संसाधनों के पुनर्चक्रीकरण और पुनर्प्रयोग के माध्यम से स्थाई कृषि पारिस्थितिकी गतिविधियों को बढ़ावा देकर न केवल बाहरी स्रोतांे पर निर्भरता कम होती है, वरन् अपशिष्टों को भी कम किया जाता है। विविधीकृत खेती करने से बेहतर पोषण और आय मिलती है परिणामस्वरूप बेहतर जीवन जीने के लिए स्वायतता का निर्माण होता है। लक्ष्मी और शंकरप्पा की कहानी ने इसे सिद्ध किया है।
‘‘कड़ी मेहनत करते हुए रसोई के बर्तनों को चमकाने के लिए संघर्ष करने से अधिक बुरा कुछ भी नहीं था। लेकिन अब एक बार बटन घुमाकर बिना धुंए के खाना पकाने ने मेरे जीवन को आसान बना दिया है।’’ यह कहते हुए कर्नाटक के बोरगी गांव की लक्ष्मीबाई का चेहरा खुशी से चमक उठता है। लक्ष्मीबाई अपने पति शंकरप्पा हनुमन्थारो के साथ कर्नाटक के बिडार जिले में अवस्थित जोजना पंचायत के एक गांव बोरगी में रहती हैं। बोरगी में लिंगायत और मुस्लिम दोनों समुदायों के 280 परिवार रहते हैं। इस गांव के किसानों की आजीविका का मुख्य स्रोत वर्षा आधारित खेती है, जिसमें वे मक्का, ज्वार और दलहन की खेती करते हैं।
कुछ वर्षों पहले परिस्थितियां पूरी तरह भिन्न थीं। अपने चार एकड़ के खेत में उर्द, मूंग, चना एवं चारा की वर्षा आधारित खेती करने के साथ इस दम्पति की यात्रा आरम्भ हुई। इनकी एक एकड़ जमीन परती थी। अत्यन्त उसर जमीन और खराब गुणवत्ता वाली मिट्टी के परिणामस्वरूप उपज बहुत ही कम होती थी, परन्तु वे जमीन से थोड़े से पैसे का प्रबन्ध करने में सक्षम थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया और परिवार बढ़ता गया, परिवार को अधिक समय तक खाना खिलाना कठिन होने लगा। स्थानीय निवेश आपूर्तिकर्ता की सलाह पर इन्होंने अपने खेत में रसायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया। प्रारम्भ में इन्हें बेहतर परिणाम प्राप्त हुआ और उपज में वृद्धि हुई। खेत से होने वाले लाभ से इन्होंने चाय गायों और एक भैंस को खरीदा।
कुछ वर्षों पश्चात्, दम्पति ने यह महसूस किया कि रसायनिक निवेशों की मात्रा तो बढ़ती जा रही है, परन्तु उत्पादन जस का तस है। इसके साथ ही उन्होंने खेती में लागत लगाने के लिए स्थानीय साहूकारों से ऋण लेना प्रारम्भ कर दिया। वर्ष 2012 में परिस्थितिया ंतब और विकट हो गयीं, जब अत्यधिक वर्षा और लम्बे समय तक सूखा पड़ जाने के कारण पूरी फसल बरबाद हो गयी। दुग्ध व्यवसाय से होने वाली आमदनी बस इतनी थी कि वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें। उनके पास खेती में लगाने हेतु कोई पैसा नहीं बचा था और कर्ज भी बढ़ता जा रहा था। इसे वजह से उन्हें इस वर्ष मजदूरी करने पर बाध्य होना पड़ा।
उत्प्रेरक
वर्ष 2013 में, रिलायंस फाउण्डेशन ने लघु एवं सीमान्त किसानों के सामने आने वाली अनिश्चितताओं के उपर सहभागी पद्धति से गांव में काम करना प्रारम्भ किया। रिलायंस फाउण्डेशन ने सामूहिक स्वामित्व, निर्णय लेने और सामुदायिक कल्याण हेतु समुदाय को ग्राम संगठन का गठन करने हेतु उत्प्रेरित किया। इस कार्य में लक्ष्मी और शंकरप्पा सबसे आगे आये और ग्राम संगठन का गठन किया। बोरगी में स्थापित ग्राम संगठन को सशक्त करने के लिए नियमित बैठकों एवं एक्सपोजर भ्रमणों का आयोजन किया गया। ग्राम संगठन के सदस्यों द्वारा स्थिति का आकलन किया गया, जिसमें खराब गुणवत्ता वाली मृदा तथा जल संकट के कारण खेती के समक्ष उत्पन्न संकटों को दर्शाया गया।
