जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप अनियमित और अप्रत्याशित वर्षा के साथ ही उपलब्ध जल संसाधनों पर दबाव भी बढ़ रहा है। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए सहगल फाउंडेशन ने जल संरक्षण तकनीकों व स्थाई कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दिया। परिणामतः कृषि उत्पादकता बढ़ी है और बढ़ती आबादी के लिए भोजन तक पहुंच बेहतर हुई है।
देश के कुल बोये गये क्षेत्रफल का लगभग 51 प्रतिशत कृषि और लगभग कुल खाद्य उत्पादन का 40 प्रतिशत हिस्सा वर्षा आधारित है। ग्रामीण भारत में पानी की कमी का सीधा संबंध गरीबी, भुखमरी और बीमारियों से जुड़ा है। पानी की कमी से फसल हानि होती है, उपज में कमी आती, गुणवत्ता का स्तर निम्न होता है और परती भूमि में वृद्वि होती है। कृषि उत्पादन में सबसे महत्वपूर्ण लागत के रूप में जल की अक्सर अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में कमी होती है। जलवायु परिवर्तन, साफ पानी का प्रदूषण और आर्द्रभूमियों के क्षेत्रफल में लगातार कमी से पानी की समस्या और बढ़ रही है। 2001 में आयी भारत सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार भूमि की गुणवत्ता को कम करने में पानी और हवा के कारण होने वाले भूमि क्षरण का योगदान 71 प्रतिशत से अधिक है। जल का समुचित उपयोग न होने से जल जमाव और उसके कारण भूमि में लवणता की मात्रा बढ़ने से पर्यावरण क्षरण को बढ़ावा मिलता है। इसके लिए बेहतर सिंचाई दक्षता की आवश्यकता है। 85 प्रतिशत से अधिक मौजूदा प्राकृतिक आर्द्रभूमि क्षेत्र पहले से ही नष्ट हो गये हैं और भूमि की सतह का 75 प्रतिशत हिस्सा महत्वपूर्ण रूप से बदल गया है, जिससे स्थायी जल आपूर्ति का सहयोग करने हेतु भूमि के पारिस्थितिक तंत्र की क्षमता कम हो गई है। पिछले चालीस वर्षों में जल का उपयोग प्रति वर्ष एक प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।
1940 के बाद से, कृषि में सिंचाई के लिए सार्वजनिक निवेश भारत में (30 प्रतिशत), मैक्सिको (80 प्रतिशत), और चीन, पाकिस्तान व इंडोनेशिया (50 प्रतिशत) में अधिक ही रहा है। भारी निवेश और अनुदान के बावजूद, उपज में वृद्धि, सिंचित क्षेत्र तथा जल के उपयोग में तकनीकी दक्षता के सन्दर्भ में सिंचाई प्रदर्शन संकेतक उम्मीदों से नीचे गिर रहे हैं। संयुक्त राष्ट््र खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा वर्ष 1990 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार सिंचाई के लिए पानी का रास्ता बदलने अथवा पंप के उपयोग से लगभग 60 प्रतिशत पानी बर्बाद हो जाता है। पानी की कमी वन्यजीवों के लिए भी एक संकट है। मीठे पानी का एक बड़ा भाग (70 प्रतिशत) कृषि कार्याें में उपयोग किया जाता है। नदियाँ सूख रही हैं और जल स्तर तेजी से गिर रहा है। विश्व की 40 प्रतिशत फसल सिंचित भूमि पर पैदा होती है, इसलिए निकट भविष्य में पानी की कमी निश्चित रूप से भोजन की कमी बन जाएगी।
