर क्षमता वर्धन एवं जागरूकता वृद्धि से, बढ़ती माँग से उत्साहित होकर, समुदाय इस बात से आश्वस्त हुआ कि मोटे अनाज भी अन्य लागत-सघन फसलों की तुलना में बराबर और अत्यधिक लाभ दे सकते हैं। इसके साथ ही, इन फसलों से कार्बन उत्सर्जन कम होने के कारण इससे क्षेत्र की पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता को संरक्षित करने में भी मदद मिली है।

नारी प्रगति फार्मर प्रोड्यूसर कम्पनी लिमिटेड (एनपीएफपीसीएल): निर्माण यात्रा
प्रारम्भ में, संस्था हर्षा ट््रस्ट ने, खेत-आधारित आजीविका पहलों को करने हेतु स्वयं सहायता समूहों जैसे समुदाय आधारित संगठनों का प्रोत्साहन व मार्ग-दर्शन किया। फरवरी 2020 में, सभी समूहों को मिलाकर एक फार्मर प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन के रूप में संगठित किया और उसे नारी प्रगति फार्मर प्रोड्यूसर कम्पनी लिमिटेड का नाम दिया गया। वर्ष 2020 में अपने गठन के समय इस फार्मर प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन में कुल 570 किसान सदस्य थे। बाद में, वर्ष 2022 में इनकी संख्या बढ़कर 3200 हो गयी। एनपीएफपीसीएल द्वारा अपनाये सेवा मॉडल ने मोटे अनाजों के मूल्य संवर्धन की दिशा में एक आवश्यक वातावरण निर्माण किया, क्योंकि उस समय भी आदिवासी परिवारों में उपभोग हेतु मोटे अनाज मनपसन्द विकल्प थे, लेकिन वे अभी भी उसके आर्थिक क्षमता को नहीं जान पाये थे। महिला किसानों के पास मोटे अनाजों के उत्पादन को बढ़ाने हेतु आवश्यक तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग, ऋण हेतु जुड़ाव, उत्पादन एवं प्रसंस्करण सुविधाओं का अभाव था। व्यवसायिक मंडियों अथवा नियमित विपणन प्रणाली के बारे में कोई जानकारी न होने के कारण किसान उत्पादित मोटे अनाजों की बिक्री नहीं कर पाते थे। आर्थिक उन्नति के लक्ष्य को हासिल करने हेतु मोटे अनाज आधारित खेती प्रणाली को प्रोत्साहित करने हेतु ओडिशा मिलेट के सहयोग से एनपीएफपीसीएल ने इन सभी कमियों को सही तरीके से चिन्हित कर उन पर काम किया।

मोटे अनाज पुनरूद्धार हेतु समग्र रणनीतियां
रणनीति मुख्य रूप से बहुसक्षम तंत्रों के एकीकरण एवं सशक्तिकरण पर केन्द्रित थी। इसमें हर्षा ट्रस्ट के सहयोग से महिलाओं के नेतृत्व में उत्पादन, प्रसंस्करण, खपत एवं विपणन सम्बन्धी सभी पहलुओं और सेवाओं सम्बन्धित कार्य करने पर जोर दिया गया। मोटे अनाज मूल्य श्रृँखला को सफल बनाने के लिए तैयार की गयी बहुत सी मुख्य रणनीतियां निम्नवत् हैं –
* मोटे अनाज उत्पादन पर महिला किसानों के लिए जागरूकता निर्माण प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन: सबसे पहले महिला स्वयं सहायता समूहों एवं एफपीओ सदस्यों के साथ केन्द्रित समूह चर्चा एवं दृष्टि निर्माण अभ्यास के आयोजन के माध्यम से जागरूकता निर्माण किया गया। इसके साथ ही उन्हें विभिन्न स्थलों पर एक्सपोजर भ्रमण भी कराया गया। विशिष्ट अभ्यासों/ गतिविधियों के पैकेज पर केन्द्रित करते हुए उत्पादन तकनीकों को उन्नत बनाने, मोटे अनाज खेती प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के महत्व आदि विषयों पर विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं क्षमता निर्माण कार्यों को किया गया। मोटे अनाज खेती प्रणाली के माध्यम से आय में वृद्धि के तरीकों को प्रदर्शित किया गया। महिलाओं का नेतृत्व होने के कारण ज्ञान पूरे घर-घर में पहुँच गया। मोटे अनाज खेती प्रणालियों को प्रोत्साहित करने हेतु कुल 141 प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया जिनका विवरण निम्नवत् तालिका सं0 1 के माध्यम से दिया जा रहा है –

