कैलाश मूर्ति के प्राकृतिक खेती के प्रयोग देश में हर छोटे एवं सीमांत किसान के लिए माडल हैं।
बिना अर्थशास्त्र के पारिस्थितिकी का अस्तित्व हो सकता है लेकिन पारिस्थितिकी के बिना अर्थशास्त्र का अस्तित्व नहीं रह सकता है। एम के कैलाश मूर्ति ने इसे कठिन तरीके से सीखा था। चामराजनगर जिले के दोड्डिन्डुवाडी गाँव में बैंकर से किसान बने मूर्ति ने राज्य के सबसे सूखे इलाकों में से एक 22 एकड़ क्षेत्र को मिनी जंगल के रूप में परिवर्तित कर दिया है। ऐसे समय में जब पंजाब जैसे राज्य कीटनाशक और रसायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने का आह्वान कर रहे हैं, प्राकृतिक खेती के साथ मूर्ति का प्रयोग अलग है जो देश में हर छोटे और सीमांत किसान के लिए एक मॉडल है।
मूर्ति ने 1984 में रसायनिक खेती का अभ्यास शुरू किया। चार साल के भीतर ही उन्हें जैव विविधता के ह्रास से होने वाले बुरे प्रभावों का एहसास हुआ। मिट्टी की उर्वरता घटने लगी और पौधों को अधिक पानी और उर्वरक देने की आवश्यकता पड़ने लगी।
मूर्ति कहते हैं “किसानों को समझना चाहिए कि कीट प्राकृतिक घटनाएँ हैं। यदि फसलों को छोड़ दिया जाय तो वे कीटों के लिए स्वयं अपने अन्दर एक प्रतिरोधक क्षमता विकसित करते हैं। केवल फसलों पर कीटनाशकों के छिड़काव से कीटों पर कोई अंकुश नहीं लगेगा। हालांकि शुरू में, यह लगता है कि कीटनाशक काम कर रहा है, लेकिन लंबे समय में कीटों में इनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता तैयार हो जाती है। यही तो शुरुआती वर्षों में मेरे साथ हुआ।’’ आगे मूर्ति बताते हैं ‘‘मेरे खेत के कीटों ने सभी कीटनाशकों के लिए अपने अन्दर प्रतिरोधक क्षमता का विकास कर लिया और पौधों में अधिक एनपीके (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम), यूरिया, पोटाश और पानी की आवश्यकता पड़ने लगी।’’
एक पहल
जापान में की जाने वाली प्राकृतिक खेती मासानोबु फुकुओका से प्रेरित होकर मूर्ति ने 1988 में प्राकृतिक खेती में कदम रखा। तब से लगभग 30 साल बीत चुके हैं और मूर्ति ने कभी रसायनिक उर्वरकों या कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया। आज भी, वह नो-टिलिंग और नो-वीडिंग दृष्टिकोण का अनुसरण करते हैं। शून्य-निवेश खेती के अपने दावे की पुष्टि करते हुए वह कहते हैं, “खेती के लिए, मैं पंचगव्य और जीवामु्रत जैसी जैविक खाद का उपयोग नहीं करता। मैं केवल प्रकाश संश्लेषण का उपयोग कर रहा हूं।’’
उनके खेत में अब कुल 3069 पेड़ हैं, जिनमें सुपारी, आम, केला, हरी बीन्स, पपीता और कई तरह की जड़ी-बूटियां शामिल हैं।
मूर्ति के खेतों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के जीवाणु और उनके लाभ
| जीवाणु | लाभ |
| बैसिली | नाइट्ा्रेजन यौगिकीकरण, भारी धातुओं में परिवर्तन एवं कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करता है। |
| म्यूकर | पर्यावरण में नाइट््रोजन परिवर्तन, कार्बनिक पदार्थों का अपघटन एवं हाइड््रोकार्बन का जैव पदार्थों में विघटन करने का कार्य करता है। |
| बैसीलस | फास्फेट को घोल के रूप में विघटित करता है। |
| आर्थोबैक्टर एसपी | मृदा के कार्बनिक पदार्थों को अपघटित करने का कार्य करता है। |
| स्यूडोमोनास | नाइट््रोजन, कार्बन, फासफोरस, गंधक ;सल्फरद्ध का रासायनिक यौगिकीकरण करता है। |
