कर्नाटक में विकसित हो रहा जलवायु अनुकूलन

Updated on March 5, 2024

नर्सरी पद्धति से अरहर फसल की खेती की नयी पद्धति किसानों को जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न असामान्य मौसमी परिस्थितियों से निपटने में सहायता प्रदान कर रही है। इससे किसानों की निवेश लागत में कोई विशेष अन्तर तो नहीं पड़ता, लेकिन उपज दर अच्छी हो जाने के कारण लाभ का प्रतिशत बढ़ जाता है। वु्रती लाइवलीहुड सेण्टर के सहयोग से कर्नाटक में ‘‘अरहर दाल के कटोरे’’ के तौर पर प्रसिद्ध गुलबर्गा जिले के किसान इस तकनीक से लाभान्वित हो रहे हैं।


 

कर्नाटक के उत्तर में स्थित गुलबर्ग या कलिबुर्गा जिला ‘‘अरहर दाल के कटोरे’’ के तौर प्रसिद्ध होने के कारण पूरे राज्य में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। यद्यपि यहां पर प्रतिवर्ष 3,30,000 हेक्टेयर भूमि पर अरहर और चना की खेती होती है, लेकिन इस फसल से बहुत कम उपज प्राप्त होती है। इसका सबसे पहला कारण तो यह है कि यहां पर इसकी खेती पारम्परिक पद्धति से की जाती है जिससे इस फसल को फसल सूखा, अनियमित वर्षा और कीटों का आक्रमण झेलना पड़ता है। ऐसा इसलिए भी है कि किसानों को अपनी फसल की लागत के अनुपात में अरहर की दाल से मुनाफा नहीं मिलता है।

चना उगाने की पारम्परिक पद्धति में शामिल प्रक्रिया को ‘‘डिबलिंग’’ कहते हैं। इस प्रक्रिया में खेत की जुताई के समय ही एक सीधी रेखा में बीजों की बुवाई करते जाते हैं। दुर्भाग्य से, बुवाई के दौरान बीजों के बीच आपस की दूरी पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता, साथ ही रसायनिक उर्वरकों का अन्धाधुन्ध प्रयोग किया जाता है। इस कारण, बारिश में होने वाली थोड़ी सी भी देरी फसल के उपज को प्रभावित करती है, दूसरी तरफ कीटों का जोखिम भी बढ़ जाता है।

इन समस्याओं को संज्ञान मंे लेते हुए, फसल की उपज में उल्लेखनीय सुधार करने के उद्देश्य के साथ एक नयी तकनीक विकसित की गयी। इस नयी पद्धति के अन्तर्गत, सबसे पहले किसानों ने एक अलग नर्सरी स्थापित कर उसमें चना की नर्सरी तैयार की। तत्पश्चात् मानक के अनुसार पौध से पौध और लाइन से लाइन की दूरी को वैज्ञानिक ढंग से माप कर नर्सरी के पौधों की रोपाई की। उदाहरण के लिए, जब किसानों ने नर्सरी के पौधों की रोपाई की, उस समय उन्होंने लाइन से लाइन की दूरी 5 फीट और पौध से पौध की दूरी न्यूनतम 2 फीट की रखी। बीच के खाली स्थान पर उन्होंने मक्का या गेंदे की अन्तःखेती की।

कृषि विज्ञान केन्द्र और कृषि विभाग, कर्नाटक के सहयोग तथा लघु किसान कृषि-व्यापार कन्सोर्टियम के वित्तीय सहायता से व्रुती लाइवलीहुड रिसोर्स सेण्टर ने गुलबर्गा के किसानों के बीच चना रोपाई की इस नयी पद्धति का प्रदर्शन किया। इस नयी तकनीक से किसानों को काफी लाभ हुआ है और इससे उन्हें निवेश लागत घटाने, फसल उपज बढ़ाने और देर से होने वाली बारिश के कारण खेती में होने वाले नुकसान के संभावित जोखिम को कम करने में मदद मिली है।

