प्रक्षेत्र की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त पोषणों का सही समय पर सही मात्रा में प्रयोग करना पौधों को स्वस्थ रखने में पौधों की आनुवांशिक प्रतिरोधक क्षमता से अधिक उल्लेखनीय भूमिका निभाती है। फसलों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों को एक समग्र तरीके से समझने की आवश्यकता है।
मानव जीवन के लिए स्वस्थ खाद्य सिर्फ स्वस्थ फसल से ही आ सकता है। आधुनिक कृषि विज्ञान में, पौध प्रजनन, कृषि रसायनों जैसे कीटनाशक एवं उर्वरक तथा तकनीकी उन्नति से खाद्य सुरक्षा में तो मदद मिली है, परन्तु इससे मानव स्वास्थ्य एवं पारिस्थितिकी प्रणाली पर व्यापक दुष्प्रभाव भी पड़ा है। बोयी गयी फसलांे को बहुत सी जैविक एवं अजैविक समस्याओं के साथ विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसमें मौसम, सूक्ष्म जलवायु, मृदा और पारिस्थितिकी तथा पौध जैव रसायन से सम्बन्धित समस्याएं शामिल हैं।
पौधों को निर्णायक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए पौधों की जैव रसायनिक संरचना तथा पृथ्वी के उपर और पृथ्वी के नीचे के पर्यावरण के क्रम में फसल स्वास्थ्य को एक समग्र स्वरूप में समझने की आवश्यकता है।
मृदा स्वास्थ्य सबसे प्रमुख है
एक बेहतर मृदा स्वास्थ्य वातावरण वह है, जहां जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो, जड़ों के नीचे की मिट्टी भुरभुरी हो ताकि पौधों को बिना किसी रूकावट के पर्याप्त हवा मिलती रहे, फसल उगने की पूरी अवधि के दौरान फसलों की विभिन्न अवस्थाओं में आवश्यकतानुसार पोषण की आपूर्ति होती रहे, रसायनों की मात्रा इतनी ही हो कि उससे पौधों की जड़ों एवं पोषण की उपलब्धता पर कोइ दुष्प्रभाव न हो, मृदा की गुणवत्ता ऐसी हो, जिससे पोषक तत्वों की उपलब्धता में सहयोग हो सके, सूक्ष्म जीवाणुओं के विकास के लिए उचित वातावरण मिल सके एवं मृदा का तापमान उचित हो।
मिट्टी की जांच के पारम्परिक तरीके को अपनाकर मात्र मृदा को समझना अब फसल को स्वस्थ्य रखने के लिए उपयुक्त नहीं है। हम अभी भी मृदा की जांच उनके स्वास्थ्य को जानने के लिए नहीं करते और इस कमी को दूर करने के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है।
इस वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र में राइजोस्फीयर में सूक्ष्म जीवाणुओं की जनसंख्या सबसे बड़ा जलाशय है। प्रकाश संश्लेषण का लगभग 20 प्रतिशत जड़ों के रिसाव के रूप में मृदा के अन्दर चला जाता है। यह रिसाव मुख्य रूप से शुगर, अमीनो एसिड, फ्लेवोनॅायड्स, एलीपैथिक एसिड, प्रोटीन एवं फैटी एसिड का मिश्रण होता है। ये पौधों के साथ-साथ राइजोस्फीयर के निकट स्थित माइक्रोबियम अर्थात् सूक्ष्म जीवाणुओं के लिए पोषण का स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। जब आवश्यकता कमी से पर्याप्तता की ओर जाने लगती है, तब रोगजनक गतिविधि बढ़ जाती है। इसके अलावा, मृदा की खाद और जैविक कारक जड़ रिसावों की मात्रा और संयोजन को निर्धारित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मृदा में उपस्थित जीवाणु जड़ क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं और इससे अमोनियम नाइट््रोजन नाइट््रेट में बदलता है। फास्फोरस ज्यादातर मृदा में घुलनशील होते हैं और अक्सर प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में पोषक तत्वों को सीमित करते हैं। इस बात के सबूत मिलते हैं कि मृदा के जीवाणुु पानी को अघुलनशील रूपों में घोलकर पौधों को उपलब्ध फास्फोरस को बनाने में सहायता कर सकते हैं जबकि माइक्रोराइजल फफूंद मृदा से स्थित पोषक तत्वों को जुटाने में मदद करते हैं।
लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु पोषण तत्वों में वृद्धि कर सकते हैं और जड़ों की संरचना को प्रभावित करके पोषक तत्वों को अधिक उपलब्ध करा सकते हैं। गैर संक्रमित पौधों की तुलना में वीएएम संक्रमित पौधों के विकास में साढ़े आठ गुना की वृद्धि होती है। माइक्रोराइजल वृद्धि से होने वाले विकास का प्राथमिक कारण पोषणों विशेषकर फासफोरस का अधिक ग्रहण करना है। मृदा की उर्वरक क्षमता को बढ़ाकर तथा रोगजनक कारकों की अधिकता को कम करके और प्रतिरोधक प्रणाली को बेहतर बनाते हुए पौधों के स्वास्थ्य को सफलतापूर्वक बढ़ाया जा सकता है। वर्ष 2003 में डी बोयेट एवं उनके सहयोगियों द्वारा राइजोस्फीयर में माइक्रोबायोम की गतिविधियांे पर किये गये एक अध्ययन में स्पष्ट रूप से निकला कि इससे लौह तत्व के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है तथा पोषण की कमी होती जाती है जिससे मृदा जनित बीमारियों के कारण मूली और गुलनार में फ्यूजेरियम विल्ट नामक संवाहक रोग दब जाता है। राइजोस्फीयर में मौजूद पौध विकास को प्रोत्साहित करने वाले फंगी तथा पौध विकास को प्रभावित करने वाले राइजोबैक्टीरिया कीटों एवं बीमारियों से लड़ने में पौधों की प्रतिरोधी क्षमता को उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। अध्ययन यह प्रदर्शित करते हैं कि पौधे कुछ चुनिन्दा सूक्ष्मजीवांे को आकर्षित करते हैं, जिससे जहां कुछ प्रजातियों की सघनता में वृद्धि होती है, वहीं ये सूक्ष्मजीवों की विविध विविधता को प्रतिबन्धित भी करते हैं।
सूक्ष्म जलवायु फसल स्वास्थ्य को प्रभावित करता है
सूक्ष्म जलवायु फसल के नीचे व उपर तथा मृदा जड़ क्षेत्र की जलवायु को संदर्भित करता है जो प्रबन्धन गतिविधियों से प्रभावित हो सकती हैं। सबसे बेहतर फसल सूक्ष्म जलवायु वह होता है, जो फसल को उगने के लिए सर्वाधिक अनुकूल वातावरण प्रदान करे और फसल की उत्पादकता अधिक से अधिक हो। मल्चिंग से मूल मृदा में नयी सूक्ष्म जलवायु उत्पन्न होती है, सौर विकिरण का संचरण कम होता है, मृदा तापमान और वाष्पीकरण को करते हुए जल संरक्षण में मदद करती है। इससे मृदा की जैविक गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।
एक खेत की सूक्ष्म जलवायु मृदा और वायु में मौजूद नमी एवं तापमान, ओस एवं ठण्ड की उपस्थिति, आर्द्रता, हवा की गति आदि से प्रभावित होती है। यह पौध के विकास एवं अंकुरण, मृदा श्वसन, मृदा की बायोटिक जीवन, पोषण चक्रण एवं कीट एवं व्याधियों की घटना को भी प्रभावित कर सकता है। सूक्ष्म जलवायु प्रबन्धन को संरक्षित खेती में अच्छी तरह से जाना जाता है, लेकिन केवल फसल की खेती में एक सीमित सीमा तक ही है। फसल स्वास्थ्य के सम्बन्ध में सूक्ष्म जलवायु का बहुत ही खराब अध्ययन किया गया है और फसल स्वास्थ्य की तुलना में सूक्ष्म जलवायु प्रबन्धन के उपर कोई यथोचित शोध नहीं किया गया है।
पोषक तत्व पौधों का रक्षा तंत्र तय करते हैं
