इन स्थानीय अन्वेषकों से मिलिए, जो तीन वर्ष की अल्प अवधि में प्राकृतिक खेती में नवाचारों को अपनाकर स्थानीय स्तर पर मास्टर ट्रेनर बन गए। इन्होंने न केवल अपने खेतों में मोटे अनाजों की खेती आरम्भ की, वरन् नये व्यंजनों को बनाकर विभिन्न प्रकार के मोटे अनाजों के उपभोग को भी बढ़ावा दिया।
हिमाचल प्रदेश की महिलाएं अपने छोटे-छोटे सीढ़ीदार खेत पर अपने क्षेत्र की पारिस्थितिकी के अनुकूल विभिन्न प्रकार की फसलें और फसल-संयोजन (मिश्रित फसल) उगाती हैं। सामान्यतः पारम्परिक/स्थानीय संयोजनों का पालन करते हुए वे अब नियमित फसलों में मोटे अनाजों की फसलें भी उगा रही हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक वे केवल रागी (मडुआ)/कोदो/कोदरा (फिंगर मिल्टेस, एल्युसिन कोरकाना) को ही जानती थीं जिसे स्थानीय स्तर पर मडंल भी कहा जाता है। अब उन्होंने रंगली/कानी/सौक (फाक्सटेल मिलेट, सेटालिका इटालिया)बार्नयार्ड मिलेट/सानवा (इचिनोक्लोआ एस्कुलेटा) और छोटे दाने के मोटे अनाज/कुटकी (पैनिकम सुमटिस) की खेती भी आरम्भ कर दी है।
ये महिलाएं अपने अपेक्षाकृत छोटे खेतों में कई वर्षों से कृषि संबंधित कार्य करती आ रही हैं। हाल के वर्षों में इन्होंने जान-बूझकर प्राकृतिक खेती करना प्रारम्भ कर दिया है। अब वे कुशल/प्रगतिशील कृषक हैं, जो अपने खेतों में जैव विविधता के बारे में पहले से ही अच्छी तरह से जागरुक हैं और उसकी देखभाल कर रही हैं, नित्य नए प्रयोग कर रही है, नए ज्ञान को बढ़ा रही हैं और मोटे अनाज सम्बन्धी कार्यक्रमों व नेटवर्क बैठकों के दौरान आत्म विश्वास के साथ इसे साझा भी कर रही हैं। इन सभी अनुभवों व ज्ञान, सूचना का बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार हिमआर.आर.ए. नेटवर्क, आर.आर.ए. नेटवर्क के हिमाचल अध्याय (ीजजचेण्ध्ध्ूूूण्तंपदमिकपदकपंण्वतह) के माध्यम से किया जाता है।
प्रेरणादायी नवोन्वेषक
जनपद मण्डी के चांवरी गांव की विमला देवी के पास केवल एक बीघा जमीन है अर्थात् एक एकड का पांचवां हिस्सा है, लेकिन वह उसमें बहुत सी फसलें उगाती हैं। वर्तमान में, यह अपनी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अपने खेत में खरीफ ऋतु में मक्का, सोयाबीन, बैंगन, गेंदा (फूल), भिण्डी, हरी मिर्च, अदरक, खीरा, करेला, अरवी, सूरजमुखी, नीम्बू घास (लेमन ग्रास), अश्वगंधा, हल्दी आदि उगा रही हैं। उपरोक्त के अलावा, पिछले चार वर्षों से ये रागी, कंगनी व सावां जैसे तीन मोटे अनाज की फसलें भी उगाई है। इन्होंने कहा कि, ‘‘अब मैं मोटे अनाज के बीजों को पंक्तियों में बोती हूँ क्योंकि इस प्रकार बोने से बीज की बचत होती है और निराई-गुड़ाई में भी आसानी होती है।’’ अब वह प्राकृतिक खेती पर मास्टर ट्रेनर के रुप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पशु सखियों व कृषि सखियों को मोटे अनाज की खेती और उनसे बने व्यंजनों पर प्रशिक्षण देने हेतु आमन्त्रित किया जाता है। वर्ष 2013 से वह पुराने बीजों का रख-रखाव कर रही हैं। उनके पास मुख्यतः धान और जौ की पाँच किस्में है। वह कहती हैं, ‘‘कृषि विभाग ने वितरण हेतु मुझसे 5 कु0 रागी और 20 किलो कंगनी का बीज क्रय किया है।’’
