बॉयोचर उत्पादन उद्यम फसल अपशिष्टों का प्रबन्धन एवं मृदा सुधार

Updated on December 1, 2024

मृदा उर्वरता में सुधार लाने के लिए फसल अवशेषों को बॉयोचर में बदलना फसल अपशिष्टों के सुरक्षित निस्तारण का एक पर्यावरण-सम्मत तरीका है। इस लेख में यह बताने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार एक फार्मर प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन ने सभी के लाभ के लिए इस प्रक्रिया को एक व्यावसायिक उद्यम बना दिया है।


भारत में किसान सामान्य रूप से फसल अपशिष्टों को जला देते हैं। लेकिन फसल अपशिष्ट निस्तारण का यह पर्यावरण-सम्मत तरीका नहीं है। फसल अपशिष्टों को जलाने से वायुमण्डल में धुंआ फैलता है, जिससे वायु प्रदूषण होता है और वायुमण्डल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है। इसके साथ ही किसानों ने जैविक उर्वरकों का उपयोग कम करके रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करना भी प्रारम्भ कर दिया, जिससे मृदा में कार्बन की मात्रा घटती जा रही है। परिणामस्वरूप, मृदा की जल धारण क्षमता, नीचे तक पानी जाने के दर, जल निकास क्षमता, सूक्ष्म जीवों की संख्या और एंजाइमेटिक गतिविधि का ह्रास हो रहा है। महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में यह एक गम्भीर पर्यावरणीय समस्या है। उल्लेखनीय है कि यहाँ पर 405,000 हेक्टेयर परिक्षेत्र में कपास और 106,000 हेक्टेयर क्षेत्र में अरहर की खेती प्रतिवर्ष की जाती है।

बढ़ते वायु प्रदूषण के साथ ही घटती मृदा उर्वरता सम्बन्धी दोहरे मृद्दों को ध्यान में रखते हुए पुणे में ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम करने वाले स्वैच्छिक संगठन बाएफ डेवलपमेण्ट रिसर्च फाउण्डेशन ने मृदा सुधार के लिए बायोचर उत्पादन एवं उसके उपयोग को एक उत्पादन उद्यम के तौर पर शुरूआत की। उद्यम ने फसल अपशिष्टों को कच्चे माल के तौर पर उपयोग किया और अन्तिम उत्पाद के तौर पर अपने मृदा की उर्वरता में सुधार करने तथा उपज बढ़ाने हेतु किसान बॉयोचर का उपयोग कर सकते हैं। बॉयोचर के उपयोग के अलावा, बाएफ मृदा-जाँच के आधार पर उर्वरकों के उपयोग, जैविक कीटनाशकों के प्रयोग, उन्नत कृषि अभ्यासों, मृदा और जल संरक्षण अभ्यासों एवं स्थाई मृदा स्वास्थ्य प्रबन्धन हेतु वर्मीकम्पोस्ट के उपयोग को भी बढ़ावा देता है।

यद्यपि बॉयोचर उत्पादन तकनीक पर ज्ञान का अभाव, भट्ठा एवं अन्य उत्पादन उपकरणों की खरीद में किसानों की असमर्थता तथा श्रम आवश्यकता के प्रबन्धन में कठिनाई सम्बन्धी बहुत सी ऐसी चुनौतियां थीं, जिनके कारण कोई एक किसान व्यक्तिगत तौर पर बॉयोचर उत्पादन उद्यम को नहीं अपना सकता था।

इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए, बाएफ ने जीआईज़ेड के सहयोग से वर्ष 2019 में महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में तुलजा किसान उत्पादक कम्पनी के नाम एक फार्मर प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन (एफपीओ) का गठन किया। शुरूआत में इस एफपीओ में 220 सदस्य थे और प्रत्येक सदस्य का अंशदान रू0 1,000.00 था। चूँकि यवतमाल एवं अमरावती जिले में सबसे अधिक कपास की खेती होती है, इसलिए यहाँ पर फसल कटाई के बाद किसानों द्वारा फसल अपशिष्टों को जलाना एक सामान्य लेकिन खतरनाक अभ्यास है। एफपीओ ने इसे एक संभावना के तौर पर देखा और अपशिष्टों को जलाने से होने वाले खतरों के बारे में खेतिहर समुदायों को संवेदित करने हेतु बहुत सी बैठकें कीं। इसी तरह, मृदा उत्पादकता में सुधार करने हेतु बॉयोचर का उपयोग भी एक विषय था। ये कार्यक्रम किसानों के प्रदर्शन प्रक्षेत्रों पर एवं किसान विद्यालयों के दौरान आयोजित किये गये।

