महिलाओं के नेतृत्व में खेती हिमाचल प्रदेश की मध्य पहाड़ियों से सफलता की कहानियां

Updated on September 1, 2024

कृषि पारिस्थितिकी के सिद्धान्तों का अभ्यास महिला किसान बड़ी ही सहजता से करती हैं। उनका ध्यान न केवल स्थाई अभ्यासों को अपनाकर मृदा और फसलों पर है, वरन् वे अपने परिवार की सेहत का भी ध्यान रखती हैं। यहां हम हिमाचल प्रदेश से दो घटनाएं प्रस्तुत कर रहे हैं, जो यह प्रमाणित करती हैं कि ज्ञान और तकनीक पर पहुंच के साथ, महिलाओं ने अपनी आजीविका में विविधता का विकल्प चुना, जो उनके खेत को और अधिक स्थाई बनाती हैं।


भारत में, महिलाएं कृषि में सर्वाधिक भूमिका निभाती हैं। यद्यपि, निर्णय लेने की शक्ति हमेशा पुरूषों या बुजुर्ग महिलाओं के हाथ में रहा। परम्परागत रूप से उनकी भूमिकाएं जेण्डर और तकनीकी रूप से हमेशा पक्षपातपूर्ण रही हैं। परम्परागत रूप से क्षेत्र विशिष्ट तकनीकों के उपयोग की आवश्यकता वाली गतिविधियां जैसे- ट््रैक्टर या बैल से जुताई पुरूषों द्वारा ही किया जाता है जबकि अधिक श्रम चाहने वाली गतिविधियां जैसे- बीजों की बुवाई व रोपाई, निराई-गुड़ाई, फसल की कटाई आदि आम तौर पर महिलाओं द्वारा की जाती हैं।

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी भू-भाग में, बिखरी और सीमान्त भूमि होने के कारण पुरूष किसानों के पास आजीविका के बहुत सीमित अवसर होते हैं। ऐसी स्थिति में वे आय के अन्य स्रोतों की तलाश में मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन कर जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि महिलाओं के उपर खेती की सारी जिम्मेदारी आ जाती है। बढ़ी हुई स्वायत्तता के साथ, यह पाया गया कि महिलाएं फसल की बुवाई व देख-रेख के अलावा परिवार के लिए अधिक वांछनीय निर्णय लेने में सक्षम हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में हमारे परियोजना क्षेत्र से निकलकर आयी निम्नलिखित कहानियां इसको सिद्ध करती हैं-

अट्टी जी की कहानी
कांगड़ा जिले के सकरी पंचायत के सुकर्णा गांव में रहने वाली अट्टी जी एक 40 वर्षीय महिला किसान हैं। वह अनुसूचित जाति से सम्बन्धित हैं। उनके पति दैनिक मजदूरी करते हैं। उनके पास 27 कनाल ;8 कनाल एक एकड़ के बराबर होता है।द्ध कृषिगत भूमि है, जिसमें से 25 कनाल भूमि पर खेती करती हैं। इस 25 कनाल में से 18 कनाल भूमि इनके घर के पास स्थित है, जबकि 7 कनाल भूमि दूर है।

वर्ष 2017 तक, उनके घर के पास स्थित 18 कनाल जमीन कंटीली झाड़ियां उगी, पेड़ एवं लताओं से ढंकी हुई थी। वह कहती हैं, ‘‘आदमी आर से पास नहीं दिखता था, यहां पूरा जंगल था।’’ ;यह इतना घना था कि एक तरफ खड़े आदमी को दूसरी तरफ से नहीं देखा जा सकता था।द्ध इसे साफ करने के लिए, इन्होंने स्थानीय चरवाहा, गड्डी समुदाय के लोगों को बुलाया कि वे इस भूमि पर अपने जानवरों को चरायें। जानवरों ने एक सिरे से जमीन को साफ करना प्रारम्भ कर दिया। फिर इन्होंने हाथ के औजारों की सहायता से झाड़ियों एवं लताओं को काटना प्रारम्भ किया। अधिक बड़े पेड़ों एवं कंटीली झाड़ियों को काटने के लिए इन्होंने बगल की ही भूमि पर बिजली का पोल लगा रहे बिजली विभाग के कर्मचारियों की मदद ली। मौसम-दर-मौसम, इन्होंने जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को साफ करके उस पर विभिन्न प्रकार की फसलों को उगाना प्रारम्भ किया, जबकि पहले ये अन्य गांव वालों तथा बाजार पर निर्भर करती थीं।

