खेती में नवाचार एक अभिनव प्रयोग है। रसायनिक कीटनाशकों एवं उर्वरकों के उपयोग को कम करते हुए मानव एवं पर्यावरण स्वास्थ्य का संरक्षण करने के साथ खेती में लागत भी कम की जा सकती है। साथ ही आय का स्रोत भी बढ़ाया जा सकता है। इसे पचगांवा स्थित स्वयं सहायता समूह ने सिद्ध किया है।
महिला किसानों ने अपना सफर कृषि मजदूर से प्रारम्भ करते हुए आज अपने आपको ‘‘सामाजिक उद्यमी एवं प्रेरक’’ के रूप में स्थापित किया है। गोरखपुर जनपद के जंगल कौड़िया प्रखण्ड की श्रीमती शान्ति देवी, श्रीमती भानमती देवी, श्रीमती छोहाड़ी देवी आज अपने क्षेत्र में किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वर्ष 2018 से भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ;सीड डिवीजनद्ध द्वारा संचालित कोर सपोर्ट परियोजना के अन्तर्गत गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप के सहयोग से इन महिला किसानांे ने ‘‘जय मां लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह ’’के रूप में अपने-आपको एक सामाजिक उद्यमी एवं अन्य किसानों के लिए प्रेरक के रूप में स्थापित किया है। शुरूआत में अन्य स्वयं सहायता समूहों की तरह इन्होंने भी बचत एवं ऋण का लेन-देन करते हुए अपने-आप को मजबूत किया।
वर्ष 2020 में अर्थ डे नेटवर्क द्वारा जैविक खेती में उत्कृष्ट योगदान के लिए ‘‘स्टार महिला किसान’’ के रूप में सम्मानित छोहारी देवी बताती हैं कि ‘‘हम समूह की महिलाएं समूह की नियमित बैठक कर उनमें समूह के लेन-देन, ऋण-बचत पर चर्चा के साथ ही परियोजना की अन्य गतिविधियों के उपर चर्चा करते हैं। आगे वे बताती हैं कि ष्इसी क्रम में रसायनिक खाद एवं कीटनाशकों के दुष्प्रभावों के बारे में समझा एवं समूह की अन्य महिला सदस्यों को भी बताया कि किस प्रकार ये रसायनिक खाद एवं कीटनाशक हमारे खेत से होते हुए हमारे शरीर में जाकर हमें भी बीमार कर रहे हैं और मृदा स्वास्थ्य को भी हानि पहुंचा रहे हैं’’।
इन महिला किसानों ने संस्था द्वारा बताये गये विभिन्न प्रकार के खाद निर्माण जैसे- नाडेप, वर्मीवाश, वर्मी कम्पोस्ट, सी0पी0पी0 आदि बनाने की विधि को ठीक ढंग से समझा। चूंकि यह सम्पूर्ण क्षेत्र सब्जी की खेती के जाना जाता है। अतः इन महिलाओं ने सब्ज़ियों व फसलों को कीटों से बचाने के लिए जैव कीट विकर्षक तैयार करने की विधि पर समझ विकसित किया और इन्होंने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों का प्रयोग कर यह जैव कीट विकर्षक तैयार किया। यह कीट विकर्षक सभी तरह की कीटांे ;मित्र एवं शत्रुद्ध को मारने के बजाय कीटों को भगाने का काम करता है, जिससे पौध/फल सुरक्षित हो जाते हैं।
जय मां लक्ष्मी समूह की महिलाएं परियोजना सदस्यों के तकनीकी सहयोग से अलग-अलग मटका कीट विकर्षक तैयार कर उसे अपने खेतों में प्रयोग कर रही हैं। प्रयोग से होने वाले फायदों को देखते हुए अन्य लोग भी इसकी मांग करने लगे हैं। समूह की अध्यक्ष श्रीमती शान्ति देवी कहती हैं ‘‘जब हमने कीटों को भगाने वाली दवा बनाई और अपने धान के खेत में डाला तो उस पर लगने वाला गन्धी कीट से उसका बचाव हुआ’’ आगे कहती हैं ‘‘इस कीट विकर्षक के अच्छे प्रभावों को देखते हुए आस-पास के खेत वाले लोग भी इस दवा को मांगने लगे कि हमारे खेत में भी दवाई डालनी है।’’
