जब एक तंत्र के तहत् महिला सशक्तिकरण किया जाता है, तो महिलाएं बदलावों की सक्रिय एजेन्ट बन सकती है, जो स्वयं और स्वयं के परिवारों की बेहतरी के लिए भाग्य को बदल सकती हैं। ओडिशा मोटे अनाज मिशन कृषि पारिस्थितिकी के एक मॉडल के रुप में एक सर्वोत्तम उदाहरण है, जो न केवल किसानों को जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन स्थापित करने में सहायक है, वरन् इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने हेतु महिलाओं को व्यवस्थित रुप से सशक्त भी बनाता है।
वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) में छोटी जोत के किसान जलवायु परिवर्तन के प्रति अन्य किसानों की तुलना में अधिक संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्य उत्पादन में अनुमानित कमी के साथ-साथ इन परिदृश्यों में व्याप्त कारक जैसे- पोषण संबंधी कमियां, प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण और असुरक्षित भूमि स्वामित्व, इस जन-सांख्यिकी क्षेत्र के जोखिम और नाजुकता को और बढ़ा देते हैं। विशेष रुप से महिलाएं, सामाजिक नाजुकता का सामना करने के अलावा, ऐसे परिदृश्यों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का बड़ा बोझ असमान रुप से उठाएंगी। बढ़ती हुई आपदा प्रवासन घटना, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए अधिक जोखिम पैदा करती हैं।
कृषि क्षेत्र में अन्तराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन संबंधी विचार-विमर्श, मुख्य रुप से पश्चिमी तकनीकी दृष्टिकोण से प्रभावित होता है और वैश्विक औद्योगिक खाद्य प्रणाली की आवश्यकता की ओर उन्मुख होता है। यह एक व्यवस्थित तरीके से वैश्विक दक्षिण के वर्षा आधारित क्षेत्रों में समुदाय विशेषकर महिलाओं की नाजुकता को बढ़ाता है। जलवायु परिवर्तन नीतियां और विधियां मुख्य रुप से शमन की ओर उन्मुख है न कि अनुकूलन उपायों की ओर।
लघु किसानों की आजीविका की अनिश्चित प्रकृति को देखते हुए अनुकूलन समय की मांग है। पारम्परिक रुप से, वर्षा आधारित कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के पारिस्थितिक व सामाजिक विकास के कारण लघु किसानों के पास मौसम की अनिश्चिताओं से निपटने हेतु ज्ञान, नेटवर्क व प्रबंधन गतिविधियों के संदर्भ में अनुकूलन क्षमताएं थीं। महिलाऐं पारम्परिक ज्ञान (जैसे- बीज की किस्में या कृषि पद्धतियाँ) की संरक्षक रही हैं, क्योंकि उन्हें घरों के लिए भोजन सुरक्षित करने की जिम्मेदारी दी गई है। लघु कृषकों द्वारा किए गए अनुकूलन उपायों में खेत पर विविधिकरण, जल प्रौद्योगिकी व प्रबन्धन को अपनाना, बोआई के लिए फसल की किस्मों व बीजों का चयन एवं जोखिम को कम करने की रणनीतियां शामिल थीं। इनमें से कई पारम्परिक सिद्धान्त अब कृषि पारिस्थितिकी के बढ़ते आन्दोलन में शामिल हो गए हैं।
कृषि पारिस्थितिकी के तत्व
कृषि पारिस्थितिकी या टिकाऊ खाद्य प्रणालियों के डिजाइन व प्रबन्धन हेतु सामाजिक और पारिस्थितिकी सिद्धांतों का अनुप्रयोग, अब हमारी वर्तमान अस्थाई खाद्य प्रणालियों को बदलने के लिए एक आशाजनक मार्ग के रुप में पहचाना जाता है। वर्ष 2019 से संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य संगठन ने अनुकूलन और लचीलेपन की दिशा में खाद्य प्रणालियों के परिवर्तन के लिए एक परिचालन ढांचे के रुप में ‘‘कृषि पारिस्थितिकी के 10 तत्वों को लोकप्रिय बनाया है। इन 10 तत्वों में से ‘‘पुनर्चक्रण, दक्षता, विविधता, लचीलापन और तालमेल’’ केन्द्रिय पारिस्थितिकी विशेषताएं हैं, जबकि अतिरिक्त पांच तत्व अर्थात् ‘‘ ज्ञान का सहनिर्माण, मानव और सामाजिक मूल्यों, संस्कृति और खाद्य परम्पराओं, जिम्मेदार शासन और सर्कुलर व एकजुटता अर्थ व्यवस्था’’ कृषि पारिस्थितिकी के सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं को आच्छादित करते हैं। एक यूरोपीय संघ ‘‘कृषि पारिस्थितिकी यूरोप’’ ने कृषि पारिस्थितिकी को