संसाधन दक्षता हेतु पुनर्चक्रण:ः विस्तार का एक व्यवहारिक तरीका

Updated on September 6, 2020

जैविक कृषि अवशेषों का व्यवस्थित पुनर्चक्रण करते हुए मूल्य संवर्धन करके खेत को अधिक उत्पादक और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। कई मायनों में देखा जाय तो, पुनर्चक्रीकृत संसाधन भी किसानों को पारिस्थितिक सेवा प्रदान करने में सक्षम बनाते हैं। खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए जलवायु अनूकूलन सुनिश्चित करने में संसाधनों के पुनर्चक्रीकरण का अधिक महत्व होता है।


परंपरागत रूप से किसान संसाधनों का पुनर्चक्रीकरण एवं पुर्नउपयोग करते रहे हैं। छोटे एवं सीमान्त किसान परिवारों की महिला किसान विशेष रूप से कृषि संसाधनों का पुनर्चक्रण करने मे अच्छी और नवाचार करने मे बेहतर हैं। वे अपने खेतों के अवशेषों को ईंधन के रूप में उपयोग करती हैं। महिलाएं इसका उपयोग कई प्रकार से कर रही हैं, जैसे- गोबर से ईंधन बनाना अथवा गृहवाटिका के लिए गोबर से खाद तैयार करना। रसोई में बचे हुए खाने एवं कचरे को कुत्तों और मवेशियों के लिए प्रयोग करती हैं साथ ही रसोई घरों के अन्य कचरे को कम्पोट गढ्ढों में डालकर उसको नारियल एवं ताड़ के पौधों को लगाने वाले गढ्ढे में प्रयोग किया जा रहा है। जब परिवार के खाने और अन्य जरूरतों के लिए ज्यादातर महिलाएं अपने स्वयं के खेत पर निर्भर रहती है, ऐसे में यह एक शून्य अपशिष्ट और पूरी तरह पुनर्नवीनीकरण प्रणाली है। इस प्रकार ये एक जीवन के रूप में अपने खेतों को अगली पीढ़ी को सौंप देती हैं।

छोटे खेतों से परिवारों की जरूरतों एवं आय को पूरा करने के लिए, खेत पर विभिन्न घटकों को एकीकृत करके, संसाधनों को अधिकतम और उचित रूप से उपयोग करने के लिए योजना तैयार की गयी है, जिससे पुनर्नवीनीकरण करके खेतों को विभिन्न तरह से लाभकारी एवं पर्यावरण के अनुकूल खेतों में बदल दिया गया है। कृषि संसाधनों के पुनर्चक्रण से निवेश लागत कम होती है, बाहरी संसाधनों के लिए बाजार पर निर्भरता कम होती है और उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार होता है, जिससे अंततः जलवायु परिवर्तन की स्थिति में भी खेत की स्थिरता बनी रहती है।

पहल
छोटे और सीमांत भूमि जोत के किसान अपनी आजीविका के स्रोतों के लिए खेती पर निर्भर करते हैं। साथ में किसान पशुपालन/मुर्गीपालन आदि घटकों को भी अपनाते हैं। आईसीएआर-सीपीसीआरआई ने केरल राज्य के अलाप्पुझा जिले के पथियोर पंचायत में 1000 परिवारों के साथ आईसीएआर के एक कार्यक्रम थ्प्त्ैज् ;खेत, नवाचार, संसाधन, विज्ञान एवं तकनीकद्ध का क्रियान्वयन वर्ष 2016 से किया। इस कार्यक्रम में शामिल किसानों की औसत भूमि जोत 0.32 हेक्टेयर है और उनकी निवेश करने तथा प्रबन्धन की क्षमता के आधार पर एक से लेकर 30 तक पशुधन इकाइयाँ हैं।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में पंचायत में उपलब्ध सामाजिक संपत्तियों, किसानों द्वारा किया जाने वाला समय उपयोग, खेती एवं आजीविका में आने वाली समस्याओं और कारणों, खेती के समय, आदि के सहभागी विश्लेषण के लिए सहभागी ग्रामीण मूल्यांकन ;पी0आर0ए0द्ध का आयोजन किया गया। विश्लेषण से निकलकर आया कि पशुओं के कचरों का निपटान करना किसानों की प्रमुख समस्या और चिंता थी। श्री गोपालकृष्ण पिल्लई, कोट्टीनट्टु बंगलावु ने कहा कि “30 गायों के मूत्र और शेड धोने वाले तरल गोबर के कारण घर के आस-पास गन्दगी होने से परिवार के साथ-साथ जानवरों के लिए स्वास्थ्यवर्धक स्थिति बनाए रखने में बाधा आती है। इसके अलावा चूंकि मेरे घर से 200 लीटर से अधिक दूध सीधे बेचा जा रहा है। इसलिए जानवरों के कचरे से निकलने वाली अनियंत्रित गंध के कारण दूध उत्पादन की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता था और उपभोक्ताओं की शिकायत भी रहती थी। इसके अलावा, पड़ोसी भी शिकायत कर रहे थे, क्यांेकि स्थानीय सरकार ने इन इकाइयों के प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रमाणन लागू किया था।

