ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव कार्यक्रम के छात्रों के तौर पर हमारा यह अनुभव रहा है कि छोटे से प्रयास से उल्लेखनीय बदलाव लाये जा सकते हैं। इस कार्यक्रम के दौरान, मोटे अनाजों की खेती करने वाले किसानों से जुड़ाव स्थापित कर हमने बहुत कुछ सीखा।
हमारे बी.एससी. कृषि पाठ्यक्रम के एक भाग के तौर पर, सातवें सेमेस्टर के छात्रों को ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव ;त्।ॅम्द्ध कार्यक्रम के तहत् एक गांव में रहना होता है। इस कार्यक्रम में, छात्र कृषि के एक पूरे फसली मौसम के दौरान गाँव में ही एक किसान के साथ रहकर काम करते और सीखते हैं। माह जुलाई से नवंबर 2022 के दौरान कुल 22 छात्रों को मध्य प्रदेश के उमरिया के बरबसपुर नामक एक छोटे से गाँव में किसानों के साथ रहने, कार्य करने और सीखने हेतु भेजा गया।
उस गांव में लगभग 450 किसान हैं और उनकी आजीविका का प्राथमिक स्रोत कृषि है। बरबसपुर गांव छत्तीसगढ़ के उत्तरी पहाड़ी जोन के अनतर्गत स्थित है। यह क्षेत्र पहाड़ी और स्थलाकृति लहरदार है। यहां की मिट्टी लाल और पीली होने के साथ ही रेतीली भी है। धान, मक्का, अरहर यहां की प्रमुख ख़रीफ़ फ़सलें हैं, जबकि गेहूं, चना और मसूर रबी मौसम के दौरान उगाई जाती हैं। हालाँकि, गाँव के लगभग आधे किसान वर्षा की अनिश्चितता के कारण, ख़रीफ़ के दौरान अपनी ज़मीन परती छोड़ देते हैं। ऊंची भूमि और ढलान वाली भूमि होने के कारण यहां के किसानों को धान की रोपाई के लिए पानी जमा करना मुश्किल होता है। इसलिए किसान केवल रबी मौसम के दौरान ही खेती करना पसंद करते हैं।
इसी गांव के वर्षों से धान की खेती करने वाले एक किसान श्री प्यारेलाल के साथ मैने कार्य किया। पिछले दो वर्षों से, जबसे उन्हें यह लगने लगा कि मोटे अनाजों की फसलों के लिए अधिक सिंचाई एवं उर्वरकों की आवश्यकता बहुत कम होती है, उन्होंने अपने 2 एकड़ जमीन पर कोदो की खेती करना प्रारम्भ किया। पूरे गांव में मात्र 3 परिवार ही कोदो की खेती करते हैं, जिसमें से एक परिवार किसान प्यारेलाल का है। अधिकांश किसान, कोदो उगाने के प्रति आश्वस्त नहीं हैं, क्योंकि वे मोटे अनाज के खेती के बारे में आश्वस्त नहीं हैं। प्यारेलाल को भी यही डर था। प्यारेलाल ने कहा, ‘‘हम तकनीकी रूप से अपनी फसल और उपज की बिक्री का प्रबंधन करने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए हमने अपने खेत से मात्र स्वयं के खाने के लिए कोदो की खेती करने का निश्चय किया।’’
छोटा बदलाव, बड़ा लाभ
छात्रों और उत्सुक शिक्षार्थियों के रूप में, हमने एक अवसर और एक समाधान की भी परिकल्पना की और हमने महसूस किया कि कोदो मिलेट एक अच्छा विकल्प हो सकता है और विशेषकर उंची-नीची भूमि पर जहां अधिक पानी या स्थिर पानी की आवश्यकता नहीं होती, वहां पर ख़रीफ़ में धान की फसल के स्थान पर इसे लगाया जा सकता है। हमने प्यारेलाल और अन्य इच्छुक किसानों को निकटतम कृषि विज्ञान केन्द्र उमरिया से जोड़ने का निश्चय किया। कृषि विज्ञान केन्द्र के तकनीकी मार्गदर्शन से, हमने यह सुनिश्चित किया कि किसान अच्छी फसल प्रबंधन पद्धतियाँ अपनायें। उदाहरण के लिए, प्यारेलाल जंगली जानवरों द्वारा फसलों को रौंदने के कारण फसल क्षति की समस्या का सामना कर रहे थे। पहले, वह रात भर खेत की रखवाली करते थे जो काफी कष्टदायक होता था। कृषि विज्ञान केन्द्र के मार्गदर्शन से, उन्होंने पशु प्रतिरोधक द्रव्य नीलगो में रस्सी को भिगोकर खेतों के चारों तरफ बाड़ लगा दिया। इसके साथ ही कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा किसानों को जीवामृत तैयार करने का प्रशिक्षण भी दिया गया एवं मृदा जनित रोगों से बचाव हेतु अगले फसली मौसम में बुआई के दौरान मिट्टी में राइजोबियम और फास्फोरस घुलनशील बैक्टीरिया कल्चर को शामिल करने की सलाह भी कृषि विज्ञान केन्द्र के माध्यम से किसानों को दी गई। इन छोटे बदलावों के कारण पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष उपज में 30 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई और इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा।
