खेती के लिए छोटी जोत को लाभकारी न मानने वाले किसानों के लिए एकीकृत खेती मॉडल एक बेहतर विकल्प हो सकता है। इसे हरियाणा, सोनीपत के रमेश चन्दर डागर ने अपने खेत पर सिद्ध किया है। उन्होंने अपने खेत पर बहुत से अभ्यासों- मधुमक्खी पालन, मछली पालन, बायोगैस प्लाण्ट, कम्पोस्टिंग, सब्ज़ियों की खेती आदि के माध्यम से पूरे हरियाणा में एक अलग पहचान स्थापित की है।
एक हेक्टेयर भूमि से रू0 10,00,000.00 का लाभ उन लोगों के लिए भले ही अविश्वसनीय लगता हो, जिनका विचार है कि छोटी जोत हमेशा नुकसान देती है। लेकिन रमेश चन्दर डागर ने इस कल्पना को वास्तविकता में बदल दिया है। हरियाणा के सोनीपत जिले में स्थित अकबरपुर बरोटा गांव में उनके खेत के भ्रमण से आंखें खुल सकती हैं। उनका खेत किसी भी कृषि वैज्ञानिक के प्रयोगशाला जैसा प्रतीत होता है। डागर कहते हैं, ‘‘मैं एक साधारण किसान हूं, जिसने सिर्फ 10वीं तक की पढ़ाई की है। मैं सरकार के दावों को हमेशा सुनता रहा कि छोटी जोत में खेती करना कभी भी व्यवहारिक नहीं रहा है।। और पिछले कुछ वर्षों तक मेरा सोचना भी यही था। पिछले चार वर्षों पहले, मैंने अपने कृषिगत भूमि में से एक तरफ की एक हेक्टेयर भूमि को लिया और उस पर प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया। इस बात पर मेरा दृढ़ निश्चय था कि इससे प्रतिवर्ष कम से कम रू0 10,00000.00 की आमदनी हो सकती है।
एकीकृत जैविक खेती के बारे में जानने के दौरान डागर का कहना है कि, ‘‘सिर्फ कीटनाशकों का उपयोग न करना ही एकीकृत खेती नहीं है।’’ उनका कहना है, ‘‘यह और भी बहुत से अभ्यासों जैसे- मधुमक्खी पालन, दुग्ध प्रबन्धन, बायोगैस उत्पादन, जल संरक्षण एवं खाद बनाना आदि का सम्मिलित रूप है। इन सभी गतिविधियों के बेहतर संयोजन से जैविक खेती निश्चित तौर पर पारिस्थितिकी एवं आर्थिक दोनों रूपों में सफल होगी।’’
आज वह अपने गृह राज्य में एकीकृत जैविक खेती का संदेश प्रचारित करने में व्यस्त हैं। अन्य किसानों के सहयोग से, उन्होंने हरियाण किसान वेलफेयर क्लब की स्थापना की है। राज्य के सभी जिलों में इस क्लब की शाखाएं हैं। लगभग 5000 किसान इस क्लब के सक्रिय सदस्य हैं और वे अपने अपने क्षेत्रों में एकीकृत जैविक खेती का प्रचार-प्रसार तेजी से कर रहे हैं। इसकी देखा-देखी राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं गुजरात जैसे राज्य भी अपने क्षेत्रों में जैविक खेती क्लब बनाने हेतु प्रयास कर रहे हैं।
करके सीखने की पद्धति को अपनाते हुए डागर ने वर्ष 1971 में लगभग 1.6 हेक्टेयर में जैविक खेती करना प्रारम्भ किया था, जो आज 44 हेक्टेयर में विस्तारित हो चुका है और ये सभी की सभी पूर्ण रूप से एकीकृत जैविक खेती के अन्तर्गत आती हैं। बाजार की मांग, उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन और उत्पाद की गुणवत्ता को बनाये रखना, इन तीन कारकों की स्पष्ट समझ ने उन्हें सफल होने में सहायता प्रदान की हे। अपने जैविक उत्पादों के लिए अच्छा बाजार पाना बहुत से किसानों के लिए मुश्किल है, लेकिन डागर के लिए नहीं। वह कहते हैं, ‘‘एक नयी फसल की बुवाई से पहले, मैं बाजार का सर्वेक्षण कर उस फसल की मांग को समझता हूं। यह भी सही है कि मैं केवल 60 प्रतिशत ही यह निश्चित होता हूं कि बेहतर परिणाम होगा, 40 प्रतिशत का जोखिम मैं भी लेता हूं।’’ और बहुत से मामलों में यह जोखिम बेहतर कार्य करता है।