बढ़ाने के लिए आवश्यक गतिविधियों का सुझाव देकर ‘‘विश्व खाद्य संगठन’’ ढाँचे में और वृद्धि की है। यद्यपि कृषि पारिस्थितिकी में लिंग (जेण्डर) समावेशन का स्पष्ट उल्लेख नही किया गया है लेकिन यह इसके सामाजिक और राजनीतिक सिद्धान्तों में निहित है जबकि क्षेत्र के साक्ष्य ने निर्णायक रुप से साबित कर दिया है कि कृषि पारिस्थितिकी ढाँचे का उपयोग करने वाली कृषि प्रणालियों ने लचीलापन व अनुकूलन क्षमताओं को बढ़ाया है। फिर भी कृषि पारिस्थितिकी को कैसे बढ़ाया जाए, इसके लिए जमीनी स्तर पर पर्याप्त उदाहरण नही है। ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ विश्व में एक अनूठा उदाहरण हो सकता है, जिसने अपने परिचालन ढाँचे में कृषि पारिस्थितिकी के सभी तत्वों को सफलतापूर्वक शामिल किया है। इसे पहचानते हुए ‘‘संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य संगठन’’ ओडिशा के मोटे अनाज मिशन के कृषि पारिस्थितिकी ढाँचे का अध्ययन कर रहा है ताकि विश्व के अन्य देशों में इसका दुहराव किया जा सके।
ओडिशा मोटे अनाज मिशन
‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’, ओडिशा सरकार की एक प्रमुख पहल है जिसे 2017 में पूरे राज्य में थाली से खेत तक के दृष्टिकोण के साथ मोटे अनाज को पुनःजीवित करने के लिए आरम्भ किया गया था। यह कृषि व कृषक सशक्तिकरण विभाग द्वारा एक अग्रणी पहल है जिसमें केन्द्र में पोषण संबंधी व्याधियों को दूूर करने हेतु खाद्य प्रणाली में मोटे अनाजों का उपभोग है। इसका उद्देश्य पोषणयुक्त मडुआ/रागी की घरेलू खपत को बढ़ाने के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली सहित राज्य पोषण कार्यक्रमों हेतु मड़ुआ को क्रय करना व वितरित करना है। वर्तमान में ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ का कार्यक्रम ओडिशा राज्य के सभी 30 जनपदों में चल रहा है। मार्च 2023 तक ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ के अन्तर्गत 2,64,000 हेक्टेयर भूमि आच्छादित हुयी है जिससे 2,02,784 मोटे अनाज की खेती करने वाले कृषक लाभान्वित हुए हैं । यह लेख कृषि संबंधी विशेषताओं व ग्रामीण महिलाओं की नाजुकता को कम करने में ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’’ के प्रभाव का दस्तावेजीकरण करता है।
| बाक्स सुन्दरगढ़ जिले की एक भूमिहीन मजदूर ज्योति ने अपने गांव में एक एकड़ बंजर जमीन पर खेती करना शुरू किया। ओडिशा मोटे अनाज मिशन से प्रशिक्षण प्राप्त करने के उपरान्त उसने बतायी गयी कृषि पद्धतियों का अनुसरण किया और जैविक निवेश तैयार कर उसका उपयोग भी किया। उनकी मेहनत रंग लाई, उपज में वृद्धि हुई। उसकी मेहनत रंग लाई। बढ़ी हुई आय के साथ उसने और अधिक बंजर भूमि पर खेती करना प्रारम्भ किया। मोटे अनाजों को मुख्य फसल के रूप में अपनाया और साथ ही अन्य फसलों की मिश्रित खेती भी की। उन्होंने अपनी कृषि आय में वृद्धि करने हेतु कृषि विविधीकरण को अपनाया। जिसके अन्तर्गत घर के पीछे मुर्गी पालन किया, साथ ही अधिक मात्रा में वर्मी कम्पोस्ट बनाकर क्षेत्र के अन्य किसानांे को बेचने का कार्य भी आरम्भ किया। अब यह प्रगतिशील किसान के रूप मंे कार्य करते हुए अन्य किसानों को व्यक्तिगत रूप से खाद्य उत्पादन में विविधता अपनाने हेतु प्रोत्साहित कर रही हैं। बेहतर पोषण और बढ़ी हुई आय के लाभों को भी अन्य किसानों को बताती हैं। |
कृषि पारिस्थितिकी को निर्धारित अभ्यासों के बजाय सिद्धान्तों द्वारा परिभाषित किया जाता है। किसी भी खाद्य या कृषि प्रणाली के कृषि पारिस्थितिकीय होने की सीमा का मूल्यांकन, इसमें शामिल कृषि पारिस्थितिकीय तत्वों और या स्तरों की संख्या निर्धारित करके किया जा सकता है। एग्रोइकोलाजी यूरोप द्वारा पहचाने गए पाँच पदानुक्रमित स्तर हमें कृषि पारिस्थितिकीय प्रणाली के पैमाने को निर्धारित करने की अनुमति देते हैं। (चित्र 1)
प्रत्येक स्तर पर महिलाओं को कैसे लाभ हुआ है?
