जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने हेतु पर्यावरण शिक्षा बच्चों के माध्यम से एक अनूठी पहल

Updated on March 4, 2024

तेजी से बढ़ती आबादी और उतनी ही तीव्र गति से बढ़ती भौतिकवादी संस्कृति ने शहर, गांव सभी को अपनी चपेट मंे ले लिया है और कूड़ा-कचरा का प्रबन्धन न होना तथा प्रकृति व पर्यावरण की तरफ लोगों की उदासीनता कई समस्याओं को जन्म दे रही है। समस्याओं से निपटने की दिशा में समाज के सभी वर्गों- महिला, पुरूष, बच्चों सभी को जागरूक करने की आवश्यकता है, क्यांेकि जलवायु परिवर्तन की स्थिति में ये समस्याएं और भी भयंकर स्वरूप में सामने आने वाली हैं। इस आवश्यकता को महसूस करते हुए गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन गु्रप ने एच0सी0एल0 फाउण्डेशन के साथ मिलकर गौतम बुद्ध नगर के कुछ विद्यालयों में बच्चों को प्रकृति एवं पर्यावरण से सम्बन्धित गतिविधियों जैसे- गृह वाटिका, कम्पोस्टिंग, जल संरक्षण आदि की दिशा में जागरूक कर रही है।


पिछले तीन-चार दशकों से जलवायु परिवर्तन एक विश्व-व्यापी समस्या के रूप में उभर कर सामने आयी है और इसके प्रभाव वैश्विक, राष्ट््रीय एवं स्थानीय स्तर पर व्यापक रूप से दिखने लगे हैं। कम समय में अधिक बारिश, असमय वर्षा, मानसून ऋतु में एक से दूसरी वर्षा के बीच लम्बा अन्तराल, ठण्ड के दिनों की घटती संख्या एवं तीव्र से तीव्रतम होती गर्मी, इन सभी का न सिर्फ खेती पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है, वरन् पूरा जीव-जगत प्रभावित हो रहा है। इन समस्याओं को बढ़ाने में हमारी आज की जीवन शैली भी अच्छा-खासा योगदान दे रही है। प्लास्टिक का बढ़ता प्रयोग, कूड़ा-कचरा का सही प्रबन्धन न होना तथा पेड़-पौधों का तेजी से विनाश आदि गतिविधियां इन समस्याओं की वृद्धि के प्रमुख कारण बन रहे हैं। इसके साथ ही प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति लोगों की उदासीनता भी जलवायु परिवर्तन जनित इन प्रभावों/समस्याओं को बढ़ा रही है।

विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, एक तरफ जहां तेजी से बढ़ती शहरी आबादी के लिए मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता में मांग की अपेक्षा कमी आ रही है, वहीं दूसरी तरफ लोगों की उदासीनता के कारण कूड़ा-कचरा से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ती जा रही हैं।

पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, स्थाई कृषि, महिला एवं बच्चों के मुद्दों आदि विषयों पर पूर्वोत्तर भारत में सघन रूप से काम करने वाली स्वैच्छिक संगठन गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप ;जी0ई0ए0जी0द्ध ने अपने परियोजना क्षेत्रों में इस समस्या की ओर ध्यान दिया। संस्था का मानना है कि बच्चे आने वाले कल का भविष्य होते हैं और यदि बच्चे समस्या की गम्भीरता को समझते हुए उससे निपटने की दिशा में जागरूक हों तो उनके माध्यम से जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों को साकार किया जा सकता है और भविष्य में एक स्वस्थ, स्वच्छ और हरित वातावरण का निर्माण किया जा सकता है। चूंकि बच्चों में वयस्कों की अपेक्षा सीखने की प्रवृत्ति तीव्र होती है और यह भी अनुभव किया गया है कि बच्चों के उपर विद्यालय में सीखी या सिखाई गयी बात का गहरा असर होता है। वे सीखी गयी बातों को अपने आस-पास के बच्चों/मित्रों, माता-पिता, आस-पड़ोस के लोगों को बताते हैं। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए जी0ई0ए0जी0 गौतम बुद्ध नगर के कुछ विद्यालयों का चयन कर विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के उपर बच्चों को जागरूक करने का कार्य कर रही है।

