अपशिष्टों को मूल्यवान संसाधनों में बदलना: जैविक गृहवाटिका के अनुभव

Updated on September 2, 2020

गृहवाटिका के माध्यम से खाद्य उत्पादन एवं आजीविका को उन्नत बनाने की तरफ नये सिरे से ध्यान दिया जा रहा है। गृह वाटिका को तैयार करते समय कृषि पारिस्थितिकी पर सीखों एवं अनुभवों के आदान-प्रदान ने फसल एवं खेत अपशिष्टों के प्रबन्धन एवं प्रभावी पुनर्चक्रण पर नये विचारों एवं व्यवहारिक सीखों को प्रदान किया है।


अपशिष्ट जैसा कुछ भी नहीं है। अपशिष्ट सिर्फ एक ऐसा बेकार संसाधन है, जिसे अन्य दूसरे उत्पादों के लिए एक मूल्यवान सामग्री के तौर पर उपयोग किया जा सकता है। अपशिष्ट संसाधनों से आर्थिक लाभों को अधिकतम करना तथा स्वीकार्य पर्यावरणीय मानकों को बनाये रखना ही किसी भी अपशिष्ट प्रबन्धन प्रणाली का पहला लक्ष्य होता है। व्यवहारिक होने के लिए, प्रणाली का सस्ता एवं संचालन के लिए उपयुक्त होना चाहिए। यदि अपशिष्टों का समुचित ढंग से नहीं संभाला जाता तो वे सतह जलस्तर, भूगर्भ जलस्तर एवं वायु को प्रदूषित कर सकते हैं। कचरे को एक संसाधन के रूप में देखना पारिस्थितिकी कृषि के मार्गदर्शक सिद्धान्तों में से एक है।

वैश्विक स्तर पर, कृषि प्रक्षेत्रों से निकले अपशिष्ट उत्पादों के स्थाई उपयोगों को खोजने की तत्काल आवश्यकता है। कृषि के अन्दर जैविक अपशिष्टों के पुनर्चक्रीकरण हेतु प्रभावी दृष्टि खनिज उर्वरकों की आवश्यकता को कम कर सकते हैं और मृदा में जैविक कार्बन की कमी को पूरा कर सकते हैं। फसल और पशु से प्राप्त प्रत्येक अपशिष्ट सामग्री को सावधानी से एकत्रित, संरक्षित एवं खेत में पुनः उपयोग कर सकते हैं। यह अत्यन्त सघन खेती की प्रणाली में मृदा उत्पादकता को बनाये रखने में मदद करता है और खनिज पदार्थों की कमी को पूरा करने के लिए ‘‘बफर’’ के तौर पर काम करता है। संसाधनों के पुनर्चक्रीकरण से कृषि पारिस्थितिकी को प्रोत्साहित करने और कृषि जैव-विविधता को बढ़ाने में भी योगदान मिलता है।

मलेशिया स्थित पेस्टीसाइड एक्शन नेटवर्क एशिया एण्ड द पैसिफिक द्वारा दक्षिणी एशिया स्थित अपने सहयोगियों हेतु कृषि पारिस्थितिकी में अवधारणा एवं दृष्टिकोण पर समझ विकसित करने के लिए युवाओं हेतु श्रीलंका में एक सीख भ्रमण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। पैन एपी के साथ नेटवर्किंग ने पारिस्थितिकी कृषि, खाद्य सम्प्रभुता एवं कृषि-पारिस्थितिकी आधारित जैव विविधता पर अपने सहयोगियों के बीच अनुभव एवं सीख आदान-प्रदान तथा क्षमता अभिवर्धन के अवसरों का निर्माण किया। मार्च 2018 के दौरान, पैन एपी के सहयोगी जकार्ता, इण्डोनेशिया में ‘‘कार्य में कृषि-पारिस्थितिकी’’ पर अभियान में संलग्न रहे। इससे यह तय हुआ कि क्षेत्र में एडवोकेसी के लिए सीख आदान-प्रदान कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण रणनीति रही। पैन एपी के साथ लगभग दो दशकों से सहयोगी कुडुम्बम ने भी इस सीख आदान-प्रदान कार्यक्रम में भाग लिया था।

कृषि-पारिस्थितिकी पर सीखों का आदान-प्रदान
निर्णय के आधार पर, फरवरी, 2019 में श्री लंका में कृषि-पारिस्थितिकी के उपर युवाओं के लिए एक चार दिवसीय सीख आदान-प्रदान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बांगलादेश, कम्बोडिया, भारत, मलयेशिया, पाकिस्तान, फिलीपीन्स एवं श्रीलंका के सहयोगियों के बीच कृषि-पारिस्थितिकी पर सीख आदान-प्रदान को फैसिलिटेट करना था। इसका एक उद्देश्य यह भी था कि चर्चाओं के माध्यम से कृषि-पारिस्थितिकी एवं खाद्य सम्प्रभुता के मुद्दों एवं चलन पर गम्भीर एवं तीक्ष्ण विश्लेषण करना था। श्रीलंका की एक स्थानीय स्वयंसेवी संस्था विकालपानी राष्ट््रीय महिला संघ ने इस सीख आदान-प्रदान कार्यक्रम को आयोजित किया एवं प्रक्षेत्र तथा संस्था आधारित सीख आदान-प्रदान गतिविधियों को फैसिलिटेट किया।
प्रतिभागियों ने विकालपानी राष्ट््रीय महिला संघ के मोनारवागला स्थित प्रक्षेत्र का भ्रमण किया, जो कोलम्बो से 350 किमी0 दूर है। विकालपानी संघ पिछले दो दशकों से श्रीलंका में महिला किसानों को समूह के रूप में संगठित करने एवं जैविक गृहवाटिका को प्रोत्साहित करने का काम कर रही है। प्रतिभागियों ने विकालपानी संघ के तकनीकी सहयोग से महिलाओं द्वारा स्थापित किये गये अनेक गृहवाटिका का भ्रमण किया। सभी गृहवाटिका से प्राप्त उत्पादों का उपयोग घरेलू उपभोग के लिए होता है और इसमें परिवार के सदस्यों का श्रम लगता है। प्रत्येक गृहवाटिका अपनी डिजाइन एवं स्थान के उपयोग तथा परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने की दृष्टि से विशिष्ट एवं अनोखी हैं।