चावल के पानी का पुनः उपयोग करते हुए केले के फलों के विकास और सब्जियों में कीट प्रबंधन के लिए इसका छिड़काव किया जाता है।

इन समस्यओं के निदान के लिए आईसीएआर ;भारतीय कृषि परिषदद्ध के किसान फर्स्ट कार्यक्रम (थ्थ्च्) के अन्तर्गत आईसीएआर-सीपीसीआरआई ने एक व्यावहारिक मॉडल तैयार किया। इसके अन्तर्गत पशु अवशेषों के पुनर्चक्रण के तरीके को बताया गया, जो निम्न है-
1. गाय के गोबर की प्रकृति (अर्धसूखा एवं गीला पदार्थ) और मात्रा का विश्लेषण करना, जिसमें गौ-मूत्र एवं पशुशाला धुलाई का प्रबन्धन भी शामिल है।
2. गाय के गोबर के घोल एवं गौ-मूत्र के साथ नारियल के जैविक अपशिष्टों एवं खेत अपशिष्टों का उपयोग कर वर्मीकम्पोस्ट इकाई तैयार करने हेतु किसानों के साथ मिलकर सहभागी पद्धति से प्रदर्शन की योजना बनाकर क्रियान्वित करना।
3. बाजार में बिक्री हेतु जैविक उत्पाद के रूप में गोबर को छाये में सुखाना।
4. चारा घास और सब्जी की खेती के लिए गौ-मूत्र और शेड की धुलाई किये गये जल का पुनर्चक्रण।
5. रसोई गैस उत्पादन के लिए बायोगैस इकाइयाँ।

पुनर्चक्रण का तरीका
श्री गोपालकृष्ण पिल्लई के पास एक एकड़ फार्म है। इनके फार्म में 30 गाय और बछड़े हैं और 200 बैग में जैविक सब्जियां उगााने के साथ ही व्यवस्थित रूप इकाईयों में चारा घास उगाते हैं। फार्म पर जैविक खाद/मूत्र से दो वर्मी कम्पोस्टिंग इकाइयाँ तैयार किये हैं। इससे सालाना 5-6 टन वर्मी कम्पोस्ट पैदा हो जाती है। इसके अलवा इनके पास मछली पालन के लिए एक तालाब है, बायोगैस यूनिट है, हाइड्रोपोनिक्स चारे की इकाई है और साथ ही नारियल के पेड़ के साथ अन्तः खेती के रूप में कंद, मसाले आदि की खेती भी करते हैं।

नारियल आधारित कृषि प्रणाली से एक पूर्णतया विकसित नारियल के पेड़ एवं उसके साथ फसलों/खेत घटकों के आधार पर अन्तः/मिश्रित खेती के रूप में फसलों से 80-100 किग्रा0 जैविक अवशेष मिलता है। इन्होंने नारियल जैविक अवशेषों से वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने की आईसीएआर-सीपीसीआरआई प्रौद्योगिकी को अपनाया। नारियल के कार्बनिक पदार्थों जैसे कटे हुए नारियल के फूल, नारियल के अन्य जैविक भाग, चारे के साथ अंतर फसलों के अवशेष, कंद/मसाले, केला, सब्जियों आदि को भी जोड़ा गया।

