बुन्देलखण्ड के आदिवासी खेतिहर परिवार कृषि विज्ञान केन्द्रों की मदद से पारम्परिक मोटे अनाजों जैसे- सांवा, कोदो, चीना, सथिया, फिकार आदि की खेती को बढ़ावा देकर न सिर्फ स्वयं के परिवारों की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित किया है, वरन् इन प्रजातियों को राष्ट््रीय स्तर पर मान्यता दिलाकर अन्य स्थानों के लघु एवं सीमान्त किसानों को स्थाई खेती का मूल-मंत्र भी प्रदान किया है। अनेक परीक्षणों से यह सिद्ध हो चुका है कि मोटे अनाजों की इन प्रजातियों की उपज क्षमता बेहतर होती है, पोषण स्तर उच्च होता है और कीट-व्याधि प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है।
बुन्देलखण्ड क्षेत्र में टीकमगढ़ जिले के आदिवासी किसानों ने अपने पारम्परिक छोटे दानों के मोटे अनाजों की प्रजातियों की खेती एवं संरक्षण कर राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान अर्जित किया है। फसल सुधार कार्यक्रमों के लिए उपयोग करने हेतु इन आशाजनक पारम्परिक प्रजातियों के जर्मप्लाजम को राष्ट्रीय जीन बैंक में जमा किया गया था। इस प्रकार, किसानों द्वारा पारम्परिक संरक्षण के अभ्यास ने भविष्य में छोटे दानों के मोटे अनाजों की कई अच्छी प्रजातियों को विकसित करने से लेकर देश को मूल्यवान कच्चा माल प्रदान किया है।
कोविड-19 महामारी के दौरान मोटे अनाजों की महत्ता काफी बढ़ गयी। अभी तक यह माना जाता था कि मोटे अनाजों की खेती करना छोटे एवं सीमान्त किसानों की ही जिम्मेदारी है। लोग बहुधा यह सोचते थे कि चूँकि छोटे एवं सीमान्त किसान रसायनिक निवेशों जैसे- उर्वरकों, कीटनाशकों आदि पर खर्च करने में सक्षम नहीं होते हैं, इसलिए मोटे अनाजों की खेती करते हैं। वास्तव में उन्होंने पारम्परिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर इनकी खेती की थी।
मुख्य मोटे अनाजों और छोटे मोटे अनाजों के संरक्षण का बुन्देलखण्ड का एक उत्कृष्ट इतिहास रहा है। इसके अलावा, मोटे अनाजों की खेती के लिए यहां उपयुक्त जलवायु होने के कारण यह लोगों के भोजन से भी जुड़ा हुआ है और इसीलिए लोग इसकी खेती को प्राथमिकता देते हैं।
विभिन्न मौसमों में आयोजित होने वाले समारोहों एवं त्यौहारों के दौरान छोटे मोटे अनाजों से विभिन्न प्रकार के व्यंजन तैयार किये जाते हैं, जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। इस प्रकार, आदिवासी किसानों द्वारा मोटे अनाजों की पारम्परिक प्रजातियों को संरक्षित करने हेतु बहुत प्रयास किये गये हैं।
मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के टीकमगढ़ जिले के किसान पिछले बहुत वर्षों से छोटे मोटे अनाजों की बहुत सी प्रजातियों का संरक्षण कर रहे हैं। ये छोटे मोटे अनाज अपने स्थानीय नामों- सांवा, चीना, सथिया, फिकार आदि के नाम से जाने जाते हैं। इन खेतिहरों का इन अनाजों के मनोवैज्ञानिक और पुर्नउत्पादक विशेषताओं के साथ गहरा पारिवारिक सम्बन्ध है। समाज में इन प्रजातियों के साथ जुड़ी प्रचलित पौराणिक कथाएं एवं परम्पराओं को स्थानीय लोक साहित्य में भी स्पष्ट रूप से बनाये रखा गया है। उदाहरण के लिए, क्षेत्र के प्रसिद्ध मन्दिरों में जैसे- ओरछा का प्रसिद्ध रामराजा मन्दिर और जिला मुख्यालय पर स्थित कुण्डेश्वर मन्दिर में आने वाले दर्शनार्थियों को ‘‘प्रसाद’’ के रूप में छोटे मोटे अनाजों से बना भोग दिया जाता है।
कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रयास
कृषि विज्ञान केन्द्र, टीकमगढ़ ‘‘किसान अधिकार – पौध प्रजातियां एवं किसान अधिकार सुरक्षा अधिनियम, 2001’’ पर जागरूकता प्रसार हेतु क्षेत्र में पिछले 8 वर्षों से एक परियोजना चला रहा है। इस परियोजना के अन्तर्गत, जिले में उपलब्ध पारम्परिक फसल प्रजातियों के संरक्षण, राष्ट्रीय जीन बैंक में जर्मप्लाज्म को संरक्षित करने और मोटे अनाजों को संरक्षित करने तथा उनकी खेती करने वाले किसानों को पहचान और अधिकार दिलाने हेतु प्रयास किया गया।
प्रारम्भ में, सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी किसानों द्वारा खेती की जाने वाली फसलांे, विशेषकर पारम्परिक प्रजातियों को जानने हेतु सघन सर्वेक्षण किया गया। वर्ष 2013-2014 से प्रत्येक वर्ष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजन किये गये जिसमें 650 से अधिक किसानों को संरक्षण के पहलुओं पर प्रशिक्षित किया गया। जिले की विभिन्न फसलों की दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियों को प्रचारित करने तथा स्थानीय लोगों को उनका संरक्षण करने हेतु प्रोत्साहित करने की दृष्टि से इन प्रजातियों का प्रदर्शनियां लगायी गयीं। सघन एवं बार-बार जागरूकता अभियान चलाये जाने के परिणामस्वरूप, कुछ निश्चित व अनूठी विशेषताओं वाली प्रजातियों की पहचान की जा सकी। वर्ष 2013-2014, 2014-15 एवं 2015-16 के दौरान कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा गोद लिये गये गाँवों के किसानों से तिलहन, दलहन, मसालों एवं अनाज जैसी दूसरी फसलों के साथ कोदो की क्रमशः ग्यारह, सात और सैंतीस प्रजातियां इकट्ठा की गयीं।
इन चिन्हित प्रजातियों को राष्ट्रीय ब्यूरो ऑफ प्लाण्ट जेनेटिक रिसोर्सेज, नई दिल्ली के तहत् गठित राष्ट्रीय जीन बैंक मंे भेजा गया। राष्ट्रीय ब्यूरो ऑफ प्लाण्ट जेनेटिक रिसोर्सेज ने अपने क्षेत्रीय केन्द्रों के खेतों में इन चयनित प्रजातियों के बहु-स्थानीय उपज परीक्षण आयोजित किये। इन प्रजातियों का विशिष्ट, एकरूपता एवं स्थिर तीन आधारों पर परीक्षण करके उनकी विशिष्टता का पता लगाया गया। तीन आधारों पर किया जाने वाला यह परीक्षण यह निर्धारित करने का एक माध्यम है कि क्या एक नई मान्यता प्राप्त प्रजाति उसी प्रजाति के भीतर अन्य मौजूदा किस्मों से भिन्न है और क्या रिपोर्ट किये गये लक्षण एक समान और स्थिर हैं।