बॉयोचर कार्बन का एक समृद्ध स्रोत होता है, जिसके उपयोग से मृदा में कार्बन की मात्रा बढ़ती है तथा मृदा की जल एवं पोषण धारण क्षमता में वृद्धि होती है। बॉयोचर के उपयोग से मृदा में सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ती है, मिट्टी की एंजाइमेटिक गतिविधियांे में वृद्धि होती है और मृदा उर्वरता में सुधार होता है। बॉयोचर का उपयोग फसल की रोग व सूखा प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाती है।  

एफपीओ ने जनवरी 2021 से कपास फसलों के अपशिष्टों को खरीदना प्रारम्भ कर दिया। इसने एक पूर्वनिर्धारित मूल्य रू0 2.50-रू0 3.00 प्रति किग्रा0 की दर से अपशिष्टों की खरीद शुरू की, जिससे किसान एफपीओ को अपने अपशिष्टों को बेचने हेतु आकर्षित हुए। अन्यथा, वे फसल अपशिष्टों को खुले में जला देते थे। भट्ठों का उपयोग कर पायरोलिसिस प्रक्रिया के माध्यम से एकत्र किये गये अपशिष्टों को बॉयोचर के रूप में प्रसंस्कृत किया गया। 200 किग्रा0 की क्षमता वाले भट्ठों का उपयोग पायरोलिसिस प्रक्रिया के लिए किया गया, जिसकी लागत लगभग रू0 60,000.00 थी। इसके बाद, बॉयोचर को बारीक पाउडर के रूप में परिवर्तित कर बोरी में पैक किया जाता है। तैयार बॉयोचर को एफपीओ के सदस्य किसानों को रियायती दर (बाजार दर से रू0 2-3.00 प्रतिकिग्रा कम दर) पर बेचा जाता है। वर्ष 2021-2022 में, एफपीओ ने सफलतापूर्वक 100 टन फसल अपशिष्टों को 25 टन बॉयोचर में परिवर्तित किया।

परिणाम
एफपीओ द्वारा संचालित की जा रही बॉयोचर बनाने की इकाई ने नये अवसरों का निर्माण किया और विभिन्न हितभागियों के बीच आर्थिक प्रवाह को बढ़ाया। जैसे- किसान अपनी कपास की फसलों के अपशिष्टों को बेच सकते थे, कपास अपशिष्टों के संग्रहण और बॉयोचर उत्पादन के लिए श्रम की आवश्यकता थी, अपशिष्टों को प्रसंस्करण केन्द्र तक ले जाने के लिए ट्रांसपोर्टर की आवश्यकता थी और अन्त में, अपनी फसलों में उपयोग करने हेतु किसानों ने बॉयोचर की खरीद के माध्यम से अपनी सहभागिता निभाई।

किसानों ने भूमि सफाई के कार्यों पर पैसा खर्च करने के बजाय, फसल अपशिष्टों को बेचकर आय अर्जन प्रारम्भ कर दिया। उद्यम ने कुशल और अकुशल दोनों प्रकार के श्रमिकों के लिए रोजगार के नये अवसर पैदा किये। यहाँ दो प्रकार के अकुशल श्रमिकों की आवश्यकता थी। पहला, तो किसानों के खेत से फसल अपशिष्टों को एकत्र करने और ढुलाई हेतु तथा दूसरा, एफपीओ पर कच्चा माल पहुँच जाने के बाद माल उतारने-चढ़ाने के साथ-साथ उत्पादन में भी सहयोग करने हेतु। कुशल अथवा अर्धकुशल श्रमिकों को बॉयोचर उत्पादन के कार्यों में शामिल किया गया, जहाँ वे सावधानीपूर्वक अपशिष्टों को तोड़ने, पीसने एवं पैकेजिंग के कार्यों को करते थे। अपने स्थानीय सदस्यों को पैकेज्ड बॉयोचर बेचकर एफपीओ को भी कुछ आमदनी हो जाती है।

फसल उपजो ंमें सुधार करने के लिए किसानों ने बॉयोचर का उपयोग करना प्रारम्भ किया और धीरे-धीरे बॉयोचर की माँग बढ़ती गयी।