तालिका सं0 1: हर्षा ट्रस्ट द्वारा कराये ये क्षमता निर्माण कार्यक्रम

क्रमांक प्रशिक्षण विषय प्रशिक्षणों की संख्याप्रतिभागियों की संख्या
1उत्पादन वृद्धि27864
2अभ्यासांे/गतिविधियों का पैकेज21672
3बीज उत्पादन11352
4बीज भण्डारण7224
5मूल्य संवर्धन7448
6मोटे अनाज के पोषण सम्बन्धी लाभ9576
7प्रक्षेत्र प्रदर्शन381216
8मोटे अनाजों पर जागरूकता कार्यक्रम172040
9सामूहिक विपणन4120
कुल1416512

 

* उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का उत्पादन एवं उन तक पहुँच सुनिश्चित करना: इस गतिविधि को बोरीगुम्मा, बोण्डागुडा, अंचला और खातरगडा स्थित चार बीज केन्द्रों द्वारा किया गया और इससे लगभग 3200 किसानों की आवश्यकता पूर्ति की गयी।
* अभ्यासों के पैकेज में सुधार करना और अच्छी खेती अभ्यासों को प्रोत्साहित करना: अभ्यासों के प्राथमिक पैकेज में प्राकृतिक कीट प्रबन्धन अभ्यासों, मोटे अनाजों की सघन प्रणाली, पंक्ति बुवाई एवं पौधरोपण को शामिल किया गया (देखंे बाक्स 2)।

बाक्स 2-
मोटे अनाजों की सघन खेती प्रणाली: मोटे अनाजों की सघन खेती प्रणाली चावल की श्री विधि की एक प्रसारित विधि है, जिसमें कम बीज दर, बीज उपचार, छोटे एवं स्वस्थ पौधों का उचित दूरी पर रोपण जैसी उन्नत कृषि अभ्यास एवं उन्न निराई-गुड़ाई तथा पोषण प्रबन्धन अभ्यास शामिल हैं।
पँक्ति से रोपाई: पँक्ति से रोपाई से पौधे अच्छी तरह से खड़े रहते हैं और अधिकतम स्थान का यथेष्ट उपयोग होने से बेहतर उपज मिलती है।
बहु-फसली/अन्तःफसली: रागी और बाजरा की एक साथ खेती अभ्यास को अपनाने से फसल का जोखिम कम होता है और आय में वृद्धि होती है।

 