पर्यावरण के दो महत्वपूर्ण घटक कचरा प्रबन्धन और जल संरक्षण के प्रति बच्चों को जागरूक करने के उद्देश्य से प्रत्येक घटक के उपर 12-12 कक्षाएं चलायी जाती हैं। इसके अतिरिक्त पर्यावरण से सम्बन्धित प्रत्येक राष्ट््रीय व अन्तर्राष्ट््रीय दिवस जैसे- विश्व पर्यावरण दिवस, अर्न्तराष्ट््रीय पक्षी प्रवासी दिवस दिवस आदि के अवसर पर बच्चों को विषय से सम्बन्धित समुचित जानकारियां देकर जागरूक व संवेदित किया जाता है साथ ही प्रयोगात्मक कार्य भी कराये जाते हैं। शमीम जहां

संस्था की पहल
पर्यावरण जागरूकता शिक्षा का एक महत्वपूर्ण भाग है। यदि बात करें जलवायु परिवर्तन जैसी व्यापक व ज्वलन्त समस्या की तो, इस समस्या एवं उसके दुष्प्रभावों का ध्यान में रखते हुए पर्यावरण पर बच्चों को शिक्षित करना आज के समय की महती व प्राथमिक आवश्यकता है। इस प्राथमिकता को पहचानते हुए जी0ई0ए0जी0 ने एच0सी0एल0 फाउण्डेशन की साझेदारी में पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से गौतम बुद्ध नगर स्थित विसरख विकास खण्ड के तीन विद्यालयों – जूनियर हाई स्कूल-नगला चरन दास, कम्पोजिट स्कूल-कुलसरा एवं कम्पोजिट स्कूल-याकूबपुर में बच्चों के बीच पर्यावरण जागरूकता बढ़ाने की शुरूआत की।

 पर्यावरण कक्षाएं: पर्यावरण के प्रति बच्चों को जागरूक एवं संवेदित करने के उद्देश्य से पर्यावरण से सम्बन्धित जानकारियां प्रदान करना एक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक अंग है। पर्यावरण एवं उसके घटकों से सम्बन्धित जानकारियों पर कक्षाएं चलाना एवं बच्चों को पर्यावरण सुरक्षा एवं संरक्षा से सम्बन्धित तथ्यों पर व्यवहारिक जानकारी प्रदान करना पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में एक सकारात्मक पहल है।

बाक्स 1: नगला चरण दास स्कूल की आठवीं कक्षा की छात्रा खुशी के घर के आस-पास फैलने वाले सूखे पत्तों से उसके घर में गन्दगी फैल जाती थी। उसने स्कूल में कम्पोस्टिंग को सीखकर सूखे पत्तों और रसोई से निकलने वाले कचरों को एकत्र कर उन्हंे बाल्टी में रखा और नियमित रूप से प्रबन्धित करते हुए उनसे कम्पोस्ट तैयार किया। इससे एक तरफ खुशी ने अपने परिवार के लिए उपयोगी कम्पोस्ट बनाया तो वहीं दूसरी ओर कूड़ा-कचरा प्रबन्धन भी हुआ। इस प्रकार खुशी की एक छोटी सी पहल पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण कदम साबित हुई। 

बाक्स 2: नगला चरण दास स्कूल के ही कक्षा 7 के छात्र जीतू मिश्रा ने पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम से प्रभावित होकर अपने घर की छत पर एक गृहवाटिका बनाया। इसके साथ ही अपने साथियों के साथ समुदाय में बच्चों को एकत्र कर एक ‘‘हरित क्लब’’ का गठन किया, जिसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण जागरूकता का प्रसार करना है। अपने परिवार और आस-पास के समुदाय के लिए प्रेरणा के तौर पर काम कर रहे जीतू का सपना हरित क्लब को बढ़ाना तथा समाज को साफ व हरित बनाना है।

बाक्स 3: कम्पोजिट विद्यालय, कुलेसरा की छठीं कक्षा की छात्रा मुस्कान ने पर्यावरण में पक्षियों एवं जानवरों की भूमिका व महत्व पर समझ बनाया और बढ़ती गर्मी को देखते हुए अपने घर की छत एवं घर के बाहर पानी से भरे बर्तनों को रखना प्रारम्भ किया, जिससे गर्मी के दिनों में चिड़ियों एवं अन्य जानवरों को अपनी प्यास बुझाने में आसानी हो। उनके इस कदम को देखकर समुदाय के अन्य लोग भी अपने घरों की छतों एवं घर के बाहर पानी रखना प्रारम्भ कर दिया है जिससे तीव्र गर्मी से निपटने में सहायता मिल रही है।

