कृषि पारिस्थितिकी अभ्यासांे को अपनाने से पारिस्थितिकी प्रणाली का संरक्षण करने के अलावा आय उपार्जन की भी संभावना बनती है। यहां तक कि यदि गांव में 50 प्रतिशत किसान भी स्थाई कृषि को अपना लें तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी सफलता होगी। यह समय जलवायु अनुकूलित कृषि पारिस्थितिकी खाद्य प्रणालियों की ओर लगातार निवेश करने का है, जिससे संसाधनों के पुनर्चक्रीकरण को प्रोत्साहित किया जा सके और कृषि पारिस्थितिक प्रणाली की सुरक्षा हो सके।
मैंने कर्नाटक के गडग जिले के गांव शागोती का भ्रमण किया। गांव में प्रवेश करते ही मैंने देखा की कीचड़ भरी सड़क पर पूरी तरह सन्नाटा था और एक छोटी सी इमारत के आगे एक बड़ी सभा एकत्रित थी। वहां गांव के स्त्री और पुरूष एकत्रित थे और कुछ गंभीर चर्चा में व्यस्त थे। यह चर्चा नीलामी में एक थ्रेशिंग मशीन लेने के उपर हो रही थी। मानसून की विफलता के कारण गांव के लोगों के अन्दर मशीन लेने के प्रति आत्मविश्वास बहुत ही कम था। यह स्पष्ट है कि सीमान्त किसानों का जीवन की नियति को वर्षा तय करती है और यह अनिश्चित है, क्योंकि पिछले तीन वर्षों से बार-बार सूखा पड़ रहा है।
हालांकि, एक किसान महादेवगौडा नीलामी में बेहतर मूल्य देकर एक वर्ष के लिए मशीन लेने हेतु आगे आये। जब गांव के अन्य सदस्य मशीन लेने में हिचक रहे थे तब वे इस मशीन को ले पाये क्योंकि लगातार पड़ने वाले सूखे ने उनके खेत पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं डाला था। ऐसा इसलिए था कि उन्होंने कृषि पारिस्थितिकी को खेती के लिए आवश्यक मानते हुए अपनाया था। महादेवगौड़ा के आत्मविश्वास को देखते हुए उनसे यह जानने की इच्छा जागृत हुई कि उन्होंने सूखा से निपटने के लिए क्या रणनीति अपनाई जबकि अन्य किसान सूखा से अति प्रभावित हुए थे।
मैं समझ गया था कि यह ग्राम संगठन के आम सभा की बैठक थी। यह संगठन रिलायंस फाउण्डेशन द्वारा बनाया गया है, जिसका नाम ‘‘शागोती ग्राम रायथा संघ’’ है। महादेवगौड़ा के साथ प्रारम्भिक बात-चीत में हमने यह सीखा कि उन्होंने ग्राम संगठन की मदद से 4 वर्षों में अपने पारम्परिक कृषि को स्थाई कृषि में बदल लिया है। जब अन्य किसान अपने खेत से औसत उत्पादन प्राप्त करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं, तब यह अपने खेत से दुगुना उत्पादन लेने में सक्षम हैं और गांव के अन्य किसानों के लिए आदर्श किसान के रूप में प्रस्तुत हो रहे हैं।
सफर
अपनी खेती से पर्याप्त आमदनी न पाने के कारण महादेवगौड़ा ने अपनी आजीविका चलाने के लिए बहुत वर्षों तक मजदूर के रूप में काम किया था। उन्होंने अपनी खेती को बदला था, तब शुरूआती वर्ष बेहद कठिन थे। उस समय वह अपने पूरे 3 एकड़ खेत में मूंगफली की एकल फसल लेते थे। वह अन्य किसानों की ही भांति रसायनिक खादों का उपयोग करते थे। उन्हें एक वर्ष मंे रू0 25000.00 की आमदनी होती थी, जो उनके परिवार को चलाने और बीमार बेटी के दवाओं का खर्च पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं था।