वर्तमान में, 240 करोड़ लोग नौकरी, आय और भोजन के लिए सिंचित कृषि पर निर्भर हैं। अगले 30 वर्षों में, दुनिया का पेट भरने के लिए अनुमानित 80 प्रतिशत अतिरिक्त खाद्य आपूर्ति के लिए सिंचाई पर निर्भर रहना पड़ेगा (आईआईएमआई 1992)। वहीं, भविष्य में आज की तुलना में सिंचित कृषि के उपयोग में कम पानी के प्रयोग से काफी अधिक उत्पादन होने की उम्मीद है। कम पानी से एक स्थाई तरीके से अधिक उत्पादन प्राप्त करने की इस दुविधा के निराकरण हेतु मांग-प्रबन्धन तंत्र की आवश्यकता है। अर्थात, वर्तमान आपूर्तियों को पुनः आवंटित करना, अधिक दक्ष उपयोग को प्रोत्साहित करना और अधिक न्यायसंगत पहुंच को बढ़ावा देना आवश्यक है।
समस्या स्पष्ट है और समाधान कठिन है। हमें चावल, गन्ना और अन्य अधिक पानी चाहने वाली फसलें कम उगाने और सिंचाई प्रणालियों में अधिक कुशल होने की आवश्यकता है। हमें पारंपरिक एवं कम पानी वाली फसलों की ओर लौटने की जरूरत है। भारतीय कृषि स्थिति रिपोर्ट 2011-2012 के अनुसार, सिंचाई दक्षता में 5 प्रतिशत की वृद्धि होने से भी सिंचाई क्षमता 100-150 लाख हेक्टेयर तक बढ़ सकती है। दीर्घकालिक जल प्रबंधन और संरक्षण काफी हद तक स्थानीय समुदाय की क्षमता पर निर्भर करता है कि वह व्यवहार परिवर्तन के माध्यम से अपने जल संसाधनों को स्थायी रूप से बनाए रखें। हमें ग्रामीण समुदाय में जल प्रयोग के बुद्विमतापूर्ण दृष्टिकोण और व्यवहार को बढ़ावा देना चाहिए।
एसएमएसएफ हस्तक्षेप
सहगल फाउंडेशन पानी की कमी वाले क्षेत्रों में ग्रामीण समुदायों के साथ मिलकर स्थानीय जल आपूर्ति को स्थाई एवं सुरक्षित रखने, ग्रामीण स्वच्छता में सुधार करने में मदद करने और स्कूलों, घरों और गांवों में अपशिष्ट जल के प्रबंधन हेतु काम करता है। सहगल फाउंडेशन टीम प्रमुख कार्यक्रम क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर समुदाय के नेतृत्व वाली विकास पहल को बढ़ावा देती है। जल प्रबंधन कार्यक्रम, समुदाय में जल की मात्रा एवं गुणवत्ता में सुधार और इसके वितरण प्रणालियों पर केंद्रित है। कृषि विकास कार्यक्रम महिला किसानों को सशक्त बनाकर, जल संरक्षण प्रयासों को बढ़ाकर और फसल उत्पादकता में सुधार करके स्थाई कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देता है। स्थानीय भागीदारी और स्थिरता कार्यक्रम अपने स्वयं के विकास में समुदाय की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए व्यक्तिगत नागरिकों और ग्राम-स्तरीय संस्थानों की जागरूकता और कौशल का निर्माण करता है। सभी कार्यक्रम उन महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण का समर्थन करते हैं जो लंबे समय से वंचित हैं। सामुदायिक नेताओं और नागरिकों को कई ग्रामीण क्षेत्रों की खराब स्थितियों और सेवाओं के अपर्याप्त वितरण से निपटने के लिए ज्ञान, कौशल और आत्मविश्वास प्रदान किया जाता है।
तालिका 1ः सहगल फाउंडेशन के जल प्रबंधन हस्तक्षेप
क्रम सं0 जल संचयन और संरक्षण संरचनाएं/हस्तक्षेप संख्या
1. चेक बांध 86
2. नाला बांध 74
3. तालाबों/टैंकों का विकास एवं पुनर्जीवन 120
4. पुनर्भरण कुएँ 421
5. सोख्ता गड्ढे 2,210