 कम्पोस्टिंग और गृहवाटिका: पर्यावरण को स्वच्छ एवं सुरक्षित बनाने की दृष्टि से कम्पोस्टिंग और गृहवाटिका एक उचित माध्यम है। कम्पोस्टिंग से एक तरफ तो ठोस एवं तरल अपशिष्टों का उचित प्रबन्धन सुनिश्चित होता है, तो वहीं दूसरी तरफ तैयार कम्पोस्ट का उपयोग कर जैविक सब्ज़ियां भी तैयार की जा सकती हैं जिससे समुदाय ताजी एवं स्वस्थ सब्ज़ियां प्राप्त करने में सक्षम होगा। इस अवधारणा को साकार करते हुए तीनों विद्यालयों में बच्चों को कम्पोस्टिंग एवं गृहवाटिका की गतिविधियों से जोड़ा गया। बच्चों को यह बताया गया कि रसोई घरों से निकलने वाले अपशिष्टों के उचित प्रबन्धन के लिए कम्पोस्टिंग एक आवश्यक तत्व है। उन्हें कम्पोस्टिंग से सम्बन्धित प्रयोगात्मक जानकारी दी गयी, कम्पोस्टिंग बनाने एवं उसके उपयोग का तरीका बताया गया। इसके साथ ही उन्हें गृहवाटिका से सम्बन्धित जानकारियां भी दी गयीं। गृहवाटिका से जुड़ाव सुनिश्चित कर एक तरफ जहां पेड़-पौधों के प्रति उनकी रूचि बढ़ाने में सहायता मिली, वहीं दूसरी तरफ कम्पोस्टिंग के उपयोग पर उनकी समझ बढ़ी। वे यह समझ सकने में सक्षम हुए कि रसोई घरों से निकले अपशिष्टों से तैयार कम्पोस्ट का उपयोग गृहवाटिका में करते हुए कचरा प्रबन्धन के साथ-साथ पोषणयुक्त, ताज़ी, रसायनमुक्त एवं स्वस्थ सब्ज़ियां उनकी प्लेटों में उपलब्ध होंगी।

जैव विविधता की पहचान: जाने-अनजाने हमारी बहुत सी गतिविधियां ऐसी होती हैं, जिनकी वजह से वानस्पतिक एवं पशु-पक्षियों की जैव विविधता को खतरा पहुंचता है। इसके पीछे जानकारी का अभाव एक बड़ा कारण होता है। हमें बहुत से पौधों, जीवों, पशु-पक्षियों आदि की पर्यावरण सुरक्षा, संरक्षा एवं मानव के लिए उनकी उपयोगिता के बारे में जानकारी न होने के कारण हम इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं करते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए विद्यालयों में बच्चों को वानस्पतिक जैव विविधता से परिचित कराने की दृष्टि से उनके साथ मिलकर विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों की खोज कर उनकी उपयोगिता के बारे में परिचित कराया गया। इसी प्रकार पशु-पक्षियों की भूमिका एवं जलवायु परिवर्तन के कारण इनके जीवन पर मंडरा रहे खतरों के बारे में परिचित कराते हुए उनसे निपटने की रणनीतियों के बारे में भी बताया गया, जिसके सकारात्मक परिणाम भी देखे गये।

इसके अलावा पर्यावरण आधारित विभिन्न खेलों, कला एवं शिल्प गतिविधियों आदि के माध्यम से भी बच्चों को पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के उपर जागरूक किया जाता है।

संभावनाएं
पायलट परियोजना के तौर पर शुरू इस कार्यक्रम से चयनित तीनों विद्यालयों के बच्चे पूरी उत्सुकता के साथ जुड़ रहे हैं। उपर दी गयी केस स्टडी तो मात्र एक उदाहरण हैं। कूड़ा-कचरा प्रबन्धन की बात हो, छत/घर के सामने गृहवाटिका की स्थापना हो अथवा जल संरक्षण, कार्यक्रम से जुड़ा हर व्यक्ति किसी न किसी कार्य में संलग्न है। आज नगला चरन दास, कुलसरा और याकूबपुर में विद्यालय के बच्चों के अलावा अन्य बच्चे भी उनके कार्यों से प्रेरित होकर गृहवाटिका स्थापित करने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं, पर्यावरण से सम्बन्धित शैक्षिक खेलों, प्रतियोगिताओं के माध्यम से जुड़े बच्चे पर्यावरण सुरक्षा एवं संरक्षा से सम्बन्धित जानकारियों को समुदाय के अन्य लोगों के साथ साझा कर रहे हैं और समस्या समाधान के विकल्पों का प्रसार कर रहे हैं। संस्था इस दिशा में भी प्रयासरत है कि इन अनुकरणीय उदाहरणों को आस-पास के अन्य विद्यालयों के शिक्षकों द्वारा अपने विद्यालयों में समुचित स्थान दिया जाये और बच्चों को सकारात्मक पहलों से जोड़ा जाये।


सुश्री शमीम जहां
सुश्री अर्चना श्रीवास्तव