तीन वर्षों तक बहु-स्थानीय परीक्षण करने के बाद, टीकमगढ़ जिले के 12 किसानों से एकत्र की गयी इन दुर्लभ प्रजातियों में मौजूद जीन बहुत प्रमुख और उपयोगी पाये गये। फसलों की ये प्रजातियां न केवल उपज क्षमता में बेहतर पाई गयीं, वरन् कीट-ब्याधियों के प्रति प्रतिरोधी होने में भी उपयोगी पायी गयीं। इस प्रकार इन परीक्षणों ने सिद्ध कर दिया कि जंगली प्रजातियां आम तौर पर कीट-ब्याधियों के प्रति प्रतिरोधी होती हैं। इसके अलावा, पोषण की दृष्टि से भी देखा जाये तो कोदो में प्रोटीन की मात्रा और गुणवत्ता के आधार पर यह देश में अन्य समानान्तर मोटे अनाजों की तुलना बेहतर थी। कोदो की इन प्रजातियों में फाइबर की मात्रा प्रति 100 ग्राम में 11-13 ग्राम के बीच पायी गयी जो परिष्कृत गेंहूं के आटे या चावल (प्रति 100 ग्राम में 3 ग्राम से भी कम) से काफी अधिक है।
किसानों के इन प्रभावशाली प्रयासों को कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित किया गया जिसमें इस बात को प्रमुखता से दर्शाया गया कि किसानों की पारम्परिक संरक्षण प्रथाओं से भविष्य में अच्छी प्रजातियों का विकास किया जा सकता है। विशेषकर भविष्य में फसल सुधार कार्यक्रमों में गुणवत्ता एवं इनकी उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए टीकमगढ़ के इन मोटे अनाजों की खेती करने वाले किसानों को तत्कालीन केन्द्रीय कृषि मंत्री माननीय राधा मोहन सिंह द्वारा 18 अप्रैल, 2017 को एक सार्वजनिक समारोह में सम्मानित किया गया। सम्मान एवं पुरस्कार स्वरूप प्रत्येक किसान को एक सम्मान पत्र एवं 1 लाख रू0 की सम्मान राशि प्रदान की गयी। माननीय मंत्री जी ने अपने संबोधन में कहा, ‘‘कृषि विज्ञान केन्द्र, टीकमगढ़ और स्थानीय किसानों का यह संयुक्त प्रयास मूल्यवान पौधों की प्रजातियों के संरक्षण के साथ-साथ भारतीय पारम्परिक ज्ञान के महत्व को इंगित कर रहा है और इसे राष्ट्रीय बेंचमार्क माना जाना चाहिए।’’
पुरस्कार पाकर सरियाना गाँव की रामा बाई कहती हैं, ‘‘मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारी परम्परा हमें राष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा पुरस्कार दिलायेगी।’’
हालाँकि, सामान्य तौर पर इनको ‘‘मोटे’’ अनाज के तौर पर जाना जाता है, लेकिन उनकी समृद्ध पोषण सम्बन्धी विशेषताएं, उगने व पकने की कम अवधि और लम्बी अवधि तक भण्डारित रहने की क्षमता उन्हें भारत में सबसे उपयुक्त विकल्प बनाता है। बुन्देलखण्ड के इन किसानों ने मोटे अनाज सुधार के लिए न केवल तंत्र विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया है, वरन् बड़ी संख्या में किसानों को मोटे अनाजों की खेती करने हेतु प्रोत्साहित भी किया है। अधिक उपज होने के कारण उन्हें इन मोटे अनाजों के खरीददार भी मिल गये। इस तरह केवल परम्परा के निर्वाह के लिए उगाया जाने वाला कोदो-बाजरा अब कमाई का जरिया बन गया है।
आर. के. प्रजापति
वैज्ञानिक ;पौध विज्ञानद्ध
कृषि विज्ञान केन्द्र, टीकमगढ़
मध्य प्रदेश – 472 001, भारत
ई-मेल: rkiipr@yahoo.com
बी.एस. किरार
प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख
कृषि विज्ञान केन्द्र, टीकमगढ़
मध्य प्रदेश – 472 001, भारत
ई-मेल: kvktikamgarh@rediffmail.com
योगरंजन सिंह
वैज्ञानिक ;बायो-टेक्नालॉजीद्ध
कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर, टीकमगढ़
मध्य प्रदेश – 472 001, भारत
ई-मेल: yogranjan@gmail.com
Source: Millet Farming Systems, LEISA India, Vol.25, No.1, March 2023



