मटका खाद ने दिखाया खुशहाली का रास्ता

Updated on June 4, 2020

बाढ़ प्रवण इलाका एवं मौसम की अनिश्चितता दोनों ही वहां रहने वाले किसानों के लिए चुनौती भरे होते हैं। बाढ़ प्रवण इलाके में लोग खरीफ की खेती करते ही नहीं अथवा करते हैं तो भगवान भरोसे। ऐसी स्थिति में अन्य ऋतुओं में खेती को लाभप्रद बनाना अधिक उपयोगी होता है। इसे ग्राम बचनाहा की आशा देवी ने सिद्ध किया है।


बिहार राज्य के सुपौल जिला अन्तर्गत प्रखण्ड निर्मली के ग्राम पंचायत कुनौली में स्थित ग्राम बचनाहा की श्रीमती आशा देवी एक उत्साही महिला किसान हैं। राज्य के अन्य भागों की तरह यह क्षेत्र भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से अछूता नहीं है। कोसी नदी के समीप स्थित यह प्रखण्ड सुपौल के अन्य प्रखण्डों की अपेक्षा अधिक बाढ़ प्रभावित है। पीढ़ियों से इनके परिवार की आजीविका का प्रमुख स्रोत खेती है और इनकी खेती कोसी नदी परिक्षेत्र में पड़ती है। यद्यपि इनके पास 3 एकड़ खेती है, परन्तु सभी नदी के पेटे में है, मात्र 0.47 एकड़ खेत पर ही खेती हो पाती है जिससे इनके 8 सदस्यीय परिवार का भरण-पोषण संभव नहीं था। पहले ये मात्र एक फसल गेंहूं की ही ले पाती थीं, क्योंकि धान तो बाढ़ की भेंट चढ़ जाता था। ऐसी स्थिति में 0.47 एकड़ खेत से प्राप्त उपज से इनके परिवार की खाद्य आपूर्ति मात्र 3-4 महीने ही हो पाती थी। शेष के लिए इनकी निर्भरता गांव व आस-पास खेतिहर मजदूरी तथा पति के पलायन पर इनकी निर्भरता होती थी।

किसानों की आजीविका, महिला सशक्तिकरण एवं जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर काम करने वाले स्वैच्छिक संगठन गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन गु्रप ने वर्ष 2019 फरवरी में सी-टीबीआर परियोजना के अन्तर्गत सुपौल जिला को चयनित किया और इसी के तहत् निर्मली एवं मरौना प्रखण्ड में विभिन्न माध्यमों से समुदाय के साथ काम करना प्रारम्भ किया। इसी क्रम में निर्मली प्रखण्ड के बचनाहा ग्राम में गांव की समस्याओं को समझने हेतु सर्वप्रथम संस्था कार्यकर्ताओं ने समुदाय के साथ बैठकें कर उनके सामने आने वाली खेती सम्बन्धित चुनौतियों के बारे में जानकारी करने का प्रयास किया जिसमें निकल कर आया कि गांव के 80-85 प्रतिशत खेतिहर किसान सिर्फ एक ऋतु ;रबीद्ध में ही खेती कर पाते थे। साथ ही रसायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से खेती पर लगने वाली लागत भी अधिक लगती थी।

अपने विभिन्न गतिविधियों के साथ संस्था कार्यकर्ताओं ने गांव में किसान विद्यालय चलाना प्रारम्भ किया जिसमें किसानों से सम्बन्धित समस्याओं एवं उनके समाधान पर चर्चा होती है। संस्था के कार्यों को जानने के लिए उत्सुक आशा देवी ने इन किसान विद्यालयों में प्रतिभागिता करनी प्रारम्भ कर दी जहां पर उन्हें गरमा धान की प्रजाति बीआरआरआई-75 के बारे में पता चला। उन्होंने फरवरी माह में की जाने वाली इस प्रजाति को अपने 0.47 एकड़ खेत में लगाया और खाद की आवश्यकता पड़ने पर यूरिया के स्थान घर पर बने मटका खाद का उपयोग किया जिसे उन्होंने संस्था कार्यकर्ताओं की मदद से तैयार किया था। स्थानीय संसाधनों- गाय का गोबर, नीम, धतूर आदि की पत्तियों से बनाये गये मटका खाद के तैयार होने की अवधि 22 दिनांे की होती है।

आशा देवी ने जैविक खाद का उपयोग कर 0.47 एकड़ में 10 कुन्तल धान प्राप्त किया, जबकि रसायनिक खाद के उपयोग से मात्र 8 कुन्तल ही मिलता है।

आशा देवी का कहना है ‘‘मैंने 20 लीटर के बड़े मटके में गाय का गोबर, नीम, धतूर आदि की पत्तियों के साथ लहसुन कुचल कर डाल दिया। 22 दिनों बाद मैंने गरमा धान के खेत में उसका प्रयोग किया जिससे हमारी फसल में कल्ले ज्यादा निकले और खेत हरा-भरा रहा और नमी भी ठीक दिखाई दिया।’’ परिपक्वता अवधि पूर्ण होने पर उन्होंने 0.47 एकड़ से 10 कुन्तल धान की उपज प्राप्त की जबकि रसायनिक खाद के उपयोग से मात्र 08 कुन्तल उपज ही प्राप्त होती है। इसके साथ ही उन्होंने मटका खाद का उपयोग कर यूरिया खाद में लगने वाले रू0 2400.00 की भी बचत कर ली। साथ ही खेत की उर्वरा शक्ति भी बरकरार रही।

आगे का रास्ता
आशा देवी ने प्रसन्न होते हुए बताया ‘‘मटका खाद के उपयोग को देखते हुए गांव के अन्य बहुत से किसान मटका खाद बनाने की ओर प्रवृत्त हुए और अपनी फसलों में इसका उपयोग कर रहे हैं।’’ आशा देवी के प्रोत्साहन से गांव के लोग बड़ी मात्रा में मटका खाद बनाया। उन्होंने गांव वालों के साथ मिलकर यह भी तय किया कि प्रत्येक 22-25 दिन पर एक ही साथ मटका खाद बनाकर मटका खाद उत्सव मनायेंगे। अब वे नियमित अन्तराल पर मटका खाद उत्सव मनाती हैं। उन सब लोगों का एक ही नारा है – ‘‘घर-घर मटका, रहेगा लटका।’’

आशा देवी के प्रयासों की सफलता को देखकर आस-पास के गांवों के किसान भी उनसे मटका खाद बनाने की विधि पूछने लगे हैं और वह संस्था द्वारा आयोजित किसान विद्यालयों में जाकर मटका खाद एवं उससे होने वाले लाभों के प्रति अपने अनुभवों को साझा करती हुई उन्हें रसायनिक उर्वरकों के उपयोग से बचने तथा मटका खाद का उपयोग करने हेतु प्रेरित कर रही हैं।
सफर अभी जारी है।

लेखकगण गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन गु्रप के सी-टीबीआर परियोजना अन्तर्गत कार्यरत हैं। अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क किया जा सकता है- रवि प्रकाश मिश्रा, परियोजना समन्वयक सम्पर्क नं0 9936279554।

निराला ठाकुर, सत्येन्द्र कुमार तिवारी एवं रवि प्रकाश मिश्रा

 

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