डागर के खेत में लगभग सभी मौसमी सब्ज़ियां, फल, धान, गेंहू, मशरूम और फूल सभी जैविक तरीके से उगायी जाती हैं। उन्होंने निर्यात के लिए कुछ विदेशी सब्ज़ियों जैसे- लेट्यूस, बेबी कार्न एवं स्ट््राबेरी भी उगाना प्रारम्भ कर दिया है। इस नवोन्वेषी किसान ने अपने एक हेक्टेयर खेत को शोध के उद्देश्य से अलग कर रखा है, जिसे डागर की शोध प्रयोगशाला के नाम से जाना जाता है। वे कहते हैं ‘‘इस भूमि के माध्यम से मैं यह सिद्ध करना चाहता हूं कि वे सभी जो जैविक खेती के लाभ के प्रति सशंकित हैं, वे गलत हैं। कड़ी मेहनत और प्रकृति के बारे में समझ बनाते हुए कोई भी किसान प्रति वर्ष न्यूनतम रू0 10 लाख अर्जित कर सकता है। मैं नहीं समझ पाता कि क्यों प्रत्येक व्यक्ति एक नौकरी के पीछे भाग रहा है।’’
डागर की शोध प्रयोगशाला एक कल्पना की तरह दिखता है। इसके एक छोर पर कम्पोट बन रहा है तो दूसरे छोर पर फूल उगाये जा रहे हैं, इसमें एक तरफ तालाब है जिसमें मछलियां भी हैं तो वहीं पर एक बायोगैस प्लाण्ट भी है। और उनके खेत के ये सभी तत्व अनेक कृषि चक्रों के माध्यम से एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित हैं और एक-दूसरे के साथ इन सभी को मिलाकर वार्षिक आय रू0 13-14 लाख हुई है। ;देखें तालिका: फार्म गोल्डद्ध इसके अलावा खेत में सौर उर्जा का उपयोग कर मूल्यवान उर्जा की भी बचत हो रही है।
आइये हम डागर के खेत में वर्मी कम्पोस्टिंग के चक्र को देखें। इस सन्दर्भ में डागर का कहना है कि ‘‘लगभग सभी भारतीय किसान धान की फसल लेने के बाद बचे हुए अवशेष को जला देते हैं, जिसे स्थानीय तौर पर हम पुआल के नाम से जानते हैं। वास्तव में केंचुए की खाद बनाने के लिए यह एक सर्वोत्तम कच्चा माल होता है। इसके उपयोग के माध्यम से मैं प्रतिवर्ष 300 टन केंचुए की खाद तैयार करता हूं।’’ आगे बताते हुए वे कहते हैं, ‘‘तैयार खाद का एक हिस्सा मैं अपने खेतों में उपयोग करता हूं और शेष को 3 रू0 प्रतिकिग्रा0 की दर से बेच देता हूं।
डागर का दावा है कि वर्मी कम्पोस्ट एक बेहतर मृदा पोषण है। इससे न केवल मृदा में नमी रोकने में सहायता मिलती है, वरन् इससे पानी के उपभोग में लगभग 25 प्रतिशत तक की कमी आती है। जो किसान जैविक खेती करने की ओर प्रवृत्त होते हैं, उन्हें डागर 2 किग्रा0 केंचुआ मुफ्त में देते हैं। वे पुआल का उपयोग मशरूम उगाने के लिए भी करते हैं, जिससे उन्हें लगभग 3 लाख रूपये वार्षिक की आमदनी होती है। वर्मीकम्पोस्ट के अलावा, डागर सामान्य खाद भी तैयार करते हैं। वे अपने खेत से लगभग 600 टन साधारण खाद उपार्जित करते हैं। डागर का लक्ष्य है कि इस वर्ष के अन्त तक 1000टन साधारण खाद उपार्जित किया जाये।
खेत पर दुग्ध उत्पादन, बायोगैस और कम्पोस्टिंग का दूसरा कृषि चक्र है। डागर के डेयरी में लगभग 50 भैंसे हैं। उनके गोबर से 50 क्यूबिक मीटर की क्षमता वाले बायोगैस प्लाण्ट को चलाया जाता है। प्लाण्ट को बैठाने में लगभग एक लाख रू0 लगा। इस गैस का उपयोग वे अपने स्वयं की रसोई के लिए करते हैं इसके साथ ही चारा काटने वाली मशीन चलाने के लिए भी इसका उपयोग होता है। प्लाण्ट से निकले अपशिष्ट से कम्पोस्ट का गढ्ढा भरा जाता है।