चूंकि यह जमीन बहुत वर्षों से वृक्षों से घिरी थी, सफाई के बाद भूमि काफी उपजाउ थी। उनके परिवार द्वारा पीढ़ियों से खेती की जा रही अन्य खेतों की अपेक्षा इससे दुगुनी उपज प्राप्त हुई। अधिक उपज मिलने से इन्होंने परिवार के उपभोग से बचे उपज को स्थानीय बाजार में बेचकर अतिरिक्त आय भी प्राप्त की। अगले ऋतु में, इन्होंने उस भूमि पर सोयाबीन की खेती और उसके बाद उस पर गृहवाटिका लगाने लगीं, जिसे स्थानीय भाषा में ‘‘सुआदू’’ कहते हैं। यह नयी जमीन अत्यधिक उपजाउ होने के कारण आरती जी को कभी भी इस पर रसायनों का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। अनाज एवं एक गृहवाटिकका के अलावा, इन्होंने इस पर फलदार वृक्षों जैसे- आम, जामुन, बड़ा नीबू, आमला, शहतूत एवं अमरूद के पौधों को भी लगाया। अट्टी जी के पास 4 गाये हैं, जिनमें से एक देशी गाय और 3 हाइब्रिड प्रजाति की गायें हैं। इन गायों से प्राप्त दूध का मूल्य संवर्धन करते हुए यह घर पर दही, घी और चीज़ तैयार करती हैं, इसलिए सामान्यतः इनके पास बाजार में बेचने के लिए दूध नहीं बचता है।

वर्ष 2022 में, आत्मा परियोजना से जुड़ाव होने के बाद, अट्टी जी पारम्परिक खेती से जैविक खेती को ओर अग्रसर हुईं। इस परियोजना के माध्यम से उनका परिचय एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन रूरल टेक्नालॉजी डेवलपमेण्ट सेण्टर ;आरटीडीसीद्ध से हुआ और अट्टी जी सम-सामयिक खेती तकनीकों जानने व सीखने हेतु इस संस्था द्वारा आयोजित की जाने वाली प्रक्षेत्र प्रदर्शन दिवसों, खेत पर प्रशिक्षणों एवं एक्सपोजर भ्रमणों में शामिल हुईं। पिछले खरीफ सीजन में, इन्होंने सब्ज़ियों जैसे- मटर, प्याज, लहसुन, मूली, आलू, चुकन्दर, देशी मटर, खेसारी, सलाद पत्ता, बाकला एवं हल्दी एवं अनाज जैसे- जौ, बाजरा, गेंहूं, धान एवं तिलहन जैसे- सरसो एवं अलसी की खेती की।

सब्ज़ियों एवं अनाजों के अलावा, इन्होंने औषधीय पौधों जैसे कैमोमाइल एवं जटामासी के पौधों को लगाया। सूखे कैमोमाइल के फूलों का उपयोग चाय के लिए किया जा सकता है। इसका औषधीय मूल्य भी है। दो वर्ष पुराने जटामासी की परिपक्व जड़ों का उपयोग आयुर्वेदिक दवाएं बनाने में किया जाता है। इसके अलावा, इन्होंने नवम्बर 2022 में मधुमक्खी पालन प्रारम्भ किया। मधुमक्खी पालन से इन्हें न सिर्फ अपनी आय बढ़ाने में मदद मिली, वरन् फसलों के परागण में भी सहायता हुई, जिससे उपज पर प्रभाव पड़ा।

ब्राम्ही जी की कहानी
ब्राम्ही जी अपने पति और एक बेटे के साथ कांगड़ा जिले के कुदैल पंचायत में अवस्थित राजोदू गांव के सुदूर कोने में रहती हैं। 22 वर्ष की उम्र में ही विस्तृत परिवार से अलगाव होने केे बाद, ब्राम्ही जी और उनके परिवार ने अपना पुश्तैनी घर छोड़ दिया और नये सिरे से सब कुछ प्रारम्भ किया। उस समय इनके पति निकट स्थित एक फैक्टरी में मजूदर के तौर पर काम करते थे और रू0 250.00 प्रति माह कमाते थे। बेहतर अवसरों की तलाश करते हुए उनके पति सउदी अरबिया एक मैकेनिक के तौर पर काम करने चले गये लेकिन अगले 3 वर्षों में उनकी सारी बचत समाप्त हो गयी। ब्राम्ही जी अपने 5 सदस्यीय परिवार के लिए एकमात्र कमाने वाली रह गयी थीं।