उनकी पत्नी श्रीमती उषा वर्मी कम्पोस्ट इकाइयों में गाय के गोबर का घोल बनाकर छिडकाव करती हैं और खेत के अवशेषों जैसे- गाय के चारा के कचरे/घर के पेड़ों के सूखे पत्तों आदि का संग्रह करती हैं और सब्जी की खेती के लिए गोबर मूत्र मिश्रण तैयार करने में सहायता करती हैं। वे कहती हैं, “वर्मी कम्पोस्टिंग यूनिट ने हमें जैविक कचरे के ढेर को 60-70 प्रतिशत तक कम करने में मदद की। आस-पास में स्वच्छता बनाए रखने के अलावा, घर स्तर पर पुनर्चक्रण आवश्यक है जहां खेत परिवार और खेती के घटक सह-अस्तित्व में हैं।”

रसोई से निकलने वाला कचरा और मछली के कचरे की राख को भी सीधे नारियल के ताड़ के जड़ में शामिल किया जाता है। साप्ताहिक रूप से औसतन 10-12 किलोग्राम राख प्राप्त होती है। प्रत्येक सप्ताह के अंत में नारियल के अंकुर पर राख का छिड़काव किया जाता है, जो प्रारंभिक अवस्था में प्रबंधन के लिए कीट और बीमारी के लिए रोगनिरोधी उपाय के रूप में कार्य करता है।

इसके अलावा, फलों के विकास और कीट प्रबंधन के लिए सब्जियों और केले की फसलों में छिड़काव के लिए चावल के पानी का पुनः उपयोग किया जाता है। महिलाएं इस कार्य में प्रमुख पुनर्नवीनीकरणकर्ता हैं। केले एवं कटहल के पेड़ की ताजी एवं पकी हुई पत्तियों को बकरियों, गायों और मुर्गियों को रोजाना खिलाने के काम मंे लाती हैं। बैकयार्ड पोल्ट्री खाद्य अपशिष्ट, मछली अपशिष्ट और गृहवाटिका में धान के कचरे को पुनर्नवीनीकरण इकाई के रूप में कार्य करती है। पुनर्नवीनीकरण करके खेत से अपने घर के लिए सब्जियां या अंडे प्राप्त करती है।

श्री गोपालकृष्ण पिल्लई इस बात को बताते हैं कि ‘‘अधिक मात्रा में ताजा गाय के गोबर की ढुलाई और उपयोग की कम मांग का सामना करना पड़ता है। इसमे हैंडलिंग एवं ढुलाई में अधिक श्रम एवं खर्च का सामना करना पड़ता है। खासकर मानसून एवं बरसात के समय गोबर का निपटान की समस्या अधिक होती है। वर्मी कम्पोस्टिंग के माध्यम से, मैं गोबर का मूल्यवर्धन करते हुए इसका पुनर्चक्रण करके, कृषि में उपयोग के साथ-साथ इसको बेचने के लिए वर्मीकम्पोस्ट का उत्पादन कर रहा हूं।’’

सीमांत भूमि धारकों और शहरों एवं कस्बों के छोटे किसानों के बीच, 12 रुपये प्रति किलोग्राम की मांग है। इस प्रकार श्री गोपालकृष्ण पिल्लई प्रतिवर्ष 5-6 टन वर्मीकम्पोस्ट बेचकर सालाना औसतन 5000-6000 रू0 की कमाई करते हैं।

गोपालकृष्ण पिल्लई प्रति दिन अपने घर से सीधे 200-300 लीटर दूध की आपूर्ति करते हैं। इसके अलावा, फार्म पर गोमूत्र, गोबर और बायोगैस घोल का पुनर्चक्रण कर उसका उपयोग करते हुए अपने घर के आस-पास के खेत से स्वादिष्ट, पौष्टिक एवं ताजा सब्जियां प्राप्त करते हैं।