हम यह भी सुनिश्चित करना चाहते थे कि किसानों को बिक्री के अधिक विकल्प दिखें ताकि वे मोटे अनाजों की खेती करने के प्रति प्रोत्साहित हो सकें। हमने क्षेत्र में काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन आशा फाउंडेशन के अधिकारियों के साथ किसानों की एक बैठक कराई। इस बैठक में संगठन ने किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने पर अपनी सहमति व्यक्त की। साथ ही यह भी कहा कि अगर किसानों को उनके उत्पादों का मूल्य उचित लगा तो संगठन नासिक में खरीददारों के साथ किसानों को जोड़ने का भी प्रयास करेगी। हमने देश के दक्षिणी राज्यों से मोटे अनाजांे की खरीद करने वाले जबलपुर के मोटे अनाज विक्रेताओं से भी बात की। आस-पास के जिलों के किसानों से गुणवत्तापूर्ण अनाज खरीदने हेतु ये खरीददार अत्यन्त उत्सुक एवं प्रसन्न हैं। उपलब्ध सभी विकल्पों की तुलना करने के बाद, प्यारेलाल ने अब अपनी उपज को बगल के जिले में मोटे अनाज प्रसंस्करण इकाई से जुड़े खरीददारों को बेचने का फैसला किया, क्योंकि उन्हें इस साल उनसे बेहतर कीमत मिली थी।
संयोग से उसी दौरान निकटवर्ती जिले डिंडोरी में सरकार द्वारा मिलेट प्रसंस्करण इकाइयाँ स्वीकृति की घोषणा हुई थी। डिंडौरी लगभग 100 किलोमीटर दूर है, जो अच्छे दामों पर टनों मोटे अनाजों को खरीद रहे हैं। चूंकि अंत में सब कुछ फसल से मिलने वाली कीमतों पर निर्भर करता है, पैसा सबसे बड़ा मुददा होगा। एक बातचीत के दौरान श्री प्यारेलाल ने कहा, ‘‘हम भाग्यशाली हैं कि पास में एक प्रोसेसिंग मिल खोली जा रही है। बिना किसी परेशानी के, चावल की तुलना में कोदो एक बेहतर विकल्प लगता है। साथ ही एक महिला किसान, झलकी बाई ने कहा, कि दी जा रही कीमतें और मिलिंग में आसानी होने से मुझे अगले सीजन में और भी बेहतर प्राप्ति की उम्मीद है। डिंडोरी में जल्द ही खुलने वाली मिलेट प्रसंस्करण इकाई मोटे अनाजों के क्षेत्र के और अधिक विस्तार के लिए उत्प्रेरक साबित होगी। किसानों के पास अपनी उपज को मिलिंग के लिए भेजने और बाद में इसे अपनी पसंद के खरीदारों को बेचने या यहां तक कि अन्य मूल्य वर्धित उत्पादों को बनाने का भी विकल्प होगा।
आपसी सीख
किसानों को पता चला कि उनकी परती भूमि का उपयोग मोटे अनाजों की खेती करने के लिए किया जा सकता है, जिसमें कम पानी की आवश्यकता होती है। उन्होंने यह भी समझा कि मोटे अनाजों की गुणवत्ता उत्कृष्ट है और संकट में भी बेचने की आवश्कता नहीं होगी। वे लोग अनाज के भंडारण और उसे सही समय पर बेचने के महत्व को समझ गये थें। साथ ही, छात्रों के साथ नियमित बातचीत से किसानों ने सीखा कि मोटे अनाजों की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, और प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना से बाजार में बेहतर अवसर पैदा होंगे। इस बढ़ी हुई जागरूकता के साथ, हम उम्मीद कर रहे हैं कि वर्ष 2023 में खरीफ मौसम के दौरान गांव में अधिक से अधिक किसान कोदो का उत्पादन करेंगे। मोटे अनाजों के अधिक उत्पादन के साथ, हम मोटे अनाज से समृद्ध आहार के साथ बेहतर स्वास्थ्य वाले परिवारों की परिकल्पना करते हैं। ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव कार्यक्रम छात्रों के लिए भी सीखने का एक बड़ा अवसर रहा है। हमने सीखा कि स्थानीय स्थलाकृति और बदलते वर्षा पैटर्न के आधार पर फसल का चुनाव कैसे किया जाए, जिससे उन्हें हमारे लाभ में बदला जा सके। छात्रों ने यह भी सीखा कि साधारण मूल्यवर्धन से किसानों की आर्थिक स्थिति में क्या बदलाव लाया जा सकता है।
सुरभि
विद्यार्थी,
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय,
जबलपुर, म.प्र. 482004 ई-मेलर : surabhishing3909@gmail.com
Source: Millets Farming Systems, LEISA India, Vol. 23, No.1, March 2023