ब्राम्ही जी ने सबसे पहले बाजार पर अपनी निर्भरता कम करके अपने खर्चों को कम किया। उन्होंने अपने घर के पास स्थित 4 कनाल जमीन पर खेती करना प्रारम्भ किया। इस पर इन्होंने आलू और मूली लगाकर गृहवाटिका प्रारम्भ की, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘‘सुआदू’’ नाम से जानते हैं। समय बीतने के साथ, पालक, शलजम, हल्दी, फूलगोभी, खीरा एवं अन्य मौसमी सब्ज़ियों को शामिल करते हुए उन्होंने अपने गृहवाटिका में विविध प्रकार की सब्ज़ियां उगाना प्रारम्भ किया। इसके अलावा, वह अब कुछ दुर्लभ एवं जंगली सब्ज़ियों जैसे- चिचिण्डा ‘‘पडोल’’ एवं सूरन ;स्थानीय नाम- तरदीद्ध उगा रही हैं, जिससे अन्य सब्ज़ियों की अपेक्षा उन्हें बेहतर उपज मिल रही है। उनका दावा है कि बाजार से लाई गयी सब्ज़ियों की अपेक्षा उनके स्वयं के द्वारा उगाई गयी सब्ज़ियों का स्वाद अधिक बेहतर है। प्रारम्भ में, जब वह अपनी गृहवाटिका तैयार कर रही थीं, बहुत सी सब्ज़ियां उनके अपने उपयोग से अधिक होने पर उसे आस-पास के परिवारों और दोस्तों को बांट देती थीं। लेकिन अपने एक मित्र के सुझाव पर उन्होंने सभी मूली को एकत्र कर उन्हें अच्छी तरह से धो कर घर-घर मंे बेचना प्रारम्भ किया। यह पहली बार था, जब उन्होंने सब्ज़ियों को बेचा और लाभ प्राप्त किया। इस छोटी सफलता ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे गृहवाटिका से निकलने वाली अधिक सब्ज़ियों को नियमित रूप से गांव वालों को बेचें।

बाद में उन्होंने अपने खेत में आम, बेर, बड़ा नीबू, संतरा, अमरूद, अनार जैसे विभिन्न प्रकार के वृक्षों को लगाया। हालांकि, शुरूआत में उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली। सबसे पहली चुनौती के रूप में ब्राम्ही जी को जंगली बन्दरों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। इन बन्दरों ने कई बार उनकी फसल को नष्ट कर दिया। इससे ब्राम्ही जी पर कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने बन्दरों द्वारा नुकसान पहुंचाये गये फलों और सब्ज़ियों को एकत्र कर कुछ को तुरन्त उपयोग किया और कुछ को बचाकर उससे घर में उपयोग के लिए चटनी और अचार बनाना शुरू कर दिया। पिछले तीन वर्षों से, उनके खेत में आने वाले बन्दरों की संख्या में बहुत कमी आयी है।

वर्ष 1999 में, उन्हें आंगनवाड़ी में सहायिका की नौकरी मिली। नई नौकरी होने के बावजूद उन्होंने अपने खेत में काम करना प्रारम्भ किया और नयी तकनीकें और पद्धतियां सीखती रहीं। वर्ष 2003 में, क्षेत्रीय कृषि ब्लाक अधिकारी द्वारा उन्हें वर्मी कम्पोस्टिंग में प्रशिक्षण प्राप्त करने हेतु चुना गया। कार्यशाला के पश्चात्, मृदा उर्वरता बढ़ाने हेतु उन्होंने अपने खेत पर गाय के गोबर और मूत्र का उपयोग करना प्रारम्भ कर दिया। वर्ष 2019 में, रूरल टेक्नालॉजी डेवलपमेण्ट सेण्टर ;आरटीडीसीद्ध दल ने उन्हें खेती की अन्य तकनीकों से परिचित कराया और श्री सुभाष पालेकर जी की प्राकृतिक खेती पद्धति के बारे में सिखाया। उन्होंने अपने पास उपलब्ध सभी संसाधनों से प्राकृतिक खेती सिद्धान्तों का अभ्यास करना प्रारम्भ कर दिया। गाय का गोबर और गौमूत्र के स्थान पर उन्होंने भैंस के गोबर का उपयोग किया और उससे भी उन्हें अच्छा परिणाम मिला। महामारी के दौरान, उन्हें अपने उत्पादों को बेचने हेतु बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ी। गांव वाले उनके घर चलकर आते थे और बाजार से तीन गुना अधिक दाम देकर अच्छी गुणवत्ता वाली सब्ज़िया खरीदकर ले जाते थे। संसाधनों की कमी के कारण बढ़ती हुई मांग को देखते हुए, जो शलजम और मूली की पत्तियां पहले फेंक दी जाती थीं, वे भी बिक जाती थीं।