यदि मूर्ति कीटनाशकों का उपयोग नहीं कर रहे हैं, तो वह कीटों से कैसे निपट रहे हैं ? इसका जवाब देते हुए मूर्ति कहते हैं, “यह साधारण विज्ञान है जो हमें सिखाता है कि कैसे पौधे अपना भोजन बनाते हैं और कीटों के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित करते हैं। इसके अलावा, प्रकृति कभी भी एक प्रजाति को दुनिया पर राज करने की अनुमति नहीं देगी।’’ फसल विविधता के लाभों के बारे में बताते हुए, वे कहते हैं, ‘‘जब आप विभिन्न प्रकार की सब्जियां, फल एवं पौधे उगाते हैं, तो प्रत्येक फसल कीटों के लिए अति संवेदनशील हो जाती है क्योंकि बाद में उनकी वृ़िद्ध को रोकनेे के लिए अधिक प्राकृतिक दुश्मन होंगे।’’ मूर्ति कहते हैं, उनके जीवन का एक चरण उन पेड़ों की पहचान करने में बीत गया जो केले की खेती में हानिकारक हैं और उन पेड़ों को समाप्त करने के लिए उन्होंने केले के लिए सहायक पौधे ‘‘दुश्मन पेड़ों’’ को लगाने की शुरुआत की ताकि केले के बागान पनप सकें।
अपने केले के बागान में, केले के कैनोपी के नीचे के क्षेत्र में ऐसे सहायक पौधांे को शामिल किया है, जिससे, मृदा के जीवांश की रक्षा, संवर्धन और सहयोग हो। केले के सहायक पौधों से जो जैविक पदार्थ गिरता है, वह जीवांश के लिए भोजन बन जाता है। इसके अलावा, पानी के वाष्पीकरण से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है क्योंकि मिट्टी की सतह को ढ़ंक दिया गया है। इस प्रकार, मिट्टी की नमी बरकरार रहती है।
मूर्ति ने कोल्लेगल तालुक के पास एकेडमी ऑफ नेचुरल खेती की स्थापना की है। इसका एकमात्र उद्देश्य उर्वरकों के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता लाना और प्राकृतिक खेती में वापस आने के लाभों के बारे में लोगों को बताना है। वह प्रोफेसर एमडी नंजुंदस्वामी के साथ मिलकर कर्नाटक में और आसपास के लोगों को शून्य निवेश खेती को लोकप्रिय बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं, जिसमें दिखाया गया है कि कैसे प्राकृतिक खेती जलवायु परिवर्तन से लड़ने और अपने आनुवंशिक गुणों को बरकरार रखने में मदद करती है? शायद वह देश के अकेले आदमी हैं जो अपने खेत के पास सौर ऊर्जा से संचालित फूड प्रोसेसिंग प्लांट चलाते हैं।
यदि आप ‘‘घातक निवेशों’’ से जैव विविधता को मारते हैं तो आप ‘‘कृषि अपराध विज्ञान’’ का अभ्यास करते हैं।
वैज्ञानिकों के मुंह से सीधे
कुछ साल पहले उन्होंने देश भर के कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों के विशेषज्ञों को अपने खेत का अध्ययन करने और इसके गुणों और अवगुणों की पहचान करने के लिए आमंत्रित किया। किसी भी कमी या बीमारी के लक्षणों के आधार पर उन्होंने पौधों को स्वस्थ पाया। यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस, बैंगलोर के एम एन रमेश ने माना कि मूर्ति के खेत के बागवानी वाले सभी पौधे कीटों से मुक्त हैं, बहुत सारे स्वस्थ फल और नट्स लदे हुए हैं।
28 परिवारों की जड़ी-बूटियों एवं पेड़ों की 138 से अधिक प्रजातियांे को केवल सूर्य के प्रकाश का उपयोग करते हुए करके वन पारिस्थितिकी तंत्र की तरह तैयार किया गया है, जो एक बेहतर परिवेश का निर्माण कर रही हैं। जिन वैज्ञानिकों ने इनके खेत का अध्ययन किया था, उनके अनुसार ‘‘खरपतवारों और विभिन्न प्रजातियों के पेड़ों से गिरने वाले पत्ते एवं टहनियों से निकले कूड़े की एक मोटी परत (लगभग 9 इंच) से मल्चिंग की जा रही है और ये मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए बहुत सक्षम हैं। इसके अलावा, खरपतवार और गिरी हुई पत्तियों के प्राकृतिक पुनर्चक्रीकरण के माध्यम से मिट्टी में पाए जाने वाले जीव जैसे केचुएं, कीट एवं कवक भी मृदा में मौजूद हैं।