धीरे-धीरे, एफपीओ ने इन कार्यों का विस्तार किया। नवम्बर 2022 से, प्रोस्वायल परियोजना के अन्तर्गत बॉयोचर उत्पादन के अतिरिक्त एफपीओ ने एक दाल प्रसंस्करण इकाई की स्थापना की। इन सभी कार्यों ने क्षेत्र में आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ करने में अपना योगदान दिया। इसे हम चित्र सं0 1 के माध्यम से देख सकते हैं। इस प्रकार, किसान, सामूहिक रूप से कार्य करते हुए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरीके से लाभान्वित हो रहे हैं।

किसानों ने स्वयं बॉयोचर का उपयोग करना शुरू कर दिया। बॉयोचर उपयोग के लम्बे समय में अनुभव किये जाने वाले कुछ लाभों में, वर्षों के साथ इसके उपयोग की लागत घटती गयी और इसे लागत के बजाय एक निवेश माना जाने लगा है। किसान अपने खेत में उर्वरकों का उपयोग कम कर बॉयोचर के उपयोग की लागत की भरपाई करते हैं। बॉयोचर, विभिन्न चरणों में, फसल का सर्वोत्तम विकास करने हेतु पोषण देने व प्रबन्धन का कार्य करते हैं। यद्यपि अधिक जोत भूमि वाले किसानों को बॉयोचर उपयोग करना काफी महँगा लगा, लेकिन फिर भी यदि उन्हें सहयोग प्रदान किया जाये तो वे उपयोग करने के लिए तैयार हैं।

किसानों ने बताया कि सोयाबीन, कपास, तूर एवं अन्य इसी तरह की फसलों में 2.5 टन प्रति हेक्टेयर बॉयोचर का उपयोग किया जाता है। बॉयोचर का उपयोग भूमि की तैयारी के समय किया जाता है। विभिन्न ऋतुओं में किसानों के खेतों पर किये गये शोध परीक्षणों के दौरान फसल से प्राप्त उपजों का विवरण निम्नवत् है –

* रबी 2020 – गेंहूं में 12.59 प्रतिशत (12 प्रक्षेत्र), चना में 13.44 प्रतिशत (8 प्रक्षेत्र)
* खरीफ 2021 – कपास में 12.16 प्रतिशत (20 प्रक्षेत्र), सोयाबीन में 7.04 प्रतिशत (6 प्रक्षेत्र)
* रबी 2021 – गेंहूं में 13.68 प्रतिशत (12 प्रक्षेत्र), चना में 13.07 प्रतिशत (8 प्रक्षेत्र)

किसानों ने अपने खेत में पैदावार में सुधार का भी संकेत दिया है। आस-पास के अन्य गाँवों के किसान इन प्रक्षेत्रों का भ्रमण कर प्रदर्शन प्रक्षेत्र के रूप में कर रहे हैं और एक ही खेत में नियन्त्रित व प्रदर्शन प्रक्षेत्र से का तुलनात्मक अध्ययन कर प्राप्त परिणामों से प्रोत्साहित हो रहे हैं।

आगे बढ़ना
किसानों को बॉयोचर के उपयोग से होने वाले लाभों का अनुभव कराने हेतु उन्हें कुछ समय तक सहयोग करने की आवश्यकता है। एफपीओ से जुड़े संगठनों की तरफ से माँग को बढ़ाकर एफपीओ द्वारा उत्पादित बॉयोचर के विपणन में सहयोग करने की जरूरत है। इसके साथ ही उत्पादन की लागत को कम करने हेतु बॉयोचर उत्पादन तंत्र में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक बदलाव में भी मदद करने की आवश्यकता है। कई प्रसंस्करण इकाईयों को जोड़ने के साथ ही एफपीओ द्वारा दी जाने वाली सेवाओं में विस्तार करने हेतु अतिरिक्त वित्तीय सहयोग दिये जाने की भी आवश्यकता है।

 


गनेश आर बेदारे
सहायक विषयगत कार्यक्रम अधिकारी
बाएफ डेवलपमेण्ट रिसर्च फाउण्डेशन
बाएफ भवन, डॉ0 मणिभाई देसाई नगर
वारजे, पुणे – 411 058
ई-मेल: ganeshb@baif.org.in


Source: Farmer Producer Organisation, Vol.25, No.4, December 2023

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