शून्य लागत खेती

Updated on June 3, 2020

श्री मालेशप्पा गुलप्पा बिसेरोट्टी कर्नाटक के धारवाड़ जिले में अवस्थित कुण्डगोल तालुक के हीरेगुंजल गांव के रहने वाले हैं। 1990 के बाद से यह क्षेत्र लगातार पानी की भयंकर कमी से जूझ रहा है।

वह पिछले एक दशक से जैविक खेती अभ्यासों को अपना रहे हैं। पहले, बिसेरोट्टी ने खेत से उत्पन्न अपशिष्टों से बने खाद, कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करना प्रारम्भ किया। चार वर्षों तक इनका उपयोग करने के बाद उन्होंने देखा कि उनकी फसल बेहतर होने लगी है। उन्होंने एक तरल जैविक पदार्थ जीवामु्रता का प्रयोग करना प्रारम्भ किया। लेकिन, उन्होंने देखा कि तरल जीवामु्रत तैयार करने में पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। जल की कमी को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने ठोस जीवामु्रत तैयार करने का प्रयोग प्रारम्भ किया और पिछले 6 वर्षों से वे फसलों पर उसका सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं।

देशी गाय अथवा बैल का 10 किग्रा0 गोबर, 250 किग्रा0 पिसी हुई दाल, 250 ग्राम गुड़, 500 ग्राम मिट्टी एवं डेढ़ से दो लीटर गौमूत्र मिलाकर ठोस जीवामु्रत तैयार किया जाता है। इन सभी सामग्रियों को एक साथ मिलाकर किसी छायादार स्थान पर 24 घण्टों के लिए बोरी से ढंककर रख देते हैं। अगले दिन, बोरी को हटा देते हैं और छाये में 25-30 दिनों तक सूखने के लिए छोड़ देते हैं, जिससे ठोस जीवामु्रत तैयार हो जाता है। बारीक एवं दानेदार जीवामु्रत को अलग-अलग करने के लिए बारीक छन्नी से छान देते हैं। इसके बाद इसे सीधे बीज के साथ मिलाकर बुवाई करते हैं या फिर टापड्र ्ेसिंग में प्रयोग करते हैं। श्री बिसेरोट्टी ने देखा कि इस पद्धति से केंचुओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जो जैविक खेती के लिए आशा की एक नई किरण है।

उन्होंने ट््रे में केंचुओं को विकसित करना प्रारम्भ किया। इसके लिए उन्होंने 20 किग्रा0 ठोस जीवामु्रत में ढाई लीटर पानी मिलाकर तीन दिनों तक छोड़ दिया। उन्होंने पाया कि 45 दिनों तक गर्मी पाने के बाद उसमें लगभग 1000 केंचुए ट््रे में हो गये हैं। 71 दिनों में वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने के बाद, उन्होंने पाया कि बहुत से केंचुए, प्यूपा और छोटे कीड़े उत्पन्न हो गये हैं। इसके साथ ही उन्होंने पाया कि ट््रे में 1500 पूर्ण विकसित केंचुए हैं। उन्होंने प्रत्येक ट््रे से 20 किग्रा0 वर्मी कम्पोस्ट लिया, जिसमें कम्पोस्ट और ठोस जीवाम्रुत तैयार कर फसलों पर उसका प्रयोग किया।

वह प्रत्येक दिन प्रति ट््रे कम से कम 15 किग्रा0 ठोस जीवाम्रुत तैयार करते हैं। एक साल में लगभग 5 मीट््िरक टन जीवाम्रुत तैयार करते हैं। श्री बिसरेट्टी प्रत्येक वर्ष 10 मीट््िरक टन वर्मी कम्पोस्ट तैयार करते है। इन जैविक उत्पादों के साथ, वह स्थाई फसलें उगाने में सक्षम हैं, जो निश्चित तौर पर रसायनिक खेती अभ्यासों के माध्यम से प्राप्त उत्पादों की अपेक्षा प्राकृतिक रूप से काफी बेहतर होते हैं। उन्होंने 17 नीम के पेड़ों से बीज एकत्र कर 200 किग्रा0 नीम की खली तैयार किया और नीम की पत्तियों का उपयोग वर्मी कम्पोस्ट बनाने में करते हैं।

श्री बिसेरोट्टी स्थानीय तौर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से तैयार कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट तथा स्थानीय बीज का उपयोग करते हुए स्थाई कृषि करते हैं। जैविक खेती की इस पद्धति को अपनाकर अनिश्चित एवं कम वर्षा की परिस्थितियों में भी वह अपनी प्रति एकड़ जमीन में बेहतर फसल उत्पादकता प्राप्त करने में सक्षम हो रहे हैं। इसके अलावा, इनके उत्पाद खाने में भी बेहतर होते हैं और बहुत दिनों तक भण्डारण करने के बाद भी उनके पोषण तत्वों का ह्रास नहीं होता है। श्री बिसेरोट्टी का मानना है कि इस पद्धति से स्थाई खेती बनाये रखने में मदद मिलेगी और अनिश्चित और असंभावित वर्षा स्थितियों में भी कृषि से बेहतर पारिश्रमिक आय प्राप्त होगी।

ग्राम हिरेगुंजल, कुण्डगोला तालुक, जिला- धारवाड, कर्नाटक भारत के रहने वाले श्री मालेशप्पा गुलप्पा बिसेरोट्टी से मोबाइल नं0 9945011754 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

के वी पाटिल, आई एस राव


के वी पाटिल
पी0एच0डी0 स्कॉलर
आई एस राव
प्रोफेसर एवं विश्वविद्यालय प्रमुख
प्रसार शिक्षा संस्थान ;ईईआईद्ध
पीजेटीएसएयू, हैदराबाद, तेलंगाना, भारत

नेशनल इन्स्टीच्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल एक्सटेन्शन मैनेजमेण्ट ;मैनेजद्ध, राजेन्द्रनगर, हैदराबाद-5000330, तेलंगाना राज्य, भारत द्वारा 2018 में प्रकाशित पुस्तक ‘‘इन्स्पायरिंग स्टोरीज फ्राम इन्नोवेटिव फार्मर्स, में डॉ0 मुतन्ना, डॉ0 लक्ष्मी मुर्थी, डॉ0 सर्वानन राज द्वारा लिखित लेख का यह सम्पादित अंश है।

Source: Agroecology- The future of farming, LEISA India, Vol. 21, No.3, Sep 2019

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