इस परिप्रेक्ष्य में ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ की कुछ डिजाइन विशेषताओं का विश्लेषण नीचे दिया गया है जिसमें प्रत्येक स्तर पर महिलाओं को सशक्त बनाने की प्रक्रिया का उदाहरण सहित वर्णन किया गया है-
1. स्तर 5- कृषि पारिस्थितिकी सिद्धान्त: (भागीदारी, स्थानीयता, निष्पक्षता और न्याय)
टिट्टोनेल एट ऑल (2020) के मतानुसार यह माना जाता है कि खेतों से लेकर सम्पूर्ण क्षेत्र तक कृषि पारिस्थितिकी प्रणालियों को बढ़ाने हेतु प्रत्येक स्तर पर हितधारकों को एकीकृत करने की संख्या और जटिलता में वृद्धि की आवश्यकता होती है। इस सरकारी कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बहु हितधारकों के साथ स्वस्थ सार्वजनिक आहार को बढ़ावा देना सुनिश्चित करना है ताकि एक कृषि पारिस्थितिकी पहल के तौर पर ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ का डिजाइन, कृषि पारिस्थितिकी ढाँचे में उच्चतम स्तरों (चित्र 1) अर्थात् स्तर 4 और 5 को शामिल करता है।
‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ एक विकेन्द्रीकृत दृष्टिकोण के माध्यम से विभिन्न स्तरों पर हितधारकों की सहभागिता को एकीकृत करता है। हितधारकों में अनुसंधान और प्रशिक्षण उद्देश्यों के लिए राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थान सार्वजनिक निवेशों को चैनलाइज करने के लिए सरकारी विभाग, स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन और नागरिक समाज के संगठन/स्वयं सेवी संस्थाएं, सुगमकर्ता एजेन्सी के रुप में 143 विकास खण्डों में कार्यक्रम के क्रियान्वयन हेतु शामिल हैं। मार्च 2023 तक 116 कृषि उत्पादक संगठन (जिसमें सभी महिलाएं सदस्य थीं व इन संगठनों को महिलाएं ही संचालित करती थीं) और 1869 महिला स्वयं सहायता समूह ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ का हिस्सा हैं। उचित व निश्चित मूल्य, स्थानीय स्तर पर मोटे अनाजों की खरीद, लघु सीमान्त किसानों को शामिल करना और लैंगिक (जेण्डर) संवेदनशीलता, ये सभी ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ की पहचान हैं जिसके परिणामस्वरुप पूरे खाद्य प्रणाली का जलवायु अनुकूलित मोटे अनाजों के रूप में व्यापक बदलाव हुआ है। पूंजीगत व्यय के लिए सरकार से वित्तीय सहायता और प्रशिक्षणप प्राप्त कर महिला किसान इस मोटे अनाज मूल्य श्रृंखला में महिला किसान उद्यमी के तौर पर सामने आयी हैं और मोटे अनाज प्रसंस्करण उद्यमों का प्राथमिक व द्वितीयक स्तर पर संचालन कर रही हैं। अगस्त 2023 तक महिलाओं द्वारा संचालित 1382 मोटे अनाज प्रसंस्करण इकाईयाँ और खाद्य की 229 दुकानें थीं जिससे इन महिला उद्यमियों को एक स्थिर मासिक आय प्राप्त होती है जो उनके सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण में अहम योगदान देता है।
2. स्तर 4 – कृषि पारिस्थितिकी सिद्धान्त: वैकल्पिक खाद्य नेटवर्कों का विकास
बाजार से मांग पैदा करने के साथ-साथ अत्यधिक सफल व्यवहार परिवर्तन अभियानों के माध्यम से एक वैकल्पिक मोटे अनाज खाद्य प्रणाली को सफलतापूर्वक विकसित किया गया। इस सफलता को प्राप्त करने हेतु मोटे अनाजों की थोक खरीद और राज्य पोषण कार्यक्रमों में उन्हे शामिल करने जैसे नीतिगत बदलाव किये गये। निजी बाजारों की आवश्यकता की पूर्ति हेतु महिला स्वयं सहायता समूहों को उद्यमी बनने के लिए सहायता प्रदान की गई। महिला स्वयं सहायता समूह मोटे अनाज से बने स्ट्रीट फूड परोसते हैं साथ ही राज्य पोषण केन्द्रों के साथ-साथ निजी दुकानों को भी मोटे अनाजों से बने रेडी-टू-कूक या रेडी-टू-ईट व्यंजनों की आपूर्ति करते हैं।