आज जय मां लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की सदस्यों श्रीमती शान्ति देवी, श्रीमती भानमती देवी, श्रीमती छोहाड़ी देवी एवं श्रीमती मीना देवी अपने प्रयोगों से उत्साहित हैं। आपस में बात-चीत कर उन्हांेने बताया- ‘‘हमने निर्णय लिया कि इस ‘मांग’’ को एक ‘‘अवसर’’ में बदलेंगे। उन्होंने उत्साहित होकर बताया कि ‘‘वैसे तो हम अभी तक अलग-अलग कीट विकर्षक तैयार कर रही थीं, परन्तु अब हमने एक साथ बड़े पैमाने पर मटका जैव कीट विकर्षक का उत्पादन सामूहिक रूप से करने का निश्चय किया है। समूह की दूसरी सदस्य भानमती कहती हैं ‘‘जब हमने यह तय कर लिया कि एक साथ मिलकर कीटों को भगाने वाली दवाई बनायेंगे तब हमने यह भी तय किया कि कौन क्या काम करेगा। हमने और मीना ने गौ मूत्र एकत्र करने का काम अपने जिम्मे लिया है।, जबकि शान्ति और छोहाड़ी ने भांग, धतूर, मदार व कनेर की पत्तियों को एकत्र करने का कार्य कर रही हैं।’’ आगे ये महिलाएं कहती हैं कि गौ मूत्र के लिए हमें 4-5 रू0 प्रति लीटर के हिसाब से खर्च करना पड़ा क्योंकि हम सभी महिलाओं के पास गाय नहीं थी। तब हमने तय कि पैसा मिलाकर गौ मूत्र व लहसुन खरीद लेती हैं, जब दवाई तैयार हो जायेगी और बिकने लगेगी तब सबसे पहले लागत निकालकर फायदा हम आपस में बांट लेंगी।’’
बड़ी मात्रा में जैव कीट विकर्षक उत्पादन होने के बाद इसके लिए बड़े बाजार की भी आवश्यकता थी। छोहाड़ी कहती हैं ‘‘जब कीड़ों को भगाने वाली दवाई तैयार हो गयी तब हम लोगों ने इसे आस-पास मांगने वालों को 10 रू0 में एक गिलास दिया, परन्तु यह कोई सही बात नहीं थी। कभी किसी को अधिक लगता था तो किसी को कम। बहुत बार हम लोग नहीं रहते थे और कोई लेने आ गया तो मिलता भी नहीं था।’’ तब हमने संस्था के लोगों से कहा ‘‘अगर ये दवाई बोतल में पैकिंग हो जाये और उस पर इसके बारे में लिख दिया जाये तो इसे सभी को बेचने में आसानी रहेगी। दाम भी तय हो जाने से कोई कम बेसी में नहीं मांग सकता।’’ इस उत्पादन को बाजार तक पहुंचाने में डी0एस0टी0 कोर सपोर्ट परियोजना ने मदद की। परियोजना कार्यकर्ताओं ने तैयार उत्पाद की पैकेजिंग करने में इन महिलाओं की मदद की। 200 व 400 मिली0 के बोतल में इसे पैक किया गया, जिस पर इस उत्पाद से सम्बन्धित सभी जानकारियां, प्रयोग की विधि, प्रयोग में सावधानियां तथा मूल्य सभी अंकित हैं। मूल्य का निर्धारण भी इन्होंने ही किया। इनका कहना था कि ‘‘दाम इस प्रकार रखा गय कि हमारी लागत व हमारी मजदूरी निकल जाये साथ ही कुछ पैसा समूह के पास बच जाये तो उससे दुबारा भी पैकिंग कर सकें।’’ इस प्रकार से पैकेजिंग किये गये माल को परियोजना के अन्तर्गत क्लस्टर स्तर पर स्थापित सभी 6 कृषि सेवा केन्द्रों पर उपलब्ध करया गया ताकि वहां से अन्य गांवों के किसान भी इसे खरीद कर इनका उपयोग कर सकें।
आज जय मां लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह के पास 50 लीटर जैविक कीट विकर्षक बनकर तैयार है एवं समूह ने हाल ही में एक स्थानीय फार्मर प्रोड्यूसर कम्पनी ‘‘सुरभि’’ के माध्यम से इसे बेचने के लिए समझौता किया है। इस प्रकार इन महिलाओं ने डी0एस0टी0 परियोजना से प्राप्त तकनीकी जानकारी से कीट विकर्षक तैयार कर न सिर्फ अपने फसलों व सब्ज़ियों की सुरक्षा कर रही हैं, वरन् सामाजिक उद्यमी के रूप में अपने-आपको विकसित कर अन्य महिला एवं पुरूष किसानों के लिए प्रेरक के रूप में भी अपने-आपको स्थापित किया है।
अर्चना श्रीवास्तव
अर्चना श्रीवास्तव प्रोग्राम प्रोफेशनल्स गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप 224, पुर्दिलपुर, एम0जी0 कालेज रोड गोरखपुर - 273 001, उत्तर प्रदेश, भारत ई-मेल:archanasri844@gmail.com