यद्यपि कि रसायनिक उर्वरकों के उपयोग से प्रारम्भिक वर्षों में बेहतर उत्पादन प्राप्त होता था। लेकिन धीरे-धीरे उत्पादन घटने लगा और निवेश की जरूरत ज्यादा पड़ने लगी। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी सीखा कि रसायनिक उर्वरकों के प्रयोग से वायुमण्डलीय कार्बन में वृद्धि हुई है जो पर्यावरण को प्रभावित कर रही है। नाइट््रोजन उर्वरक से नाइट््रस आक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो बहुत शक्तिशाली ग्रीन हाउस गैस होती है। उनके कुंएं में पर्याप्त पानी न होने के कारण उनके खेतों की सिंचाई नहीं हो सकी और पूरी फसल सूख गयी। ठीक इसी समय उन्होंने देखा कि खेत के उस कोने पर, जहां वे कृषि अपशिष्टों को फेंकते थे और पशुशाला से निकला कचरा रखते थे, वहां पर कुछ स्वस्थ पौधे उग आये हैं। अंकुरित पौधे सकारात्मकता का संकेत होते हैं। कृषि अपशिष्टों ने प्राकृतिक गीली घास के रूप में काम किया और पौधों को सूखने से बचाया।
वर्ष 2013 उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उन्होंने कुछ बागवानी वाले खेतों का भ्रमण किया और ग्राम संगठन द्वारा आयोजित नर्सरी स्थापना के प्रशिक्षण में भी भाग लिया, जिसमें वे एक सक्रिय सदस्य हैं। स्थाई कृषि का अभ्यास करने में उनकी रूचि बढ़ गयी क्योंकि उन्होंने सफल किसानों के शुष्क भूमि खेतों का भ्रमण किया। उनकी रूचि को समझते हुए, ग्राम संगठन ने उन्हें वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग प्रदान किया। उन्होंने एक नर्सरी की स्थापना की और अपने खेत में कृषि-औद्यानिकरण को बढ़ावा दिया। वर्तमान में उन्होंने अपनी दो एकड़ की सिंचित भूमि में 200 सपोता, 20 नींबू, 50 काजू, 10 पपीता, 600 केला, 2 अमरूद, 2 अंजीर, 5 खजूर, 10 सुपारी, 25 नारियल, 70 ग्लिरिसिडिया एवं 500 से अधिक पौधे करी पत्ता के लगा रखे हैं, जबकि मेड़ों पर आम के 70 पौधे तथा सागौन के 200 पेड़ लगाये हैं। इसके अतिरिक्त, वे अपने खेत के सभी खाली स्थानों पर सब्ज़ियां एवं चारा घास उगाते हैं। वे कहते हैं, ‘‘मुझे हमेशा लगता है कि साल में किसी भी समय कोई हमारे घर आये तो मैं उसके सामने दो फल अवश्य प्रस्तुत कर सकता हूं। यहां उगायी गयी सभी चीजें जैविक हैं। इससे हमें न केवल स्वस्थ रहने में मदद मिलती है, वरन् हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।’’ किसान के ये गर्व भरे शब्द यह सुनिश्चित करते हैं, कि ये न सिर्फ अपने भोजन के लिए खेती करते हैं, वरन् पर्यावरण की सुरक्षा पर भी नजर रखे हुए हैं।