महिला स्वयं सहायता समूह विभिन्न आकार के 4 अलग-अलग प्रकार के खाद्य दुकान संचालित करती हैं, जो आबादी के अलग-अलग वर्गों की आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। इन दुकानों के लिए प्रारम्भिक पूंजी सरकार द्वारा प्रदान की जाती है। जबकि महिला स्वयं सहायता समूह सभी परिचालन लागतों का ध्यान रखती हैं। सबसे छोटे खाद्य दुकान मोटे अनाज टिफिन केन्द्र का मासिक व्यवसाय रु0 30,000 प्रति इकाई है। जबकि ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ में सबसे बड़े खाद्य दुकान मोटे अनाज शक्ति कैफे का व्यवसाय रु0 2,00,000 प्रति इकाई है। ओडिशा मोटे अनाज मिशन के अन्तर्गत 2 जिलों में बच्चों के लिए आंगनवाड़ियों या राज्य पोषण केन्द्रों में मोटे अनाज को शामिल करने के लिए पायलट प्रोजेक्ट की शुरूआत की गयी है। क्यांेझार जिले में 27000 बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने वाली सभी आंगनवाड़ियां प्रत्येक बच्चे को मोटे अनाज के 8 लड्डू प्रति माह उपलब्ध कराती हैं। लड्डू बनाने के लिए मोटे अनाजों के आटे की आपूर्ति 59 महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से होती है। इस उद्यम के माध्यम से प्रत्येक माह में रु0 30,000.00 का लाभ अर्जित होता है। आंगनवाड़ियों को लड्डू बनाकर बिक्री करने वाले महिला स्वयं सहायता समूह औसतन रु0 16,500.00 का मासिक लाभ अर्जित करती हैं।
3. स्तर 3 – कृषि पारिस्थितिकी सिद्धान्त: कृषि पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्डिजाइन
पारिस्थितिकी तंत्र की जैव विविधता को पुनर्जीवित करना एक कृषि पारिस्थितिकी तत्व है और जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन बनाये रखने के लिए प्रमुख है। ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ ने सहभागी प्रजाति परीक्षण के माध्यम से किसानों को उनकी पसंदीदा भूमि पर शोध करने के लिए सहायता प्रणाली स्थापित की है। मोटे अनाजों को उत्पादन और उपभाग विकेन्द्रित था। लोगों को विभिन्न भूमियों के लिए उपयुक्त प्रजातियों के गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने हेतु प्रत्येक विकास खण्ड में समुदाय-प्रबन्धित बीज केन्द्रों की स्थापना की गयी। इन समुदाय-प्रबन्धित बीज केन्द्रों का प्रबन्धन पंजीकृत किसान उत्पादक संगठनों द्वारा किया जाता है जो व्यक्तिगत किसानों से बीजों की खरीद करते हैं। बाजार के लिए बीज शुद्धिकरण, बीज उपचार एवं गुणन के लिए मानक संचालन प्रोटोकाल स्थापित किये गये। जैव निवेशों के माध्यम से बीजों का उपचार, खरीद एवं बिक्री में महिला किसान एवं महिला स्वयं सहायता समूह शामिल हैं।
4. स्तर 2 – कृषि पारिस्थितिकी सिद्धान्त: कृषि पारिस्थितिक विकल्प
जागरूकता अभियान चलाने, प्रशिक्षण एवं प्रारम्भिक पूंजी उपलब्ध कराने के माध्यम से ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ ने किसानों को आवश्यक सहायता प्रणाली उपलब्ध कराई है ताकि किसान जैव निवेशांे के उपयोग की ओर उन्मुख हों। बाजार की बढ़ती मांग को देखते हुए मयूरभंज जिले में वर्ष 2020 में जशीपुर फार्मर प्रोड्यूसर्स कम्पनी लिमिटेड के सहयोग एवं तकनीकी निर्देशन में ‘‘मां हिन्गुला महिला स्वयं सहायता समूह’’ ने एक जैव-निवेश इकाई प्रारम्भ की। उस समय, विकास खण्ड के बाजारों में इन जैव निवेशों की लगभग 5000 लीटर