अपने-अपने घरों के पीछे खाली जमीन में बहुत सी प्रजातियों की जैविक विधि से तैयार की गयी सघन एवं विविधतापूर्ण गृहवाटिका बहुत प्रभावी हैं। गृहवाटिका में, महिलाएं सब्ज़ियां, औषधीय पौधे, हरियाली एवं पेड़ों के संयोजन के साथ खेती करती हैं। इसमें टमाटर, बैगन, भिण्डी, मिर्च, प्याज, साग, सेम, काली मिर्च, करेला, चिचिंडा, पुदीना, मूली, वल्लराई, घिकवार, धनिया, हल्दी, लहसुन, केला एवं सागौन, ग्लाईरीसिडीया, आम, अमरूद जैसे पेड़ शामिल हैं। फसल चयन, निवेशों की खरीद, कटाई-तुड़ाई एवं प्रबन्धन आदि से सम्बन्धित सभी निर्णय परिवार के उपभोग एवं आय उपार्जन की आवश्यकताओं के आधार पर लिये जाते हैं। गृहवाटिका का संयोजन इस प्रकार किया गया है कि परिवार की लगभग 80 प्रतिशत आवश्यकताएं इससे पूरी हो जाती हैं और परिवार के सदस्यों की पोषण सुरक्षा भी बढ़ रही है।

अपशिष्टों को खाद में बदलना
मुख्य रूप से समझ बनाने और अपशिष्ट पदार्थों को उपयोगी संसाधनों में परिवर्तित करते हुए संसाधनों के पुनर्चक्रीकरण में पूरे परिवार के संलग्न होने से ही सफलता मिलती है। महिला किसानों द्वारा रसोई के अपशिष्टों एवं फसल अवशेषों का उपयोग कर कम्पोस्ट बनाने की विधि को जानना प्रतिभागियों के लिए एक बहुत अच्छी सीख रही। रसोई से निकले अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण करते हुए बगीचे के लिए इसका उपयोग किया जा रहा था। स्थानीय सामग्रियों का उपयोग करते हुए अपशिष्टों के पुनर्चक्रीकरण पर उनकी नवीन तकनीकें प्रतिभागियों के लिए महत्वपूर्ण सीख बनीं। लतादार पौधों के लिए ग्लाईरीसिडिया की लकड़ी का उपयोग किया गया, जिससे मृदा में नमी संरक्षित होने के कारण सूक्ष्म जलवायु का निर्माण हो रहा है। जैविक चारकोल को तैयार किया गया एवं बगीचे के लिए एक मूल्यवान खाद के रूप में उपयोग किया जा रहा था।

कार्यशाला में प्रतिभाग करने वाले प्रतिभागी श्रीलंका में सरकार द्वारा उठाये गये कदमों, विशेषकर कृषि विभाग द्वारा किये गये कार्यों के भी साक्षी रहे। कृषि विभाग ने जैविक कृषि के लिए एक उत्कृष्टता केन्द्र स्थापित किया है, जो श्रीलंका में जैविक कृषि के विस्तार हेतु प्रतिबद्ध है। इस केन्द्र में, किसानों के लिए संस्तुत करने से पूर्व विभिन्न प्रकार के जैव उत्पादों पर बहुत से शोध किये जाते हैं। प्रतिभागियों को शहरी क्षेत्र में कृषि प्रसार अधिकारी द्वारा स्वयं के लिए विकसित किये गये एक अनूठे गृहवाटिका का भ्रमण करने का भी मौका मिला।

निष्कर्ष
वैश्विक खाद्य संकट और भोजन की बढ़ती कीमतों के संकट के बीच स्थानीय खाद्य प्रणालियों का निर्माण करने एवं बढ़ाने पर जोर दिया गया। इस सन्दर्भ में, गृहवाटिकाओं के माध्यम से खाद्य उत्पादन एवं आजीविका वृद्धि पर नये सिरे से ध्यान दिया जा रहा है। कृषि पारिस्थितिकी पर सीख एवं अनुभव आदान-प्रदान के माध्यम से गृहवाटिका को डिजाइन करते समय खेत के कचरों का प्रबन्धन एवं प्रभावी पुनर्चक्रण पर नये विचार एवं व्यवहारिक सीख प्रदान किये हैं।

सुरेश कन्ना के


सुरेश कन्ना के
कुडुम्बम
सं0 113/118, सुन्दराज नगर, सुब्रमण्यपुरम त्रिची- 620 020, तमिलनाडु, भारत
ई-मेल: sureshkanna_kudumbam@yahoo.in

Source: Recycling resources in agroecological farms, LEISA India, Vol. 21, No.2, June 2019

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