सब्जी उत्पादन की नवोन्वेषी तकनीक: पंक्ति आच्छादन

Updated on March 2, 2024

बदलती जलवायुविक परिस्थितियों में जल-जमाव तथा सूखे की स्थिति से निपटने की दृष्टि से किसानों को लचीला बनाने के साथ ही अपनी मृदा एवं फसलों को सुरक्षित रखने तथा उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों को प्राप्त करने हेतु पंक्ति आच्छादन की नवोन्वेषी तकनीक अत्यन्त कारगर सिद्ध होती है। इसे गोरखपुर एवं बिहार के सब्जी उत्पादक किसानों ने प्रदर्शित किया है।


प्रसंग एवं आवश्यकता
पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार क्षेत्र में विशेष रूप से प्रत्येक वर्ष दो से तीन माह तक बारम्बार आने वाली बाढ़ और जल-जमाव का खतरा बना रहता है। जलवायु परिवर्तन के कारण समय-समय पर सूखा की अवस्था भी सामने आती है। अनुमान है कि भविष्य में इस क्षेत्र में वर्षा की घटनाओं की तीव्रता बढ़ सकती है। इससे यहां की स्थितियां और भी विकट हांेगी। विशेष रूप से पिछले 8-10 वर्षों में गंगा के मैदानी क्षेत्र में, एक बारिश से दूसरी बारिश के बीच 15-20 दिनों का सूखा समयान्तराल होना एक सामान्य घटना बन गयी है।

वर्षा के ऐतिहासिक आंकड़ों का सूक्ष्म स्तर पर विश्लेषण करने से यह इंगित होता है कि एक दिन में 64.5 मिमी0 से अधिक बारिश जैसी वर्षा की चरम घटनाओं में वृद्धि हुई है जिससे वर्षा की मात्रा 15-20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। स्थितियों को देखने से स्पष्ट होता है कि 24 घण्टों में 100 मिमी0 से अधिक बारिश होने की स्थिति में गोरखपुर और पश्चिमी चम्पारण के निचले इलाके बाढ़मग्न हो जाते हैं। इससे निचली उपजाउ कृषि भूमि हल्की स्थलाकृति ढलान और खराब जल निकासी प्रणाली के कारण जल-जमाव वाले क्षेत्र में बदल जाती है।

फलतः, विशेषकर लघु और सीमान्त सब्जी उत्पादक किसानों को फसल का नुकसान होता है। डूब क्षेत्र बढ़ने से खरीफ एवं रबी की फसलों की बुवाई पर नकारात्मक असर पड़ता है जिससे लघु एवं सीमान्त किसानों की खाद्य एवं आय सुरक्षा प्रभावित होती है। चूंकि 75 प्रतिशत लघु एवं सीमान्त किसान सब्ज़ियों की खेती करते हैं, इसलिए व्यापक जल-जमाव के कारण क्षेत्र में रबी सीजन में सब्ज़ियों की बुवाई हेतु गर्मी के दौरान नर्सरी उगाना अत्यन्त कठिन होता है।

इस समस्या को ध्यान में रखते हुए गोरखपुर एन्वायारन्मेण्टल एक्शन ग्रुप ;जी0ई0ए0जी0द्ध ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के कोर सपोर्ट परियोजना के अन्तर्गत, किसानों के साथ पंक्ति कवर तकनीक को किया। क्षेत्र में इस तकनीक के माध्यम से खेती करने से पूर्व की गयी व्यवहार्यता अध्ययन में भी यह निकलकर आया कि परियोजना आच्छादित कार्यक्षेत्र का लगभग 18 प्रतिशत क्षेत्रफल प्रतिवर्ष बाढ़ से प्रभावित होता है और अधिकांश क्षेत्र दो से तीन माह तक अत्यधिक जल-जमाव ग्रस्त रहता है। इन कठिनाईयों को बढ़ाने में घटती मृदा उर्वरता तथा कीट-ब्याधियों का बढ़ता प्रकोप भी शामिल है। इसके अलावा, क्षेत्र में गुणवत्ता युक्त नर्सरियों की समय से उपलब्धता नहीं होती है, जिससे वे किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए उपयुक्त नहीं होती हैं।