डागर के खेत में तालाब एक दूसरा कृषि चक्र है। बहुत से किसानों का मानना है कि खेत में तालाब होने से कीमती कृषि भूमि का नुकसान होगा। इस विषय में डागर का कहना है, ‘‘हम किसानों को जल संग्रहण के लिए कहते हैं। लेकिन यह उनके लिए कैसे लाभप्रद होगा, यह सुनिश्चित नहीं हो पाता। इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर किया। और मैंने जल संग्रहण करने का निश्चय किया, जिससे मुझे तात्कालिक लाभ भी हो।’’ वह अपने खेत के तालाब मंे वर्षा जल संग्रहण करते हैं, जिसका उपयोग वे अपनी भैंसों को नहलाने के लिए करते हैं। जैविक किसान डागर अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि ‘‘मैंने उसमें मछली पालन भी किया, जिससे मुझे प्रतिवर्ष लगभग रू0 30,000.00 की आमदनी होती है। इस प्रकार मैं न सिर्फ भूगर्भ जलस्तर का पुनर्भरण कर रहा हूं, वरन् इससे पैसे भी कमा रहा हंूं।’’
डागर की कृषि सम्बन्धित गतिविधियों में मधुमक्खी पालन सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इससे 10-30 प्रतिशत तक अधिक फसल प्राप्त होती है। इसका कारण यह है कि मधुमक्खी प्राकृतिक परागण में बहुत प्रभावी होती है। इसके अलावा, शहद की मांग भी बहुत अधिक होती है। डागर ने लगभग 150 मधुमक्खी के बक्सों को रखा है, जिससे प्रत्येक से लगभग 35-40 किग्रा0 शहद उत्पादित होता है। शहद से उनकी कुल वार्षिक आमदनी रू0 4 लाख है। डागर कहते हैं ‘‘मधुमक्खी पालन एक बहुत ही लाभकारी धन्धा है। इसे एक भूमिहीन किसान भी अपना सकता है। और एक किसान सामान्यतः मधुमक्खी द्वारा आच्छादित क्षेत्र लगभग 2-3 किमी0 के परिक्षेत्र को लाभान्वित कर सकता है।’’
डागर ने रू0 4 लाख की लागत का एक सोलर पैनल भी स्थापित किया है। इसे स्थापित करने में इन्होंने सिर्फ रू0 67,000 व्यय किया, शेष सरकारी अनुदान है। अपने खेत पर ये सोलर पैनल का उपयोग सिंचाई करने के समय मोटर चलाने के लिए करते हैं। इसके बाद जो शेष उर्जा बचती है, उससे ये अपने घर के इन्वर्टर की बैटरी चार्ज करते हैं। इनके खेत में एक तरफ लगभग 500 वर्गमीटर में ग्रीन हाउस बना हुआ है, जिसमें वे महंगी फसलें उगाते हैं और प्रति वर्ष रू0 1 लाख तक कमाते हैं।
खबर का प्रसार
आज, डागर पूरे देश में एकीकृत खेती के बारे में खबर फैलाने में व्यस्त हैं। उनके इस अभियान में हरियाणा के किसान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हरियाणा किसान वेलफेयर क्लब लोगों को जैविक खेती पर प्रशिक्षण देता है। चूंकि अधिकांश किसान जिला क्लबों पर नहीं आ सकते, इसलिए गांव स्तर पर कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। इस वर्ष फरवरी में, सोनीपत में लगभग 4000 किसानों की एक सभा आयोजित की गयी थी। किसानों के अलावा इसमें विशेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिकों एवं प्रशासकों को भी आमन्त्रित किया गया था। लेकिन डागर का मानना है कि एकीकृत जैविक खेती करने की दिशा में सरकारी तंत्र को उत्प्रेरित करना एक बड़ा काम है। उनकी सामान्य टिप्पणी है ‘‘जो सरक-सरक कर चले वो सरकार है। अर्थात् सरकार की प्रक्रिया बहुत धीमी गति से चलती है।’’
