खेती एवं उससे सम्बन्धित सभी घटकों जैसे- पशुपालन, सामाजिक-वानिकी, मुर्गी पालन को एकीकृत करते हुए मिश्रित खेती, अन्तः खेती आदि पद्धतियों को अपनाकर एन0 केशवमुर्थी ने बदलते मौसमों से लड़ने हेतु जैविक एवं प्राकृतिक खेती का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपने स्वयं के अनुभवों से यह भी बताया कि खेती को लाभप्रद एवं स्थाई बनाने के लिए अपने उत्पादों का बाजार से जुड़ाव सुनिश्चित करना भी किसान की एक महती जिम्मेदारी होगी।
मैं, एन0 केशवमुर्थी, मूलतः एक खेतिहर परिवार से आता हूं। मैं 30 वर्षों से एक फैक्टरी चला रहा था और अच्छी आय अर्जित कर रहा था। लेकिन श्रमिकों की कमी, काम का तनाव और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के चलते मेरा झुकाव कृषि की ओर हो गया। मैं कृषि विज्ञान केन्द्र, मगदी द्वारा आयोजित प्रशिक्षण ‘‘देखो और जानो तथा करो एवं सीखो’’ से अधिक प्रभावित हुआ और मैने महसूस किया कि स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याआंे का मुख्य कारण रसायनिक उर्वरकों का उपयोग कर उगाया जाने वाला भोजन है। मुझे जैविक खेती में रूचि हो गयी।
मैंने अपने पिता से विरासत में मिली 3 एकड़ जमीन के साथ-साथ स्वयं द्वारा खरीदी गयी 4 एकड़ जमीन पर खेती करना प्रारम्भ किया। खेत में सिल्वर ओक, सागौन व महोगनी के कुछ वृक्ष तथा दो बोरवेल थे और खेत चारों तरफ से कंटीले तार की बाड़ से घिरा था। यह महसूस करते हुए कि कम अवधि, मध्यम अवधि और लम्बे समय की फसलों की मिश्रित खेती करने से उत्पादन दुगुना हो सकता है, हमने ‘‘जंगल आधारित एकीकृत जैविक खेती’’ प्रणाली को अपनाया।
प्रारम्भ में, हमने खेत में मिश्रित अनाजों की खेत में छिंटकवा विधि से बुवाई की। मृदा स्वास्थ्य को उन्नत बनाने के लिए, बहुत से अभ्यास जैसे- मल्चिंग और मृदा में बायोमॉस की जुताई आदि को अपनाया। शुरूआत में, हमने कम समय की फसलों जैसे- बीन्स, बैगन, मटर, चना, भिण्डी, टमाटर, हरी मिर्च, लतादार फसलों और लौकी, करेला आदि से आय प्राप्त करना प्रारम्भ किया। मैंने इसके साथ मध्यम अवधि की फसलों जैसे- 100 पेड़ नीबू, 50 पेड़ अमरूद के, 40 पेड़ चीकू के, आँवला के 40 तथा कटहल, शरीफा, सेब व जामुन के 30-30 पेड़ लगाये। साथ में करी पत्ता, काली मिर्च, इलायची व सहजन के 50-50 पौधों को भी लगाया। लम्बी अवधि की फसलों में 280 पेड़ सिल्वर ओक, 120 पेड़ सागौन, 160 पेड़ महोगनी, 100 पेड़ आम तथा नारियल के 180 पेड़ांे के साथ बरगद, नीम, इमली, अकोल पेड़ की प्रजातियां, अंजीर पेड़ की प्रजातियां, बाँस तथा चन्दन आदि के पेड़ शामिल हैं।
मेरे खेत के साथ पशुधन एक प्रमुख घटक हैं। विभिन्न प्रकार के पशुधन में 5 गायें हलीकर प्रजाति की, 5 गायें मालेन्दु गिद्दा प्रजाति की, भेड़ और बकरियां 5, 60 मुर्गियां (टर्की प्रजाति की 10, 6 मुर्गियां, 4 लड़ाकू मुर्गियां एवं 10 कड़कनाथ प्रजाति की मुर्गियां), 9 बतख, 4 कुत्ते और 4 बिल्लियां आदि हैं।
मैंने अपने खेत पर पर्यावरण-सम्मत कृषि अभ्यासों का अनुसरण किया। सीमित जल संसाधनों के संरक्षण की दृष्टि से बूँद सिंचाई का उपयोग किया। पशुओं और पौधों के अपशिष्टों का उपयोग कर खाद एवं वर्मीकम्पोस्ट तैयार किया, जिसे खेत पर पुनःचक्रित किया जाता है। बायोडाइजेस्टरों का उपयोग कर जानवरों के गोबर से बायोगैस उत्पादित किया गया। इसके साथ ही मेरे खेत पर मधुमक्खी पालन भी शामिल है।