6. सोख्ता कुएँ 217
7. ड्रिप और सिं्प्रकलर (एकड़ में) 1,525
8. लेजर लेवलिंग (एकड़ में) 4,983
9. शून्य जुताई (एकड़ में) 6,374
10. फार्म मेड़बंदी (एकड़ में) 514
11. फार्म मेड़बंदी (मीटर) 55,959
12. सामुदायिक जल टंकियां 38
13. स्कूलों में छत जल संचयन 183
14. डब्लूयूजी/टीयूजी का गठन 41
15. डब्लूयूजी/टीयूजी के साथ जागरूकता सत्र 187
16. क्षमता निर्माण एवं जागरूकता समुदायों के साथ सत्र 3646
वर्ष 1999 से लेकर अब तक सहगल फाउंडेशन ने भारत के बारह राज्यों के 1959 गांवों में कृषि और जल संबंधी गतिविधियां की हैं, जिनमें हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और महाराष्ट्र शामिल हैं।
जल प्रबंधन पहल
सूखा, सूखे कुओं और भूमि जलस्तर निम्न होने से बढ़ते जल संकट के कारण सिंचाई में कमी आ रही है नतीजतन फसल की पैदावार कम हो रही है। जल की कमी और इससे संबंधित स्वास्थ्य चिंताओं के न्यूनीकरण के लिए सहगल फाउंडेशन टीम पेयजल के साथ-साथ घरेलू एवं कृषि उद्देश्यों के लिए सुरक्षित एवं स्थाई स्थानीय जलापूर्ति हेतु प्रारूपित किये गये तकनीकों को लागू करती है। टीम जल संचयन और संरक्षण संरचनाओं, जैसे चेक डैम, नए तालाबों आदि के निर्माण, मौजूदा तालाबों को गहरा करना, टैंकों से गाद निकालना और उनका पुनरूद्धार करना, पुनर्भरण कुओं का निर्माण करना, भूमि को समतल करना, सिं्प्रकलर/ड्रिप सिंचाई का उपयोग करना आदि के लिए ग्रामीण समुदायों के साथ काम करती है।
स्थाई जल प्रबन्धन में प्रभावी होने हेतु हमारे दृष्टिकोण के लिए, हमें परम्परागत समुदायों की उनकी स्वयं की दक्षता, मूल्यांे एवं समग्र दृष्टिकोण से प्रेरणा लेने के लिए जनजातीय लोगों को हितभागी एवं अधिकारधारकों के रूप में अवश्य शामिल करना चाहिए।
चूँकि भारत में आधे से अधिक कृषि वर्षा आधारित है, इसलिए खाद्य उत्पादकता में वृद्धि के लिए कृषिगत मांग को पूरा करने हेतु उपलब्ध पानी का प्रबंधन अच्छी तरह से किया जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप अनियमित और अप्रत्याशित मानसून के कारण उपलब्ध जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। इसे संज्ञान में लाने के लिए, सहगल फाउंडेशन किसानों के साथ काम करता है, सिं्प्रकलर और ड्रिप सिंचाई के उपयोग को बढ़ावा देता है एवं व्यक्तियों और समुदायों को वर्षा जल संचयन के लिए कम लागत वाले जल भंडारण टैंक बनाने में मदद करता है। जल संरक्षण तकनीकों और स्थाई कृषि उत्पादन के प्रदर्शन के परिणामस्वरूप किसानों की कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई है और बढ़ती आबादी के लिए भोजन तक बेहतर पहुंच बन पाई है।
एस एम सहगल फाउंडेशन ने सीएसआर समर्थित साझेदारी परियोजना के तहत कर्नाटक के कोलार जिले में इस टैंक को पुनर्जीवित करने की पहल की। पिछले चालीस वर्षों से, गाँव के तालाब में भारी गाद जमा हो जाने की वजह से जल भंडारण क्षमता कम होने के कारण अधिक पानी जमा नहीं हो रहा था। केरे हब्बा (झील उत्सव), पारंपरिक टैंकों का एक वार्षिक उत्सव जिसे कई गांवों में लंबे समय से भुला दिया गया था, जिसमें कोलार के मालूर तालुक का एक गांव केम्पेसंड्रा भी शामिल था (बॉक्स-1)। गठित टैंक उपयोगकर्ता समूह (टीयूजी) के मार्गदर्शन में टैंक से गाद निकालने और टैंक का कायाकल्प करने का कार्य किया गया। कोका-कोला फाउण्डेशन के वित्तीय सहयोग से इस परियोजना का क्रियान्वयन एस एम सहगल फाउंडेशन द्वारा किया गया।