लेकिन डागर सरकारी सहायता की प्रतीक्षा नहीं करते हैं। उन्होंने जैविक खेती को अपना अभियान बना लिया है। वह कहते हैं, ‘‘मैंने अपने खेत में अनेक फसलों के साथ प्रयोग कर रखा है। उदाहरण के लिए, इस समय मैं एक चाइनीज पौधा उगाने का प्रयास कर रहा हूं, जो चीनी से 300 गुना अधिक मीठा है, लेकिन इसमें कोलेस्ट््राल नहीं है। यदि में अपनी खोज में सफल हुआ, तो मैं इसे अन्य लोगों के लिए संस्तुत करूंगा। इस पौधे के औषधीय गुण के कारण अन्तर्राष्ट््रीय बाजार में इसकी बहुत मांग है। जरा पीछे चलते हैं, वर्ष 1987 में उन्होंने अपने 0.40 हेक्टेयर में बेबी कार्न को लगाया था, आज सोनीपत में बेबी कार्न की खेती लगभग 485 हेक्टेयर भूमि में होती है।
भावी चुनौतियां
सफलता के साथ नयी चुनौतियां भी आती हैं। रसायनों का उपयोग कर उगाये गये खाद्य के मुकाबले जैविक खाद्य का मूल्य अधिक मिलता है। डागर ने इसी बात का फायदा लेने का प्रयास किया। उन्होंने जैविक खाद्य की विशेषता को बताते हुए उसकी बिक्री हेतु उन्होंने अच्छी विपणन रणनीति का उपयोग किया। जैविक खाद्य के विपणन हेतु इन्होंने स्वैच्छिक संगठनों के साथ भी जुड़ाव स्थापित किया है। दोहरी सुनिश्चितता स्थापित करने के लिए, उन्होंने अनेक जैविक खाद्यों की मांग को सुनिश्चित करने के लिए स्वयं बाजार शोध किया है।
डागर जैसे जैविक किसानों के लिए दूसरी समस्या यह है कि भारत में जैविक खाद्यों को मुख्य धारा में शामिल करने के लिए प्रक्रियाओं का अभाव है। इसके साथ ही एक प्रकार का प्रमाण पत्र सभी देशों के लिए वैध नहीं है। डागर पूछते हैं, ‘‘जैविक खाद्य के विषय को समझने और उस पर अन्तर्राष्ट््रीय प्रमाण पत्र जारी करने के लिए कृषिगत और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद विशेषज्ञ विकास प्राधिकरण नोडल एजेन्सी है। इसके अन्तर्गत लगभग 10 कम्पनियां पंजीकृत हैं, जिसमें से भारतीय फर्म सिर्फ केवल एक है। कम्पनी के अधिकारियों के एक दिन के दौरे पर लगभग रू0 15,000.00 की लागत आती है, जो भारतीय किसानों के लिए बहुत अधिक पैसा है।
हरियाणा किसान वेलफेयर क्लब ने इस मुद्दे को सरकार के साथ उठाया, परन्तु सफलता नहीं मिली। अन्ततः इसने गुड़गांव की एक निजी कम्पनी से प्रमाणीकरण के लिए सम्पर्क साधा। कम्पनी एक माह के अन्दर इस पर काम करने लगेगी। क्लब समूह प्रमाणीकरण योजना के उपर काम कर रही है ताकि बड़े किसानों के साथ छोटे किसानों को भी फायदा मिल सके।
तालिका 1: फार्म गोल्ड
| आय का स्रोत | वार्षिक आय (रू0 लाख मेंद्ध) |
| वर्मी कम्पोस्ट | 5 |
| दुग्ध पालन | 1 |
| मशरूम | 3 |
| शहद | 4 |
| मछली पालन | 0.3 |
| कुल | 13.3 |
स्रोत: 30 मार्च, 2004 को रमेश चन्दर डागर, ग्राम- अकबरपुर बरोटा, सोनीपत, हरियाणा, से व्यक्तिगत बात-चीत के आधार पर
निधि जामवाल
स्रोत: यह लेख मूलतः डाउन टू अर्थ में प्रकाशित किया गया है।
Source: Recycling resources in agroecological farms, LEIS India, Vol 21, No.2, June 2019