उन्होंने कम्पोस्ट बनाने, फसल चक्र, फसल आच्छादन, ट््रैप फसल, एकीकृत कीट प्रबन्धन एवं खेत पर बनी खाद का उपयोग बढ़ाकर अकार्बनिक निवेशों को कम किया। उन्होंने न केवल कार्बनिक पदार्थों में वृद्धि की, वरन् वातावरण से अधिकतम कार्बन पकड़ने में मदद की। कार्बन का भण्डारण बढ़ने से मृदा उर्वरता और नाइट््रोजन स्थिरीकरण की मात्रा बढ़ी। फसल विविधीकरण अपनाने से खेती में जोखिम कम हुआ। पर्यावरण-सम्मत अभ्यासों को अपनाने से उनका खेत परागणकर्ताओं के लिए एक केन्द्र के तौर पर तैयार हुआ और वनों की कटाई पर भी जांच रखी गयी।
तालिका 1 – आय-व्यय विश्लेषण
| क्र0 सं0 | विवरण | क्षेत्रफल व उत्पादन (एकड़ में) | आय (रू0 में) | व्यय (रू0 में) | कुल लाभ ;रू0 मेंद्ध | ||||
| 2014&15 | 2015&16 | 2014&15 | 2015&16 | 2014&15 | 2015&16 | 2014&15 | 2015&16 | ||
| 1 | fHk.Mh | 0-5 | 0-25 | 10000 | 15000 | 3000 | 3000 | 7000 | 12000 |
| 2 | lse | 0-25 | 0-5 | 8000 | 15000 | 2500 | 5000 | 5500 | 10000 |
| 3 | VekVj | 0-5 | 0-5 | 20000 | 60000 | 5000 | 10000 | 15000 | 50000 |
| 4 | fepZ | 0-25 | 0-12 | 7000 | 5000 | 2500 | 2000 | 4500 | 3000 |
| 5 | [khjk | 0-5 | 0-5 | 25000 | 20000 | 5000 | 5000 | 20000 | 15000 |
| 6 | rjksbZ | 0-07 | 0-25 | 5000 | 7000 | 2000 | 2000 | 3000 | 5000 |
| 7 | cht gsrq I;kt | 0-5 | 0-5 | 60000 | 90000 | 18000 | 20000 | 42000 | 70000 |
| 8 | djhiRrk | & | 10 ikS/kk | 6000 | 20000 | & | & | 6000 | 20000 |
| 9 | pkjk | & | & | & | & | & | & | 2000 | 2000 |
| 10 | ?kkl gsrq pkjk | & | 72 ikS/kk | 36500 | 36000 | ||||
| 11 | liksrk | 0 | 3 ikS/kk | & | 6000 | & | & | & | 6000 |
| 12 | dsyk | 600 ikS/k | 600 ikS/k | & | 150000 | 32000 | 30000 | 88000 | |
| dqy | 141500 | 317000 | |||||||
महादेवगौड़ा अन्तःखेती, नर्सरी स्थापना, सब्ज़ियों की खेती, मल्चिंग, खाद बनाना, कुशल सिंचाई एवं बायो-गैस डिगेस्टर के माध्यम से खाद प्रबन्धन जैसे अभ्यासों को भी करते हैं। उनके पास वर्मी कम्पोस्ट की 2 तथा अजोला की 2 इकाईंयां भी हैं। यह दृष्टिकोण ने उन्हें एक सर्कुलर आर्थिक मॉडल स्थापित करने में मदद की है, जिसमें पुनर्चक्रीकरण, पुर्नउपयोग एवं बाहरी निवेशों पर निर्भरता कम करने तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु संसाधनों का संयोजन शामिल है। वह भूगर्भ जल का समुचित उपयोग करते हैं और अपने छत वर्षा जल संरक्षण प्रणाली के माध्यम से अपने परिवार की पेयजल आपूर्ति को सुनिश्चित करते हैं।
उनके फलदार वृक्षों ने फल देना प्रारम्भ कर दिया है, जिसे तोड़कर वह बाजार में बेचते हैं और आमदनी प्राप्त करते हैं। पेड़ों से प्राप्त अपशिष्टों को वे वर्मीकम्पोस्ट की इकाई में डालते हैं और इस प्रकार बायोमॉस का पुनर्चक्रीकरण करते हैं। उनके पास दो वर्मी कम्पोस्ट इकाई हैं। वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करते हुए, उनके खेतों की मृदा में नमी धारण की क्षमती काफी अच्छी हो गयी है। खेत में कहीं भी खोदने परं केंचुओं की पर्याप्त उपलब्धता से यह स्पष्ट प्रदर्शित भी होता है। इससे उनके खेत की मृदा बनावट में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वह वर्मीकम्पोस्ट यूनिट में में तीन चक्र में वर्मी कम्पोस्ट तैयार करते हैं और प्रत्येक चक्र में 3 कुन्तल उत्पाद प्राप्त होता है। इस प्रकार वह एक साल में 18 कुन्तल वर्मीकम्पोस्ट तैयार करते हैं। एक जैविक तरल पदार्थ जीवामृत का नियमित उपयोग करते हैं।