जलवायु परिवर्तन के उभरते संकट से निपटने के लिए भारत के जल प्रबंधन में बदलाव की आवश्यकता है
भारतीय कृषि जलवायु परिवर्तन के जोखिमों विशेषकर सूखा से अत्यधिक ग्रस्त है; क्योंकि भारत में दो तिहाई कृषि भूमि वर्षा पर निर्भर है, और यहाँ तक कि सिंचित प्रणाली भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। देश के कई हिस्सों में बाढ़ भी एक बड़ी समस्या है, खासकर पूर्वी हिस्सों में, जहां अक्सर बाढ़ की घटनाएं होती रहती हैं। इसके अलावा, उत्तर-पश्चिम में पाला, मध्य और उत्तरी भागों में गर्म लहरें और पूर्वी तट पर चक्रवात भी तबाही मचाते हैं। वायुमंडलीय तापमान में वृद्धि के कारण इन जलवायुविक चरम स्थितियों की आवृत्ति बढ़ रही है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन में काफी नुकसान होने का खतरा बढ़ गया है।
जलवायु परिवर्तन के उभरते संकट से निपटने के लिए हमें भारत के जल प्रबंधन में क्या बदलाव करने की आवश्यकता हैः
1. सिंचाई प्रणालियों की दक्षता में सुधार करें।
2. जहां सतही जल संसाधन अनुपस्थित हैं और भूजल निकासी वार्षिक पुनर्भरण दर से अधिक है, जैसा कि पिछले पांच साल के औसत में हुआ था। वहां पर चावल, गन्ना, मक्का और अन्य पानी की खपत वाली फसलों की खेती को प्रतिबंधित करें।,
3. पानी की अधिक खपत वाली फसलों की सिंचाई के लिए भूजल के उपयोग पर प्रतिबंध लगाएं (अन्यथा हम चावल, चीनी आदि के रूप में अपना पानी निर्यात करेंगे)।
4. विशेष रूप से वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में पारंपरिक कृषि पद्धतियों और मुख्य फसलों को बढ़ावा दें।
5. जहां भी संभव हो सभी फसलों के लिए ड्रिप/सिं्प्रकलर प्रणाली जैसी सूक्ष्म सिंचाई को अनिवार्य बनाएं।
6. मुफ्त बिजली पर अनुदान वापस लें।
7. ऐसे उपकरणों और प्रथाओं के उपयोग को प्रोत्साहित करें जो पानी के उचित प्रयोग पर आधारित हो।
8. ऐसी पारंपरिक फसलें जो कम पानी के प्रयोग से अच्छा उत्पादन देती है, के लिए उचित मूल्य निर्धारण और खरीद सहायता प्रदान करें।
बॉक्स 1ः कोलार के केम्पेसंड्रा गांव में चालीस वर्षों के बाद ग्रामीणों ने झील उत्सव केरे हब्बा को पुनर्जीवित किया। केरे हब्बा (झील उत्सव), आमतौर पर कर्नाटक में पारंपरिक टैंकों का एक वार्षिक उत्सव है। उत्सव मनाने वाले झीलों के महत्व पर जश्न मनाते हैं। हालाँकि, कई गाँवों में उत्सव को लंबे समय से भुला दिया गया है, जिसमें केम्पेसेंड्रा गाँव भी शामिल है।कर्नाटक के कोलार के मालूर तालुक में पिछले चालीस वर्षों से भारी गाद और जल भंडारण क्षमता कम होने के कारण गांव के तालाब में ज्यादा पानी जमा नहीं हो रहा था।
