कृष्णा राय एक अनुकरणीय किसान एवं एक अभिनव उद्यमी हैं। उनके एक हेक्टेयर में फैले खेत की भूमि ‘‘पारिस्थितिकी वन प्रणाली’’ का एक शानदार मॉडल है। शानदार इस अर्थ में कि यहां पर सभी कुछ एक आपसी बेहतर ताल-मेल के साथ लाभप्रद रूप में एकीकृत है। फसल और पशुधन का एकीकरण बड़ी ही सुन्दरता के साथ किया गया है।
इनके खेत में पर हजार मछलियों को पालने के लिए एक प्लास्टिक का तालाब है, जिसमें जाने का प्रवेश द्वार लगभग 10 मीटर लम्बा है। इसी के साथ हम सूअरांे को देख सकते हैं, जिनका प्रत्येक का वजन 300 किग्रा0 से अधिक होगा। स्थान के अनुरूप, पहाड़ी ढलान पर उसके खेत में, नीचे की ओर हम सीरिंज पाइप के साथ बोतलों को लटके पाते हैं, जो उनके गमले के पौधों के लिए बूंद सिंचाई हेतु लगाये गये हैं। छोटी गृहवाटिका के पीछे, एक 8000 लीटर की क्षमता वाला प्लास्टिक का तालाब है, जिसकी सतह पर बत्तखों के लिए खर-पतवार तैरता रहता है, जो सूअरों और बत्तखों के लिए भोजन है। बत्तखें सूअरों का मल खाती हैं, जिससे मच्छरों का लार्वा पैदा होने की प्रक्रिया पर भी रोक लगती है।
इन्होंने अपने खेत में कुछ लो टनल पॉली हाउस भी लगा रखे हैं, जहां पर वे चाइनीज़ बन्दगोभी और फूलगोभी के साथ टमाटर को एकीकृत रूप से उगा रहे हैं। कद्दू और करेला को टमाटर के उपर चढ़ा रखा है। पश्चिमी तरफ बत्तख, मुर्गियां एवं टर्की को पाल रहे हैं।
कृष्णा राय के पास 10 गायें हैं। दूध को वे बेच देते हैं और गाय के गोबर से बायोगैस बनाते हैं जबकि बायोगैस से निकले अपशिष्ट का उपयोग वर्मी कम्पोस्ट बनाने में करते हैं। अपने एक हेक्टेयर के खेत में बहुत से एकीकृत उद्यमों के साथ, श्री राय लगभग 2000 डॉलर की शुद्ध मासिक आमदनी प्राप्त करते हैं, जो एक औसत परिवार की आय का दस गुना है।
गौशाला के सामने ही शौचालय है। उनके शौचालय पर लिखा है ‘‘खेत से पेट में और पेट से खेत में।’’ शौचालय से निकलने वाले मल और मूत्र को भिन्न-भिन्न गढ्ढों में एकत्र कर उसे शक्तिशाली उर्वरक में बदलते हैं। मानव और पशु मल-मूत्र श्री राय के उर्वरक बैंक बनाते हैं, जिसे वर्मी कम्पोस्ट, वर्मीक चाय, खाद, कैप्सूल एवं तरल खाद में परिवर्तित किया जाता है साथ ही ये बायोगैस को भी शक्ति देते हैं। इस प्रकार, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के साथ जैव चक्र को पूर्ण करते हुए जैविक अपशिष्टों की प्रत्येक वस्तु को कुशलतापूर्वक शक्तिशाली उर्वरकों में बदला जाता है।
कृष्णा राय कहते हैं ‘‘तालाब के उपर एक हल्का बल्ब लटका हुआ है, जिसे देखकर प्रत्येक व्यक्ति पूछता है कि इसे यहां क्यों लटका रखा है। कोई इसका आभास नहीं लगा पाता है, वरन् सभी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। जबकि इसका उपयोग रात्रि में कीट-पतंगों को आकर्षित करने के लिए लगाया गया है। जब कीड़े मरेंगे तो मछलियां उन्हें खायेंगी।’’ कीटों एवं पतंगों से निपटने हेतु उन्होंने नीम, एवं अन्य विषैले पौधों की पत्तियों का कीटनाशक बनाया है। वह बताते हैं ‘‘कीटों एवं कीड़ों को भगाने के लिए मानव/पशु मूत्र सर्वाधिक प्रभावी है।’’
श्री राय ने अपनी भूमि को जैविक आवास के रूप में परिवर्तित करने तथा अपने कन्धों पर जैविक का बिल्ला धारण करने के लिए अपने जीवने के दो दशक खर्च किये हैं। वह सोतांग कृषि प्रक्षेत्र और शोध केन्द्र के सीईओ भी हैं। श्री राय ने अपने गांव में जैविक खेती करने का बीड़ा उठाया है। साथ ही अपने नेतृत्व करने के गुणों के कारण वह जैविक कृषि पद्धति को अपनाने हेतु किसानों को उत्प्रेरित करने में सक्षम हैं। कुशल एवं प्रभावी कृषि तकनीक के क्षेत्र में निरन्तर शोध, नवाचार एवं सुधारात्मक गतिविधियों के कारण इनके गांव को ‘‘शोध केन्द्र’’ के तौर पर जाना जाने लगा है। सामूहिक विपणन ने एक समुदाय के तौर पर पूरे गांव को सशक्त बनाया है और इस बात का बेहतर उदाहरण प्रस्तुत किया है कि कृषि से किस प्रकार जीवन में बदलाव लाया जा सकता है। स्थाई उत्पादन एवं नकदी फसलों का सामूहिक विपणन करते हुए पूर्वी नेपाल का पहाड़ी जिला इल्लम, नेपाल के समृद्ध जिलों में से एक है। इसे नेपाल में सबसे कम पलायन दर और सबसे कम गरीबी दर वाला जिला होने का गौरव प्राप्त है। श्री राय के शब्दों में, ‘‘बाजार शक्ति से प्रभावित उचित तकनीक किसानों के लिए एक बेहतर रास्ता है।’’
डॉ0 राजेन्द्र उप्रेती
डॉ0 राजेन्द्र उप्रेती रीजनल एग्रीकल्चरल डायरेक्ट््रेट, विराटनगर, मोरांग, नेपाल ई-मेल: upretyr@yahoo.com
Source: Recycling resources in agroecological farms, LEISA India, Vol.21, No.2, June 2019