विमला देवी मोटे अनाजों से विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर स्वयं मोटे अनाजों के कई व्यंजन जैसे- रागी इडली, रागी डोसा, नंगा जौ की खीर, ज्वार के पापड़ बना रही हैं। साथ ही दूसरे लोगों को रागी व बाजरा की खिचड़ी, रागी का दलिया, रागी सूप, रागी के मीठे लड्डू, जौ के लड्डू आदि व्यंजन बनाने का प्रशिक्षण भी दे रही है। उन्होंने बातचीत में कहा कि, ‘‘मैं बाजरे की चाय बनाती हूँ और मेरे सभी प्रशिक्षण में इसकी बहुत मांग है। मैं अपने घर पर भी बच्चों के लिए बाजरे से बने व्यंजन बनाती है। इसके अतिरिक्त, मैने रागी से हलुआ, पापड़, बाजरे के लड्डू, ज्वार के पापकार्न भी बनाए हैं। अब की बार हमने मोटे अनाज के चाट (खट्टा व नमकीन नाश्ता) भी बनाया है।’’ फरवरी 2023 के शिवरात्री मेले में राज्य द्वारा संचालित आत्मा परियोजना के अन्तर्गत एक स्टॉल भी लगाया, जहां पर रागी की चपाती, साबूत जौ के लड्डू, ज्वार के लड्डू और कंगनी से तैयार व्यंजनों की बिक्री की गई।
मण्डी जनपद के कथियो गांव की कला देवी के पास 04 बीघा सीढ़ीनुमा कृषि भूमि है। मुख्य फसल के रूप में सेव की खेती के साथ वर्तमान में वह बीन्स (सेम), लाल चावल, मक्का, कुल्थी, अनार, ज्वार, सोयाबीन, एक स्थानीय दाल ‘‘भरथ’’ (लोबिया जैसी दिखती है) और एक लता वाली ‘‘झुमरु’’ जैसी फसले उगाती हैं। इन्होंने नाशपाती उगाने की भी योजना बनाई है। मोटे अनाजांे के लाभ के बारे में जागरुक होते हुए रागी, कंगनी, चीना, सेउंक, कुटकी (छोटा बाजरा) और रामदाना की खेती आरम्भ की है। कला देवी कहती हैं कि ‘‘पहले हम केवल मटर उगाते थे और नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए उसके साथ बीन्स (सेम) भी उगाते थे, लेकिन पिछले 3-4 वर्षों से हमने इनके साथ ही मोटे अनाजों की खेती करना भी प्रारम्भ कर दिया है।
वर्ष 2021 में आरआरए-नेटवर्क के बीज समूह से बीज उत्पादन तकनीक पर प्रशिक्षण प्राप्त कर इन्होंने स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में बेहतर तरीके से उगने वाले विशेष फसलों के बीजों व किस्मों की पहचान करने के उद्देश्य से अपने खेत मंे जैव विविधता ब्लाक स्थापित किया है। इन्होंने स्थानीय स्तर पर पहले से प्रचलित व्यंजनों में सुधार किया है। अब वह कंगनी अथवा रागी के आटे से विशेष प्रकार के नवीन व्यंजन तैयार करती हैं। कला देवी कहती हैं, ‘‘मैने रागी के आटे का उपयोग करके डोसा जैसा व्यंजन तैयार किया है जिसे हम स्थानीय भाषा में ‘‘चीला’’ कहते हैं। लस्सी और कोदो के आटे से हम एक और व्यंजन ‘‘खोबरू’’ तैयार करते हैं, जो एक गर्म पेय पदार्थ है।