की मांग थी और भविष्य में इस मांग के और बढ़ने की संभावना थी। जैव निवेशों की इस बढ़ती हुई मांग को देखते हुए, स्वयं सहायता समूह इसके उत्पादन को और अधिक विस्तार देने के लिए तैयार है। जशीपुर फार्मर प्रोड्यूसर्स कम्पनी लिमिटेड द्वारा विपणन की जिम्मेदारी लेने के पश्चात्, स्वयं सहायता समूह के सदस्य भविष्य में एक सुरक्षित व स्थाई आमदनी के प्रति आशान्वित हैं। वे इस बात से भी प्रसन्न हैं कि लोग उनके निवेशांे का उपयोग न सिर्फ मोटे अनाजों की खेती में कर रहे हैं वरन् धान और सब्ज़ियों की खेती में भी इनका बखूबी उपयोग कर रहे हैं।
5. स्तर 1 – कृषि पारिस्थितिकी सिद्धान्त: लागत उपयोग की दक्षता में वृद्धि
‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ ने उपज की उत्पादकता उन्नत करने और निवेशों की दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से किसानों को कृषि पारिस्थितिकी अभ्यासों में प्रशिक्षित किया। खेती की गतिविधियों के लिए आवश्यक उपकरणों जैसे साइकिल वीडरों को कस्टम हायरिंग केन्द्रों के माध्यम से किसानों को उपलब्ध कराया गया। किसानों ने देखा कि इन विभिन्न प्रकार की कृषि पारिस्थितिकी अभ्यासों से निवेश लागतों में कमी, अत्यधिक उत्पादकता, ग्रीन हाउस गैसों का न्यूनतम उत्सर्जन, पानी के उपयोग को कम करना एवं मृदा गुणवत्ता जैसे लाभ प्राप्त हो रहे हैं। अपने कार्यक्रमों में जेण्डर समावेशन के लिए विश्व खाद्य कार्यक्रम ने अपने एक स्वतन्त्र मूल्यांकन में ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ की प्रशंसा की। विशेषकर साइकिल वीडर जो अपनी डिजाइन के कारण जेण्डर की दृष्टि से उपयुक्त है।
निष्कर्ष: अनूूकुलन उपायों के रूप में बड़े पैमाने पर कृषि पारिस्थितिकी प्रणालियां
‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ बड़े पैमाने पर कृषि पारिस्थितिकी प्रणाली को बढ़ावा दे रहा है, जिससे हजारों किसान परिवारों को जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन विकसित करने में मदद मिल रही है। ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ के अनुकूलन उपायों में कृषि पारिस्थितिकी ढांचे के तकनीकी, पारिस्थितिक, सामाजिक और प्रशासनिक सिद्धान्त शामिल हैं। इन अनुकूलन उपायों से आजीविका के अवसरों में वृद्धि हुई है, आय बढ़ी है और लोगों का पोषण बेहतर हुआ है। वृद्धि और बेहत पोषण प्रदान करने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। इसके साथ ही ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ के परिणामस्वरूप महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के सन्दर्भ में सह-लाभ भी हुआ है।
यह महत्वपूर्ण है कि जलवायु परिवर्तन नीति एवं निवेश ढांचों में पारम्परिक देख-भालकर्ता के रूप में महिलाओं के ज्ञान व अनुभवों को शामिल किया गया है। ‘‘ओडिशा मोटे अनाज मिशन’’ द्वारा यह प्रदर्शित की कृषि पारिस्थितिकी प्रणालियां खाद्य व खेती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाती हैं, साथ ही उन्हें जलवायु परिवर्तन के विरूद्ध लचीलापन स्थापित करने में भी सक्षम बनाती हैं।
बिन्दु मोहन्ती
वरिष्ठ समन्वयक ;शोध एवं सहभागिताद्ध
आरआरए नेटवर्क हब
वाटरशेड सपोर्ट सर्विसेज एवं एक्टिविटीज नेटवर्क
प्लॉट नं0 685 व 686
रोड नं0 12 नरसिम्हास्वामी कालोनी, नागोल
हैदराबाद – 500068, तेलंगाना
ई-मेल: bindu@wassan.org
Source: Women in Agroecology, LEISA India, Vol. 23, No. 3, September 2023