हालाँकि, यह वर्ष नई आशा लेकर आया क्योंकि टैंकों को फिर से जीवन में लाया गया। केम्पेसंड्रा गांव में टैंक से गाद हटाने और पुनरुद्धार करने का कार्य किया गयापरिणामस्वरूप टैंक की जल भंडारण क्षमता में वृद्धि हुई और कई बार पानी भरा गया। दो सप्ताह से अधिक समय तक, स्थानीय लोगों ने टैंकों को पानी से लबालब देखा। टैंकों ने गाँव के भूजल को रिचार्ज करने के साथ-साथ सतही जल की उपलब्धता बढ़ाने में भी मदद की।
केम्पेसंड्रा गांव में भरपूर पानी देखकर लोग सदियों पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित करने और केजी हल्ली पंचायत में केरे हब्बा मनाने के लिए प्रेरित हुए। कोका-कोला फाउंडेशन के वित्तीय सहयोग से सहगल फाउंडेशन द्वारा क्रियान्वित परियोजना को सुविधाजनक बनाने के लिए गठित टैंक उपयोगकर्ता समूह (टीयूजी) के मार्गदर्शन में टैंक से गाद निकालने और पुनर्जीवन का काम किया गया।
केरे हब्बा एक सामुदायिक त्योहार है और गांव में पानी की पर्याप्तता का प्रतीक है, जो गांव के एकता को बताता है। पूरा गाँव प्रार्थना (पूजा), नृत्य और भोजन के लिए एकत्रित होता है। गांव की महिला-पुरुषों ने ही नहीं, बल्कि उन बुजुर्गाें ने भी स्थानीय बैंड पर नृत्य किया जो नब्बे साल के या उससे उपर के हैं। केरे हब्बा के दिनभर चले इस समारोह में एक ऐसा भी ग्रामीण शामिल था जो अपने सिर पर चावल के आटे से बना एक बड़ा दीपक लेकर पूरे गांव में चलतारहा। ग्रामीण महिलाओं ने दीपक का सम्मान किया, जिसे एक विशाल सभा के रूप में तालाब में लाया गया। गाँव में किसी भी घर में खाना नहीं बना है क्योंकि सामुदायिक रसोई में सभी के लिए दोपहर के भोजन की व्यवस्था की गयी, जो आम तौर पर वेजपुलाव होता है।
दीपक को आम तौर पर स्थानीय रूप से निर्मित एक सजावटी बेड़ा के अंदर रखा जाता है और टैंक के पानी में छोड़ दिया जाता है, जिसके बाद ग्रामीणों द्वारा सामूहिक पूजा की जाती है। शाम को कुछ बकरियों/भेड़ों को पकाया जाता है, और पूरा गाँव स्थानीय व्यंजनों जैसे रागी मुड्डा, सांभर, चावल आदि का आनंद लेते हैं।
केम्पेसंड्रा में, इस अवसर पर 200 से अधिक लोग टैंक पर एकत्र हुए, जिनमें ग्रामीण, कुछ स्थानीय नेता और आसपास के गांवों के रिश्तेदार शामिल थे। टैंक से गाद निकालने के नतीजे देखकर लोग रोमांचित और चकित थे। ग्रामीणों ने केम्पेसेंड्रा केरे टैंक से गाद निकालने और उसे पुनर्जीवित करने के अद्भुत काम के लिए सहगल फाउंडेशन और कोका-कोला फाउंडेशन को दिल से धन्यवाद दिया, क्योंकि क्षेत्र में टैंक विकास के लिए यह एक मॉडल टैंक साबित हुआ है।
सन्दर्भ
ऽ कृषि विभाग, कोआपरेशन एण्ड फार्मर्स वेलफेयर की वार्षिक रिपोर्ट – 2020-2021, कृषि एवं किसान मंत्रालय, भारत सरकार, कृषि भवन, नई दिल्ली,
सलाहुुद्दीन सैफी
प्रमुख नेतृत्व, जल प्रबन्धन
एस एम सहगल फाउण्डेशन
सर्वे नं0 361 एवं 362, गांव – रावलकोले
मण्डल – मेडचल, जिला – मेडचल मल्काजगिरी
हैदराबाद, तेलंगाना – 501 401, भारत
ई-मेल: s.saiphy@smsfoundation.org
Source: Water Management, Vol.25, No.2, June 2023