| मोटे अनाजों के व्यंजनों के माध्यम से प्राकृतिक खेती की ओर बदलाव प्राकृतिक खेती को अपनाने के पीछे क्या कारण है, इसके बारे में उन्होंने बताया कि प्रतिदिन के आहार से बच्चों में आलस्यपन होता है लेकिन जब से हमने बच्चों को दलिया (पानी या दूध में पका पिसा हुआ अनाज) या खीर (दूध से बनी कंगनी या रागी से तैयार मीठा व्यंजन) खिलाते हैं तो बच्चा अधिक सक्रिय रहता है तथा सामान्यतः अच्छा व्यवहार भी करता है। हमने अपने परिवारों में यह परिवर्तन देखा तथा भोजन में रसायनों से होने वाले नुकसान पर भी ध्यान केन्द्रित किया। सितम्बर 2022 में एक बैठक के दौरान रीता देवी ने बताया कि उन्होंने नए व्यंजन बनाए, जो बच्चों को पसंद आए और उन्होंने बार-बार वहीं व्यंजन बनाने के लिए कहा। आरम्भ में अपनी बातों को कहने में संकोच करने वाली रीता देवी और वंदना, जो अब आर0टी0डी0 सी0 में सामुदायिक संदर्भ व्यक्ति हैं, वे बताती हैं कि, नए व्यंजन में मोटे अनाज बच्चों द्वारा अच्छी तरह स्वीकार किया जाता है। परिवार के वयस्क भी, जो मोटे अनाज नहीं खाते थे (शायद बचपन के दौरान छोड़कर) अब स्वयं को इसमें रुचि लेते हुए पाते हैं अर्थात् मोटे अनाज के व्यंजन अब अधिक पसंद करते हैं। |
चम्बा जनपद के पनेला गांव की रीना देवी ने रागी के अलावा किसी अन्य मोटे अनाज की खेती नहीं की थी। तीन साल पहले उन्होने कंगनी, कूटकी और लाल चावल की एक विशेष किस्म सुखारा धान (वर्षा आधारित परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त) की खेती करना आरम्भ किया। वह वर्तमान समय में कुल्थी, रामदाना, चौलाई और तिल की खेती भी करती हैं। अब वह विभिन्न फसलों के साथ-साथ मिश्रित खेती कर रही है। उन्होंने अपने प्रयासों से गठित स्वयं सहायता समूह में अन्य लोगों को घनजीवामृत उपलब्ध कराया। साथ ही दूसरों को मोटे अनाजों के खेती की तकनीक सिखाती हैं। रीना देवी ने कहा कि ‘‘मक्का हमारी मुख्य फसल रही है और इसे राजमा (नाइट्रोजन स्थिरीकरण वाली फसल) के साथ उगाया जाता है। अब हमने पंक्तिवत बोआई में रागी, कंगनी और कुटकी को भी शामिल कर लिया है।’’
इन्हांेने जुलाई 2023 में आयोजित चम्बा मिन्जर मेले में अपने स्टाल पर आने वाले लोगों के लिए बाजरे का गर्म पेय (बाजरे की चाय) प्रस्तुत किया। मेले के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि इस तरह का गर्म पेय पदार्थ अर्थात् चाय परोसी गई। धर्मशाला में आयोजित ‘‘मोटे अनाज खाद्य महोत्सव’’ में इन्होने पहली बार पारम्परिक रागी से बने व्यंजन को लोकप्रिय बनाया, जिसे स्थानीय भाषा में ‘‘पिंड़री’’ कहा जाता है।