आज हम यहां पर इस नयी तकनीक से लाभान्वित होने वाले गुलबर्गा के एक प्रगतिशील किसान श्री मल्लिकार्जुन पाटिल की चर्चा करेंगे। वु्रती के फील्ड स्टाफ ने गुलबर्गा जिले के आनन्द तालुक के किन्नीसुल्तान गांव के किसान श्री मल्लिकार्जुन पाटिल से मिलकर इस नर्सरी पद्धति के बारे में उन्हें बताया। प्रारम्भ में, उन्होंने अपने 10 एकड़ खेत में से एक एकड़ में इस तकनीक से चना की खेती की। इस पद्धति से खेती करने से होने वाली प्राप्ति और निवेश जैसे तत्वों पर बात करते हुए पाटिल कहते हैं, ‘‘पारम्परिक पद्धति में, एक सीज़न में प्रति एकड़ रू0 10,420.00 की लागत लगती थी और मुझे 4 कुन्तल प्रति एकड़ की उपज प्राप्त होती थी। रू0 4,000.00 प्रति कुन्तल की दर से चना बेचने पर मुझे रू0 16,000.00 मिलते थे। इसके अतिरिक्त, अन्तःखेती के तौर पर में मूंग उगा लेता था, जिससे मुझे रू0 3,000.00 की अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी। इस प्रकार देखा जाये तो प्रति एकड़ रू0 8,760.00 मेरी शुद्ध आय थी।’’ आगे वे कहते हैं, यद्यपि इस नयी पद्धति में नर्सरी तैयार करने का एक अतिरिक्त खर्च है, लेकिन इससे मेरी पूरी उपज में वृद्धि होती है। बीज की लागत घटती है और कीटनाशकों का कम छिड़काव करना पड़ता है। कुल मिलाकर निवेश पर कम लागत आती है, जिससे भरपाई हो जाती है। इस बिन्दु को और अधिक स्पष्ट करते हुए पाटिल जैसे ही एक अन्य किसान, इस नयी तकनीक पर अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहते हैं, ‘‘रोपाई विधि से खेती करने में निवेश लागत रू0 10,620.00 प्रति एकड़ थी, जो हमारी पारम्परिक पद्धति से बिलकुल भी भिन्न नहीं थी। फिर भी उपज में बड़ा अन्तर था। इस नये तरीके से खेती कर हमने प्रति एकड़ 7 कुन्तल चना का उत्पादन प्राप्त किया, जिससे मुझे रू0 28,000.00 की आय हुई और अन्तः फसली खेती के रूप में मक्का से रू0 4,000.00 की अतिरिक्त आय हुई। मैं प्रति एकड़ रू0 21,240.00 का शुद्ध लाभ प्राप्त करने में सक्षम हुआ, जो पारम्परिक पद्धति से होने वाली शुद्ध आय से दुगुना से भी अधिक था।’’

इस नयी पद्धति की व्यवहार्यता मल्लिकार्जुन और किसान हित समूहों तथा किसान उत्पादक संगठनों से जुड़े तथा अन्य बहुत से किसानों की सफल कहानियों में परिलक्षित होती है। इन लोगों ने फसल विकास के प्रारम्भिक चरण में ही इस पद्धति को अपनाया और नर्सरी की पोषण युक्त वातावरण में अंकुरित होने के कारण ये पौधे सूखा स्थितियों का सामना करने में सक्षम हुए। इसकी वजह से किसान, अब बिना किसी नुकसान के भय के बारिश रहित महीनों का इन्तजार कर सकते हैं। इसके अलावा, वे पारम्परिक पद्धति की तुलना में अधिक शाखाएं एवं फूल पाने में सक्षम रहे। कुछ किसान तो इस नयी तकनीक की सफलता को देखते हुए अगले साल दुगुने क्षेत्रफल में इसकी खेती करने की योजना बना रहे हैं।

सूखा और अनियमित वर्षा वाले अन्य चना उत्पादक क्षेत्रों में भी इस पहल को दुहराया जा सकता है। इस प्रक्रिया में किसानों को व्यवस्थित प्रशिक्षण और उसके परिणामस्वरूप प्राप्त परिणामों का प्रदर्शन किया गया। परिणामतः गुलबर्गा जिले में इस पहल को बड़े पैमाने पर बढ़ाने में व्यापक सहायता मिली।
किसान उत्पादक संगठना का पता: कृषिकाबन्धु फार्मर प्रोड्यूसर कम्पनी लिमिटेड, ग्राम- किन्नीसुल्तान, तालुका- आनन्द, जिला- गुलबर्गा, कर्नाटक। सम्पर्क: बाबूराव पाटिल – 09740621115।

स्रोत: यह लेख मूलतः ‘‘कृषि सूत्र 2 किसान उत्पादक संगठनों की सफल कहानियां’’ में प्रकाशित है।


व्रुती लाइवलीहुड रिसोर्स सेण्टर
नं0 19, पहला मेन, पहला क्रास, आरएमवी द्वितीय स्टेज,
अश्वत्थनगर, बेंगलोर, कर्नाटक – 560 094
फोन न0: 080-23419616, 23517241
ई-मेल: इंसं/bala@vrutti.org
वेबसाइट: www.vrutti.org


Source: Farmer Producer Organisation, LEISA India, Vol.25, No.4, December 2023

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