एक पायलट पहल के रूप में, जी0ई0ए0जी0 ने नर्सरी तैयार करने हेतु उंचे बेड पर पंक्ति कवर तकनीक एवं पॉलीथीन मल्चिंग के साथ उच्च मूल्य वाली सब्ज़ियों की खेती करने की तकनीक अपनाने हेतु किसानों को तकनीकी सहयोग प्रदान किया।

तकनीकी विशिष्टता एवं पायलट पहल
इस तकनीक में छोटी-छोटी सुरंग की तरह लघु संरचनाएं शामिल हैं जो ग्रीन हाउस की तरह प्रभाव उत्पन्न करती हैं। इस तकनीक के तहत् लोहे की तार से अर्ध चन्द्राकार आकृति बनायी जाती है और फिर उसे उपर से पॉलीथीन शीट से ढंक दिया जाता है जो एक कम उंचाई की सुरंग जैसी हो जाती है। ये सुरंगें कार्बन डाई ऑक्साइड को रोकने में मदद करती हैं, जिससे पौधों की प्रकाश संश्लेषक गतिविधि में तेजी आती है। परिणामस्वरूप, पौधों का स्वस्थ विकास होता है। इसमें पौधों के लिए पोषक तत्वों को बढ़ाने के साथ-साथ समुचित तापमान बनाये रखा जाता है। ये ढांचे कम लागत के होते हैं, बनाने में आसान होते हैं और अगले वर्ष की तैयारी के लिए तोड़ना और बनाना दोनों आसान होता है।

इस तकनीक की कुछ विशेषताएं निम्नवत् हैं –
* लो-टनल पॉली हाउस का निर्माण सामान्य खेत की सतह से 1-1.5 फीट उपर उठे हुए बेड पर किया जाता है, ताकि यह जल-जमाव से प्रभावित न हो।
* नर्सरी लगाने हेतु तैयार बेड के चारों तरफ छह इंच का एक मेड़ बना दिया जाता है जिसमें ढलानदार नाली होती है, ताकि बारिश का पानी सीड बेड में न जाने पाये।
* पॉली हाउस के चारों तरफ एक नाली बना दी जाती है, जिससे पानी अधिक होने पर आसानी से बाहर निकाला जा सके।

इस तकनीक का उपयोग सर्दी और गर्मी के मौसम में उचित जल प्रबन्धन के माध्यम से किया जा सकता है। इनका उपयोग लौकी, करैला, बैगन, फूलगोभी, टमाटर और खीरे जैसी अधिक मांग वाली सब्ज़ियों की नर्सरी उगाने के लिए किया जा रहा है।

इस तकनीक से किसानों को कई लाभ हुए। जैसे- उपज में वृद्धि, सब्ज़ियों की जल्दी कटाई, जल प्रबन्धन के माध्यम से मृदा के तापमान का संरक्षण, पक्षियों और कीटों, हवा एवं बारिश, पाला, शीतलहर एवं लू आदि से फसलों की सुरक्षा आदि के सन्दर्भ में इस तकनीक से किसानों को कई लाभ हुए और अन्ततः किसानों की शुद्ध आय में वृद्धि हुई है।

कोर सपोर्ट परियोजना के अन्तर्गत वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद के कैम्पियरगंज व जंगल कौड़िया विकासखण्ड तथा बिहार के पश्चिमी चम्पारण जिले के नौतन प्रखण्ड में उंचे बेड पर लो टनल पॉली हाउस की चार मॉडल इकाईयां निर्मित की गयीं। इन इकाईयों में निम्नवत् मानकों को देखा गया-
* करैला, लौकी, बैगन और गोभी पर परीक्षण किया गया और जुलाई-अगस्त, 2019 के दौरान 35 दिनों का आंकड़ा एकत्र किया गया।

नीचे दी गयी तालिका में पॉली हाउस के अन्दर और बाहर एकत्र किये गये आंकड़ों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है-

पायलट पहलपरीक्षणफसलअंकुरण में लगने वाला समय (दिनों में)अंकुरित पौधे (% में)कीट-व्याधियों से प्रभावित पौधे (% में)जल-जमाव के कारण क्षतिग्रस्त पौधे (% में)पौधे परिपक्व होने का समय (दिनों में)

 

कैम्पियर गंजखुले खेत मेंकरैला67592532
पॉली हाउस मेंकरैला4821228
जंगल कौड़ियाखुले खेत मेंलौकी760123231
पॉली हाउस मेंलौकी6782529
जंगल कौड़िया