एक बैंक कर्मी से किसान बने श्री गोपालकृष्ण पिल्लई के खेत पर हर दिन 100 से अधिक आगंतुक इनकी एकीकृत कृषि प्रणाली का मॉडल, खेत के कचरे का पुनर्चक्रण कर मूल्यवान खाद का उत्पादन, हरा चारा, तालाब की मछलियों, सब्जियों और फलों के रूप में किये जाने वाले कार्य को देखने आते हैं। महिलाएं भी खुश हैं कि वे ताजी सब्ज़ियों को प्राप्त कर सकती हैं और नये तरीके से खेती करने से खीरा बर्गीय सब्जियों के भंडारण की अवधि बढ़ जाती है। कोई भी परिवार अपने घर के जैविक कचरे वे पत्तेदार सब्जियों के अपशिष्ट को पुनर्नवीनीकरण के माध्यम से तरल खाद, ठोस खाद, वर्मी कम्पोस्ट आदि के रूप में आसानी से परिवर्तित कर सकता है।

श्री गोपालकृष्ण पिल्लई को जैविक खेती करने के लिए पंचायत मंे सर्वश्रेष्ठ किसान सम्मान से सम्मानित किया गया। आज उनका फार्म पर्याप्त संसाधन पुर्नचक्रीकरण एवं स्व निर्धारित खेती का एक बेहतर उदाहरण है।

एक सामाजिक मॉडल के तौर पर विस्तार
पंचायत में 15 परिवारों द्वारा संसाधन पुनर्चक्रीकरण मॉडल को अपनाया गया है। कृषि अपशिष्टों का पुनर्चक्रीकरण के साथ मूल्य संवर्धन इकाईयों की स्थापना होगी और किसान एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनायेंगे। पथियोर ग्राम पंचायत के अध्यक्ष श्री वी प्रभाकरन को यह पूर्ण विश्वास है कि सात महिलाओं सहित 15 युवा किसान संसाधनों का पुनर्चक्रीकरण करने में सफल होंगे और वे अपने इस पहल से कुछ आमदनी भी प्राप्त करने में सक्षम होंगे। वह कहते हैं, ‘‘पंचायत में कृषि अपशिष्टों का विकेन्द्रित तरीके से कुशल और वैज्ञानिक पुनर्चक्रीकरण करने से ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित, स्वादिष्ट और पोषणयुक्त खाद्य के उत्पादन के लिए प्रेरणा स्तर में वृद्धि हो सकेगी। इसमें महिला किसान स्थानीय संसाधनों के पुनर्चक्रीकरण के लिए एक बड़ी भूमिका निभा सकेंगी। हम अब उन्हें सलाह देते हैं कि वे मनरेगा गतिविधियों के तहत् घासों एवं अन्य कृषि अपशिष्टों का पुनर्चक्रीकरण करें और उन्हें जलाने के बजाय सीधे मृदा में वापस मिला दें।’’

जैविक कृषि अपशिष्टों का व्यवस्थित पुनर्चक्रीकरण एवं मूल्य संवर्धन मृदा को आवश्यक पोषण प्रदान करते हुए खेत को और अधिक उर्वर एवं आत्मनिर्भर बना सकेगा। वर्मी कम्पोस्टिंग से सूक्ष्म जीव रोगजनकों के जैव निदान होने के साथ-साथ मृदा में लाभकारी जीवाश्मों में भी वृद्धि होगी। बायोगैस उत्पादन से जैव ईंधन के तौर पर इसका उपयोग होने से हानिकारक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आयेगी। विभिन्न तरीकों से योगदान करते हुए, संसाधन पुनर्चक्रीकरण कर किसान हरीतिमा को बढ़ाकर पारिस्थितिकी को भी सुदृढ़ करने में सक्षम होगा। समग्र रूप से यह कहना अधिक उचित होगा कि, विशेषकर छोटे मझोले किसानों के लिए जलवायु अनुकूलन सुनिश्चित करने हेतु संसाधनों के पुनर्चक्रीकरण पर विशेष ध्यान देकर अधिक महत्व देने की आवश्यकता है।

अनिथाकुमारी पी एवं इन्दुजा एस


अनिथाकुमारी पी
प्रधान वैज्ञानिक ;कृषि प्रसारद्ध
ई-मेल:anithacpcri@gmail.com

इन्दुजा एस
वैज्ञानिक ;कीटाणुविज्ञानद्ध
आईसीएआर सेण्ट््रल प्लाण्टेशन क्राप्स रिसर्च इन्स्टीच्यूट
पोस्ट- कृष्णापुरम, कायमकुलम, केरल

Source: Recycling resources in agroecological farms, LEISA India, Vol.21, No.2, June 2019

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