बारिश का पानी जड़ों तक नीचे जाता है और भृमिगत-जलस्तर को रिचार्ज करता है। विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार, पेड़ों की प्रजातियों द्वारा सालाना लगभग 1085 टन कार्बन अवशोषण होता है। बैंगलोर विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के रीडर और प्रधान अन्वेषक डॉ0 एन नंदिनी द्वारा मिट्टी का विश्लेषण किया गया और यह बताया गया कि, उनकी भूमि के नमूनों से पता चला कि मिट्टी में निकेल जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व के अलावा उच्च एनपीके (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम, जस्ता, लोहा, तांबा और मैग्नीशियम) सामग्री है।
उनके खेत में 300 से अधिक बागवानी और लकड़ी के पेड़ बारिश की बूंदों को सीधे जमीन पर गिरने और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं।
लेकिन, क्या उनका खेत जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से अछूता है?
उनका कहना है “आप देखते हैं, एक आम का पेड़ बदलती जलवायु का सूचक है। फूलों से लेकर परागण और फलों की परिपक्वता तक, हर संक्रमण पूर्व में अनुमानित होता था। हम जानते थे कि आम के पेड़ मध्य जनवरी से फूलने लगेंगे और हम मई तक फल काटेंगे। लेकिन इस साल, फूल दिसंबर में हुआ। इसके अलावा, एक आम के पेड़ को बढ़ने के लिए मध्यम तापमान की आवश्यकता होती है। पिछले कुछ वर्षों से मैं ध्यान दे रहा हूं कि लंबे समय तक अधिक गर्मी होने से फूल जल जाते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण किसानों के लिए फल के जीवन चक्र की भविष्यवाणी करना कठिन हो रहा है।’’
उनसे बात करते समय, कोई भी यह महसूस कर सकता है कि वह न केवल अपने आम के पेड़ों के बारे में चिंतित है, बल्कि आम के पेड़ों पर निर्भर जीवांश और कीटों के लिए भी चिंतित है। वे कहते हैं, “आप सोच सकते हैं कि इन बदलावों के साथ अनुकूलन के लिए इन छोटे जीवों को क्या करना पड़ता हैं। जीवित रहने और अगली पीढ़ी को विकसित करने में मदद करने के लिए उन्हें अपने संपूर्ण जीवनचक्र में परिवर्तन करना होता है।’’
“हम सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों से स्वास्थ्य सुरक्षा नहीं प्राप्त करते हैं, लेकिन खाद्य विविधता से ऐसा कर सकते है। इसीलिए, इन सभी वर्षों में, मैंने जमीन के नीचे के जीवों का अध्ययन किया है और मिट्टी में पोषक तत्वों की आपूर्ति करने की उनकी क्षमता को समझा है।’’
वर्तमान समय में प्राकृतिक खेती को अपनाना प्रासंगिक हो गया है क्योंकि सीमांत किसान अपनी निवेश लागत को तेजी से कम करने के साधन खोज रहे हैं और इसमें उन्हें कोई नुकसान नहीं हो रहा वरन् इन सभी वर्षों में लाभ ही कमा रहे हैं।
इस लेख को मूलतः डाउन टू अर्थ पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। आप इसे https://www.downtoearth.org.in/news/agriculture/thiskarnataka-farmer-hasn-t-used-fertilisers-pesticides-forthree-decades-now-57443.57443 पर देख सकते हैं।
सुभोजीत गोस्वामी
सुभोजीत गोस्वामी पूर्व सहायक सम्पादक डाउन टू अर्थ
Source: Nurture plants- Save the planets, LEISA India, Vol.21, No. 4, December 2019