उन्होंने अपने कुंए का पुनरूद्धार कराकर उसमें मछली पालन भी किया है, जिसके अगले वर्ष में तैयार हो जाने की उम्मीद है। इन्होंने अपने खेत में गेंदे के फूलों की खेती की, जो न केवल कीड़ों के आकर्षण को रोकते हैं, वरन् मधुमक्ख्यिों एवं कीटों को आकर्षित भी करते हैं, जो पारिस्थितिकी चक्र को पूरा करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। तीन वर्षों तक लगातार प्रयास करने के बाद, अब उनका खेत प्रकृति का एक केन्द्र बन चुका है, जो न सिर्फ विभिन्न स्थानों से स्थाई खेती सीखने वाले भ्रमणकर्ताओं को आकर्षित करता है, वरन् पर्यावरण को सुरक्षित एवं स्वस्थ रखने वाले बहुत सी चिड़ियों एवं प्राकृतिक परागणकर्ताओं के लिए भी आकर्षण का केन्द्र है। महादेवगौड़ा कहते हैं, ‘‘एक मक्खी को भी रहने के लिए स्थान की आवश्यकता है। जब यह गिरती हैं तो हमारे द्वारा की गयी क्रिया-कलापांे के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाओं को आसानी से मापा जा सकता है।’’ उनकी मंशा है कि उनका खेत स्वस्थ वातावरण को प्रदर्शित करे।
महादेवगौड़ा अपनी खेती को अपना पूरा समय देते हैं और अब वे प्रतिवर्ष 2 लाख रूपये से अधिक कमाते हैं ;देखंे तालिका सं0 1द्ध। जिले में तीन साल तक लगातार व भयंकर सूखा पड़ने के बावजूद उनकी खेती कृषि-पारिस्थितिकी कृषि प्रणाली तथा खेत पर संसाधनों के पुनर्चक्रीकरण के मॉडल के तौर पर उभर कर सामने आयी है। उनसे उत्प्रेरित होकर, ग्राम संघ के अन्य सदस्यों ने स्थाई कृषि अभ्यासों को अपनाना प्रारम्भ कर दिया है। पारिस्थितिकी प्रणाली का संरक्षण करने के अतिरिक्त, यदि गांव के 50 प्रतिशत किसान भी स्थाई कृषि अभ्यासों को अपना लें तो 3 करोड़ रूपयों के आय अर्जन की पूरी संभावना है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में यह एक बड़ा कदम हो सकता है। इसलिए, यही उपयुक्त समय है कि जलवायु अनुकूलित कृषि पारिस्थितिकी खाद्य प्रणाली की ओर बड़ा निवेश किया जाये, जिससे उत्पादन में वृद्धि हो और बिना पर्यावरण स्थाईत्व को नुकसान पहुंचाये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो।
रंचिथा कुमारन एवं भास्कराभट्ट जोशी
रंचिथा कुमारन एवं भास्कराभट्ट जोशी
रिलायंस फाउण्डेशन
आर सी पी, परियोजना कार्यालय, प्रथम तल
घनसोली, नवी मुम्बई – 400701
ई-मेल:ranchitha.kumaran@reliancefoundation.org
Bhaskarabhatta.Joshi@reliancefoundation.org
Source: Recycling resources inagroecological farms, LEISA India, Vol. 21, No. 2, June 2019