 

खुले खेत मेंबैगन1175155035
पॉली हाउस मेंबैगन11864628
नौतनयपश्चिमी चम्पारणद्ध खुले खेत मेंगोभी126272430
पॉली हाउस मेंबैगन9783327

 

आंकड़े और निरीक्षण यह इंगित करते हैं कि खुले में नर्सरी तैयार करने की अपेक्षा उंचे बेड पर बनाये गये लो-टनल पॉली हाउस में नर्सरी तैयार करने से पौध अंकुरण बेहतर हुआ, पौधों की बीमारियों से सुरक्षा हुई और जल-जमाव के कारण पौधों का नुकसान भी कम हुआ। उदाहरण के लिए, करैला, लौकी, बैगन और गोभी पर किये गये परीक्षण से पता चलता है कि अधिक पौधे उगे ;7 प्रतिशत, 18 प्रतिशत, 10 प्रतिशत एवं 16 प्रतिशतद्ध। इसी प्रकार कीटांे एवं बीमारियों का आक्रमण तथा जल-जमाव के कारण होने वाला नुकसान में भी कमी आयी। इस प्रकार, जल-जमाव तथा समय-समय पर सूखा स्थितियों से गम्भीर रूप से प्रभावित इन क्षेत्रों में, यह तकनीक अत्यधिक प्रभावी सिद्ध हुई है और समान परिस्थितियों में इसके विस्तार की असीम संभावनाएं हैं।

लाभदायक परिणाम
आस-पास के घरेलू बाजार क्षेत्रों में वर्ष भर ताजी सब्ज़ियों की अत्यधिक मांग रहती है। इसका कारण निकट बसे शहरी क्षेत्र, स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता, उच्च जनसंख्या वृद्धि दर, समृद्ध मध्यम आयवर्ग का तेजी से बदलती आहार पद्धति हैं। यद्यपि बेहतर परिवहन प्रणालियों के कारण दूर-दराज के इलाकों में भी मौसम के साथ-साथ गैर मौसम में भी सब्ज़ियों की बाढ़ आ जाती है। ऐसे में लघु एवं सीमान्त सब्जी उत्पादक किसानों को बाहरी विक्रेताओं से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में समय से पहले तैयार ये ताजी सब्ज़िया इन्हें लाभ प्रदान कराती हैं।

इन दोनों क्षेत्रों में, पायलट परीक्षण के बाद, अब 30 से अधिक किसान टमाटर, गोभी, बन्दगोभी, मिर्च, बैगन एवं लतावर्गीय सब्ज़ियों जैसे- लौकी, खीरा, करैला, कद्दू आदि की समय से पूर्व नर्सरी तैयार कर रहे हैं। वे समय से पूर्व उच्च गुणवत्ता वाली पौधों की रोपाई कर अपने 20-30 दिनांे की बचत कर रहे हैं। इससे उन्हें समय से पहले उपज मिल जा रही है और बाजार में उच्च मूल्य प्राप्त हो रहा है। किसान अन्य स्थानीय किसानों के साथ नर्सरी में उगाये गये पौधों की अदला-बदली भी करते हैं और स्थानीय बाजार में बेचते भी हैं।

वर्ष भर सब्ज़ियों की समय से पूर्व नर्सरी तैयार करने और अच्छी गुणवत्ता वाली सब्ज़ियों की खेती की इस तकनीक से जंगल कौड़िया, कैम्पियरगंज और नौतन के सब्जी उत्पादक किसान अत्यन्त संतुष्ट हैं। क्योंकि उपज में वृद्धि, सब्ज़ियों की समय से पहले खेती, जल प्रबन्धन के माध्यम से मृदा की उष्मा संरक्षण, हवा, पाला आदि से पौधों की सुरक्षा आदि के माध्यम से अन्ततः किसान अपनी शुद्ध आय में वृद्धि कर रहे हैं।

 


अर्चना श्रीवास्तव
परियोजना समन्वयक
गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप
ई-मेल:pacs@geagindia.org

अजय कुमार सिंह
परियोजना समन्वयक
गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप
एच आई जी प्रथम फेज 1/4
सिद्धार्थपुरम, तारामण्डल रोड
ई-मेल: mahewa@geagindia.org


Source: Water Management, LEISA India, Vol.25, No.2, June 2023

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