इस वर्ष उन्होंने बड़ी इलायची और बाजरा उगाना प्रारम्भ किया है। उनके पास दो भैंस एवं एक गाय हैं, जिनसे प्राप्त दूध से दही और घी तैयार कर वे मूल्य सवंर्धित उत्पादों के माध्यम से अपनी आय के स्रोतांे की विविधता बढ़ा रही हैं। मार्च के महीने में, उन्होंने आरटीडीसी दल के सहयोग से बैकयार्ड पोल्ट््री परियोजना से जुड़कर मुर्गी पालन शुरू किया है।

निष्कर्ष
अवसर मिलने पर महिला किसानों ने कृषि पारिस्थितिकी सिद्धानों का अभ्यास बड़ी ही सहजता से किया है। दोनों ही घटनाओं में, महिलाओं ने अपना स्वयं का भोजन उगाने के माध्यम से बाजार पर अपनी निर्भरता कम करने का विकल्प चुना है। इसके साथ ही स्थाई कृषि अभ्यासों को अपनाने के माध्यम से वे अपने परिवार, फसलों एवं मृदा के स्वास्थ्य पर भी केन्द्रित कर रही हैं। कृषि पारिस्थितिकी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, ये महिलाएं परम्परागत प्रणाली के साथ काम कर रही हैं, लेकिन साथ ही वे नयी तकनीक व ज्ञान अपनाने से भी परहेज नहीं कर रही हैं। जब उनकी पहुंच नये ज्ञान एवं तकनीकों तक हुई है, उन्होंने स्थानीय समुदायों को विभिन्न उत्पादों की श्रृंखला उपलब्ध कराते हुए अपनी आय के विकल्पों की विविधता को चुना है।

इन महिलाओं को उनकी सामाजिक स्थिति या वित्तीय कठिनाईयों के द्वारा प्रतिबन्धित नहीं किया गया है। अपने बच्चों को बेहतर व स्वस्थ जीवन प्रदान करने के लिए, उपलब्ध कराई गयी सभी जानकारियों एवं सहयोग पर अट्टी जी ने कड़ी मेहनत की और पूंजी लगाई। जबकि ब्राम्ही जी ने प्रचलित प्रथाओं से अलग हटकर, प्राकृतिक खेती में भी नये प्रयोग किये और नये परिणाम भी प्राप्त हुए। दोनों महिलाओं ने अपने स्वयं के प्रयासों एवं समझ के साथ कृषि पारिस्थितिकी के माध्यम से स्थाई विकास प्राप्त करते हुए असाधारण सफलता प्रदर्शित की है।

आभार
हम इस लेख को तैयार करने में आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध कराने हेतु रूरल टेक्नालॉजी डेवलपमेण्ट सेण्टर ;हिमाचल प्रदेशद्ध की सामुदायिक सन्दर्भ व्यक्ति सुश्री मीना देवी का कृतज्ञतापूर्वक आभार व्यक्त करते हैं।


छवि बाठला
क्षेत्रीय समन्वयक ;हिमाचल प्रदेशद्ध
वाटरशेड सपोर्ट सर्विसेज एवं एक्टीविटीज नेटवर्क,
ई-मेल: chhavi@wassan.org

साई निकम
कार्यक्रम अधिकारी ;हैदराबादद्ध
संगठन – वाटरशेड सपोर्ट सर्विसेज एवं एक्टीविटीज नेटवर्क,


Source: LEISA Inia, Vol.25, No.3, Sep 2023, Women in Agroecology

Recent Posts