एक पौध का उपयुक्त पोषण तत्व एक फसल के प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाने के लिए उच्च प्रभाव डालती है। जबकि अधिशेष पोषण मित्र के साथ-साथ शत्रु सूक्ष्म जीवों एवं कीटों को आमत्रिंत करते हैं। पोषक तत्व एक पौधे में रक्षा की पहली पंक्ति का कार्य करते हैं। फसल में पोषक तत्वों की सांद्रता को बदलकर कीटों और रोगों के लिए पौधों की रक्षा तंत्र पर सीधे कार्य किया जा सकता है।
मृदा परीक्षण की पारम्परिक विधि को अपनाकर मृदा के बारे में समझ विकसित करना अब फसल को स्वस्थ रखने के लिए बहुत पर्याप्त नहीं है।
पोषक तत्व सीधे मेजबान की शारीरिक और जैव रसायनिक स्थिति जैसे- आत्मसात करना, पोषण ग्रहण करना, कोशिका की दीवार का एकीकरण आदि को बदल सकते हैं। खनिज पोषक तत्व, कार्बनिक संशोधन, कल्ले, बुवाई की तारीख, फसल चक्रीकरण, मल्चिंग, पीएच समायोजन आदि बहुत से ऐसे कारण हैं, जो पौधे की बीमारी की गंभीरता को प्रभावित करते हैं। ये कारक पौधों और रोगजनकों के लिए पोषण की उपलब्धता को निर्धारित करते हैं। उदाहरण के लिए, रिज़ोक्टोनिया एसपी द्वारा रूट रॉट, फ्यूजेरियम एसपी द्वारा विल्ट एवं मृदा पीएच को बदलकर क्लब रूट बीमारियों को आसानी से प्रबन्धित किया जा सकता है।
पौधों का रक्षा तंत्र पौध हार्मोन्स जैसे- सेलेक्लिक एसिड, जैसमोनेट्स एवं एथीलीन द्वारा नियन्त्रित होता है। ये हार्मोन्स कीटों एवं व्याधियों के प्रति पौधों में प्रतिरोधक क्षमता तैयार करते हैं। पौधों के टिश्यू में संगठित रूप से निवास करने वाले बीमारियों विशेषकर बायोट््राफिक एवं हेमि-बायोट््राफिक बीमारियों के प्रति व्यवस्थित प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सेलेक्लिक एसिड की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी प्रकार जैसमोनेट्स एवं एथिलीन उन कीटांे एवं नेक्रोट््रोफ्स के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करते हैं, जो पौधों की पोषण लेने वाली कोशिकाओं को तेजी से नष्ट करते हैं।
पत्तियों में यौगिक आर्गिनाइन कवक को बढ़ाने वाले कैल्शियम के उपयोग को बढ़ाकर आलू में लगने वाले फंफूद रोग लेट ब्लाइट के प्रति प्रतिरोधक क्षमता तैयार की जा सकती है।
पौध पोषण एवं कीट प्रकोप
शाकाहारी कीटों के प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले कारकों में नाइट््रोजन एक सबसे महत्वपूर्ण कारक है। नाइट््रोजन को कुछ निश्चित कीटों के प्रजनन, दीर्घायु एवं समग्र फिटनेस को प्रभावित करने वाला कारक पाया गया है। कृत्रिम नाइट््रोजनयुक्त उर्वरकों के उपयोग के कारण पौधों की प्रतिरोधक क्षमता में ह्रास होने के कारण अधिक गम्भीर कीटों के प्रकोप की घटनाएं एवं फसल का नुकसान होता है। पौधों में नाइट््रोजन की मात्रा कम होने पर कीटों के प्रति पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जबकि नाइट््रोजन की उच्च मात्रा होने से पौधों का विकास तो तीव्र होता है, परन्तु उनमें बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है। हालांकि, नाइट््रोजन की उच्च दर के परिणामस्वरूप प्रति पत्तियों में जासिद, सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स की जनसंख्या बहुत अधिक होती है। उच्च नाइट््रोजन से रूई वाली मक्खी के प्रजनन में वृद्धि होती है और सफेद मक्खी की जनसंख्या दर भी उच्च होती है। उदाहरण के लिए, नाइट््रोजन के बढते स्तर के साथ सरसों में माहो का संक्रमण बढ़ जाता है।