कागड़ा जनपद के नगरोटा बगवा की वीना देवी वर्तमान में हल्दी, अदरक, भिण्डी, सोयाबीन, बैगन, हरी मिर्च, शिमला मिर्च, लौकी, करेला, खीरा, स्ट्रॉबेरी और काली मिर्च उगा रही हैं, जो मिश्रित व विविधता वाली खेती का प्रमाण है। उन्होंने बताया, ‘‘मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु हम मक्का के साथ कुल्थी की मिश्रित फसल की खेती करते हैं। इसके साथ ही पिछले तीन वर्षों से कोदरा व दो वर्षों से कंगनी उगा रहे हैं। मैने चीना की खेती भी आरम्भ कर दी है। हम कंगनी को मेड़ों पर उगाते हैं। हमने खेत के बाहरी मेड़ों पर सेव और आम के पौध भी रोपित किए हैं।’’ इनके पास 10 कनाल अर्थात् एक एकड़ कृषि भूमि है।
मोटे अनाजों के उपभोग के लिए उन्होंने रागी-ईडली, कंगनी पुलाव (कुछ सब्ज़ियों के साथ पकाई गई कंगनी), रागी बबरु (आटे को खमीर उठाकर बनाई गई चपाती जैसी) और रागी हलुआ (मीठा व्यंजन) के अलावा कंगनी की ‘‘खीर’’ और चौलाई की लस्सी भी अभिनव तरीके से तैयार की है। वह अपने स्वयं सहायता समूह में दैनिक उपभोग हेतु गेहूँ के आटे में ज्वार, काला गेहूँ और रागी मिलाने की संस्तुति करती हैं तथा मिट्टी के बर्तन में ही रागी चाय बनाती हैं।
निष्कर्ष/सारांश
हिमाचल प्रदेश की इन महिलाओं को कृषि जैव विविधता की अच्छी व व्यवहारिक समय विकसित है, जो कृषि पारिस्थितिकी में बदलाव के लिए आवश्यक है। नए व स्थानीय रुप से प्रांसगिक व्यंजनों के माध्यम से मोटे अनाजों की खपत बढ़ाने के लिए उनके दृष्टिकोण से परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ उनका स्वयं का सशक्तिकरण के रूप में दो-दो फायदे हैं। जलवायु लचीलापन बढ़ाने में मदद करने के लिए मोटे अनाज की फसलों को शामिल करना मूल आधार है। उन्होंने दिखाया है कि पारिस्थितिकी तंत्र का पोषण करते हुए अधिक और विविध खाद्य पदार्थों का उत्पादन कैसे किया जाए। ये सभी ऐसे उपयुक्त उदाहरण है जहां प्राकृतिक खेती और कृषि पारिस्थितिकी की ओर बदलाव उनके आत्म विश्वास का निर्माण कर रहा है तथा महिलाओं को मजबूती भी प्रदान कर रहा है। विभिन्न मीडिया (मुख्यतः व्हाट्सएप) के माध्यम से हिमआरआरए नेटवर्क, तकनीकी ज्ञान का निर्माण और साझा करना, कृषि पारिस्थितिकी तथा प्राकृतिक खेती के प्रचार-प्रसार को सशक्त एवं सक्षम बनाता है। यह एक अलग शोध का विषय है कि क्या इसमें लैंगिक समानता का भी मुद्दा है? लेकिन खेती पर उनका नियंत्रण और दिन-प्रतिदिन की खेती की गतिविधियों में उनके स्वतंत्र निर्णय जमीनी स्तर पर दिखाई देने वाले नए आयाम है।
आभार
हम हिमआरआरए नेटवर्क एव ंदल, रिवाइटलाइजिंग रेनफेड एग्रीकल्चर नेटवर्क, हैदराबाद एवं इसके राज्य एवं थीम समूह, छवि बाटला, भुवनेश, उत्तरदाता एवं उनके परिवार का आभार व्यक्त करते हैं।
डी0 के0 सदाना
पूर्व वैज्ञानिक, आईसीएआर-एनबीएजीआर
करनाल-132 001, हरियाणा
ई-मेल: sadana.dk@gmail.com
सुखदेव विश्वप्रेमी एवं अनूप कुमार
हिमआरआरए नेटवर्क, आरटीडीसी,
ग्राम व पोस्ट – कमलेहर – 176 061
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश
Source: Women in Agroecology, LEISA India, Vol. 23, No. 3, September 2023