सामूहिकता की ओर बढ़ना
स्वस्थ और स्थाई कृषि पद्धतियों का अभ्यास करने हेतु मेरे साथ मेरे बहुत से किसान मित्र जुड़ गये और हमने 30 सदस्यों का एक समूह गठित किया, जिसे ‘‘सत्वा आर्गेनिक्स’’ नाम दिया गया। हमने सुरक्षित खाद्य उत्पादित किया और उसकी बिक्री हेतु विभिन्न प्रकार के बाजारों जैसे- किसान बाजार, स्कूल आदि की खोज की।
आगे बढ़ते हुए, हमने एफ0पी0ओ0 ;फार्मर प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशनद्ध पर एक केन्द्रीय सरकारी योजना के तहत् औद्यानिक विभाग के सहयोग से ‘‘सावनदुर्गा रायथा उथपादक कम्पनी लिमिटेड’’ नाम से एक किसान उत्पादक कम्पनी का गठन किया। रामनगर जिले के मगदी तालुक में लघु किसान व्यापार फेडरेशन, परम्परागत कृषि विकास योजना तथा श्री श्री रूरल डेवलपमेण्ट प्रोग्राम ट््रस्ट, बंगलौर, जैसे संगठनों ने भी इस पहल को सहयोग प्रदान किया। रायथा उत्पादक कम्पनी का मुख्य उद्देश्य नारियल, आम और सब्ज़ियों की खेती करने वाले किसानों को बीजों की समय से बुवाई, उर्वरकों का उपयोग, जैविक बायोलाजिकल दवाओं, बाजार तक पहुँच, मूल्य संवर्धन आदि से सम्बन्धित तकनीकी कृषिगत प्रशिक्षण और जानकारियां देकर किसानों की आय में वृद्धि करना था।
जागरूकता और प्रशिक्षणों के साथ, किसान अब सुरक्षित खाद्य उगा रहे हैं, मृदा उर्वरता उन्नत हुई है, उनकी फसल उत्पादन की लागत घटी है और जैव विविधता बढ़ी है।
हम रू0 10,000.00 प्रति माह आय अर्जन के इच्छुक किसानों को 10 फसलें उगाने हेतु उत्साहित भी करते हैं। नारियल के पेड़ों के साथ लाइन में नीबू, सहजन, करी पत्ता एवं इलायची की अन्तः फसली खेती करते हैं। भेड़ और बकरी पालन, गाय के बछड़े, शहद, मछली पकड़ना, केंचुऐ से खाद बनाना, आम एवं अन्य मूल्य सवंर्धित उत्पादों से कम से कम रू0 60,000.00 आय प्राप्त करने में मदद मिली।
एफ0पी0ओ0 किसानों के उत्पादों को सीधे बाजार से जोड़कर उन्हें अच्छी आय प्राप्त करने में मदद कर रहा है। कई मार्केटिंग चैनल तलाशे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, गिरिनगर में पूर्ण प्रमति स्कूल परिसर और बंगलौर के पूर्णप्रयाग लेआउट में प्रत्येक शनिवार को किसानों के उत्पादों की बिक्री हेतु बाजार लगता है। फलों और सब्ज़ियों को जैविक स्टोरों पर सीधे बेच दिया जाता है। मूल्य सवंर्धित उत्पादों के उत्पादन एवं उनको बेचने में भी एफ0पी0ओ0 किसानांे की मदद कर रहा है। मूल्य सवंर्धित उत्पादांे को ‘‘समग्र श्री’’ ब्राण्ड नाम से बेचा जाता है। इसमें अनाजों से बना माल्ट, अचार, शहद, ए2 दूध, मक्खन, घी एवं देशी मुर्गियों के अण्डे शामिल हैं।
वन अभियान कार्यक्रम के साथ मिलकर, हम एक पौधरोपण कार्यक्रम भी चला रहे हैं। इसके अनुसार, प्रत्येक वर्ष 365 पौधे, अर्थात् हर दिन एक पौधा हमारे बगीचे में जुड़ता है।
समग्र रूप से देखा जाये तो, इस पहल से ताजी और गैर विषाक्त अर्थात् जैविक सब्ज़ियां उचित दामों पर उपभोक्ताओं तक पहुँचाने में सहायता मिल रही है। जैविक सब्ज़ियां और मूल्य सवंर्धित उत्पादों को सामने लाकर हम समाज को ‘‘विष मुक्त भोजन’’ प्रदान कर रहे हैं।
एन0 केशवमुर्थी
पुत्र एन0 नंजुंदय्या
अंकनपाल्या, मोटागोण्डनाहाल्ली पंचायत
सोलुरू होबली, मगदी तालुक
रामनगर जिला – 562 127
ई-मेल: nkeshava42@gmail.com
Source: Farmer Producer Organisation, LEISA India, Vol.25, No.4, December 2023