फासफोरस की उच्च मात्रा होने से वयस्क माहो की विकास अवधि कम हो गयी है। हालिया रिपोर्टों से प्रदर्शित होता है कि फासफोरस के उपयोग से जनसंख्या का घनत्व और फली चूसक कीटों एवं इम्पास्का डोलिची के नुकसान में कमी आयी है।
पोटैशियम उर्वरक के प्रयोग से माहो, लीफहूपर्स एवं माइट्स के प्रकोप की घटनाएं होती है। पोटैशियम पोषण पौधों के प्रति कीटों एवं रोगजनकों के आकर्षण को प्रभावित करने के साथ ही बाद में उनकी वृद्धि एवं विकास को भी प्रभावित करते हैं।
पोटैशियम की कमी के साथ कीटों के उच्च आक्रमण का अपने-आप में सम्बन्ध नहीं हो सकता, लेकिन पोटैशियम की कमी का पौधांे पर बाद में प्रभाव पड़ता है और चूसक कीट पौधों को आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं। उदाहरण के लिए, पोटैशियम का स्तर बढ़ने से अधिक फेनोल्स का संचयन होता है, जिससे कुछ धान की फसलों में कीट प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने में योगदान संभावित है। इसके अलावा, धान की पौधों में पोटेशियम जनित बदलावों का कीट-पौध सम्बन्ध पर असर पाया जाता है।
अजैविक तनाव फसल स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं
अजैविक तनाव जैसे- अम्लता, सूखा, बाढ़, धातु विषाक्तता, पोषण की कमी, उच्च एवं निम्न तापमान, छाया, अल्ट््रा वायलेट किरणों का सम्पर्क, फोटो-निषेध, वायु प्रदूषण, हवा, तूफान आदि फसल स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। पौधों एवं उनके प्रबन्धन पर अजैविक तनावों के प्रभावों को बेहतर तरीके से अध्ययन किया गया है।
निष्कर्ष
फसल स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों पर समझ विकसित करने वाले विषयों को एक समग्र तरीके से नहीं समझा गया है। पोषण का उचित प्रबन्धन, पौध एवं वातावरण अधिकांश कीट एवं व्याधियों को कम कर सकते हैं। पौधों की आनुवांशिक प्रतिरोध से अधिक, उपलब्ध तरीकों के आधार पर सही मात्रा में सही समय पर उचित पोषण का प्रयोग पौध स्वास्थ्य के लिए अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कभी-कभी राइजोस्फीयर की प्रतिक्रिया नकारात्मक भी होती है। कुछ रसायन यौगिक रोगजनकों को आकर्षित करते हैं, इसलिए सही मात्रा में पोषण का प्रयोग अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। पोषणों के साथ फसल में परिवर्तन भी सूक्ष्म जलवायु को उन्नत करने में सहायक हो सकता है, साथ ही साथ यह लाभकारी सूक्ष्म जीवाश्मों के लिए खाद्य स्रोत के तौर भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त, राइजोस्फीयर में उनकी जीनोटाइप के अनुसार सूक्ष्म जीवाश्मों को तैयार करने में भी पौध सक्षम हैं। राइजोस्फीयर में उच्च माइक्रोबायोम की सघनता को बनाये रखना एक चुनौती है।
टीएम थियागराजन, एस रागेश्वरी, एल रामाजीएम एवं सी पार्थीबन
टीएम थियागराजन, एस रागेश्वरी, एल रामाजीएम एवं सी पार्थीबन कृषिगत विज्ञान संकाय एसआरएम इन्स्टीच्यूट ऑफ साइंस एण्ड टेक्नालॉजी एसआरएम नगर, कत्तनकुलाथुर 7 603 203 जिला- चेंगलपट्टू, तमिलनाडु ई-मेल:dean.agri@srmist.edu.in
Source: Nurture plants- Save the planets, LEISA India, Vol.21, No.4, Dec.2019