मोटे अनाजों की सघन बुवाई, पंक्ति से बुवाई, पंक्ति से पौधरोपण जैसे उन्नत तकनीकों को अपनाने वाले किसानों को ओडिशा मिलेट मिशन से प्रारम्भिक तीन वर्षों तक अतिरिक्त प्रोत्साहन मिला। किसानों ने पहले वर्ष मोटे अनाजों की सघन बुवाई हेतु रू0 5000.00 प्रति हेक्टेयर तक और पंक्ति से बुवाई/पंक्ति से पौधरोपण हेतु रू0 2500.00 प्रति हेक्टेयर तक की राशि प्राप्त की और आगे के दो वर्षों में रू0 3000.00 सघन बुवाई हेतु तथा रू0 1500.00 एवं रू0 1000.00 पंक्ति से बुवाई/पंक्ति से पौधरोपण हेतु प्राप्त किया। वर्तमान में इन्हें निम्नानुसार संशोधित किया गया है।
* ग्रामस्तरीय तकनीकी व्यक्तियों को तैयार करना: तकनीकी एवं प्रसार सेवाओं को घर तक उपलब्ध कराने हेतु समुदाय स्तर पर सन्दर्भ व्यक्तियों को तैयार किया गया।
* कस्टम हायरिंग केन्द्रों एवं प्राथमिक प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना: थ्रेशरों एवं ग्रेडरों के उपयोग को बढ़ावा देने हेतु ग्राम पंचायत स्तर पर कस्टम हायरिंग केन्द्रों एवं प्राथमिक प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना की गयी। चार कस्टम हायरिंग केन्द्रों, 10 पल्वराइजर्स एवं प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना की गयी, जिनका विवरण नीचे दिया जा रहा है-
* एनपीएफपीसीएल द्वारा सामूहिक विपणन एवं न्यूूनतम समर्थन मूल्य स्थापित करना: विशेष रूप से, उत्पादों को एकत्र करने, प्राथमिक प्रसंस्करण, परिवहन एवं विपणन हेतु सामूहिक प्रयास करने हेतु एफपीओ द्वारा किसानों को संगठित किया गया। उत्पादों के एकत्रित हो जाने से किसान अपने उत्पादों के दामों को तय करने तथा ढुलाई की लागत कम करने में सक्षम हुए। ओडिशा मिलेट मिशन द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य स्थापित किया गया।
* बिक्री केन्द्र: किसानों और बाजारों के बीच दूरी को कम करने हेतु बोरीगुम्मा, कठारगुडा, केरपा व नौगांव में मंडियां स्थापित की गयीं। पहले, मोटे अनाजों को बेचने हेतु किसानों के पास कोई दुकान या केन्द्र न होने के कारण वे बेहद कम दामों पर अपने उत्पादों को स्थानीय हाट- बाजारों में बेच देते थे। नयी मंडियों ने किसानों को अपने उत्पादों को यथोचित दामों पर बेचने हेतु एक मंच प्रदान किया।
* मंडिया हाट: विशेष रूप से मोटे अनाजों को एक निश्चित उचित मूल्य पर बेचने हेतु मंडिया हाट बनाया गया है। मोटे अनाजों के उपभोग को बढ़ावा देने हेतु यह ओडिशा मिलेट मिशन की एक पहल है। मंडिया से बने लोकप्रिय खाद्य पदार्थों की बिक्री हेतु लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में छोटी-छोटी दुकानें खोली गयी हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों स्थानों पर मोटे अनाजों को और अधिक लोकप्रिय बनानेे की दृष्टि से ओडिशा सरकार ने वर्ष 2021 में, 10 नवम्बर को मंडिया दिवस घोषित किया।
* कल्याणकारी योजनाओं में समोवशन: ओडिशा मिलेट मिशन द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मिड-डे मील योजनाओं एवं आँगनवाड़ी केन्द्रों में मोटे अनाजों का समावेश किया गया।

प्रभावी परिणाम:
ओडिशा मिलेट मिशन के माध्यम से, पिछले तीन वर्षों में बोरीगुम्मा एवं कुन्द्रा क्षेत्रों में मोटे अनाजों की खेती का क्षेत्रफल बढ़कर 1167 हेक्टेयर हो गया है। उन्नत उत्पादन अभ्यासों की वजह से बाजरा और छोटे मोटे अनाजों की उपज में पारम्परिक खेती की तुलना में तीन से चार गुना तक की वृद्धि हुई है। पहले किसान जहां पारम्परिक विधि से मोटे अनाजों की खेती कर एक एकड़ में मात्र 1-2 कुन्तल की उपज प्राप्त करते थे, वहीं अब वे मोटे अनाजों की सघन विधि से खेती कर 6-7 कुन्तल प्रति एकड़ तक उपज प्राप्त कर रहे हैं। ओडिशा मिलेेट मिशन एवं ओडिशा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराये गये 10 प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना से मड़ाई जैसी श्रमसाध्य गतिविधियों को आसान बना दिया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मिड-डे मील योजना में मोटे अनाजों का समावेशन और रागी के लड्डू जैसे मोटे अनाज से बने खाद्य पदार्थों को बोरीगुम्मा व कुन्द्रा के आँगनवाड़ी केन्द्रों पर वितरण जैसी योजना ने घरेलू उपभोग को बढ़ावा दिया जिससे महिलाओं एवं बच्चों के पोषण पर प्रत्यक्ष सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

बाक्स 3: मोटे अनाज की खेती करने वाली एक किसान जयन्ती गौडा की कहानी
कोरापुट जिले में बोरीगुम्मा ब्लॉक के ग्राम पंचायत खातरगडा के मंकदिताड़ा गाँव में रहने वाली जयन्ती गौड़ा एक आदिवासी महिला किसान हैं। प्रारम्भ के वर्षों में, वे मोटे अनाजों की खेती को गम्भीरता से नहीं लेती थीं। एनपीएफपीसीएल से एक सदस्य के रूप में जुड़ने के पश्चात्, उन्होंने अपने एक एकड़ जमीन पर मोटे अनाजों की सघन खेती और अन्य उत्पादन अभ्यासों को अपनाने के लाभों को समझा। वर्ष 2018-19 में भारी और अनियमित वर्षा के बावजूद, वे एनपीएफपीसीएल के सहयोग से मोटे अनाजों की खेती करना जारी रख सकीं। उन्होंने अपनी उम्मीद से ज्यादा उपज प्राप्त की और उनकी सफलता ने गाँव की अन्य महिलाओं को मोटे अनाजों की खेती हेतु प्रोत्साहित किया।