रिलायंस फाउण्डेशन के आर्थिक सहयोग से ग्राम संगठन ने गहरी जुताई, भूमि समतलीकरण और मेड़बन्दी जैसी गतिविधियों को बड़े पैमाने पर करना प्रारम्भ कर दिया। इसमें लक्ष्मी का खेत भी शामिल था। ग्राम संगठन ने बायोगैस, वर्मी कम्पोस्टिंग, जैविक कीट नियंत्रण एवं स्थानीय संसाधनों से बीज उपचार जैसे विषयों पर कई चरणों में प्रशिक्षणों का आयोजन किया। ग्राम संगठन के अन्य सदस्यों के साथ लक्ष्मी ने इन नयी दक्षताओं को गम्भीरता से सीखा एवं बायोगैस एवं वर्मीकम्पोस्ट का उत्पादन एवं प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया। रिलायंस फाउण्डेशन ने बोरगी गांव में बायोगैस की 14 ईकाई तथा वर्मी कम्पोस्ट की 47 इकाईयों को स्थापित किया।
पुनर्चक्रीकरण और पुनः प्रयोग
लक्ष्मी रोज सुबह पशुशाला से जानवरों का गोबर एकत्र कर डीगेस्टर में भरती जाती है। जहां पर गोबर बायोगैस में बदल जाता है। 1.8 घन मीटर की क्षमता वाले डीगेस्टर में उनके परिवार के लिए दोनों समय का भोजन बनाने हेतु पर्याप्त गैस मिल जाती है। डीगेस्टर से रिस-रिस कर बहने वाले गोबर के घोल में फसलांें जैसे- सोयाबीन, उर्द, चना आदि के अवशेषों को मिलाकर उनका उपयोग वर्मी कम्पोस्ट का बेड तैयार करने में किया जाता है। इसके बाद में इसमें कुछ सूखी पत्तियां भी मिली दी जाती हैं, जिससे केंचुओं को भोजन मिलता और इस प्रकार वर्मी कम्पोस्ट तैयार होता है। पहली बार, वर्मी कम्पोस्ट तैयार होने में 90 दिन का समय लगता है, लेकिन उसके बाद 45-50 दिनों में खाद उत्पादित होती रहती है।
पत्ती में इल्ली, तनाछेदक, पीला मोजैक जैसे कीटों से उपचार के लिए मिर्चा, लहसुन और अदरक का घोल बनाकर उस कीटनाशक का छिड़काव किया गया।
लक्ष्मी कहती हैं, ‘‘घर की खाद से खेत की 90 प्रतिशत आवश्यकता पूरी हो जाती है। इससे खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आयी है और उत्पादन भी 5 कुन्तल से बढ़कर लगभग 20 कुन्तल हो गया है, जो दोगुना से ज्यादा वृद्धि है। इन फायदों को देखते हुए हमने वर्मी कम्पोस्ट की दो और इकाईयां बनायी हैं। इसके साथ ही मैंने अपने स्वयं सहायता समूह की महिलाओं तथा बोरगी एवं पड़ोसी गांव के 40 से अधिक किसानों को वर्मी कम्पोस्ट बनाने हेतु केंचुआ बेचा भी है।’’
इसके साथ ही लक्ष्मी ने जानवरों का मूत्र एकत्र करने हेतु पशुशाला में एक गढ्ढा खोद रखा है। वे गौमूत्र का उपयोग पत्तों पर छिड़काव करने तथा तरल खाद बनाने में करती हैं। ग्राम संगठन द्वारा एक प्रगतिशील किसान के खेत पर कराये गये एक भ्रमण के दौरान उन्होंने पंचगव्य, जीवामु्रत एवं मिर्च-लहसुन का घोल बनाना सीखा। ताकि वे जानवरों का स्वास्थ्य उन्नत करने हेतु उसका उपयोग कर सकें और साथ ही कीट-व्याधिनाशक के तौर पर भी इसका उपयोग कर सकें। जीवाम्रुत बनाने में उन्होंने गाय का गोबर, गौमूत्र, गुड़ और पिसी हुई दाल में कुछ मिट्टी मिलाकर पानी में घोल लिया और उसे दो दिनों तक सड़ने के लिए छोड़ दिया। तैयार तरल पदार्थ को यह प्रत्येक सिंचाई के बाद छिड़कती हैं और मृदा स्वास्थ्य को उन्नत करने के लिए खाद के साथ मृदा में भी मिला देती हैं।
मिर्चा, लहसुन और अदरक का घोल बनाकर उस कीटनाशक का छिड़काव पत्ती में इल्ली, तनाछेदक एवं पीला मोजैक जैसे कीटों के उपचार हेतु किया गया। उन्होंने पंचगव्य तैयार करने हेतु अपनी रसोई एवं खेत में आसानी से उपलब्ध होने वाली नौ विभिन्न प्रकार की सामग्री जैसे- केला, गाय का घी, गुड़, कच्चा नारियल, दूध, गाय का गोबर एवं गौमूत्र को एक साथ मिलाकर एक ठण्डे छायादार स्थान पर 30 दिनों के लिए रख दिया। लक्ष्मी का कहना है ‘‘यह जानवरों के लिए प्रतिरक्षा दवा के रूप में काम करती है और इसे जब उनके भोजन में मिलाते हैं तो दूध का उत्पादन बढ़ता है।’’
उन्नति की ओर अग्रसर
ग्राम संगठन ने लक्ष्मी एक खुला कुंआ निर्माण करने में भी मदद की। ग्राम संगठन ने विभिन्न सरकारी योजनाओं से लक्ष्मी का जुड़ाव कराया। उदाहरणस्वरूप, कृषि विभाग से उच्च अनुदानित दर पर एक ड््िरप एवं स्प्रिंकलर यंत्र दिलवाने में ग्राम संगठन ने सहायता की। पहली बार के लिए, परिवार ने रबी ऋतु में सब्ज़ियों जैसे- टमाटर, नेनुआ, बैगन, पत्तीदार सब्ज़ियों को उगाया। उन्होंने जामुन, सपोता, अनार, अमरूद एवं नीबू के पौधों का रोपण भी किया और दो और गायों को खरीदा। इस प्रकार, यह दम्पति अपने एक एकड़ परती पड़ी भूमि को उर्वर बनाने में व्यस्त हैं।
निष्कर्ष:
लक्ष्मीबाई और उनके पति शंकरप्पा हनुमन्थारो जैसे बहुत से ऐसे लघु एवं सीमान्त किसान हैं, जो हमारे भोजन का 70 प्रतिशत भाग आपूर्ति करते हैं। जल संकट, जमीनों की घटती गुणवत्ता, निवेशों की कमी, बाजार, वित्त एवं जोखिम लेने की क्षमता का अभाव होने के कारण ये किसान खेती में बहुत सी चुनौतियों का सामना करते हैं। इसके साथ ही, पिछले कुछ दशकों में मौसम की अनिश्चितता ने वर्षा आधारित खाद्य उत्पादन प्रणाली को और संवेदनशील तथा अनिश्चित बना दिया है।
संसाधनों के पुनर्चक्रीकरण और पुनः उपयोग के माध्यम से स्थाई कृषि-पारिस्थितिकी अभ्यासों को बढ़ावा देते हुए लक्ष्मी और शंकरप्पा अपने-आप को स्थाईत्व प्रदान करने में सक्षम हुए हैं। इन्होंने बाहरी निवेशों पर अपनी निर्भरता घटाई है, अपशिष्टों को कम किया है और अपने रहने के लिए बेहतर वातावरण तैयार किया है। खेतों में विविधता बढ़ाने से न केवल इनके आय में वृद्धि हुई है, वरन् इनकी थाली में पोषण युक्त भोजन आ जाने से इनके परिवार का स्वास्थ्य भी उन्नत हुआ है। अब लक्ष्मी की अपने रिश्तेदारों एवं समुदाय में एक पहचान बन गयी है और खेती सम्बन्धित कार्यों में उनकी राय ली जाने लगी है।
जसबीर सन्धू एवं शिवानन्दा मातापति
जसबीर सन्धू
रिलायंस फाउण्डेशन
मुम्बई, महाराष्ट््र, भारत
ई-मेल:Jasbir.Sandhu@reliancefoundation.org
Source: Recycling resources in agroecological farms, LEISA India, Vol. 21, No.2, June 2019