जयन्ती कहती हैं, ‘‘हम अपने 4.5 एकड़ खेत में से, हम़ निचली भूमि वाले 2.5 एकड़ खेत में धान की खेती करते थे। शेष 2 एकड़, जो अपेक्षाकृत ऊँची भूमि थी, अधिकाँशतः परती पड़ी रह जाती थी। उस पर हम कभी-कभी ही मोटे अनाजों को उगाते थे। एनपीएफपीसीएल से जुड़ने के पश्चात् और हर्षा ट्रस्ट से तकनीकी सहयोग प्राप्त कर, हमने अपने एक एकड़ खेत में रागी की खेती करना प्रारम्भ कर दिया। इससे मिलने वाली उपज को देखते हुए हमने बाद में, कुल 2 एकड़ खेत में रागी की खेती करने लगे और इस वर्ष हमें लगभग 6 कुन्तल की उपज और रू0 20,262.00 की आय हुई।’’

 

एनपीएफपीसीएल का मुख्य लक्ष्य ग्रामीण महिला उद्यमियों को बढ़ावा देने हेतु रागी के बिस्किट, मल्टी-ग्रेन कुकीज, रागी माल्ट एवं स्नैक्स जैसे मोटे अनाज से बने उत्पादों को तैयार करने हेतु भण्डारण गृह, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन इकाईयों को स्थापित करने की योजना बनाकर चरणबद्ध तरीके से मोटे अनाजों को मुख्य धारा में शामिल करने हेतु अपनी व्यापार विकास योजना को पुनः परिभाषित करना है।

साराँश:
कोरापुट जिले के बोरीगुम्मा एवं कुन्द्रा ब्लाकों की महिला किसानों की यात्रा हमें मोटे अनाजों को पुनर्जीवित करने हेतु स्थाई संस्थागत दृष्टिकोण के समग्र परिप्रेक्ष्य को बताती है।

इसके प्रसार का भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। नबरंगपुर जिले के झारीगाँव ब्लाक में भी किसान मोटे अनाजों की खेती करने लगे हैं। हर्षा ट्रस्ट के सहयोग से झारीगाँव का मंगलमणि एफपीओ ने 1456 महिला किसानों को सक्षम बनाया। परिणामस्वरूप दो वर्षों में मोटे अनाजों की खेती का क्षेत्र 16 हेक्टेयर से बढ़कर 685 हेक्टेयर हो गया। एफपीओ ग्रामीण आदिवासी परिवारों की पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही आर्थिक उन्नति में भी योगदान दे रहे हैं।

ओडिशा मिलेट मिशन द्वारा मोटे अनाज आधारित फसल प्रणालियों को पुनर्जीवित के समावेशी दृष्टिकोण ने मोटे अनाजों की खेती को व्यवसायिक रूप से उन्नत करने हेतु किसानों के अन्दर एक नये आत्मविश्वास का संचार किया है। मंडिया स्टॉल, मंडिया हाट एवं मंडिया दिवस जैसे पहलों के माध्यम से मोटे अनाजों का विस्तार व विकास गाँवों से शहरों की ओर हुआ है और फार्मर प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन के माध्यम से क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजारांे तक पहुँच बनाने हेतु बहुत सी महिला किसानों को अवसर उपलब्ध हो रहा है।

अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से लेकर ग्राम-स्तरीय बैठकों तक वर्ष की चर्चा का विषय, मोटे अनाज आज ओडिशा के दक्षिणी जिलों के सैकड़ों गाँवों मंे आजीविका सुुधार का कार्य कर रहा है। वर्ष 2023 को अन्तर्राष्ट्रीय मोटे अनाज वर्ष के रूप में घोषित करना किसान समुदायों के लिए स्थाई आजीविका बनाने में मोटे अनाजों के प्रभाव को प्रतिबिंबित करता है।


रंचिथा शिवराम एवं संगीता बेहरा
हर्षा ट्रस्ट
प्रथम तल, एन 1/36, आईआरसी विलेज
नयापल्ली, भुबनेश्वर,
ओडिशा – 751 015
ई-मेल: ranchithakumaran@gmail.com, Sangeetabehera12@gmail.com


Source: Millets Farming Systems, LEISA INDIA, Vol. 25, No.1, March. 2023

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